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त्रिमूर्ति मुरली प्वॉइंट्स प्रूफ के साथ
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पहले-2 तो त्रिमूर्ति पर ही समझाना है।... पहले-2 तो परिचय देना है बाप का। (मु.5.11.71 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
एक बात जब समझे तब और समझाना है। (मु.5.11.71 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
पहले मुख्य बात है- मात-पिता की पहचान देनी है।... मुख्य बात है मात-पिता का परिचय दिया। अब समझा है तो लिखो, नहीं तो गोया कुछ नहीं समझा। हड्डी (दिल से) समझाकर फिर लिखवाना चाहिए। बरोबर यह जगतअम्बा, जगतपिता है। वह लिख दे बरोबर बाप से वर्सा मिलता है।... एक ही त्रिमूर्ति चित्र पर पूरा समझाना है। निश्चय करते हो यह तुम्हारा माँ-बाप है। इससे वर्सा मिलना है। (मु.12.3.87 पृ.2 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
पहली मुख्य बात बुद्धि में बिठानी है कि भगवान कौन है। यह बात जब तक बुद्धि में नहीं बैठी है तब तक और कुछ भी समझाने से कुछ असर नहीं होगा। (मु.25/4/90 पृ.1 म.) मुरली प्रूफ देखें
बाप के डाइरैक्शन से ही यह चित्र आदि बनाये जाते हैं। बाबा दिव्य-दृष्टि से चित्र बनवाते थे। कोई तो चित्र अपनी बुद्धि से भी बनाते रहते हैं। (मु.ता.1.1.75 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
तुम्हारे यह चित्र सब अर्थ सहित हैं। अर्थ बिगर कोई चित्र नहीं। जब तक तुम किसको समझाओ नहीं तब तक कोई समझ न सके। समझाने वाला समझदार, नॉलेजफुल एक बाप ही है। (मु.ता.1.1.75 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
अरे, यह तो बाप ने चित्र बनाये हैं। तुम चित्रों से लिखत निकाल देते हो, तुम तो कोई डैमफुल दिखाई पड़ते हो।’ (मु.30.4.71 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
बेहद का बाप बेहद की बात ही समझाते हैं। (मु. 11.2.75 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
तुमको विचार-सागर-मंथन करने की आदत पड़ती रहेगी तो प्वाइंट्स बहुत आती रहेंगी। (मु.ता.22.3.74 पृ.3 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
मुरली बच्चों को 5-6 बार पढ़नी चाहिए, सुननी चाहिए, तब ही बुद्धि में बैठेगी। (मु.ता.31.8.73 पृ.4 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
जो ब्रह्मा का तन मुकर्रर है तो मुरली उसी के तन द्वारा जो चली है वही मुरली है और संदेशियों द्वारा थोड़े समय के लिए जो सर्विस करते हैं उनको मुरली नहीं कहा जाता है। उस मुरली में जादू नहीं है। बापदादा की मुरली में ही जादू है। इसलिए जो भी मुरलियाँ चल चुकी हैं वह सभी रिवाइज़ करनी हैं।’ (अ.वा.21.1.69 पृ.20 अंत) मुरली प्रूफ देखें
‘बाप सम्मुख आकर श्रीमत देते हैं।’ (मु.8.3.83 पृ.3 म.) मुरली प्रूफ देखें
‘श्रीमत पर चलना होता है कदम-2 पर।’ (मु.3.3.77 पृ.1 म.) मुरली प्रूफ देखें
मुरली है लाठी। इस लाठी के आधार से कोई कमी भी होगी तो वह भर जावेगी। यह आधार ही अपने घर तक और अपने राज्य तक पहुँचायेगा; लेकिन लक्ष्य से, नियमपूर्वक नहीं; लेकिन लगन से।... सच्चे ब्राह्मण की परख मुरली से होगी। मुरली से लगन अर्थात् सच्चा ब्राह्मण, मुरली से लगन कम अर्थात् हाफकास्ट ब्राह्मण। (अ.वा.23.10.75 पृ.220 अं.) मुरली प्रूफ देखें
हरेक बात की समझानी मुरली में मिलती रहती है, तो नोट करना चाहिए। बच्चे मुरली से नोट तो करते नहीं हैं, फिर बैठकर बाबा से वही बातें पूछते हैं। (मु.8.10.72 पृ.2 म.) मुरली प्रूफ देखें
सबका आधार मुरली पर है ही। मुरली तुमको न मिलेगी तो तुम श्रीमत कहाँ से लावेंगे? (मु.11.2.76 पृ.3 आ.) मुरली प्रूफ देखें
जो साकार की मुरली है, वही मुरली है। जो मधुबन से श्रीमत मिलती है, वही श्रीमत है। बाप सिवाय मधुबन के और कहीं मिल नहीं सकता।... अगर कहाँ भोग आदि के समय संदेशी द्वारा बाबा का पार्ट चलता है तो यह बिल्कुल राँग है। (अ.वा.11.4.82 पृ.365 म.) मुरली प्रूफ देखें
• श्रीमत एक बाप की है।... दादी की, दीदी की श्रीमत नहीं कहेंगे। (अ.वा.31.3.90 पृ.206 अंत) मुरली प्रूफ देखें
सम्मुख सुनना है नं.वन, टेप से सुनना है नं.टू, मुरली से पढ़ना नम्बर थ्री। (मु.27.1.73 पृ.3 अं.) मुरली प्रूफ देखें
भगवान पढ़ाते हैं तो उनका कितना रिगार्ड रखना चहिए। कितना पढ़ना चाहिए। कई बच्चे हैं, पढ़ाई का शौक नहीं।... मीठे बच्चे, बाप रिक्वेस्ट करते हैं- अच्छी रीति पढ़ो तो अच्छा पद पायेंगे। बाप के दाढ़ी की लाज रखो। (मु. 26/4/85 पृ.2 अंत, 3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
अगर कोई भी क्वेश्चन उठता है या कोई भी समस्या सामने आती है तो मुरली से रेसपॉन्स मिलता है। (अ.वा.18.02.94 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
आत्मा की कमज़ोरी से माया को जन्म मिल जाता है। कारण है अपनी कमज़ोरी और उसका निवारण है- रोज़ की मुरली। मुरली ही ताज़ा भोजन है, शक्तिशाली भोजन है। (अ.वा.14.10.81 पृ.61 अंत) मुरली प्रूफ देखें
मुरली द्वारा सर्व समस्याओं का हल मिल सकता है। (मु.20.5.77 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
मुरली से प्यार माना मुरलीधर से प्यार।’(अ.वा.18.1.07 पृ5 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
नाम ही है श्रीमत। श्री का अर्थ है श्रेष्ठ। ( अ.वा.24.09.92 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
श्रीमत है ही एक परमपिता परमात्मा की। बाकी सभी हैं आसुरी मत, जिससे असुर ही बनते हैं। (मु.ता.2.6.73 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
तुमको तो सिर्फ़ एक ईश्वर से ही पढ़ना है। बाप जो पढ़ावे, सिखावे, ओरली पढ़ना है। (मु.ता.17.3.68 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
हर एक को अपने-2 लिए बाबा से पूछना है; क्योंकि हर एक के सरकमस्टांसेज अपने हैं। (मु.17/5/76 पृ.2 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
अगर श्रीमत पर कदम होगा तो कभी भी अपना मन असंतुष्ट नहीं होगा। मन में किसी प्रकार की हलचल नहीं होगी। स्वतः श्रीमत पर चलने से नैचुरल(वास्तविक) खुशी रहेगी।... मनमत पर चलने वाले के मन में हलचल होगी। श्रीमत पर चलने वाला सदा हल्का और खुश होगा। (अ.वा.29.5.77 पृ.194 आदि) मुरली प्रूफ देखें
सिवाय श्रीमत के कोई भी श्रेष्ठाचारी बन नहीं सकता। (मु.1.11.78 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
जो कुछ श्रीमत के आधार बिगर करते हैं तो बहुत डिससर्विस करते हैं। बिगर श्रीमत करेंगे तो गिरते ही जावेंगे। बाबा ने शुरू से माताओं को निमित्त रखा है। (मु.3.1.76 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
तुम बच्चों को भी कब सुनी-सुनाई बात पर विश्वास नहीं करना चाहिए। बाप से पूछो, यह ऐसे कहते हैं। सत्य है? बाप बता देंगे।... बाबा जानते हैं, ऐसे बहुत होता है। उल्टी-सुल्टी बातें सुनाकर दिल को ख़राब कर देते। इसलिए कब भी झूठी बातें सुन अंदर में चलना न चाहिए। पूछो, फलाने ने मेरे लिए ऐसे कहा है? सफाई हो जानी चाहिए। सुनी-सुनाई बातों पर भी दुश्मनी रख देते। बाप मिला है तो बाप से पूछना चाहिए ना। (मु.18/8/70 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
मैं ज्ञान का सागर हूँ; परंतु मैं निराकार ऊपर बैठ प्रेरणा से कैसे पढ़ाऊँ? ऐसे तो कब पढ़ाई होती नहीं। प्रोफेसर घर में बैठ जाए, प्रेरणा से स्टूडेंट को पढ़ा सकेंगे? ज़रूर स्कूल में आना पडे़ ना। (मु.ता.20.8.78 पृ.1 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
प्रेरणा से अगर योग और ज्ञान सिखलाना होता फिर तो बाप कहते मैं इस गन्दी दुनिया में आता क्यों? प्रेरणा-आशीर्वाद यह सब भक्तिमार्ग के अक्षर हैं। (मु. 8.8.76 पृ.3 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
तुम कहेंगे हम हैं ईश्वरीय मत पर। प्रेरणा की तो बात ही नहीं। ईश्वरीय प्रेरणा और ईश्वरीय मत में रात-दिन का फ़र्क है। प्रेरणा का कोई अर्थ ही नहीं। प्रेरणा अर्थात् विचार। बस हम तो डाइरैक्ट ईश्वर के मत पर चलते हैं। (मु.ता.25.6.68 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
अभी (संगमयुग पर) मैं सन्मुख हूँ। मैं भी ट्रस्टी बन फिर तुमको ट्रस्टी बनाता हूँ। जो कुछ करो, पूछकर करो। मैं तो जीता-जागता हूँ ना। बाबा हर बात में राय देते रहेंगे। (मु.ता.16.3.75 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
शरीर बिगर बाप बात कैसे करेंगे? सुनेंगे कैसे? आत्मा को शरीर है तब सुनती-बोलती है। बाबा कहते, मुझे ऑरगन्स ही नहीं तो सुनूँ, देखूँ, जानूँ कैसे? (मु.ता.30.6.75 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
ज्ञानदाता, सर्व की सद्गति दाता, त्रिमूर्ति परमपिता परमात्मा शिव ही है। ब्र॰वि॰शं॰ तीनों का जन्म इकट्ठा है। सिर्फ़ शिव जयंती नहीं है; परंतु त्रिमूर्ति शिवजयंती। (मु. 27.9.75 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
गॉड इज वन, उनका बच्चा भी वन। कहा जाता है त्रिमूर्ति ब्रह्मा। देवी-देवताओं में बड़ा कौन? महादेव शंकर को कहते हैं। (मु.10.2.72 पृ.4 म.) मुरली प्रूफ देखें
पहले ऐसा नहीं कहना होता है स्थापना, पालना, विनाश। नहीं। पहले स्थापना, फिर विनाश, बाद में पालना- यह राइट अक्षर हैं। (मु.ता.19.12.89 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
ब्रह्मा द्वारा वाइसलेस वर्ल्डं देवताओं की स्थापना हो रही है। शंकर द्वारा विनाश भी होने वाला है, फिर वैष्णो राज्य होगा। (मु.ता.22.1.78 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
परमपिता परमात्मा ब्रह्मा द्वारा नई दुनियाँ की स्थापना, शंकर द्वारा विनाश कराते हैं। त्रिमूर्ति का अर्थ ही यह है- स्थापना, विनाश, पालना। (मु.ता.14.1.00 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
मुझे प्रजापिता ब्रह्मा ज़रूर चाहिए।... ब्रह्मा का बाप कौन है? कोई बतावे। (मु.ता. 4.11.73 पृ.2 म.) मुरली प्रूफ देखें
शिवबाबा के अवतरण में तो बिल्कुल फर्क नहीं पड़ सकता। पता ही नहीं पड़ता कब आया। ऐसे भी नहीं सा॰ हुआ तब आया। नहीं, अंदाज लगा सकते हैं। मिनिट-सेकेंड का हिसाब नहीं बता सकते। उनका अवतरण भी अलौकिक है। (मु.ता.7.12.89 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बाबा अनुभव अपना बतलाते हैं, शुरू में बनारस गए तो दीवारों पर गोले आदि निकालते रहते थे। समझ में कुछ भी नहीं आता था यह क्या है; क्योंकि यह तो जैसे बेबी बन गए। (मु.ता.26.7.88 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बाबा को तो हुआ है विनाश और स्थापना का सा॰हुआ। इनको भविष्य का सा॰ एक्यूरेट हुआ; परंतु पहले यह समझ में नहीं आया कि हम यह विष्णु बनेंगे।’ (मु.ता.4.8.83 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
साकार तन को ढूँढा भी यहाँ से ही है।’ (यह नहीं कहा सिंध हैदराबाद से) (अ.वा.1.2.79 पृ.259 आदि) मुरली प्रूफ देखें
इस्टर्न ज़ोन महान लक्की ज़ोन है। क्यों लक्की है? क्योंकि ब्रह्मा बाप की कर्म भूमि और प्रवेशता भूमि है। (इस्टर्न ज़ोन- बंगाल, बिहार, उड़ीसा, आसाम, नेपाल) (अ.वा.17.11.94. पृ.15 अंत) मुरली प्रूफ देखें
बंगाल में बाप की पधरामणी हुई है, प्रवेशता हुई है। (अ.वा.2.2.08 पृ.3 अं.) मुरली प्रूफ देखें
सबसे पहले बंगाल में सूर्योदय होता है तो माया का अंधकार तो आ नहीं सकता। (अ.वा.19.1.95 पृ.113 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
‘धन्धे में भी पहले अपने भाइयों को ही भागीदार बनाते हैं। यह भी ऐसे है।’ (मु.ता.27.12.84 पृ.2 अंत, 12.12.89 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
सेल्समेन जब होशियार देखा जाता है तो फिर उनको भागीदारी बनाया जाता है। ऐसे ही थोड़े ही भागीदारी मिल जाती है। (मु.10.11.88 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
10 वर्ष (साथ में) रहने वाले ध्यान में जाय मम्मा-बाबा को भी ड्रिल कराते थे। हेड होकर बैठते थे। उनमें बाबा प्रवेश कर डाइरैक्शन देते थे। कितना मर्तबा था। मम्मा-बाबा भी उनसे सीखते थे। (मु.ता.25.7.67 पृ.2 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
संगमयुग में ‘शक्ति फर्स्ट’का बाप-दादा का नारा है।... ब्रह्मा बाप की भी माता गुरु है। (अ.वा.23.1.77 पृ.40 आ.) मुरली प्रूफ देखें
बापदादा भी मीठी-2 माताओं को ‘वंदे मातरम्’कहते हैं; क्योंकि नई सृष्टि की स्थापना के कार्य में ब्रह्मा बाप ने भी माता गुरु को सब समर्पण किया। (अ.वा.3.4.83 पृ.113 आ.) मुरली प्रूफ देखें
माता गुरू बिगर कोई का उद्धार नहीं होना है। माता को ही निमित्त रखा जाता है। (मु.13.7.72 पृ.3 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
आदि देव अर्थात् साकार मनुष्य सृष्टि का रचयिता बाप। (अ.वा.19.10.75 पृ.199 आदि) मुरली प्रूफ देखें
प्रजापिता ब्रह्मा तो कहते ही तब हैं जब शिवबाबा इनमें प्रवेश करें। (मु.ता.23.9.89 पृ.1,2 / मु.ता.18.9.04 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
ड्रामा में जिसका पार्ट है उनमें ही प्रवेश करते हैं और उसका नाम ब्रह्मा रखते हैं।... अगर वह दूसरे में आवें तभी भी उनका नाम ब्रह्मा रखना पड़े। (मु.ता.17.3.73 पृ.2 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
पहले जब तक ब्राह्मण नहीं बने तब तक कोई भी कर्तव्य के निमित्त नहीं बन सकते। (अ.वा.30.6.73 पृ.115 अं.) मुरली प्रूफ देखें
जैसे यह बाबा जवाहरात का धन्धा करते थे, फिर बड़े बाबा ने कहा- यह अविनाशी ज्ञान-रत्नों का धन्धा करना है। इससे तुम यह बनेंगे। चतुर्भुज का साक्षात्कार करा दिया। अब विश्व की बादशाही लेवें या यह करें। सबसे अच्छा धन्धा यह है तो उनको मारी ठोकर। भल कमाई अच्छी थी; परन्तु बाबा ने इसमें प्रवेश होकर मत दी कि अब अल्फ और बे को याद करो। (मु.ता.12.5.87 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
मनुष्य भी कहते हैं आगे आपका ज्ञान और था। अब तो बहुत अच्छा है। (मु.ता.27.1.78 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
पहले-2 जिस द्वारा रचना रचते हैं उनको कहा जाता है प्रजापिता ब्रह्मा। वह है ग्रेट-2 ग्रैण्ड फादर। (मु.ता. 3.5.72 पृ.1 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
प्रजापिता ब्रह्मा जिसको एडम कहा जाता है, उनको ग्रेट-2 ग्रैण्ड फादर कहा जाता है। (मु. ता. 6.2.76 पृ.1 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
राम कहा जाता है बाप को। (मु.ता.6.9.70, पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
बाप जिसको भारतवासी राम भी कहते हैं; परंतु यथार्थ रीति न जानने कारण राम त्रेता वाला समझ लेते हैं। वास्तव में उनकी तो बात ही नहीं (संगम की बात है)। (’मु.ता. 10.2.75, पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
‘स्वर्ग का वर्सा बाप ही आकर देते हैं। पुकारते भी उनको हैं- हे राम! हे भगवान! मरने समय भी उनको याद करते हैं।’ (मु.ता.29.1.75, पृ.3 आदि)। मुरली प्रूफ देखें
सर्वशक्तिवान तो एक बाप ही है जिसको राम भी कहते हैं। (मु.ता.20.2.74, पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
विनाश ज्वाला प्रज्वलित कब और कैसे हुई? कौन निमित्त बना? क्या शंकर निमित्त बना या यज्ञ रचने वाले बाप और ब्राह्मण बच्चे निमित्त बने? जब से स्थापना का कार्य-अर्थ यज्ञ रचा तब से स्थापना के साथ-2 यज्ञ-कुण्ड से विनाश की ज्वाला भी प्रगट हुई। तो विनाश को प्रज्वलित करने वाले कौन हुए? बाप और आप साथ-2 हैं न! तो जो प्रज्वलित करने वाले हैं तो उन्हों को सम्पन्न भी करना है, न कि शंकर को। (अ.वा.3.2.74 पृ.13 अंत) मुरली प्रूफ देखें
इस रुद्र ज्ञान यज्ञ में असुरों के विघ्न ज़रूर पड़ेंगे। (मु.ता.14.9.87 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
10 वर्ष (साथ में) रहने वाले ध्यान में जाय मम्मा-बाबा को भी ड्रिल कराते थे। हेड होकर बैठते थे। उनमें बाबा प्रवेश कर डाइरैक्शन देते थे। कितना मर्तबा था। मम्मा-बाबा भी उनसे सीखते थे। आज वह भी हैं नहीं। उस समय यह इतना ज्ञान नहीं था। (मु.ता.25.7.67 पृ.2 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
रामचंद्र भी (अपने पूर्वजन्म सन् 1937 से 1942 के बीच में) राजयोग सीखता था। सीखते-2 फेल हो गया; इसलिए क्षत्रिय नाम पड़ा। (मु.ता.21.8.84 पृ.3 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
अच्छे-2 फर्स्ट क्लास ध्यान में जाने वाले, जिनके डाइरैक्शन पर माँ-बाप भी पार्ट बजाते थे, आज वह हैं नहीं। क्या हुआ? कोई बात में संशय आ गया। (मु.ता.8.7.78 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
अच्छे-2 बच्चे 5-10 वर्ष रह अच्छे-2 पार्ट बजाते हैं, फिर हार खा लेते। (मु.ता.8.7.78 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
मम्मा-बाबा को भी ड्रिल सिखलाते थे। डाइरैक्शन देती थी ऐसे-2 करो। टीचर हो बैठती थी। हम समझते थे यह तो बहुत अच्छा नम्बर माला में आवेंगी। वह भी गुम हो गये। यह सब समझाना पड़े न। हिस्ट्री तो बहुत बड़ी है। (मु.ता.28.5.74 पृ.2 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
बहुत-2 अच्छी बच्चियाँ जो मम्मा-बाबा के लिए भी डाइरैक्शन ले आती थीं, ड्रिल कराती थीं। उनके डाइरैक्शन पर हम चलते थे। सभी से जास्ती दुर्गति में वह चले गए। यह बच्चियाँ भी जानती हैं। (मु.28.5.69 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
कराची से लेकर मुरली निकलती आई है।... पहले बाबा मुरली नहीं चलाते थे। रात को दो बजे उठकर 10/15 पेज लिखते थे। बाप लिखवाते थे। फिर उसकी कॉपियाँ निकालते थे। (मु.ता.26.5.78 पृ.1 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
शुरू में कराची में रात को 2 बजे हम वाणी लिखते थे। (रात्रि मु. ता.25.2.68 पृ.1) मुरली प्रूफ देखें
ड्रामा अनुसार पाकिस्तान भी हो गया। वह भी शुरू तब हुआ जब तुम्हारा जन्म हुआ। (मु.ता.26.6.70 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
ड्रामा में जिसका पार्ट है उनमें ही प्रवेश करते हैं और इसका नाम ब्रह्मा रखते हैं।... अगर वह दूसरे में आवें तभी भी नका नाम ब्रह्मा रखना पड़े। (मु.ता.17.3.73 पृ.2 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
मालूम कैसे पड़ता है कि इनमें बाप भगवान है? जब नॉलेज देते हैं। (मु.ता.27.10.74 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
बाप सम्मुख आते और बच्चे अलमस्त होने के कारण देखते हुए भी नहीं देखते, सुनते हुए भी नहीं सुनते। ऐसा खेल अभी नहीं करना है। (अ.वा. 6.9.75, पृ.96 अंत) मुरली प्रूफ देखें
आप श्रेष्ठ आत्माएँ सम्मुख बाप की श्रीमत लेने वाली हो, प्ररेणा द्वारा व टचिंग द्वारा नहीं। मुखवंशावली हो, डायरैक्ट मुख द्वारा सुनते हो। (अ.वा.24.5.77 पृ.170 आदि) मुरली प्रूफ देखें
तुम्हारी बड़ी मम्मी ब्रह्मा है; परंतु कई बच्चों ने पूरा नहीं पहचाना है। अभी अजुन पहचानते रहते हैं। (मु.ता.1.5.73 पृ.2 के आदि) मुरली प्रूफ देखें
असुल रियल्टी में यह (साकार ब्रह्मा) माता है; परंतु पुरुष तन है तो माताओं की चार्ज में इनको कैसे रखा जाए; (क्योंकि दाढ़ी-मूंछ वाले को माता नहीं कहा जाता) इसलिए फिर जगत अम्बा निमित्त बनी हुई है। (मु.ता.18.5.78 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
बेहद के भी दो बाप हैं (शिव-प्रजापिता), तो माँ भी ज़रूर दो होंगी- एक जगदम्बा माँ, दूसरी यह (ब्रह्मा) भी माता ठहरी। (मु.ता. 8.2.78 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
ज्ञान सूर्य तो है बाप। फिर माता चाहिए ज्ञान चंद्रमा। तो जिस तन में प्रवेश किया है वह हो गई ज्ञान चंद्रमा माता और बाकी सब हैं बच्चे, लकी सितारे। इस हिसाब से जगदंबा भी लकी स्टार हो गई; क्योंकि सभी बच्चे ठहरे ना। (मु.ता.28.1.93 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बाप कहते हैं, मुझे रथ तो ज़रूर चाहिए। मैं साजन बड़ा हूँ तो सजनी भी बड़ी चाहिए। सरस्वती है ब्रह्मा मुखवंशावली। वह कोई ब्रह्मा की युगल नहीं है, ब्रह्मा की बेटी है। उनको फिर जगदम्बा क्यों कहते हैं; क्योंकि यह मेल है ना। तो माताओं की सम्भाल के लिए उनको रखा है। ब्रह्मा मुखवंशावली सरस्वती तो ब्रह्मा की बेटी हो गई। अभी तुम समझ गये हो। (मु.26.10.83 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
इतनी ब्रह्माकुमारियाँ हैं तो ज़रूर प्रजापिता ब्रह्मा भी होगा। (मु. ता.1.1.73 पृ.3 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
ब्रह्माकुमारियों के आगे प्रजापिता अक्षर ज़रूर लिखना है। प्रजापिता कहने से बाप सिद्ध हो जाता है। (मु. ता.7.9.77 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
• बाबा ने रात को भी समझाया बी॰के॰ के आगे ‘प्रजापिता’अक्षर ज़रूर डालना है। यह ऐसे-2 अक्षर भूलो नहीं। ब्रह्मा नाम भी आजकल बहुतों के हैं। फीमेल्स का भी ब्रह्मा नाम है; इसलिए सदैव लिखो प्रजापिता ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ। (मु.ता.25.10.90 पृ.3 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
वर्सा देने लिए ज़रूर ब्रह्मा तन में आवेंगे। यह प्रजापिता ब्रह्मा है। सूक्ष्मवतनवासी ब्रह्मा को प्रजापिता नहीं कहेंगे। वहाँ थोड़े ही प्रजा रचेंगे। हम ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ स्थूल में हैं तो प्रजापिता ब्रह्मा भी स्थूल में है। यह राज़ बैठ समझो। (मु.ता. 4.11.72, पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
तुम अगर ब्राह्मण हो तो ब्रह्मा कहाँ है? तुम्हारा बाप कहाँ है? ब्रह्मा नाम तो कह नहीं सके। फिर तुम ब्राह्मण कैसे कहते हो? ब्राह्मण तो प्रजापिता ब्रह्मा की सन्तान थे। यह भी शरीर में है ना। अब तुम हो सच्चे ब्राह्मण और वो हैं झूठे ब्राह्मण। (मु.ता. 17.9.69 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
यह मूर्ति एक ही है; परंतु हैं तीनों ही अर्थात् बाप भी बनते हैं, टीचर भी बनते हैं, गुरू भी बनते हैं। (मु. 14.6.89 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
ब्रह्मा द्वारा स्वर्ग की स्थापना करना, यह ब्रह्मा का काम नहीं। यह परमपिता परमात्मा का ही काम है। (मु.ता.18.9.83 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
जब फादर है तो ज़रूर फादर मिलना चाहिए। फादर सिर्फ़ कहे और कब मिले ही नहीं तो वह फादर हो कैसे सकता? सारी दुनिया की जो भी आत्माएँ हैं, सबसे मिलते हैं। सब बच्चों की जो भी मुराद है, आश है, वह पूर्ण करते हैं। (मु.ता.8.7.74 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
ब्राह्मणों के लिए इतने बड़े विश्व के अंदर अपना ही छोटा-सा संसार है। (अ.वा.13.6.73 पृ.97 अं.) मुरली प्रूफ देखें
गवर्मेंट को भी कहते हैं 10 वर्ष के अंदर हम यहाँ दैवी राज्य स्थापन करेंगे। न करें तो आप यह मकान आदि सब ले लेना। लड़ना चाहिए ना। बोलो, दूसरा कोई ऐसा नहीं कहेगा कि हम 10 वर्ष के अंदर यह कार्य न करें तो मकान आपका। तुम लिखत में देते हो तो भी समझते नहीं। ऐसा कोई लिखकर दे न सके। हम तो 5000 ब्राह्मणों की सही लेकर देते हैं। (मु.ता.25.7.67 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
हाहाकार के बाद जयजयकार होनी है। (मु.1.11.00 पृ.2 म.) मुरली प्रूफ देखें
तुमको तो प्रापर्टी कुछ भी बनानी नहीं है। हुक्म नहीं है। (मु.7.1.67 पृ.1मध्य) मुरली प्रूफ देखें
विकार के लिए शादी बरबादी है। .......आधा कल्प भक्तिमार्ग में विकार के लिए शादी चली। अब संगम पर हैं। अब विकार के लिए शादी करना बरबादी है। परमपिता परमात्मा शिव के साथ सगाई आबादी कर देती है। (मु.9.3.78 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
बड़े ज़ोर से धुन लगाते हैं सदगुरू अकालमूर्त.. मूर्त ही नहीं हो तो वह फिर सदगुरू कैसे बनेंगे? सद्गति कैसे देंगे? वह सत्गुरू स्वयं ही आकर अपना परिचय देते हैं। (मु.ता.27.9.84 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
स्वर्ग का रचता कोई ब्रह्मा को नहीं कहा जाता। वास्तव में तुम्हारा गुरू ब्रह्मा नहीं है। सतगुरू है ही एक। यह ब्रह्मा भी उनसे सीख रहे हैं। ऐसे नहीं कि सीखकर वह चला जावेगा तो हम गद्दी पर बैठेंगे। नहीं, ऐसे होता नहीं। सतगुरू एक ही सतगुरू है। हम सब उनसे सीखकर और सद्गति को पाते हैं। (मु.28.7.77 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
ब्रह्मा को भी पावन बनाने वाला वह एक सतगुरू है। सत बाबा, सत टीचर, सतगुरू तीनों इकट्ठे हैं। (मु.ता.25.9.98 पृ.3 आ.) मुरली प्रूफ देखें
ब्रह्मा-सरस्वती भी वास्तव में मम्मा-बाबा नहीं हैं। (मु.ता.31.3.72 पृ.1 के मध्य) मुरली प्रूफ देखें
आते भी हैं पतित दुनिया और पतित शरीर में। पतित शरीर का नाम है प्रजापिता ब्रह्मा। इनमें प्रवेश कर कहते हैं, मैं बहुत जन्मों के अंत वाले साधारण मनुष्य तन में प्रवेश करता हूँ। सूक्ष्मवतनवासी सम्पूर्ण ब्रह्मा में नहीं आते हैं।--- मैं इसमें आया हूँ। मैं सूक्ष्मवतनवासी ब्रह्मा द्वारा प्रवेश नहीं करता हूँ। मुझे तो यहाँ पतितों को पावन बनाना है। मेरे द्वारा ही वह सूक्ष्मवतनवासी ब्रह्मा पावन बना है। (मु.ता.5.11.92 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
सदैव यह अभ्यास करो कि अभी-2 आकारी, अभी-2 निराकारी। साकार में आते भी आकारी और निराकारी स्थिति में जब चाहें तब स्थित हो सकें।... इसके लिए सारा दिन अभ्यास करना पड़े, सिर्फ़ अमृतवेले नहीं। बीच-2 में यह अभ्यास करो। (अ.वा.10.12.92 पृ.117 म.) मुरली प्रूफ देखें
एडवांस पार्टी का कार्य चल रहा है। आप लोग के लिए सारी फील्ड तैयार करेंगे। उनके परिवार में जाओ, ना जाओ; लेकिन जो स्थापना का कार्य होना है उसके लिए वह निमित्त बनेंगे। कोई पावरफुल स्टेज लेकर निमित्त बनेंगे। ऐसे पावर्स लेंगे जिससे स्थापना के कार्य में मददगार बनेंगे। (अ.वा.2.8.72 पृ.349 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
सूक्ष्मवतन का तो नाम ही नहीं। वहाँ न सफेद पोशधारी होते, न जेवरधारी होते, न कोई नाग-बलाएँ पहनने वाला शंकर आदि होता है। बाकी ब्रह्मा और विष्णु का राज़ बाप समझाते रहते हैं।’(मु.ता.10.1.76 पृ.3 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
हिस्ट्री-ज्यो्ग्राफी सूक्ष्मवतन की तो है नहीं। यह सूक्ष्मवतन आदि है भक्तिमार्ग में। ज्ञानमार्ग में कुछ है नहीं। भल तुम सूक्ष्मवतन में जाते हो, सा॰ करते हो। वहाँ चतुर्भुज देखते हो। (पहले देखा था) चित्रों में (देखा) है ना तो बुद्धि में बैठा हुआ है तो ज़रूर सा॰ होंगे; परंतु ऐसी कोई चीज़ है नहीं। (मु.ता.12.5.69 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
सूक्ष्मवतन यहाँ ही बनना है। (अ.वा.22.11.72 पृ.377 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बाप ही समझाते हैं। जिसमें प्रवेश किया है वह भी सुनते हैं। (मु.ता.7.2.68 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
ऐसे नहीं बाबा का आवाहन करते हैं। नहीं, बाबा का आवाहन तो कर ही नहीं सकते। बाबा को आपे ही आना है। (मु.ता.12.4.76 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
सबसे जास्ती पतित कौन है, यह बाप बतलाते हैं। मैं उस रथ में ही प्रवेश करता हूँ। (मु.ता.26.6.68 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
(शिवबाबा) इतना ऊँच बाप है तो उनको तो राजा अथवा पवित्र ऋषि के तन में आना चाहिए। पवित्र होते ही हैं संन्यासी। पवित्र कन्या के तन में आवें; परंतु कायदा नहीं है। बाप सो फिर कुमारी पर कैसे सवारी करेंगे? (मु.ता.15.10.69 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
नम्बरवन काँटे में मैं आकर उनको नम्बरवन फूल बनाता हूँ। (मु.ता.26.2.74 पृ.2 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
बाप खुद कहते हैं मैं जब आता हूँ तो किसको भी पता नहीं पड़ता है; क्योंकि हैं गुप्त। तुम बच्चे भी हो गुप्त।... प्रवेश कब किया, कब रथ में पधारा, मालूम नहीं पड़ता। (मु.ता.26.1.68 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
लाउडस्पीकर पर कब पढ़ाई होती है क्या? टीचर सवाल कैसे पूछेंगे? लाउडस्पीकर पर रेसपांड कैसे दे सकेंगे? इसलिए थोड़े-2 स्टूडेंट को पढ़ाते हैं। (मु. 24.1.71 पृ.3 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
ड्रामा में जिसका पार्ट है उनमें ही प्रवेश करते हैं और इसका नाम ब्रह्मा रखते हैं।... अगर वह दूसरे में आवें तभी भी उनका नाम ब्रह्मा रखना पड़े। (मु.ता.17.3.73 पृ.2 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
अभी थोड़े समय के अन्दर धर्मराज का रूप प्रत्यक्ष अनुभव करेंगे; क्योंकि अब अंतिम समय है। (अ.वा.22.10.70 पृ.310 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
सज़ाएँ भी कैसे खाते हैं? भिन्न-2 शरीर धारण कर। जिस-2 को जिस रूप से दुख दिया है तो वह सा॰ करते हैं, दंड मिलता जाता है। (मु.ता.20.5.77 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
बाबा ने समझाया है सज़ा कैसे मिलती है? सूक्ष्म शरीर भी नहीं, स्थूल शरीर धारण करके सज़ा देते हैं। (मु.ता.4.10.73 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
करन-करावनहार है तो करनहार का भी पार्ट बजाया (पास्ट में ब्रह्मा द्वारा) और अभी करावनहार का भी पार्ट बजा रहे हैं। (अ.वा.ता.14.11.78 पृ.59-60) मुरली प्रूफ देखें
ब्राह्मण धर्म में तुम कितने जन्म लेते हो? (एक जन्म) कोई दो-तीन जन्म भी लेते हैं। समझो, कोई शरीर छोड़ते हैं, वह संस्कार ब्राह्मणपने के ले जाते हैं। तो संस्कार ब्राह्मणपने के होने के कारण फिर भी ब्राह्मण कुल में ही आ जाएँगे। सच्चे-2 ब्राह्मण कुल में आएँगे।’ (मु.ता.8.02.84 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
कुछ हिसाब-किताब है तो दो-तीन जन्म भी ले सकते हैं। (मु.ता.8.02.84 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
बाप समझाते हैं, ऐेसे नहीं कहेंगे, रामचन्द्र फेल हुआ। नहीं। (यज्ञ के आदि में) कोई बच्चे फेल हुए जो जाकर रामचन्द्र बनते हैं। राम वा सीता त्रेता में थोड़े ही पढ़ते हैं जो फेल हुए। यह भी समझ की बात है न। कोई सुने रामचन्द्र फेल हुआ तो कहेंगे, कहाँ पढ़ते थे? आगे (पूर्व) जन्म में ऐसा पढ़कर यह पद पाया है। (मु.ता.9.8.74 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
रामचन्द्र ने जीत नहीं पाई; इसलिए उनको क्षत्रिय की निशानी दी है। तुम सब क्षत्रिय हो न, जो माया पर जीत पाते हो। कम मार्क्‍स पास होने वाले को चन्द्रवंशी कहा जाता; इसलिए राम को बाण आदि दे दिए हैं। हिंसा तो त्रेता में भी होती नहीं। (मु.ता.23.7.74 पृ.3 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
भील, अर्जुन से तीखा हो गया। बाहर में रहने वाले ने (ज्ञान) तीर पूरा चट लिया।’ (मु.ता.3.8.74 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बाप देते हैं ज्ञान रतन। वह तो दाता हैं। बच्चे चावल मुट्ठी देते हैं, बाप तो देते हैं बेहद की बादशाही। उनकी भेंट में यह तो चावल मुट्ठी हुई ना। तुम सब सुदामा हो। देते क्या हो, लेते क्या हो! विश्व की बादशाही। (मु. 17.1.79 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
लास्ट सो फर्स्टा। फर्स्ट् सो लास्ट। (मु.ता.16.9.70 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
देरी से आने वाले आगे जा सकते हैं। (मु. 8.6.85 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
आगे चल नए भी बहुत निकलेंगे। ऐसे नहीं, पहले आने वाले ही आगे जावेंगे। बाप कहते हैं, पिछाड़ी में आने वालों को तख्त मिलता है तो तीखे हो जाते हैं। (मु.ता.8.3.76 पृ.3 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
नए-2 पुरानों से तीखे चले जाते हैं। बाप से पूरा योग लग जाए तो बहुत ऊँच चला जावेगा। सारा मदार है ही योग पर। (मु.ता.4.9.74 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
लास्ट में आने वाले बच्चों को ड्रामा अनुसार हाई जम्प द्वारा फास्ट अर्थात् फर्स्ट जाने का गोल्डन चांस विशेष मिला हुआ है। (अ.वा.22.1.76 पृ.8 आदि) मुरली प्रूफ देखें
प्रजापिता ब्रह्मा, जो होकर गए हैं, वह इस समय प्रेजेंट हैं। (मु.ता.4.3.88 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
प्रजापिता ब्रह्मा तो बहुत ऊँच है ना। इनको कहेंगे- नेक्स्ट टू गॉड।’ (मु.26.11.76 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
एकदम काँटों को बैठ शिक्षा देते हैं। प्रवेश भी काँटे में किया है। तो काँटों पर भी प्यार है ना। तब तो उनको फूल बनाते हैं।... नम्बरवन काँटे में मैं आकर उनको नम्बरवन फूल बनाता हूँ। (मु.26.2.74, पृ.2 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
लास्ट बाम्ब अर्थात् परमात्म बाम्ब है बाप की प्रत्यक्षता का। जो देखे, जो सम्पर्क में आ करके सुने उन्हीं द्वारा यह आवाज़ निकले कि बाप आ गए हैं। डाइरैक्ट आलमाइटी अथार्टी का कर्तव्य चल रहा है।... सिखाने वाला डाइरैक्ट आलमाइटी है।... इस अंतिम बाम्ब द्वारा ...हरेक के बीच बाप प्रत्यक्ष होगा। विश्व में विश्वपिता स्पष्ट दिखाई देगा। (अ.वा.ता.24.12.78, पृ.159-161 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
पतितों को पावन करने वाला भी वह है, जगत का मालिक भी वह है। (मु.ता. 29.7.78, पृ.2 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
राम राज्य राम द्वारा ही मिलता है। सतयुग से राम राज्य शुरू होता है। (मु.ता. 17.7.72, पृ.1 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
गाते भी हैं सर्व का सद्गति दाता राम; परंतु बंदर बुद्धि होने के कारण समझते नहीं कि राम किसको कहा जाता है। कहते हैं जिधर देखो राम ही राम रमता है। अभी (संगम पर) रमते तो मनुष्य हैं ना। तो इसको कहा जाता है अज्ञान अन्धियारा। (मु.ता.11.3.75, पृ.1 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
बाप को करनकरावनहार पतित-पावन कहते हैं तो ज़रूर यहाँ (सृष्टि पर) आवेंगे न। पतितों को पावन कोई प्रेरणा से थोड़े ही बनावेंगे। ज़रूर यहाँ आना पड़े। (मु.ता.24.2.74, पृ.2 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
शिवबाबा पार्ट न बजावे फिर तो कोई काम का न रहा। वैल्यु ही न होती। उनकी वैल्यु ही तब होती है जबकि सारी दुनियाँ को सद्गति में पहुँचाते हैं। तब उनकी महिमा होती है। भक्तिमार्ग में गाते हैं। (मु.ता.16.12.74, पृ.1 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
जबकि इनको सबकी सद्गति करने आना ही है तो ज़रूर किस रूप में आवेंगे ना। घर बैठे इनको आना है। (मु.ता.6.7.77, पृ.2 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
एक ही बाप बैठ सभी को पावन बनाते हैं। एक पावन बनने से सब पावन बन जाते हैं। एक पतित तो सब पतित होते हैं। (मु.ता.21.3.74, पृ.3 आदि) (तो वह एक ही है राम बाप)। मुरली प्रूफ देखें
बाप पतित-पावन आते हैं तो सारी दुनियाँ के मनुष्य मात्र तो क्या प्रकृति को भी सतोप्रधान बनाते हैं। अभी तो प्रकृति भी तमोप्रधान है। (मु.ता.20.1.75, पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
बाप कहते हैं मैं सभी धर्मों का सर्वेंट हूँ। आकर सबको सद्गति देता हूँ। सद्गति कहा जाता है सतयुग को। (मु.ता.28.3.74, पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
पतित-पावन बाप के सिवाय न कोई पावन निराकारी दुनियाँ में जा सकते, न पावन साकारी दुनियाँ में आ सकते। (मु.ता.19.4.78, पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
पतित-पावन बाप आकर जब पावन बनावें तब हम जा सकते हैं। अब बाप तुम बच्चों को पावन होने की युक्ति बता रहे हैं। (मु.ता.1.11.71, पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
पुकारती हैं- हे पतित-पावन आओ! तो ज़रूर उनको रथ चाहिए ना जिसमें आकर पावन बनावे। ज्ञान के बाण से तो पावन नहीं बनेंगे। (मु.ता.30.5.70, पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बाप जिसको भारतवासी राम भी कहते हैं; परंतु यथार्थ रीति न जानने के कारण राम त्रेता वाला समझ लेते हैं। वास्तव में उनकी तो बात ही नहीं। (मु.ता.10.2.75, पृ.1 आदि) (संगमयुग की बात है; क्योंकि संगमयुग पर ही निराकार राम शिव साकार तन प्रजापिता में प्रवेश करते हैं)। मुरली प्रूफ देखें
सर्वशक्तिवान तो एक बाप ही है जिसको राम भी कहते हैं। (मु.ता.26.2.68, पृ.3) मुरली प्रूफ देखें
वास्तव में राम भी राम (परम)पिता परमात्मा को कहते हैं। (मु.26.7.73 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
राम कहा जाता है शिवबाबा को। (मु.ता.6.9.68 पृ.3) मुरली प्रूफ देखें
प्रजापिता ब्रह्मा जिसको एडम कहा जाता उनको ग्रेट-2 ग्रैन्ड फादर कहा जाता है। मनुष्य सृष्टि में प्रजापिता हुआ। (मु.ता. 6.2.76, पृ.1 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
शिवबाबा प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा ब्र॰कु॰कुमारियों को वर्सा देते हैं। ब्रह्मा द्वारा शिवबाबा ब्राह्मण कुल की रचना रचते हैं।’ (मु.ता.1.3.76 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
मुझे ब्रह्मा ज़रूर चाहिए तो प्रजापिता ब्रह्मा भी चाहिए, जिसमें प्रवेश करके आऊँ, नहीं तो कैसे आऊँ? यह मेरा रथ मुकर्रर है। कल्प-2 इसमें ही आता हूँ। (ब्रह्मा तो टेम्पररी रथ है) (मु.ता.15.11.87 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
प्रजापिता ब्रह्मा तो ज़रूर यहाँ कल्प के संगम पर होना चाहिए तब तो ब्राह्मणों की नई सृष्टि रची जाए। (मु.ता. 17.3.78, पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
व्यक्त प्रजापिता ब्रह्मा चाहिए। सूक्ष्मवतन में तो प्रजापिता नहीं होता है। प्रजापिता ब्रह्मा यहाँ चाहिए। (मु.ता. 5.8.73, पृ.2 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
शिवबाबा... खुद कहते हैं जब मैं ब्रह्मा तन में प्रवेश करूँ तब तो ब्राह्मण सम्प्रदाय हो। ब्रह्मा यहाँ ही चाहिए। वह सूक्ष्मवतन वासी तो अव्यक्त ब्रह्मा है। मैं इस व्यक्त में प्रवेश करता हूँ। (मु.ता. 2.5.92, पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
शंकर का पार्ट कुछ भी है नहीं।... शंकर क्या करते हैं? (मु.ता.29.5.85 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
शंकर क्या करते हैं? उनका पार्ट ऐसा वंडरफुल है जो तुम विश्वास कर न सको। (मु.ता.14.5.70 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
सूक्ष्मवतनवासी ब्रह्मा, विष्णु, शंकर का भी मंदिर यहाँ है; क्योंकि आते तो हैं न। (मु.ता.25.6.73 पृ.1 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
कुमारका, बताओ, शिवबाबा को कितने बच्चे हैं? कोई कहते हैं 500 करोड़, कोई कहते एक बच्चा ब्रह्मा है। क्या शंकर बच्चा नहीं है? तब शंकर किसका बच्चा है? यह भी गुंजाइश है। मैं कहता हूँ शिवबाबा को दो बच्चे हैं; क्योंकि ब्रह्मा वह तो विष्णु बन जाते हैं। बाकी रहा शंकर तो दो हुए ना। तुम शंकर को क्यों छोड़ देते हो? भल त्रिमूर्ति कहते हैं; परंतु आक्युपेशन तो अलग-2 है ना।’ (मु.ता.14.5.72 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
यह त्रिमूर्ति तो दिखाया जाता है, उसमें वास्तव में होना चाहिए ब्रह्मा, विष्णु और शिव, न कि शंकर; परंतु बाजू में शिव (बिन्दु) को कैसे रखें तो फिर शंकर को रख दिया है और शिव (बिन्दु) ऊपर में रखा है। इससे शोभा अच्छी होती है। सिर्फ़ दो से शोभा न हो। नहीं तो वास्तव में शंकर का कोई पार्ट है नहीं। (मु.ता.7.5.69 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
शंकर द्वारा विनाश होना है। वह भी अपना कर्तव्य कर रहे हैं। ज़रूर शंकर भी है तब तो साक्षात्कार होता है। (मु.ता.26.2.73 पृ.1 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
शंकर का पार्ट प्रैक्टिकल तो बजना है; लेकिन शक्तियाँ ही संहार का पार्ट बजाती हैं, शंकर को नहीं बजाना है। शक्तियों को संहारी रूप धारण करना है जिससे संहार करना है। (अ.वा.ता. 9.10.71, पृ.194 अंत) मुरली प्रूफ देखें
ब्रह्मा के संकल्प से सृष्टि रची और ब्रह्मा के संकल्प से ही गेट खुलेगा। अब शंकर कौन हुआ, यह भी गुह्य रहस्य है। जब ब्रह्मा ही विष्णु है तो शंकर कौन? इस पर भी रूह-रूहान करना। (अ.वा.ता. 1.1.79, पृ.166 आदि) मुरली प्रूफ देखें
जो-2 मैंने काम किये हैं वह नाम रख दिये हैं। कहते हैं हर-हर महादेव। सभी के दुःख काटने (हरने) वाला। वह भी मैं ही हूँ, शंकर नहीं है। शंकर भी मेरी प्रेरणा से सर्विस पर हाजिर है, ब्रह्मा भी सर्विस पर हाजिर है। (मु.ता.4.11.73, पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
विष्णु को, शंकर को भी देह का अहंकार हो सकता है। (मु.ता.7.4.72, पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
शंकर नहीं होता तो हमको (शिवबाबा को) शंकर के साथ मिलाते भी नहीं। चित्र बनाया है तो मुझे शंकर के साथ मिला दिया है। शिव-शंकर महादेव कह देते। तो महादेव बड़ा हो जाता। (मु.ता.5.7.85, पृ.2 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
शंकर भी देवता है। उन्होंने फिर शिव-शंकर इकट्ठा कर दिया है। अब बाप कहते हैं हमने इसमें प्रवेश किया है तो तुम कहते हो बापदादा। वह फिर कहते हैं शिव-शंकर। शंकर-शिव नहीं कहेंगे, शिव-शंकर कहते हैं। (मु.ता. 11.2.75, पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बाप बहुत मोहजीत है। कितने ढेर बच्चे हैं जो काम चिक्षा पर जल मरे हैं। परमपिता परमात्मा आते ही हैं शंकर द्वारा पुरानी दुनियाँ का विनाश कराने। फिर मोह कैसे होगा? (मु.ता.1.5.71, पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
बहुत मनुष्य पूछते हैं शंकर का क्या पार्ट है ? प्रेरणा से कैसे विनाश कराते हैं? बोलो, यह तो गाया हुआ है। चित्र भी है। तो इस पर समझाया जाता है। वास्तव में तुम्हारा कोई इन बातों से कनेक्शन है नहीं। (मु.ता.23.3.78 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
शंकर के लिए कहते हैं ना एक सेकेंड में आँख खोली और विनाश। यह संहारकारीमूर्त के कर्तव्य की निशानी है। (मु.ता.4.11.76, पृ.1 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
वास्तव में तो शिव का बहुत पार्ट है, पढ़ाते हैं। शंकर क्या करते हैं? उनका पार्ट ऐसा वंडरफुल है जो तुम विश्वास कर न सको। (मु.ता.14.5.70 पृ.2 आ.) मुरली प्रूफ देखें
बाप ने समझाया है शंकर का इतना पार्ट नहीं है। वह नेक्स्ट टू शिव है। (मु.ता. 8.3.76, पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
चित्र भी दिखाया जाता है त्रिमूर्ति का। त्रिमूर्ति मार्ग नाम भी रखा है; परन्तु तीन मूर्ति ब्रह्मा-विष्णु-शंकर को कोई नहीं जानते। ब्रह्मा क्या करके गया, विष्णु और शंकर क्या करते हैं, कहाँ रहते हैं, कुछ भी नहीं जानते। (मु.ता. 30.6.01, पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
बच्चे जब स्नेह के गीत गाते हैं, तो बापदादा भी खुशी में नाचते हैं ना। इसीलिए शंकर डान्स बहुत मशहूर है। (अ.वा.14.12.83 पृ.52 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
सच जब निकलता है तो झूठ सामना करते हैं।... तुम किसको सच बताते हो तो जैसे मिर्ची लगती है।’ (मु.ता.9.5.73 पृ.3 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
पहले-2 ज्ञान का आधार ही है बाप को पहचानना अर्थात् परखना कि यह बाप का कर्तव्य चल रहा है। पहले परखने की शक्ति आवश्यक है। परखने की शक्ति को नॉलेज़फुल की स्टेज कहते हैं। (अ.वा.8.6.73 पृ.93 अंत) मुरली प्रूफ देखें
एक दिन टेलीविज़न भी निकलेगा; परंतु सभी तो देख नहीं सकेंगे। देखेंगे, बाबा मुरली चला रहे हैं। आवाज़ भी सुनेंगे। (मु.ता.23.8.73 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
घबराओ मत! बैक-बोन बाप-दादा, सामना करने के लिए किसी भी व्यक्ति(व्यक्त तन) द्वारा, समय पर प्रत्यक्ष हो ही जावेंगे और अब भी हो रहे हैं। (अ.वा.ता.16.1.75 पृ.२ आदि) मुरली प्रूफ देखें
व्यक्त में भी अब भी सहारा है। जैसे पहले भी निमित्त बना हुआ साकार तन सहारा था वैसे ही अब भी ड्रामा में निमित्त बने हुए साकार में सहारा है। पहले भी निमित्त ही थे। अब भी निमित्त हैं। यह पूरा परिवार का साकार सहारा बहुत श्रेष्ठ है। अव्यक्त में तो साथ है ही।... साकार अकेला नहीं है। प्रजापिता ब्रह्मा तो उनके साथ परिवार है।’ (अ.वा.18.1.70 पृ.166 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
ब्राह्मण बच्चों के साथ जो बाप का वायदा है कि साथ चलेंगे, साथ मरेंगे और साथ जियेंगे अर्थात् पार्ट समाप्त करेंगे।.... वह आधे में छोड़ सकते हैं क्या? स्थापना के कार्य में निमित्त बनी हुई नींव(फाउंडेशन) बीच से निकल सकती है क्या? (अ.वा.30.6.74 पृ.84-85) मुरली प्रूफ देखें
ब्रह्मा का पार्ट स्थापना के कार्य में अंत तक नूँधा हुआ है। (अ.वा.30.6.74 पृ.83 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
साकार स्नेह के रिटर्न में साकार रूप है। (अ.वा.18.1.79 पृ.229 अंत) मुरली प्रूफ देखें
मैं थोड़े समय के लिए इनमें प्रवेश करता हूँ। यह तो पुरानी जूती है। पुरुष की एक स्त्री मर जाती है तो कहते पुरानी जूती गई, अभी फिर नई लेते हैं। यह भी पुराना तन है ना। (मु.ता. 11.7.70 पृ.2 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
सबसे बड़े ते बड़ा संगमयुग का फल है जो स्वयं बाप प्रत्यक्ष रूप में मिलता। परमात्मा भी साकार रूप में साकार मनुष्य रूप में मिलने आता। इस फल में और सब फल आ जाते। (अ.वा.31.5.77, पृ.202 आदि) मुरली प्रूफ देखें
हम इतनी श्रेष्ठ आत्माएँ हैं जो स्वयं परम आत्मा बाप, शिक्षक और सतगुरू बने हैं। इससे बड़ा भाग्य और किसी का हो सकता है? ऐसा भाग्य तो कभी सोचा भी नहीं होगा कि सर्वसम्बंधों से परम आत्मा मिल जायेगा। यह असम्भव बात भी सम्भव साकार में हो रही है। तो कितना भाग्य है। (अ.वा. 3.12.79, पृ.81 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बाबा चला गया यह कह अविनाशी (साकार) सम्बंधों को विनाशी क्यों बनाते हो? सिर्फ़ पार्ट (ब्रह्मा से शंकर) परिवर्तन हुआ है। जैसे आप लोग भी (स्थूल में) सेवा स्थान चेंज करते हो ना। तो ब्रह्मा बाप ने भी (स्थूल में) सेवा स्थान चेंज किया है। (अ.वा.18.1.78, पृ.35 आदि) मुरली प्रूफ देखें
एडवांस पार्टी तो साकार शरीर परिवर्तन कर सेवा कर रही है; लेकिन कोई-2 का पार्ट अंत तक साकारी और आकारी रूप द्वारा भी चलता है। आपका क्या पार्ट है? किसका एडवांस पार्टी का पार्ट है, किसका अन्तःवाहक शरीर द्वारा सेवा का पार्ट है। दोनों पार्ट का अपना-2 महत्व है। फर्स्ट सेकेण्ड की बात नहीं। वैराइटी पार्ट का महत्व है। एडवांस पार्टी का भी कार्य कोई कम नहीं है। सुनाया ना वह जोर-शोर से अपने प्लैन बना रहे हैं। वहाँ भी नामी-ग्रामी हैं। (अ.वा.25.1.80, पृ.245 अन्त, पृ.246 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बहुत बच्चे एडवांस में भी जाने वाले हैं। उनका कोई अफसोस नहीं करना है। जाकर रिसीव करेंगे। रिसीव करने के लिए भी टाइम चाहिए ना। माँ-बाप तो पहले जाने चाहिए। (मु.ता.27.2.73, पृ.4 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
एडवांस पार्टी का कार्य चल रहा है। आप लोग के लिए सारी फील्ड तैयार करेंगे। उनके परिवार में जाओ, ना जाओ; लेकिन जो स्थापना का कार्य होना है उसके लिये वह निमित्त बनेंगे। कोई पावरफुल स्टेज लेकर निमित्त बनेंगे। ऐसे पावर्स लेंगे जिससे स्थापना के कार्य में मददगार बनेंगे। (अ.वा. 2.8.72, पृ.349 मध्य) (फील्ड, परिवार व स्टेज ऊपर सूक्ष्मवतन में नहीं होता बल्कि इसी साकार सृष्टि पर होता है।) मुरली प्रूफ देखें
एडवांस का ग्रुप, उसमें भी जो विशेष नामी-ग्रामी आत्मायें हैं उनका संगठन बहुत मजबूत है। (दिल्ली राजधानी में कृष्ण की प्रत्यक्षता रूपी दिव्य जन्म दिलाने के लिए) श्रेष्ठ जन्म, फर्स्टी जन्म दिलाने के लिए धरनी तैयार करने का वंडरफुल पार्ट इन आत्माओं द्वारा तीव्रगति से चल रहा है। (अ.वा. 18.1.80, पृ.222 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
एडवांस पार्टी में किसका पार्ट है वह दूसरी बात है। बाकी यह सीन देखना तो बहुत आवश्यक है। जिसने अन्त किया उसने सब कुछ किया।... तो जाने का संकल्प नहीं करो।... अकेले जायेंगे तो भी एडवांस पार्टी में सेवा करनी पड़ेगी। इसलिए जाना है यह नहीं सोचो, सबको साथ ले जाना है यह सोचो। (अ.वा.26.11.84, पृ.32 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
वह भी (एडवांस पार्टी) अपना संगठन मजबूत बना रहे हैं। उन्हों का कार्य भी आप लोगों के साथ-2 प्रत्यक्ष होता जायेगा। अभी तो सम्बंध और देश के समीप हैं इसलिए छोटे-2 ग्रुप उन्हों में भी कारणे अकारणे आपस में न जानते हुए भी मिलते रहते हैं।... कर्मणा वाले भी गये हैं, राज्य स्थापना करने की प्लैनिंग बुद्धि वाले भी गये हैं। साथ-2 हिम्मत, हुल्लास बढ़ाने वाले भी गये हैं।... ग्रुप तो अच्छा बन रहा है; लेकिन दोनों ग्रुप साथ-2 प्रत्यक्ष होंगे।... वह भी (एडवांस) पार्टी अपनी तैयारी खूब कर रही है। जैसे आप लोग यूथ रैली का प्लान बना रहे हो ना, तो वह भी यूथ हैं अभी।... अंदर तो बहुत जोश है; लेकिन बाहर से कुछ कर नहीं सकते हैं, यह भी एक स्थापना के राज़ में सहयोग का पार्ट है।... अभी स्थापना की गुह्य रीति-रसम स्पष्ट होने का समय समीप आ रहा है। फिर आप लोगों को पता पड़ेगा कि एडवांस पार्टी क्या कर रही है और हम क्या कर रहे हैं। अभी आप भी क्वेश्चन करते हो कि वह क्या कर रहे हैं और वह भी क्वेश्चन करते हैं कि यह क्या कर रहे हैं! लेकिन दोनों ही ड्रामा अनुसार बढ़ रहे हैं। (अ.वा. 18.1.85, पृ.133 मध्य, पृ. 134 आदि) मुरली प्रूफ देखें
रिसीव करने के लिए भी टाइम चाहिए ना। माँ-बाप तो पहले जाने चाहिए। (मु.ता. 27.2.73, पृ.4 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
मम्मा का भल शरीर नहीं है तो भी पुरुषार्थ करती रहती है, सर्विस पर जाती है। बच्चों के तन में विराजमान हो पतितों को पावन बनाने का रास्ता बताती है।’(मु. ता. 22.7.72, पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
यह मुकर्रर तन है। दूसरे कोई में कब आते ही नहीं। हाँ, बच्चों में कब मम्मा, कब बाबा आ सकते हैं मदद करने के लिए।’(मु.ता. 8.1.75, पृ.2 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
बाप भी साकार से आकारी बना, आकारी से फिर निराकारी और फिर साकारी बनेंगे। (अ.वा.ता. 15.9.74 पृ.131 के मध्य) मुरली प्रूफ देखें
वह सतगुरू स्वयं ही आकर अपना परिचय देते हैं। (मु.ता.27.9.84. पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
बाप कहते हैं मैं भी मगध देश में आता हूँ। (मु.ता.8.6.75 पृ.3 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
जैसे फर्रुखाबाद वाले कहते हैं हम उस मालिक को याद करते हैं; परन्तु वास्तव में विश्व का वा सृष्टि का मालिक तो ल॰ना॰ बनते हैं। निराकार शिवबाबा तो विश्व का मालिक बनते नहीं। तो उनसे पूछना पडे़ कि वह मालिक निराकार है वा साकार है? निराकार तो साकार सृष्टि का मालिक हो न सके। (मु. 14.1.73 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
जहाँ बाप का जन्म होता है वह भूमि सबसे ऊँच (सब तीर्थों का भानजा) तीर्थ है। (मु.ता.10.11.77 पृ.2 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
इतना ऊँच ते ऊँच बाप कैसे छी-2 गाँव में आते हैं। बच्चों को बहुत प्यार से समझाते हैं। (मु.ता.6.7.84 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
बंदरों की महफिल में आता हूँ। मैं देवताओं की महफिल में कब आता ही नहीं हूँ। जहाँ माल मिलता, 36 प्रकार के भोजन मिल सकते वहाँ मैं आता ही नहीं हूँ। जहाँ रोटी भी नहीं मिलती बच्चों को, उन्हों को आए, गोद में लेकर, बच्चा बनाए गोद में लेता हूँ। साहूकारों को गोद में नहीं लेता हूँ।’(मु.ता.15.8.76 पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
यह वंडरफुल विश्व-विद्यालय है। देखने में घर भी है; लेकिन बाप ही सत शिक्षक है। घर भी है और विद्यालय भी है; इसलिए कई लोग समझ नहीं सकते हैं कि यह घर है या विद्यालय है; लेकिन घर भी है और विद्यालय भी है; क्योंकि जो सबसे श्रेष्ठ पाठ है, वह पढ़ाया जाता है। (अ.वा.22.4.84 पृ.265 आदि) मुरली प्रूफ देखें
ज्ञान सागर को कोई महल तो नहीं है, झोपड़ी है। ज्ञान सागर झोपड़ी में रहना पसंद करते हैं। मु.ता.15.9.78 पृ.1 आदि मुरली प्रूफ देखें
सोमनाथ मंदिर में बैठने वाला शिवबाबा आज कहाँ पढ़ा रहे हैं। भक्तिमार्ग में उनको हीरों-जवाहरों के महल दे दिए हैं। कितना मान है! यहाँ इनको पहचानते नहीं तो पूरा रिगार्ड भी नहीं रखते। राजऋषि, भारत को स्वर्ग बनाने वाले, पढ़ते देखो कितना साधारण हैं। जैसे गरीबों का सतसंग होता है। साहुकारों के तो बड़े-2 हाल होते हैं। यहाँ देखो, कैसे पढ़ते हैं! (मु.ता.12.3.78 पृ.3 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
जब गोरा है तो ताज होना चाहिए और साँवरा है तो ताज कहाँ से आवेगा? उनको कहा जाता है गाँवरे का छोरा, तो ताज कहाँ से हो सकता! गाँव का छोरा तो गरीब होगा ना! (मु.ता.8.2.75 पृ.2 मध्य) (ब्रह्मा बाबा में जब शिवबाबा की प्रवेशता हुई तब वे गरीब नहीं थे बल्कि हीरे-जवाहरातों के बहुत बड़े व्यापारी थे।) मुरली प्रूफ देखें
बाबा इतना अंग्रेजी नहीं पढ़ा हुआ है। तुम कहेंगे- बाबा, अंगे्रजी नहीं जानते! बाबा कहते, वाह! मैं कहाँ तक सब भाषाएँ बैठ सीखूँगा! मुख्य है ही हिंदी, तो मैं हिंदी में ही मुरली चलाता हूँ। जिसका शरीर धारण किया है वह भी तो हिंदी ही जानता है। (मु.ता.26.11.73 पृ.2 मध्य) (ब्रह्मा बाबा की मातृभाषा तो सिंधी थी जबकि शिवबाबा बाप के रूप में जिस तन से विश्व के आगे प्रत्यक्ष होते हैं उसकी मातृभाषा हिंदी ही है।) मुरली प्रूफ देखें
सभी बच्चों पर मालिक को ही तरस पड़ेगा। बहुत हैं जो सृष्टि के मालिक को मानते हैं; परंतु वह कौन है? उनसे क्या मिलता है? वह कुछ पता नहीं है। फर्रुखाबाद में सिर्फ़ मालिक को मानते हैं। समझते हैं वह मालिक ही हमारा सब कुछ है। (मु.ता.22.2.78, पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
फर्रुखाबाद में तो मालिक को मानते हैं न। तुमने मालिक का भी अर्थ समझा है। वह है मालिक हम उनके बच्चे हैं। तो ज़रूर वर्सा मिलना चाहिए न। ( मु.ता.7.12.73 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
जैसे फर्रुखाबाद के रहवासी मालिक को मानते हैं। अनेक मत तो हैं ना। अच्छा, उस मालिक से फिर क्या मिलेगा? कुछ भी पता नहीं। मालिक को कैसे याद करें ? उनका नाम, रूप क्या है? कुछ पता नहीं है। मालिक तो सृष्टि का मालिक ठहरा ना। वह हुआ रचयिता, हम हुए रचना। (मु.ता.22.1.72 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
फर्रुखाबाद में बच्चियाँ तो हैं, परंतु अजुन इतनी ताकत नहीं। वहाँ मालिक को मानने वाले हैं तो समझाना चाहिए तुम कहते हो वह मालिक है। बाप फिर कहते हैं तुम मालिक हो। (मु.ता.22.1.72 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
फर्रुखाबाद में सिर्फ़ मालिक को मानते हैं।... ऐसे तो नहीं, मालिक से हमको दुःख मिला है। याद करते ही हैं उनको सुख-शांति के लिए। (मु.ता. 22.2.78, पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
यह घर का घर भी है और यूनिवर्सिटी भी है। इसको ही गॉड फादरली यूनिवर्सिटी कहा जाता है; क्योंकि सारी दुनियाँ के मनुष्य मात्र की सद्गति होती है। रीयल वर्ल्डं यूनिवर्सिटी यह है। घर का घर भी है। मात-पिता के सन्मुख बैठे हो। ...स्प्रीचुअल नॉलेज सिवाय स्प्रीचुअल फादर के और कोई भी मनुष्य दे नहीं सकता। (मु.ता. 18.8.76, पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
सोमनाथ नाम रखा है; क्योंकि सोमरस पिलाते हैं, ज्ञान धन देते हैं। फिर जब पुजारी बनते हैं तो कितना खर्चा करते हैं उनका मंदिर बनाने पर; क्योंकि सोमरस दिया है ना। सोमनाथ के साथ सोमनाथिनी भी होगी। (मु.ता.4.3.75 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
अहमदाबाद को सभी से ज्यादा सर्विस करनी है; क्योंकि अहमदाबाद सभी सेंटर्स का बीजरूप है। (अ.वा.ता.24.1.70 पृ.190 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
गुजरात को सैम्पुल तैयार करने चाहिए। .... गुजरात को लाइट हाउस बनाओ। न (जो) सिर्फ़ गुजरात (का) लाइट हाउस हो बल्कि विश्व लाइट हाउस। (अ.वा.4.1.79 पृ.178 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
अहमदाबाद में स्वामीनारायण के 108 मंदिर हैं। करोड़ों पैसे आते होंगे। मिलते तो स्वामीनारायण को होंगे ना। तो (अंत में अहमदाबाद पाण्डव भवन तैयार होने पर संगमयुगी विश्व महाराजन श्री नारायण व उनके सहयोगी विश्व विजेता 108 मणकों से कनेक्शन जोड़ने के लिए) सभी सेन्टर्स से भी यहाँ ही आवेंगे ना। (मु.ता. 5.3.75, पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
इनका तो ‘वही’ साधारण रूप जो है, ‘वही’ ड्रेस आदि है। फर्क नहीं। इसलिए कोई समझ नहीं सकते। (मु.ता.5.2.74, पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
वह है निराकारी, निरअहंकारी, कोई अहंकार नहीं। कपड़े आदि सब वही है, कुछ भी बदला नहीं है।... इनका तो वही साधारण तन, साधारण पहरवाइस है। कोई फर्क नहीं। बाप भी कहते हैं मैं साधारण तन लेता हूँ। मु.ता.8.4.74 पृ.1 अन्त (‘वही’ माने यज्ञ के आदि वाला) मुरली प्रूफ देखें
बाप कहते हैं मैं बहुत साधारण तन में आता हूँ। इसलिए कोई विरला पहचानते हैं। मैं जो हूँ, जैसा हूँ, साथ रहने वाले भी समझ नहीं सकते हैं। (मु.ता.4.2.74 पृ.3 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
शंकर क्या करते हैं? उनका पार्ट ऐसा वंडरफुल है जो तुम विश्वास कर न सको। (मु.ता.14.5.70 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
वही महाभारत लड़ाई है तो ज़रूर भगवान भी होगा। किस रूप में, किस तन में है, वह सिवाय तुम बच्चों के किसको पता नहीं है। कहते भी हैं मैं बिल्कुल साधारण तन में आता हूँ। मैं कृष्ण के (अर्थात् ब्रह्मा के असाधारण सुंदर) तन में नहीं आता हूँ। (मु.ता.13.8.76 पृ.3 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
तुम जानते हो कि ऊँच ते ऊँच भगवान, फिर सेकेंड नम्बर में ब्रह्मा। उनसे ऊँच कोई होता नहीं। इससे बड़ी आसामी कोई है नहीं; परंतु चलते देखो कितना साधारण हैं! कैसे साधारण रीति बच्चों से बैठते हैं! ट्रेन में जाते हैं! कोई क्या जाने कि यह कौन हैं? (मु.13.8.76 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
उन (शिव) की आत्मा का ही नाम शिव है। वह कब बदलता नहीं। शरीर बदलते हैं तो नाम भी बदल जाते। (मु.ता.24.1.75 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बाप जब आते हैं तो ब्र॰वि॰शं॰ भी ज़रूर चाहिए। कहते ही हैं त्रिमूर्ति शिवभगवानुवाच्य। अब तीनों द्वारा (एक साथ) तो नहीं बोलेंगे ना। यह बातें अच्छी रीति बुद्धि में धारण करनी हैं। (मु.ता.22.2.75 पृ.1 के आदि) मुरली प्रूफ देखें
गॉड इज़ वन, उनका बच्चा भी वन। कहा जाता है त्रिमूर्ति ब्रह्मा। देवी-देवताओं में बड़ा कौन? महादेव शंकर को कहते हैं। (मु.ता.10.2.72 पृ.4 के अन्त) मुरली प्रूफ देखें
में कहा है- ‘बड़े भाई को हमेशा बाप समान समझते हैं। यह भी बड़ा है। जैसे मम्मा भी बड़ी है। यह सारा ज्ञान के ऊपर है। जिसमें अधिक ज्ञान है वह बड़ा ठहरा। भल शरीर में छोटा हो; परन्तु ज्ञान में तीखा है तो हम समझते हैं यह भविष्य पद में बड़ा (विश्वनाथ) बनने वाला है। ऐसे बड़ों का फिर रिगार्ड भी रखना चाहिए; क्योंकि ज्ञान में तीखे हैं। (रात्रि मु.ता.3.5.73 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
हनुमान का भी दृष्टांत है न। इसलिए तुम्हारा महावीर (तीर्थंकर) नाम रखा है। अभी तो एक भी महावीर नहीं।... अभी वीर हैं। पूरा महावीर पिछाड़ी में होंगे। (मु.ता.8.1.74 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
सोमनाथ का मंदिर कितना बड़ा है। कितना सजाते हैं।... आत्मा की सजावट नहीं है वैसे परमआत्मा(परमात्मा) की भी सजावट नहीं है। वह भी बिंदी है। बाकी जो भी सजावट है वह शरीरों की है।.... अभी तुम (बच्चे) अंदर में जानते हो, हम सोमनाथ बन रहे हैं।’(यहाँ ब्रह्मा बाबा के शरीर रूपी रथ की सजावट की बात नहीं है; क्योंकि वे शरीर रहते जीते जी अपनी सम्पूर्ण निरोगी कंचन काया नहीं बना सके। (मु.ता.5.7.75 पृ.1 मध्य-अंत) मुरली प्रूफ देखें
आगे जो मरे हैं, फिर भी बड़े हो कोई 20, कोई 25 वर्ष के हो गए होंगे। ज्ञान भी ले सकते हैं। (मु. ता.17.2.75 पृ.1 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
भल कितने भी बड़े संन्यासी, पंडित, विद्वान आदि हैं; परंतु तीसरा नेत्र देने की कोई में ताकत नहीं। यह तीसरा नेत्र देने के लिए ज्ञान सूर्य बाप को आना पड़ता है। (मु.4.10.74 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
सूत ही सारा मुँझा हुआ है। सिवाय बाप के उसको कोई सुलझा न सके। (मु.20.5.72 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
तुम बच्चों को तो वण्डर खाना चाहिए। बाप बिगर कोई भी यह बातें समझा नहीं सकते। यह बाप भी है, टीचर भी है, सतगुरू भी है। यह तो हमारा बाबा है। इनका कोई माँ-बाप है नहीं। कोई कह नहीं सकते, शिवबाबा किसका बच्चा है। यह बातें बुद्धि में घड़ी-2 याद रहे- यही मन्मनाभव है। टीचर पढ़ाते हैं; परन्तु खुद कहाँ से पढ़ा नहीं है। इनको कोई ने पढ़ाया नहीं। वह नॉलेजफुल है। मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है। ज्ञान का सागर है। चैतन्य होने कारण सब कुछ सुनाते हैं। (मु.ता.17.6.84 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
तुम राजऋषि हो ना। जटाएँ खुली हों और मुरली चलाओ। साधु-सन्त आदि जो भी सुनाते हैं, वह सब है मनुष्यों की मुरली। यह है बेहद बाप की मुरली। (मु.ता.25.11.84 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
वास्तव में जटाएँ तुमको हैं। राजऋषि तुम हो। ऋषि हमेशा पवित्र रहते हैं। राजऋषि हो घरबार भी सम्भालना है। (मु.ता.4.9.77 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
विष्णु के दो रूप लक्ष्मी-नारायण के तो बच्चे पैदा होते हैं, जो तख्त पर बैठते हैं।’ (मु.ता.6.7.92 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
विष्णु की भी 4 भुजा फिर ब्रह्मा-सरस्वती और शंकर के साथ पार्वती दिखाते हैं। (मु.ता.28.9.90 पृ.1 अन्त) मुरली प्रूफ देखें
अ.वा.ता.18.1.78 पृ.35 के मध्य में भी इसका उल्लेख है- ‘हज़ार भुजा वाले ब्रह्मा के रूप का वर्तमान समय पार्ट चल रहा है तब तो साकार सृष्टि में इस रूप का गायन और यादगार है। भुजाएँ बाप के बिना कर्तव्य नहीं कर सकतीं। भुजाएँ बाप को प्रत्यक्ष करा रही हैं। कराने वाला है तब तो कर रहे हैं। मुरली प्रूफ देखें
अभी शिवजयंती आती है, तुमको त्रिमूर्ति शिव का चित्र निकालना चाहिए। त्रिमूर्ति ब्र॰वि॰शं॰ का एक्यूरेट क्यों न निकालें। (मु.ता.19.1.75 पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
शुरू-2 में अख़बार में निकाला गया था कि ओम मंडली इज़ दि रिचेस्ट इन दि वर्ल्ड । तो यही बात फिर अंत में, सबके मुख से निकलेगी। (अ.वा.13.9.74 पृ.125 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
चित्र भी दिखाए जाते हैं त्रिमूर्ति का। त्रिमूर्ति मार्ग नाम भी रखा है; परंतु तीन मूर्ति ब्र॰वि॰शं॰ को कोई नहीं जानते। ब्रह्मा क्या करके गया? विष्णु और शंकर क्या करते हैं? कहाँ रहते हैं? कुछ भी नहीं जानते। बिल्कुल ही घोर अंधियारे में हैं। (मु.ता.22.6.91 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
त्रिमूर्ति में तीन शेर देते हैं। यह तो है ही शेर, बकरी, घोड़े। तो कोर्ट ऑफ आर्म्स की भेंट में यह दिया जाता है। बाकी जानते हो वह दुनिया तो कोई है नहीं। (मु.ता.22.4.69 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
गवर्मेन्ट जो त्रिमूर्ति बनाती है उनमें होना चाहिए ब्रह्मा-विष्णु-शंकर। यह फिर जानवर लगा देते हैं। सिद्ध करते हैं सभी जानवर ही है।... बाप रचयिता का चित्र है नहीं और नीचे चक्र भी लगा हुआ है। वह समझते हैं चरखा है; परंतु है यह ड्रामा सृष्टि का चक्र। अब चक्र का नाम रखा है अशोक चक्र।... अभी तुम इस चक्र को जानने से अशोक बन जाते हो। (मु.ता.10.1.73 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
अच्छा, परमात्मा जिसको तुम याद करते हो वह क्या चीज है? तुम कहते हो अखण्ड ज्योति स्वरूप है; परंतु ऐसे है नहीं। अखण्ड ज्योति को याद करना राँग हो जाता है। याद तो एक्यूरेट चाहिए ना। सिर्फ़ गपोड़े से काम नहीं चलेगा। एक्यूरेट जानना चाहिए। (मु.ता.9.5.71 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
ख़त्म होने वाली चीज़ को याद नहीं किया जाता है। नया मकान बनता है तो फिर पुरानी से दिल हट जाती है। यह फिर है बेहद की बात। (मु.ता.28.3.76 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
मैं यहाँ (ब्रह्मा के) इस शरीर में आकर कहता हूँ कि तुमको याद वहाँ (शंकर के तन में) करना है, जहाँ अब (भविष्य में) आना है। ऐसे नहीं यहाँ (ब्रह्मा को) याद करना है। (मु.ता.19.4.78 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बाप कहते हैं कि तुम इन(ब्रह्मा) के शरीर को भी याद न करो। शरीर को याद करने से पूरा ज्ञान उठा नहीं सकते। (मु.ता.27.11.77 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
ब्रह्मा को याद करने से विकर्म विनाश नहीं होंगे। कोई न कोई पाप हो जावेगा। इसलिए उनका फोटो भी न रखो। (मु.ता.17.5.71 पृ.4 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
बाप कहते हैं जो भी आकारी वा साकारी या निराकारी चित्र हों उनको तुम्हें याद नहीं करना है। (मु.ता.2.3.78 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
विचित्र (निराकार)के साथ चित्र को याद करने से खुद भी चरित्रवान बन जाएँगे। अगर सिर्फ़ चित्र और चरित्र को याद करेंगे तो चरित्र की ही याद रहेगी। इसलिए विचित्र के साथ चित्र और चरित्र याद आए। (अ.वा.ता.18.1.70 पृ.166 आदि) मुरली प्रूफ देखें
परमपिता परमात्मा हमको सम्मुख बैठ नॉलेज देते हैं। उस बाप की ही अव्यभिचारी याद रहनी है। और कोई नाम-रूप की याद नहीं रहती है। (मु.ता.4.8.72 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बच्चे कहते हैं- बाबा, योग में रह नहीं सकते। अरे, तुमको सम्मुख कह रहा हूँ मुझे याद करो, फिर योग अक्षर तुम क्यों कहते हो? योग कहने से ही तुम भूलते हो। बाप को याद कौन नहीं कर सकते? लौकिक माँ-बाप को कैसे याद करते हो? यह भी माँ-बाप हैं ना। यह भी पढ़ते हैं। सरस्वती भी पढ़ती है। पढ़ाने वाला एक बाप ही है। (मु.15.1.84 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
इसको याद की यात्रा कहा जाता है। योग कहने से यात्रा नहीं सिद्ध होती। (मु.ता.23.6.99 पृ.2 म.) मुरली प्रूफ देखें
तुमको तो आँख बंद भी न करनी चाहिए। याद में बैठना है ना। आँखें खोलने से डरना न चाहिए। आँखें खुली हों, बुद्धि में माशूक ही याद हो। आँखें बंद करना तो गोया अंधा हो गया। यह कायदा नहीं। बाप कहते हैं याद में बैठो। ऐसे थोड़े ही कहते हैं आँखें बंद करो। आँख बंद कर वा कांध ऐसे नीचे कर बैठेंगे तो बाबा कैसे देखेंगे?.... आँखें बंद हो जाती हैं। कुछ दाल में काला होगा। और कोई को याद करते होंगे। (मु.28.3.75 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
तुम बाप को भी भृकुटी के बीच में देखेंगे। बाबा भी यहाँ है, तो भाई (ब्रह्मा की आत्मा) भी यहाँ है। (मु.ता.17.3.89 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
बच्चे कहते हैं- बाबा, याद कैसे करें? अरे, अपने को आत्मा तो समझते हो ना। आत्मा कितनी छोटी बिंदी है तो उनका बाप भी इतना छोटा होगा। तो वह पुनर्जन्म में नहीं आता है, यह बुद्धि में ज्ञान है। बाप याद क्यों नहीं आएगा? (मु.ता.2.9.89 पृ.3 अं.) मुरली प्रूफ देखें
सबसे मुख्य बात है बाप को बहुत प्यार से याद करना है। जैसे बच्चे माँ-बाप को एकदम चटक जाते हैं वैसे आत्मा को बुद्धियोग से एकदम बाप को चटक जाना चाहिए। (मु.ता.10.2.89 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
बाबा टाइम भी देते हैं। अच्छा, रात को 9 बजे सो जाओ, फिर 2 बजे, 3 बजे उठकर याद करो। (मु.3.5.75 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
याद क्या है? बाप की याद वा बाप के कर्म द्वारा बाप की याद वा बाप के गुणों द्वारा बाप की याद है तो वह याद ही हुई ना। रूप की याद हो वा नाम की वा गुण की वा कर्तव्य की, याद तो एक ही हुई ना। आप लोग बड़ा मुश्किल बना देते हो।... बाबा के सिवाए कुछ है ही क्या। जब प्रैक्टिकल में सर्व स्नेही बाप को ही समझ लिया तो फिर उसको याद करने लिए कोई प्लैन सोचा जाता है क्या? (अ.वा.4.7.71 पृ.124 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
अमृतवेले का समय अच्छा है। उस समय बाहर के विचारों को लॉकप कर देना चाहिए। कोई भी ख़याल न आए। बाप की याद रहे। (मु.2/6/85 पृ.1) मुरली प्रूफ देखें
अमृतवेले उठ बाप से रूह-रूहान करो तो सब परिस्थितियों का हल स्पष्ट दिखाई देगा। कोई भी बात हो उसका रेस्पान्ड रूह रूहान में मिल जायेगा। (अ.वा. 14/2/78 पृ. 49 ) मुरली प्रूफ देखें
अमृतवेले का ठीक करेंगे तो सभी ठीक हो जायेगा। जैसे अमृत पीने से अमर बन जाते हैं। तो अमृतवेले को सफल करने से अमर भव का वरदान मिल जाता है। फिर सारा दिन कोई भी विघ्नों में मुरझायेंगे नहीं। सदा हर्षित रहने में और सदा शक्तिशाली बनने में अमर रहेंगे। अमृतवेले जो अमर भव का वरदान मिलता है वह अगर न लेंगे तो फिर मेहनत बहुत करनी पड़ेगी। (अ.वा.8/7/73 पृ. 98 ) मुरली प्रूफ देखें
संकल्प ही नीचे लाता है ; संकल्प को ब्रेक देने की पावर होगी तो ज़्यादा समय अव्यक्त स्थिति में स्थित रह सकेंगे। अपने को आत्मा समझ उस स्वरूप में स्थित होना है। जब स्व-स्थिति में स्थित होंगे तो भी अपने जो गुण हैं वह तो अनुभव होंगे ही।... आत्मिक स्वरूप में बाबा की याद नहीं रहे- यह तो हो नहीं सकता है। ( अ.वा. 23/7/69 पृ. 108) मुरली प्रूफ देखें