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एडवांस कोर्स अर्थात् संजीवनी मुरली प्वॉइंट्स प्रूफ के साथ
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कोई भी देहधारी को गुरू न बनाओ। (मु.3.4.75 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
माया की प्रवेशता के कारण मनुष्य जो कुछ कहेंगे वह असत्य ही कहेंगे। जिसको आसुरी मत कहा जाता है । बाप की है ईश्वरीय मत।... एक ईश्वर के मत को ही श्रीमत कहेंगे। (मु. 8.3.73 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
और सभी की मत है कुमत। कलियुगी आसुरी मत। उनसे कुमत ही बनेंगे।... और कोई की मत ली तो धोखा खाया। (मु. 2.4.73 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
श्रीमत है ही एक परमपिता परमात्मा की। बाकी सभी (की) है आसुरी मत, जिससे असुर ही बनते हैं। (मु. 2.6.73 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
शूद्रकुल में है मनुष्य मत, ब्राह्मण कुल में है ईश्वरीय मत। (मु. 25.6.74 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
जो (सूर्यवंशी) वर्से के अधिकारी बनते हैं उन्हों का सर्व के ऊपर अधिकार होता है। वह (श्रीमत के अलावा) कोई भी बात के अधीन नहीं होते। (अ.वा. 24.1.70 पृ.183 आदि) मुरली प्रूफ देखें
(किसी) व्यक्ति (अर्थात् दीदी, दादी, दादा आदि) के व वैभव के अधीन रहने वाली आत्मा (खुद भी सर्व अधिकारी नहीं बन सकती और) अन्य आत्माओं को भी सर्व अधिकारी नहीं बना सकती। (अ.वा. 26.6.74 पृ.80 आदि) मुरली प्रूफ देखें
अधीन न होना अर्थात् शेर व शेरनी की चाल चलना। (अ.वा. 23.4.77 पृ.95 अंत) मुरली प्रूफ देखें
कई ब्र.कु.कु. में तो बड़ा देह-अभिमान है। उनको तो जैसे कि यहाँ पर ही राजाई चाहिए। .....बाप तो कहते हैं मैं सर्वेंट हूँ; परंतु बच्चों में देहअभिमान है जिससे ही गिर जाते हैं। (मु. 3.5.67 रही हुई प्वाइंट्स मध्य) मुरली प्रूफ देखें
सेन्टर पर किसी को भी राजाई पर ना बैठना है। (मु. 4.10.73 पृ.4 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
बाक़ी आज से सभी के लिए कौन निमित्त है वह तो आप जानते ही हैं- दीदी तो है, साथ में कुमारका मददगार है। (अ.वा. 21.1.69 पृ.21 अंत, 22 आदि) मुरली प्रूफ देखें
मुरली द्वारा सर्व समस्याओं का हल मिल सकता है। (मु. 20.5.77 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बाप कहते हैं जो धक्के खाते हैं वे मुझे नहीं जानते हैं। उनको पता नहीं है कि बाप (मुरली की पढ़ाई) पढ़ाकर वर्सा दे रहे हैं। (मु. 2.6.73 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
गुरुओं ने तो सत्यानाश कर दी है। एक गुरू (ब्रह्मा) मर गया। फिर जो गद्दी पर बैठा उनको गुरू कर लेते (अर्थात् उन्हीं की मत पर चल पड़ते हैं)। यह (ज्ञानमार्ग में) तो एक ही सद्गुरू है। (मु. 19.9.73 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
यह कोई साधू-संत आदि नहीं, जिसकी गद्दी चली आई है। यह तो शिवबाबा की गद्दी है। ऐसे नहीं कि यह (ब्रह्मा) जायेगा तो दूसरा कोई गद्दी पर बैठेगा। (मु. 20.5.77 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
ब्रह्माकुमारियों की मत मिलती है सो भी (मुरली से) जाँच करनी होती है कि यह मत राइट है वा राँग है। (मु. 31.1.70 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
तुम बच्चों को भी कब सुनी-सुनाई बात पर विश्वास नहीं करना चाहिए।... धूतियाँ ऐसे-2 खराब काम करते हैं, झूठी बातें बनाये औरों की दिल खराब कर देते। (मु. 18.8.70 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
सुनी-सुनाई बातों पर ही भारतवासियों ने दुर्गति को पाया है। (मु.30.1.71 पृ.4 आदि) मुरली प्रूफ देखें
(ब्रह्मा) मुखवंशावली है तो जो बाबा मुख से कहे वो मानना पड़े। (मु.8.10.73 पृ.3 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
बापदादा कब प्रत्यक्ष दिखाई देते, कब पर्दे के अंदर छिपा हुआ दिखाई देते; लेकिन बाप-दादा सदा (ज्ञानी तू आत्मा) बच्चों के आगे प्रत्यक्ष हैं।...‘बाबा चला गया’ यह कह अविनाशी सम्बंधों को विनाशी क्यों बनाते हो। सिर्फ (ब्रह्मा से शंकर रूप में) पार्ट परिवर्तन हुआ है। जैसे आप लोग भी सेवा स्थान चेंज करते हो ना। तो ब्रह्मा बाप ने भी सेवा स्थान (मधुबन से दिल्ली राजधानी बनाने के लिए) चेंज किया है। (अ.वा. 18.1.78 पृ.34 अंत, 35 आदि) मुरली प्रूफ देखें
संगमयुग पर तक़दीर की रेखा परिवर्तन करने वाला बाप सम्मुख पार्ट बजा रहे हैं। (अ.वा. 9.9.75 पृ.99 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
हज़ार भुजा वाले ब्रह्मा के रूप का वर्तमान समय पार्ट चल रहा है। तब तो साकार सृष्टि में इस (प्रैक्टिकल) रूप का गायन और यादगार है। भुजाएँ (रूपी बच्चे) बाप के बिना कर्तव्य नहीं कर सकतीं। भुजाएँ बाप को प्रत्यक्ष करा रही हैं। कराने वाला (साकार बाप) है तब तो कर रहे हैं।... (दूसरे) बच्चे जुदाई का पर्दा डाल देखते रहते हैं। फिर ढूँढ़ने में समय गँवाते हैं। हाज़िर-हजूर को भी छिपा देते।... बहलाने की बातें नहीं सुना रहे हैं। और ही सेवा की स्पीड़ को अति तीव्र गति देने के लिए सिर्फ स्थान परिवर्तन किया है। (कहाँ? दिल्ली की ओर) (अ.वा. 18.1.78 पृ.35 मध्य, 36 आदि) मुरली प्रूफ देखें
शंकर क्या करते हैं? उनका पार्ट ऐसा वण्डरफुल है जो तुम विश्वास कर न सको। (मु. 14.5.70 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
दिल्ली में बिरला मंदिर में एक पत्थर लगा हुआ है जिसमें लिखा हुआ है भारत कब्रिस्तान (अर्थात् अज्ञानी) था। उनको धर्मराज ने परिस्तान (ज्ञानपरियों का स्थान) बनाया। (मु. 16.12.71 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बाबा ने बताया था कि बिड़ला मंदिर में भी लिखा हुआ है (धर्मराज ने) दिल्ली को परिस्तान बनाया था। (मु. 27.7.73 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
देहली पर (यादव-कौरव-पाण्डव) सबको चढ़ाई करनी है। देहली की धरणी को प्रणाम ज़रूर करना है।... देहली के तरफ़ सभी की नज़र है। (साकार) बाप की भी नज़र है तो सर्व की भी नज़र है।... देहली से सेवा की प्रेरणा मिलनी चाहिए। जैसे सेंट्रल गवर्मेंट है तो सेंटर द्वारा सर्व स्टेशन को डायरैक्शन मिलते हैं वैसे सेवा के प्लैन्स वा सेवा को नवीनता में लाने के लिए पार्लियामेंट होनी चाहिए।... तो जैसे (राजधानी) स्थापना में नं.वन देहली रही वैसे विशेषताओं के गुलदस्ते में भी नम्बरवन बनना है।... जैसे मधुबन चरित्र भूमि है, मिलन भूमि है, बाप को साकार रूप में अनुभव कराने वाली भूमि है वैसे देहली की धरणी सेवा को प्रत्यक्ष रूप देने के निमित्त है तब देहली से आवाज़ निकलेगा। अभी सबकी बुद्धियों में यह संकल्प तक उत्पन्न हुआ है कि जो कुछ (यह मेले-मलाखड़े आदि) कर रहे हैं, जो चल रहा है उससे कुछ होना नहीं है, अभी सब सहारे टूटने लगे हैं; इसलिए ऐसे समय पर यथार्थ (साकार बाप का) सहारा अभी जल्दी ढूँढ़ेंगे। माँग करेंगे। ऐसी नई बात कोई सुनावे और आख़िरीन में चारों तरफ़ भटकने के बाद (दिल्ली में) बाप के सहारे के आगे सब माथा झुकावेंगे। समझे- अब देहली वालों को क्या करना है। (अ.वा. 26.12.78 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
घोस्ट भी आकर प्रवेश करते हैं। तो वह आत्मा हुई न। (परमात्मा नहीं हुई; क्योंकि) घोस्ट अपना कर्तव्य करते हैं तो उनका फिर पार्ट बन्द हो जाता। (मु. 12.7.73 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
(शिवबाबा) पवित्र कन्या के तन में आवें; परंतु कायदा नहीं है। बाप सो फिर कुमारी पर कैसे सवारी करेंगे? (मु. 15.10.69 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
एकदम (कामी) काँटों को बैठ शिक्षा देते हैं। प्रवेश भी काँटे में किया है।... नं.वन काँटे में मैं आकर उनको नं.वन फूल बनाता हूँ। (मु. 26.2.74 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
मैं इस तन में प्रवेश करता हूँ। यह मुकर्रर तन है। दूसरे कोई में (प्रत्यक्ष या व्यक्त रूप से) कब आते ही नहीं। हाँ, बच्चों में कब मम्मा, कब बाबा (बिंदु रूप स्टेज में) आ सकते हैं मदद करने (के) लिए। (मु. 8.1.75 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
बाप... जब आते हैं तो कोई को पता पड़ता है क्या? बाबा को पता पड़ता है क्या?... नहीं, पता भी नहीं पड़ता। (रात्रि क्लास 5.3.73 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
अभी थोड़े समय के अंदर धर्मराज का रूप प्रत्यक्ष अनुभव करेंगे; क्योंकि अब अंतिम समय है। (अ.वा. 22.10.70 पृ.310 अंत) मुरली प्रूफ देखें
सजाएँ भी (सभी को) यहाँ ही (इसी दुनियाँ में) खानी होंगी। (मु. 16.9.68 पृ.4 अंत) मुरली प्रूफ देखें
बेहद के भी दो बाप हैं। (एक शिवबाप, दूसरा प्रजापिता) तो माँ भी ज़रूर दो होंगी, एक जगदम्बा माँ, दूसरी यह (ब्रहमा) भी माता ठहरी। (एक तो ब्रह्मा, दूसरी सरस्वती) (मु. 8.2.78 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
शुरू में मम्मा-बाबा को भी साकार में कन्ट्रोल करने वाली, डायरैक्शन देने वाली, रूहानी ड्रिल कराने वाली, टीचर हो बैठने वाली आत्मा ही प्रजापिता थी; क्योंकि बाप ही माँ को कन्ट्रोल करने का अधिकारी है, बच्चे नहीं। (मु. 10.5.74 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
शिवबाबा प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा ब्र.कु.कुमारियों को वर्सा देते हैं। ब्रह्मा द्वारा शिवबाबा ब्राह्मण कुल की रचना रचते हैं। (मु. 1.3.76 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
शंकर द्वारा विनाश होना है। वह भी अपना कर्तव्य कर रहे हैं। ज़रूर शंकर भी है तब तो साक्षात्कार होता है। (मु. 26.2.73 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
सूक्ष्मवतनवासी ब्रह्मा, विष्णु, शंकर का भी मंदिर यहाँ है; क्योंकि आते तो हैं न। (मु. 25.6.73 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
वहाँ (अमरनाथ में) तो शिव का चित्र दिखाते हैं। अच्छा, शिव किसमें बैठा? शिव और शंकर दिखाते हैं। शिव ने शंकर में बैठ कथा सुनाई। ऐसा हिसाब हो जाता है। (मु. 6.10.76 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
कुमारका! बताओ शिवबाबा को कितने बच्चे हैं कोई कहते हैं 500 करोड़। कोई कहते एक बच्चा ब्रह्मा है। क्या शंकर बच्चा नहीं है तब शंकर किसका बच्चा है यह भी गुंजाइश है। मैं कहता हूँ शिवबाबा को दो बच्चे हैंय क्योंकि ब्रह्मा वह तो विष्णु बन जाते हैं। बाक़ी रहा शंकर तो दो हुये ना। तुम शंकर को क्यों छोड़ देते हो (मु. 14.05.72 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
मैं तो थोड़े समय (अधिकतम् 33 वर्ष) के लिए इनमें प्रवेश करता हूँ। यह (ब्रह्मा) तो पुरानी जूती है। पुरुष की एक स्त्री मर जाती है तो कहते हैं पुरानी जूती गई, अब फिर नई लेते हैं। यह भी पुराना तन है ना। (मु. 1.6.99 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
एक दिन टेलीविजन भी निकलेगा; परन्तु सभी तो देख नहीं सकेंगे। देखेंगे, बाबा मुरली चला रहे हैं। आवाज़ भी सुनेंगे। (मु. 23.8.73 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बाप (शिव) भी साकार से आकारी बना, आकारी से फिर निराकारी (बिंदु) और फिर साकारी बनेंगे। (अ.वा. 15.9.74 पृ.131 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
यह तो शिवबाबा का रथ है ना। (जो रथ) सारे वर्ल्ड को हैविन बनाने वाला है। (मु. 11.1.75 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
घबराओ मत! बैकबोन बापदादा, सामना करने के लिए किसी भी व्यक्त तन द्वारा समय पर प्रत्यक्ष हो ही जावेंगे और अब भी हो रहे हैं। (अ.वा. 16.1.75 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
लास्ट (ज्ञान) बॉम्ब अर्थात् परमात्म बॉम्ब है बाप की प्रत्यक्षता का। जो देखे, जो (बाप के डायरैक्ट) सम्पर्क में आ करके सुने उन्हीं द्वारा यह आवाज़ निकले कि बाप आ गए हैं, डायरैक्ट ऑलमाइटी अॅथॉर्टी का कर्तव्य चल रहा है।... अंतिम पावरफुल बॉम्ब परमात्म प्रत्यक्षता अब शुरू नहीं की है।.......सिखाने वाला डायरैक्ट ऑलमाइटी है, ज्ञानसूर्य साकार सृष्टि पर उदय हुआ है यह (बात) अभी गुप्त है। (क्योंकि दूसरी ओर मधुबन में ज्ञान चंद्रमा ब्रह्मा अभी तक अस्त नहीं हुआ)... इस अंतिम बॉम्ब द्वारा... हरेक (ब्राह्मण) के बीच बाप प्रत्यक्ष होगा। (संगमयुगी) विश्व में विश्वपिता स्पष्ट दिखाई देगा। (अ.वा. 28.12.79 पृ.159, 161) मुरली प्रूफ देखें
जब विश्वराजन बनेंगे तो विश्व (अर्थात् 500/700 करोड़) का बाप ही कहेंगे ना। विश्व के राजन विश्व के बाप हैं ना। (अ.वा. 6.8.70 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
(ब्रह्मा की संतान) ब्राह्मण भी यहाँ ही हैं। जिसको ग्रेट-ग्रेट ग्रैंड फादर कहा जाता है। (मु. 28.9.74 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
अनेक मत वाले सि़र्फ एक बात को मान जाएँ कि हम सबका बाप एक है और वही अब (प्रैक्टिकली डायरैक्ट) कार्य कर रहे हैं। (अ.वा. 23.1.79 पृ.239 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
जब सर्वशक्तिवान ज्ञान सूर्य के साथ अटूट संबंध है तो अपने आप में भी ऐसे ही हर बात स्पष्ट देखने में आयेगी। और जो चलते-2 पुरुषार्थ में माया का अंधकार वा धुँध आ जाता है, जो सत्य बात को छिपाने वाले हैं वह हट जायेंगे। (अ.वा. 22.1.70 पृ.170 आदि) मुरली प्रूफ देखें
इस वर्ष में कोई नई बात ज़रूर होनी है। सन् 76 में जिस (बाप की प्रत्यक्षता) का प्लैन बनाया है; लेकिन निमित्त बनना पड़ता है।... जो निमित्त बनता है, उसका सारे ब्राह्मण कुल में नाम बाला होता है। यह भी प्राइज़ है। (अ.वा. 31.10.75 पृ.255 अंत) मुरली प्रूफ देखें
अब लक्ष्य यह रखो कि सब मिलकर अपनी (दिल्ली) राजधानी पर विजय का झण्डा लहरावेंगे और सब पर विजय पावेंगे।... अब यह रिजल्ट आउट होनी है। राख कौन बनते हैं और कितने बनते हैं और कोटों में से, लाखों में से एक कौन निकलते हैं, वह भी देखेंगे। (अ.वा. 23.9.73 पृ.160,161) मुरली प्रूफ देखें
यह (सन् 76) वर्ष है जिसको (बाप की) प्रत्यक्षता वर्ष प्रसिद्ध किया है... ड्रामा अनुसार होगा वह तो ठीक है; लेकिन निमित्त कोई तो बनता है। जैसे (शुरू में यज्ञ की) स्थापना का पार्ट ड्रामा में था; लेकिन निमित्त एक ब्रह्मा (बना) ना। हिम्मत की, प्रैक्टिकल में आए, निमित्त बने तब तो हुआ। जैसे स्थापना के निमित्त साकार रूप में ब्रह्मा बने, ब्रह्मा तो अव्यक्त हो गए। अब साकार रूप में विनाश कराने वाले कौन? (अ.वा. 4.2.76 पृ.1 आदि, पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
ब्रह्मा के संकल्प से (ब्राह्मणों की) सृष्टि रची और ब्रह्मा के संकल्प से ही गेट खुलेगा। अब शंकर कौन हुआ? यह भी गुह्य रहस्य है- जब ब्रह्मा ही विष्णु है तो शंकर कौन? इस पर भी रूह-रिहान करना। (अ.वा. 1.1.79 पृ.166 आदि) मुरली प्रूफ देखें
ऐसा कोई आश्रम सारे का सारा पलट पड़े फिर तो सभी की आँख खुल जाए। बहुत समझते भी हैं जबकि यह महाभारत लड़ाई है, तो ज़रूर भगवान भी होना चाहिए। (मु. 4.4.75 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
आज सभी बच्चे विशेष साकारी याद-प्रेम स्वरूप की स्मृति में ज़्यादा रहे। साकारी सो आकारी (अर्थात् साकार होते हुए भी आकारी अवस्था वाला)। बाप सभी (आदि रतन ज्ञानी बच्चों) के नयनों में समाए हुए हैं।... (परंतु) (अज्ञानी) बच्चे बाप से पूछते हैं- हम सबसे पहले अकेले वतनवासी क्यों?... बाप बोले, जैसे आदि में स्थापना के कार्य प्रति साकार रूप में निमित्त एक ही बने, अलफ की तार पहले एक को आई, सेवा अर्थ सर्वस्व त्यागमूर्त एक अकेले बने। जिसको (सम्मुख) देख बच्चों ने फॉलो फादर किया।...(वैसे ही) अब अंत में भी बच्चों को ऊँचा उठाने के लिए वा अव्यक्त बनाने के लिए बाप (अर्थात् प्रजापिता) को ही (जीते जी) अव्यक्तवतनवासी बनना पड़ा। इस साकारी दुनिया से ऊँचा स्थान अव्यक्त वतन (बुद्धियोग द्वारा) अपनाना पड़ा। अभी बाप कहते हैं बाप (प्रजापिता) समान स्वयं को और सेवा को सम्पन्न करो। (अ.वा. 18.1.79 पृ.227 आदि, पृ.228 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बाप (प्रजापिता) समान (बुद्धियोग से जीते जी) अव्यक्त वतनवासी बन जाओ। (अ.वा. 18.1.79 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
(बुद्धि से) ऊपर जाना माना मरना, शरीर (भान) छोड़ना। मरना कौन चाहते? यहाँ तो बाप ने कहा है तुम इस शरीर को भी भूल जाओ। जीते जी मरना तुमको सिखलाते हैं। (मु. 25.8.74 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बाप सम्मुख आते और बच्चे (धन, पद, मान, मर्तबे में) अलमस्त होने के कारण देखते हुए भी नहीं देखते, सुनते हुए भी नहीं सुनते। (अ.वा. 6.9.75 पृ.96 अंत) मुरली प्रूफ देखें
साकार स्नेह के रिटर्न में साकार रूप (मौजूद) है। (अ.वा. 18.1.79 पृ.229) मुरली प्रूफ देखें
पिछाड़ी में बहुत मज़े देखेंगे। शुरुआत से भी जास्ती। (मु. 6.11.82 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
जैसे शुरू में बाबा ने तुम बच्चों को बहलाया है तो पिछाड़ी वालों का भी हक़ है। (मु. 12.5.73 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
शुरू-2 में जब बाबा आया, मकान तो छोटा ही था। मम्मा के कमरे से भी छोटा था। उसमें ही परमपिता परमात्मा ने आकर हॉस्पिटल अथवा यूनिवर्सिटी खोली। फिर धीरे-2 मकान बनते गए। पहले तो एक छोटी गली में मकान था तो (बाप समान सम्पूर्ण ब्राह्मण) बच्चों का भी यही कर्तव्य है। (क्योंकि आदि सो अंत)(मु. 23.7.77 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
दिल्ली दरबार कहते हैं तो दिल्ली को अपनी राज्य दरबार बनाई है? राजाई तैयार हो गई है? दरबार में कौन बैठेंगे? दरबार में पहले तो महाराजा-महारानियाँ चाहिए।... दिल्ली वालों को राज्य का फाउंडेशन (नींव) लगाना है। (अ.वा. 27.5.77 पृ.177 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
अपने फ़रिश्ते स्वरूप का अनावरण कब करेंगे? आपे ही करेंगे या चीफ गेस्ट (अर्थात् चीफ जस्टिस धर्मराज) को बुलायेंगे? (अ.वा. 2.2.76 पृ.33 अंत) मुरली प्रूफ देखें
विशेष बॉम्बे और देहली में आदि रतन ज़्यादा हैं। विश्व सेवा की स्थापना के कार्य में बॉम्बे और देहली का विशेष सहयोग है। समय पर सहयोगी बनने वालों का महत्व होता है। (अ.वा. 29.11.78 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
(42 वीं त्रिमूर्ति) शिवजयंती तो आई कि आई। धामधूम से मनाना होगा। देहली जैसे गाँव (गीतापाठशाला) में ही धामधूम हो सकती है। (मु. 29.11.73 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
मेला एक ही लगता है (कलह-कलेश काटने वाले बेहद) कलकत्ते (कल$कट्टा) में... वह (सागर) जड़ है। दिल्ली में (चैतन्य ज्ञान सागर बाप) जावेंगे तो वहाँ भी सागर और ब्रह्मपुत्रा का (मिलन) मेला (होना) है। (मु. 25.6.73 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
(बाप प्रजापिता की) सम्पूर्णता सम्पन्नता का झण्डा और राज्य का झण्डा दोनों देहली में होना है। तो देहली निवासी फ्लैग सेरीमनी की डेट फिक्स करें- अभी से तीव्र तैयारियाँ करने लग जाना है।... देहली पर सबको चढ़ाई करनी है। देहली की धरनी (माता) को प्रणाम ज़रूर करना है।... देहली के तरफ़ सभी की नज़र है। (विश्वपिता बनने वाले) बाप की भी नज़र है।... आख़िरीन में चारों तरफ़ भटकने के बाद बाप के सहारे के आगे सब माथा झुकावेंगे। समझे, अब देहली वालों को क्या करना है? (अ.वा. 26.12.78 पृ.153,155,157) मुरली प्रूफ देखें
दिल्ली में कमाल कब करेंगे? दिल्ली का आवाज़ ही चारों ओर फैलता है। दिल्ली में नाम बाला होना, (सारे) भारत में नाम बाला होना है। इतनी ज़िम्मेवारी दिल्ली वालों को उठानी है। (अ.वा. 24.1.70 पृ.189 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
गेट खोलने वाले कौन हैं? बाप अकेला कुछ नहीं करेगा। कब कुछ किया है क्या? अभी भी अकेले नहीं हैं। (क्योंकि भुजाओं रूपी शिवशक्तियाँ तो साथ हैं ही)... वायदा क्या किया है? साथ रहेंगे, साथ चलेंगे, साथ खावेंगे-पियेंगे- यह वायदा है ना! अभी वायदा बदल गया है क्या? अभी भी वही वायदा है, (देह रूपी मिट्टी के सिवाय कुछ भी) बदला नहीं है। चले गये- ऐसा नहीं है।... साकार में तो फिर भी कई प्रकार के (यज्ञ की पालना आदि अलौकिक परिवार के) बंधन थे। अभी तो निर्बंधन हैं अभी तो और ही तीव्र गति है- बाप को बुलाया और हाज़िरा हुजूर। (मु. 5.12.78 पृ.103 अंत, 104 आदि) मुरली प्रूफ देखें
यह जन्म-2 का साथ है। भविष्य में भी (ब्रह्मा बड़ी माँ और प्रजापिता) बाप का तो साथ रहेगा न। शिव बाप साक्षी हो जायेंगे और ब्रह्मा बाप (अर्थात् रामकृष्ण की आत्माएँ) साथी हो जायेंगे। (अ.वा. 7.12.78 पृ.111 आदि) मुरली प्रूफ देखें
देहली से आवाज़ निकलना चाहिए। वहाँ झट नाम होगा। (दिल्ली में नाम बाला होने के बीज तो सन् 76 में बाप की प्रत्यक्षता वर्ष में ही पड़ चुके थे) परंतु अजुन देरी दिखाई पड़ती है। अबलाओं-गणिकाओं को बाप कितना ऊँच आकर उठाते हैं। तुम ऐसे-2 का उद्धार जब करेंगे तब नाम बाला होगा। (मु. 23.8.77 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
दिल्ली वालों का उसमें भी विशेष शक्ति सेना का विशेष गुण कौन-सा है? यज्ञ की स्थापना के कार्य में दिल्ली की शक्ति सेना का सुदामा मिसल जो चावल चपटी काम में आई है, वह बहुत महत्व के समय काम में आई है।... दिल्ली की निमित्त सेवा अन्य सेवा स्थानों (अर्थात् सेवाकेंद्रों को स्वाधीन करने) के निमित्त एग्ज़ाम्पुल बने। जैसे आदि में विशेषता दिखाई वैसे अभी भी दिखाओ।... सबकी नज़र दिल्ली पर है। (अ.वा. 26.5.77 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
बाप-दादा का माताओं से आदि से विशेष स्नेह है। यज्ञ की स्थापना में भी विशेष किसका पार्ट रहा? निमित्त कौन बने? और अंत में भी (बाप की) प्रत्यक्षता और विजय (जय सियराम) का नारा लगाने में निमित्त कौन बनेंगे? माताएँ। (अ.वा. 23.1.76 पृ.17 आदि) मुरली प्रूफ देखें
शक्ति सेना को बापदादा विशेष चढ़ती कला का सहयोग देते हैं; क्योंकि शक्तियों को, माताओं को सबने नीचे गिराया। अब बाप आ करके ऊँचा चढ़ाते हैं। अपने से भी आगे शक्तियों को रखते हैं। (अ.वा. 7.12.78 पृ.111 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
जब डायरैक्ट (बाप का) साथ निभाने का वायदा है तो वायदे का फ़ायदा उठाओ। इस समय दो बाप (शिव और प्रजापिता) के साथ (अव्यक्त में नहीं) व्यक्तिगत अनुभव हो सकता है, फिर सारे कल्प में नहीं होगा। (अ.वा. 23.1.76 पृ.22 आदि) मुरली प्रूफ देखें
आप श्रेष्ठ आत्माएँ ज्ञान सागर बाप द्वारा डायरैक्ट सर्व प्राप्ति करने वाली हो और जो भी आत्माएँ हैं वह (सतयुग में नं.वार ल.ना. बनने वाली) श्रेष्ठ आत्माओं के द्वारा कुछ न कुछ प्राप्ति करती हैं; लेकिन आप डायरैक्ट बाप द्वारा सर्व प्राप्ति करने वाले हो। (अ.वा. 12.1.79 पृ.207 अंत) मुरली प्रूफ देखें
हम किस बागवान के बगीचे के फूल हैं। डायरैक्ट बाप फूलों को अपने स्नेह का पानी दे रहे हैं, तो कितने लकी हो गये! (अ.वा. 1.2.79 पृ.261 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
चारों ओर से एक आवाज़ निकले कि हमारा बाप गुप्त वेष में आ गया है, (चला गया नहीं)। जैसे बाप ने आप (बीजरूप आदि रतन पाँच पांडवों) बच्चों को गुप्त से प्रत्यक्ष किया वैसे आप सबको फिर बाप को प्रत्यक्ष करना है। सब शक्तियाँ मिलकर अंगुली देंगी तो सहज ही हो जायेगा“। (अ.वा. 8.1.79 पृ.193 अंत) मुरली प्रूफ देखें
कितनी बड़ी लॉटरी मिलती है... घर बैठे इतनी श्रेष्ठ प्राप्ति है, घर बैठे भगवान मिल गया ना! तो अपने भाग्य की सदा महिमा करते रहो,... संगमयुग पर विशेष प्राप्ति बाप से मिलन मनाने की है। (अ.वा. 3.2.79 पृ.269 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
कोटों में कोई, कोई में कोई यह हम (बीजरूप) आत्माओं का गायन है; क्योंकि साधारण रूप में आये हुये बाप को और बाप के कर्तव्य को जानना यह कोटों में कोई का पार्ट है। जान लिया, मान लिया और पा लिया। जब विश्व (500 करोड़) का मालिक अपना हो गया (शिवबाप विश्व का मालिक नहीं बनता) तो विश्व अपनी हो गई ना। जैसे (मनुष्य सृष्टि का) बीज (प्रजापिता) अपने हाथ में है तो वृक्ष तो है ही ना। जिसको ढूँढ़ते थे उसको पा लिया। घर बैठे भगवान मिला तो कितनी खुशी होनी चाहिए?... बाप ने स्वयं आकर अपना बनाया।... जो स्वप्न में भी नहीं था वह प्राप्ति हो गई, बाप मिला सब कुछ मिला। (अ.वा. 13.1.78 पृ.27 अंत) मुरली प्रूफ देखें
सर्व सम्बंध निभाने वाले परम$आत्मा को अपना बना लिया, जब चाहो, जैसा सम्बंध चाहो वैसा ही सम्बंध का रस एक द्वारा सदा निभा सकते हो और सम्बंध भी ऐसे जो देने वाले होंगे, लेने वाले नहीं। कभी धोखा भी नहीं देने वाले, सदा प्रीति की रीति निभाने वाले- ऐसे (प्रैक्टिकली) अमर सम्बंध अनुभव करते हो ना! (अ.वा. 23.1.79 पृ.236 अंत) मुरली प्रूफ देखें
भक्तिमार्ग में यही पुकार देते हैं- कि थोड़े समय के साथ का अनुभव करा दो, झलक दिखा दो; लेकिन अब क्या हुआ? सर्व सम्बंध में साथी हो गये। झलक वा दर्शन अल्पकाल के लिए होता है; लेकिन सम्बंध सदाकाल का होता है। तो अब बाप के समीप सम्बंध में आ गये कि अभी तक भी जिज्ञासु हो? जिज्ञासा तब तक होती जब तक प्राप्ति नहीं। अब जिज्ञासु नहीं अधिकारी हो। हर सेकेड का साथ है, हर सेकेण्ड में सम्बंध के कारण समीप हैं। (अ.वा. 7.12.78 पृ. 412 अंत) मुरली प्रूफ देखें
जितना यहाँ समीपता द्वारा सदा साथ हैं उतना ही मूलवतन में भी ऐसी आत्माएँ साथ-2 हैं और स्वर्ग में भी हर दिनचर्या में सम्बंध का साथ है। जैसे यहाँ तुम्हीं से बोलूँ, तुम्हीं से खेलूँ, तुम्हीं से साथ निभाऊँगा, वैसे भविष्य में भी (होगा)... जो यहाँ बाप के गुण और संस्कार के समीप, सर्व सम्बंधों से बाप का साथ अनुभव करते हैं वही वहाँ रॉयल कुल के समीप सम्बंध में आवेंगे। (अ.वा. 8.1.79 पृ.188 अंत) मुरली प्रूफ देखें
युगल स्मृति से पुराना सौदा कैन्सिल कर सिंगल बनो।... माया के सम्बंध को डायवोर्स दे दिया, बाप के सम्बंध से सौदा कर दिया, इसी से मायाजीत, मोहजीत, विजयी रहेंगे।..... मोस्ट लकी हो। घर बैठे भगवान मिल जाये तो इससे बड़ा लक और क्या चाहिए।... बाप आपके पास पहले आया, पीछे आप आये हो। इसी अपने भाग्य का वर्णन करते सदा खुश रहो- भगवान को मैंने अपना बना लिया। (अ.वा. 1.12.78 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
बापदादा के (दिल्ली रूपी) दिलतख्तनशीन हो।... सर्व आत्माएँ तड़प रही हैं, बेसहारे हैं और आप थोड़ी सी आत्माएँ (साकार) सहारे के अंदर सहारे का अनुभव कर रही हो- तो विशेष आत्मा हुई ना! (अ.वा. 1.12.78 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
अब जो कुछ प्रैक्टिकल हो रहा है फिर उनका भक्तिमार्ग में गायन होगा। (मु. 29.3.74 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
महिमा भी वह होनी चाहिए जो आपके सम्पूर्ण स्वरूप की है। (अ.वा. 20.1.74 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
सदा सुहागिन का गायन पटरानियों के रूप में है। फिर पटरानियों में भी नम्बर हैं- कोई सदा साथ रहती हैं और कोई कभी-कभी। उन्होंने देहधारी (देहभान में रहने वालों) की कहानी बना दी है; लेकिन है आत्माओं और परमात्मा (के प्रैक्टिकल पार्ट) की कहानी।...कोई विशेषता राधे के पार्ट में है और कोई विशेषता पटरानियों वा गोपियों के पार्ट में है। इसका भी गुह्य रहस्य है। मिलन मेला मनाने वाले कौन? सर्व सुखों का अनुभव परमात्म पार्ट से है- यह भी सबसे विशेष भाग्य है। इसका भी आत्माओं के विशेष (रुद्र और विजयमाला के) पार्ट से सम्बंध है। (अ.वा. 23.1.79 पृ.238 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
यह शिवरात्रि प्रत्यक्षता की शिवरात्रि करके मनाओ। सब (ब्राह्मणों) का अटेंशन जाय- यह कौन हैं और किसके प्रति सम्बंध जोड़ने वाले हैं। सब अनुभव करें कि जो आवश्यकता है वह यहाँ से ही मिल सकती है, सब सुखों के खान की चाबी यहाँ (स्वर्ग की राजधानी दिल्ली में) ही मिलेगी। (अ.वा. 3.2.79 पृ.267 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
जैसे उन (हद के) राजाओं को रानियों की परवाह नहीं रही, छोड़ दिया, वैसे ही अब (बेहद की) रानियाँ निकलेंगी जो (बेहद के) राजाओं की परवाह नहीं करेंगी। (मु. 14.4.73 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बाबा को तो हुआ है। विनाश का सा. और स्थापना का सा. हुआ है।... परंतु पहले यह समझ में नहीं आया कि हम यह विष्णु बनेंगे। (मु. 6.5.73 मुरली पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
10 वर्ष से रहने वाला, ध्यान में जा(ती) थी। मम्मा-बाबा को भी ड्रिल कराती थी। उनमें बाबा प्रवेश कर डायरैक्शन देते थे। कितना मर्तबा था! आज वह भी हैं नहीं। (क्योंकि) उस समय यह इतना (ड्रामा का) ज्ञान नहीं था। (मु. 23.7.69 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
उन (शिव) की आत्मा का ही नाम ‘शिव’ है। वह कब बदलता नहीं। शरीर बदलते हैं तो नाम भी बदल जाते। (मु. 24.1.75 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बाप जब आते हैं तो ब्रह्मा, विष्णु, शंकर भी ज़रूर चाहिए। कहते ही हैं त्रिमूर्ति शिव भगवानुउवाच। अब तीनों द्वारा (एक साथ) तो नहीं बोलेंगे ना। यह बातें अच्छी रीति बुद्धि में धारण करनी हैं। (मु. 22.2.75 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
गॉड इज़ वन, उनका बच्चा भी वन। कहा जाता है ‘त्रिमूर्ति ब्रह्मा’। देवी-देवताओं में बड़ा कौन? महादेव शंकर को कहते हैं। (मु. 10.2.72 पृ.4 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
बड़े भाई को हमेशा बाप समान समझते हैं।... यह सारा ज्ञान के ऊपर है। जिसमें अधिक ज्ञान है वह बड़ा ठहरा। भल शरीर में छोटा हो, परन्तु ज्ञान में तीखा है तो हम समझते हैं यह भविष्य पद में बड़ा (विश्वनाथ) बनने वाला है। (मु. 3.5.73 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
ब्रह्मा के ज्येष्ठ पुत्र सनतकुमार का जिक्र आया है। वास्तव में ब्रह्मा-सरस्वती को आदिदेव और आदिदेवी नहीं कह सकते; क्योंकि सरस्वती ब्रह्मा की बेटी थी; परंतु वही ब्रह्मा-सरस्वती अपना पतित शरीर त्याग कर जब 'विशेष प्रिय ज्ञानी और योगी तू आत्मा'- शंकर-पार्वती में प्रवेश करते हैं तो आदि देव और आदि देवी के नाम से संसार में प्रत्यक्ष होते हैं। ता.11.3.71 की अ.वाणी में मुरली प्रूफ देखें
हनुमान का भी दृष्टांत है न। इसलिए तुम्हारा महावीर नाम (तीर्थंकर) रखा है। अभी तो एक भी महावीर नहीं।... अभी वीर हैं। पूरा महावीर पिछाड़ी में होंगे। (मु. 8.1.74 पृ.1 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
चंद्रमा अर्थात् बड़ी माँ, ब्रह्मा को कहा जाता है। (अ.वा. 22.6.77 पृ.271 अंत) मुरली प्रूफ देखें
ज्ञान सूर्य तो है बाप। फिर माता चाहिए ज्ञान चंद्रमा। (मु. 31.1.73 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
सोमनाथ का मंदिर कितना बड़ा है! कितना सजाते हैं!.. आत्मा की सजावट नहीं है वैसे परमआत्मा (परमात्मा) की भी सजावट नहीं है। वह भी बिंदी है। बाकी जो भी सजावट है वह शरीरों की है।... अभी तुम (बच्चे) अंदर में जानते हो- हम सोमनाथ बन रहे हैं। (मु. 5.7.75 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
इनका तो वही साधारण रूप जो है वही ड्रेस आदि है। फ़र्क़ नहीं। इसलिए कोई समझ नहीं सकते। (मु. 5.2.74 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
वह है निराकारी, निरअहंकारी। कोई अहंकार नहीं। कपड़े आदि सब वही हैं, (शरीर रूपी मिट्टी के सिवाय) कुछ भी बदला नहीं है।... इनका तो वही साधारण तन, साधारण पहरवाइस है। कोई फ़र्क़ नहीं। (मु. 8.4.74 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
बाप कहते हैं मैं बहुत साधारण तन में आता हूँ (ब्रह्मा अर्थात् बड़ी माँ का तन तो असाधारण था)। इसलिए कोई विरला पहचानते हैं। मैं जो हूँ, जैसा हूँ, साथ (में) रहने वाले भी समझ नहीं सकते हैं। (मु. 4.2.74 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
वही महाभारत लड़ाई है। तो ज़रूर भगवान भी होगा। किस रूप में, किस तन में है, वह सिवाय तुम बच्चों के (और) किसको पता नहीं है। कहते भी हैं, मैं बिल्कुल साधारण तन में आता हूँ। मैं कृष्ण के (अर्थात् ब्रह्मा के शोभायमान) तन में नहीं आता हूँ। (मु. 13.8.76 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
श्रीनाथ-जगन्नाथ है एक ही चीज़; परंतु जैसा देश वैसा ठाकुर बनाकर उनको भोग लगाते हैं। अगर पकवान आदि खिलावें तो पेट में दर्द पड़ जाये। (मु. 20.7.73 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
बाप को मालिक कहा जाता है। फर्रुखाबाद तरफ़ मालिक को मानते हैं। घर का मालिक तो बाप ही होता है। बच्चों को बच्चे ही कहेंगे। जब वह भी बड़े होते हैं, (अलौकिक) बच्चे पैदा करते हैं तब फिर मालिक बनते हैं। यह भी राज़ समझने की है। (मु. 2.5.69 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
जैसे फर्रुखाबाद में कहते हैं हम उस मालिक को याद करते हैं; परंतु वास्तव में विश्व का वा सृष्टि का मालिक तो ल.ना. बनते हैं। निराकार शिवबाबा तो विश्व का मालिक बनते नहीं। (तो किसे याद करते हैं?) तो उनसे पूछना पड़े कि वह मालिक निराकार है वा साकार है? निराकार तो साकार सृष्टि का मालिक हो न सके।... खुद पावन दुनिया का मालिक नहीं बनते। उसका मालिक तो ल.ना. बनते हैं और बनाते हैं बाप। यह बड़ी गुह्य बातें समझने की हैं। (मु. 14.1.73 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
जब गोरा (निर्विकारी) है तो (स्वर्ग की ज़िम्मेवारी का) ताज होना चाहिए और सांवरा (अर्थात् विकारी) है तो ताज कहाँ से आवेगा? उनको कहा जाता है गाँवरे का छोरा। तो ताज कहाँ से हो सकता? गाँव का छोरा तो गरीब होगा ना। (मु. 8.2.75 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
अहमदाबाद को सभी से ज़्यादा सर्विस करनी है; क्योंकि अहमदाबाद सभी सेंटर्स का बीजरूप है। बीज में ज़्यादा शक्ति होती है। खूब ललकार करो, जो गहरी नींद में सोये हुये भी जाग उठें। (सोमनाथिनी जैसी) कुमारियाँ तो बहुत कमाल कर सकती हैं। (अ.वा. 24.1.70 पृ.190 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
सोमनाथ नाम रखा है; क्योंकि सोमरस पिलाते हैं, ज्ञान धन देते हैं। फिर जब पुजारी बनते हैं तो कितना खर्चा करते हैं उनका मंदिर बनाने पर; क्योंकि सोमरस दिया है ना। सोमनाथ के साथ सोमनाथिनी भी होगी। (मु. 4.3.75 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
गुजरात को सैम्पुल तैयार करने चाहिए।... गुजरात को लाइट हाउस बनाओ (जो) न सि़र्फ गुजरात (का) लाइट हाउस हो, बल्कि विश्व (का) लाइट हाउस (हो)।... ऐसा बॉम्ब फेंको जो एक ठका (से) आत्माएँ दौड़ती हुई अपने एक एसलम में पहुँच जायें। पहले गुजरात आबू में क्यू शुरू करे। जो ओटे सो अर्जुन हो जावेगा। ‘अर्जुन’ अर्थात् पहला नम्बर। (अ.वा. 4.1.79 पृ.178 आदि) मुरली प्रूफ देखें
अहमदाबाद में स्वामी नारायण के 108 मंदिर हैं। करोड़ों पैसे आते होंगे। मिलते तो स्वामी नारायण को होंगे ना। तो (अंत में अहमदाबादी पाण्डव भवन तैयार होने पर विश्व विजेता 108 मणकों से कनेक्शन जोड़ने के लिए) सभी सेंटर्स से भी यहाँ ही आवेंगे ना। (अ.वा. 5.3.75 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बाप आत्माओं को बुलाते हैं यह समझाने लिए कि तुम ज्ञान में आते थे ना। तुमको कितना समझाया था कि बाप को याद करो, पवित्र बनो। फिर भी न माना। अब तुम्हारा पद भ्रष्ट हो गया। आगे जो मरे थे फिर भी बड़े हो कोई 20/25 के ही हुए होंगे। ज्ञान भी ले सकते हैं। (मु. 16.2.67 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
तुम कोई शरणागति नहीं लेती हो। यह अक्षर भक्तिमार्ग के हैं ‘शरण पड़ी मैं तेरे’। बच्चा कब बाप की शरण पड़ता है क्या? बच्चे तो मालिक होते हैं। तुम बच्चे बाप की शरण नहीं पड़े हो, बाप ने तुमको अपना बनाया है। (मु. 27.2.75 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
प्रकृति के व परिस्थिति के और व्यक्ति के व वैभव के अधीन रहने वाली आत्मा अन्य आत्माओं को भी सर्व अधिकारी नहीं बना सकती। (अ.वा. 26.6.74 पृ.80 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
हरेक को अपनी ज़िम्मेवारी आप उठानी है। अगर यह सोचेंगे कि दीदी, दादी व टीचर (हमारी जिंदगी के) ज़िम्मेवार हैं, तो इससे सिद्ध होता है कि आपको भविष्य में उन्हीं की प्रजा बनना है, राजा नहीं बनना है। यह भी अधीन रहने के संस्कार हुए न? जो अधीन रहने वाला है वह अधिकारी नहीं बन सकता। विश्व का राज्यभाग्य नहीं ले पाता। इसलिए स्वयं के ज़िम्मेवार, फिर सारे विश्व की ज़िम्मेवारी लेने वाले विश्वमहाराजन् बन सकते हैं। (अ.वा. 30.5.73 पृ.81 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
वह सद्गुरू स्वयं ही आकर अपना परिचय देते हैं। (मु. 8.10.74 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
पैगाम अथवा मैसेज तो शिवबाबा ही देते हैं। खुदा को पैगम्बर कहते हैं न। (मु. 9.3.74 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
धनवान बाप (शिव) का बच्चा कब गरीब (ब्रह्मा बाबा, दीदी-दादी-दादा आदि देहधारियों) की एडॉप्शन थोड़े ही कबूल करेगा। (मु. 29.1.74 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
ब्रह्मा-विष्णु को भी ‘वर्थ नॉट ए पैनी’ बताया है। (मु. 26.2.75 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
हम नं.वन (संगमयुगी विश्व महाराजन) बनते हैं तो फिर सेकेण्ड-थर्ड (सतयुगी ल.ना.) की पूजा (खुट्टेबरदारी) क्यों करेंगे? (मु. 13.8.74 पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
मम्मा-बाबा यह (16 कला सम्पूर्ण ल.ना.) बनते हैं तो हम फिर कम बनेंगे क्या? (मु. 16.3.75 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
जब एक (शिव) द्वारा सर्व रसनाएँ प्राप्त हो सकती हैं तो अनेक (देहधारी गुरुओं) तरफ़ जाने की आवश्यकता ही क्या? (अ.वा. 25.10.69 पृ.131 अत) मुरली प्रूफ देखें
महावीर तो दुश्मन (अर्थात् विरोधियों) का आह्वान करते हैं (अर्थात् निमंत्रण देते हैं) कि आओ और हम विजयी बनें। महावीर पेपर को देख घबराएँगे नहीं, चैलेंज करेंगे; क्योंकि त्रिकालदर्शी होने के कारण जानते हैं कि हम कल्प-2 के विजयी हैं। (अ.वा. 19.12.78 पृ.139 आदि) मुरली प्रूफ देखें
शूरवीर (आत्माएँ) कब किससे घबराते नहीं; लेकिन शूरवीर के सामने आने वाले घबराते हैं। (अ.वा. 13.3.71 पृ.47 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बापदादा सुनाते भी सत्यनारायण की कथा हैं और स्थापना भी सतयुग की करते हैं। तो बाप को, जो सत् बाप, सत् टीचर, सत्गुरु का प्रैक्टिकल पार्ट बजाते हैं, तो सत् बाप को क्या प्रिय लगता है? सच्चाई। जहाँ सच्चाई है अर्थात् सत्यता है वहाँ स्वच्छता व सफ़ाई अवश्य ही होती है। गायन भी है ”सच्चे दिल पर साहब राज़ी। (अ.वा. 2.9.75 पृ.88 अंत, 89 आदि) मुरली प्रूफ देखें
रात को सारा दिन का पोतामेल निकालो क्या किया?... ऐसा सच्च लिखने वाला कोटों में कोऊ ही है। (मु. 16.4.70 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
सच जब निकलता है तो झूठ सामना करते हैं।... तुम किसको सच बताते हो तो जैसे मिर्ची हो लगती है। (मु. 9.5.73 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
समीप के सितारा कैसे बनेंगे? साफ़दिल होने से। (लौकिक-अलौकिक) सर्व संबंधी छोड़ने से। (अ.वा.11.1.70 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
सबसे न्यारा और बाप का प्यारा, इसी को ही कमल पुष्प समान कहा जाता है। (अ.वा.30.6.77 पृ.297 आदि) मुरली प्रूफ देखें
कमल का पुष्प कमाल करने में प्रवीण। (अ.वा.16.5.73 पृ.67 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
इस मायावी (विषय) वैतरणी नदी में रहते (न कि आश्रम के पवित्र वातावरण में रहकर) कमल फूल समान पवित्र रहना है। कमल फूल बहुत बाल-बच्चों (शतदल यानी 100 पंखड़ी) वाला होता है, फिर भी पानी से ऊपर रहता है। वह गृहस्थी है, (प्रजापिता/शंकर) बहुत चीज़ें (अर्थात् हर धर्म की बीजरूप मनुष्यात्माओं को) पैदा करते हैं। यह दृष्टांत तुम्हारे लिए भी (विश्वपिता शंकर के) है। (मु. 31.1.75 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
पवित्र प्रवृत्ति मार्ग बाप ही बनाते हैं। इसलिए विष्णु को भी 4 भुजा दिखाई हैं। शंकर के साथ पार्वती, ब्रह्मा के साथ सरस्वती दिखाई है। अब (सरस्वती) ब्रह्मा की कोई स्त्री तो नहीं है। (परंतु वह भी पार्वती में प्रवेश करने के बाद वैष्णव देवी कही जाती है।) (मु.22.1.75 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
जो बाप बैकबोन है, गुप्त रूप में पार्ट बजा रहे हैं, बाप को प्रत्यक्ष करना है, (बाप से) सुनाने वालों को पहचानते हैं; लेकिन बनाने वाला अभी भी गुप्त है तो अब बनाने वाले को प्रत्यक्ष करना अर्थात् (दिल्ली राजधानी पर) विजय का झण्डा लहराना है। (अ.वा. 5.2.79 पृ.273 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
हम यह सुख-शांति के राज्य स्थापन कर रहे हैं अपने ही तन-मन-धन से गुप्त रीति। बाप भी है गुप्त (उनके) बच्चे भी गुप्त। नॉलेज भी गुप्त। तुम्हारा पुरुषार्थ भी है गुप्त। (दान-मान-पद-सर्विस आदि सब गुप्त।) (मु.13.9.70 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
पाण्डव थे गुप्त। (मु.20.5.73 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
वह तो अपने टाइम पर, अपनी सर्विस पर खड़े हो जाते हैं। किसी को भी पता नहीं पड़ता है। कल्प (की शूटिंगकाल 40 वर्ष) पहले भी तुम बच्चों को मालूम था नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार। कौरवों को पता ही नहीं था। अभी भी ऐसे है। (मु. 4.2.74 पृ.1 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
बेगर बनना मासी का घर थोड़े ही है। बेगर के पास तो (धन, पद, मान, मर्तबा) कुछ भी न हो। (मु. 21.1.74 पृ.4 अंत) मुरली प्रूफ देखें
तुम सभी सुदामा हो। देते क्या हो? (मुट्ठी चावल) लेते क्या हो? विश्व की बादशाही। (मु. 17.2.69 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बाप है ही गरीब निवाज़। (मु. 7.1.74 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
(लौकिक या अलौकिक ब्राह्मणों की दुनिया में) बड़ा पद जो मिला है वह उसमें ही रहते हैं। पैसे वालों को अपने पैसे ही याद पड़ते हैं।... धन, मर्तबा याद पड़ता रहेगा। (मु. 26.1.74 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
बड़े-2 आदमियों की गुप्त रहती है। (मु. 14.5.73 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
बाबा कहते हैं, मेरी कितनी ग्लानि की है। यह भी बना-बनाया ड्रामा है। फिर भी ऐसे ही होगा। (मु. 28.5.73 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
कलंक जिस पर लगते हैं वही फिर कलंकीधर डबल सिरताज (अर्थात् स्वर्ग स्थापना की ज़िम्मेवारी और पवित्रता दोनों के ताजधारी) बनते हैं। जैसे इन (ब्रह्मा) के लिए वैसे तुम्हारे (अर्थात् शंकर के) लिए।... हमारा यह सितम सहन करने का भी पार्ट है। (मु. 9.7.73 पृ.5 अंत) मुरली प्रूफ देखें
मैं जानता हूँ तुमको कितने धक्के खाने पड़ते हैं। समझते हैं भगवान कोई न कोई रूप में आ जावेगा। कब बैल पर सवारी भी दिखाते हैं। अब बैल पर सवारी कोई होती थोड़े ही है। (मु. 17.1.79 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
तुम ऐसे कभी नहीं सुनेंगे, शंकर को (एक साथ इकट्ठी) 100 अथवा 1000 भुजाएँ हैं। (मु. 5.7.73 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
हम तो है ही रमतायोगी। जिसमें भी चाहूँ तो जाकर कल्याण कर सकता हूँ। (मु. 24.4.70 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
कहते हैं जिधर देखो राम ही राम रमता है। अभी (संगमयुग में) रमते तो मनुष्य (रूप में भगवान) हैं ना। (त्रेतायुगी राम की तो बात ही नहीं, उनके संगमयुगी पार्ट शंकर की बात है) (मु. 11.3.75 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
तुम (ईश्वरीय संतान) को सर्विस करने लिए 3 पैर पृथ्वी भी नहीं मिलती। मैं फिर तुमको विश्व का मालिक बनाता हूँ। (मु. 6.5.77 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
गाया हुआ है जिन्हों को 3 पैर पृथ्वी के न मिले थे वे सारे विश्व के मालिक बन गये। मनुष्य थोड़े ही समझते हैं। (मु. 1.5.73 पृ.2 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
बाप कहते हैं- देखो, भक्तिमार्ग में मुझ शिव को रहने के लिए कितने अच्छे-2 महल बनाते हैं हीरों-जवाहरातों के और अभी मैं डायरैक्ट आया हूँ तो देखो कहाँ रहता हूँ। कम से कम राष्ट्रपति जैसा मकान तो होना चाहिए; परंतु देखो 3 पैर पृथ्वी भी नहीं मिलती। (मु. 1.5.73 पृ.1 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
रमता योगी वह जो ज्ञान में रमण करता हो। (मु. 18.6.70 पृ.6 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
बड़े भाई को हमेशा बाप समान समझते हैं।... जिसमें अधिक ज्ञान है वह बड़ा ठहरा। (रात्रि मु. 3.5.73 पृ.1) मुरली प्रूफ देखें
मालूम कैसे पड़ता है कि इनमें बाप भगवान है। जब नॉलेज देते हैं। (मु. 27.10.74 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
बाप है विचित्र तो उनकी नॉलेज भी विचित्र है। (मु. 1.5.73 पृ.1 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
जैसे आत्मा को देख नहीं सकते, जान सकते हैं, वैसे परमात्मा को भी (ज्ञान से) जान सकते हैं। देखने में तो आत्मा और परमात्मा दोनों एक जैसी बिंदी दिखेंगी। बाक़ी तो है सारी नॉलेज। (मु. 11.1.75 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
भल कितने भी (संगमयुगी बेहद के) बड़े सन्यासी, पंडित, विद्वान आदि हैं; परंतु तीसरा नेत्र देने की कोई में ताकत नहीं। यह (काम विकार को भस्म करने वाला) तीसरा नेत्र देने के लिए ज्ञान सूर्य बाप को आना पड़ता है। (मु. 4.10.74 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
ता.31.1.73 की वाणी के अनुसार ”ब्रह्मा ज्ञान चंद्रमा माता है, ज्ञानसूर्य बाप नहीं। (मु. 31.1.73 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
हमको बाप जैसा सम्पूर्ण ज्ञान सागर बनना ही है। (मु. 8.8.74 पृ.1 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
बुद्धि में फुल नॉलेज आने से फुल वर्ल्ड की राजाई मिल जावेगी। (मु. 2.1.74 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
जिसमें (जितनी) जास्ती नॉलेज होगी वह (उतना) ऊँच पद पावेंगे। (मु. 26.1.74 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
कई (बाप समान) बच्चे ऐसे भी हैं जो माँ-बाप से भी अच्छा पढ़ाते हैं। शिवबाबा की तो बात ही ऊँच ठहरी; परंतु मम्मा-बाबा से भी इस समय होशियार बच्चे हैं। (मु. 21.3.73 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
भील, अर्जुन से तीखा हो गया। बाहर में रहने वाले ने तीर पूरा चट (कर) लिया। तब तो बाबा कहते हैं घर वाले इतना उठा नहीं सकते, जितना बाहर वाले। कहा जाता है घर की गंगा को मान नहीं देते हैं। (मु. 3.8.74 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
मैं स्वर्ग का रचयिता तुमको राजतिलक न दूँगा तो कौन देगा? कहते हैं ना, तुलसीदास चंदन घिसे... (तिलक देत रघुवीर), यह बात यहाँ (संगमयुग) की है। (मु. 5.3.73 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
जब ज्ञान घिसेंगे तब ही राजतिलक के लायक बनेंगे। (मु. 8.8.73 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
विचार-सागर-मंथन का नाम बहुत बाला है।... एक दिन (रूहानी) गवर्मेंट भी तुमको कहेगी कि यह नॉलेज सभी को दो। (मु. 9.3.73 पृ.1 मध्य, पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
विचार-सागर-मंथन भी सर्विस करने वालों का ही चलेगा। (डिससर्विस ही करते हैं) सर्विस नहीं कर सकते तो विचार-सागर-मंथन न चल सके। (मु. 26.1.74 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
(शास्त्रों में) बाक़ी यह ठीक है- विचार-सागर-मंथन हुआ, कलश लक्ष्मी (अर्थात् ब्रह्मा सो विष्णुदेवी) को दिया। उसने फिर औरों को अमृत पिलाया तब स्वर्ग के गेट खुले। (मु.7.6.74 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
महारथियों की बुद्धि में प्वॉइंट्स बैठती होगी। लिखते रहें तो अच्छी-2 प्वॉइंट्स अलग करते रहें। प्वॉइंट्स का वज़न करें; परंतु इतनी मेहनत तो कोई करते नहीं। मुश्किल कोई नोट रखते होंगे।... डायरी तो सदैव पॉकेट में रहनी चाहिए नोट करने (के) लिए। सबसे जास्ती तुमको (सबसे बड़े बच्चे शंकर को) नोट करना है। (मु. 27.5.74 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
मुरली बच्चों को 5/6 बार पढ़नी चाहिए, सुननी चाहिए, तब ही बुद्धि में बैठेगी। (मु. 31.8.73 पृ.4 अंत) मुरली प्रूफ देखें
स्कॉलरशिप तो उनको मिलती है जो (संकल्प मात्र भी) सज़ा नहीं खाते हैं। उनकी याद की रफ़्तार और ज्ञान की रफ़्तार फर्स्ट क्लास रहेगी। (मु. 4.3.69 पृ.2 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
जब स्वयं को ज्ञान-योग का प्रत्यक्ष प्रमाण बनायेंगे। जितना स्वयं को प्रत्यक्ष प्रमाण बनायेंगे उतना बाप को प्रत्यक्ष कर सकेंगे। (अ.वा. 6.8.70 पृ.305 आदि) मुरली प्रूफ देखें
नये-2 पुरानों से तीखे चले जाते हैं। बाप से पूरा योग लग जाये तो बहुत ऊँच चला जावेगा। सारा मदार है ही योग पर। (मु.4.9.74 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बाबा कहते हैं बाप को निरन्तर याद करना, इसमें मेरे से भी तुम जास्ती तीखे जाते हो; क्योंकि इनके ऊपर तो (यज्ञ की पालना का) मामला बहुत है। (मु. 2.12.74 पृ.2 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
(ज्ञान)सागर (बाप) में विशेष दो शक्तियाँ सदैव देखने में आवेंगी-.... (ज्ञान) लहरों द्वारा सामना भी करते हैं और हर वस्तु व व्यक्ति को स्वयं में समा भी लेते हैं। (अ.वा. 21.9.75 पृ.121 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
स्थापना के आदि समय तो सारी दुनिया एक तरफ़ और एक आत्मा दूसरी तरफ़ थी ना!.... पहले निमित्त तो एक आत्मा बनी ना! (अ.वा.9.4.73 पृ.19 अंत, 20 आदि) मुरली प्रूफ देखें
निराकार से क्या निराकारी वर्सा चाहिए? प्रश्न उठता है।... अब उनसे वर्सा लेना है तो किस चीज़ का? (रात्रि मु. 7.10.73 पृ.4 अंत) मुरली प्रूफ देखें
त्वमेव माताश्च पिता... कहते हैं, तो फादर के साथ मदर भी चाहिए। मनुष्य समझते हैं एडम ब्रह्मा, ईव सरस्वती। वास्तव में यह राँग है। (मु. 18.5.73 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
यह अभी जानते हैं हम सो (संगमयुगी) ल.ना. बनते हैं। हम सो राम-सीता बनेंगे। (मु. 25.5.72 पृ.3 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
सतयुग में ल.ना. का राज्य है। फिर वही त्रेता में भी राज्य करते हैं। (मु. 9.11.72 पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
सतयुग को रामपुरी कहा जाता है। अक्षर कहते हैं; परंतु यह नहीं जानते कि राम कौन है? (मु. 6.3.75 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
जिस नाम से (रामराज्य की) स्थापना होती तो ज़रूर उनका नाम ही रखेंगे। (मु. 25.5.74 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
रामराज्य है सतयुग (के) आदि में। (मु. 2.8.76 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
राम भी वास्तव में जगतजीत था ना। (मु. 15.12.72 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
ऊँच ते ऊँच बाप से ऊँच ते ऊँच वर्सा मिलता है। वह (वरसा) है ही भगवान (भगवती का)। फिर सेकेंड नम्बर में हैं ल.ना. सतयुग के मालिक। (मु. 8.1.75 पृ.2 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
भगवान (शिव) ने ज़रूर भगवती-भगवान पैदा किये। (मु. 23.5.76 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
नारायण से पहले तो श्रीकृष्ण है। फिर तुम ऐसे क्यों कहते हो नर से नारायण बने? क्यों नहीं कहते हो नर से कृष्ण बने? पहले नारायण थोड़े ही बनेंगे। पहले तो नर से श्रीकृष्ण बनेंगे न। (कौन? ब्रह्मा)... बाप कहते हैं अब तुम (अर्थात् हम बच्चे) नर से नारायण, नारी से लक्ष्मी बनने वाले हो। (मु. 17.7.74 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
यह ल.ना. समझदार हैं तब तो (500 करोड़ की) विश्व के मालिक हैं। बेसमझ तो विश्व के मालिक हो न सके। (मु. 28.7.74 पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
यह (संगमयुगी) ल.ना. आदि चैतन्य में थे तो सुख ही सुख था। सब धर्म वाले उनको बहिश्त, गार्डन ऑफ अल्लाह कहते हैं। (मु. 30.9.74 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
अब हीरे जैसा जन्म तो सब कहेंगे इन ल.ना. का ही है। (मु. 5.2.75 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बाप है ही स्वर्ग का रचयिता तो ज़रूर स्वर्ग का वर्सा ही देंगे और देंगे भी ज़रूर नर्क में। (मु. 9.6.74 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
तुम बच्चों को सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण यहाँ बनना है। (मु. 23.3.68 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
पहले-2 तो यह ल.ना. ही आवेंगे न। इनको ऐसा कोई ने तो ज़रूर बनाया होगा न। ज़रूर पुरुषोत्तम संगमयुग पर ही बने होंगे। उत्तम ते उत्तम पुरुष है ही यह। (मु. 10.3.74 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
यह (ल.ना.) स्वर्ग के मालिक कैसे बने? अभी तुमको बाप सुना रहे हैं- इस सहज राजयोग द्वारा इस पुरुषोत्तम संगमयुग पर ही यह बनते हैं। (मु. 5.12.74 पृ.1 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
वह (सतयुगी ल.ना.) तो दान-पुण्य करने से राजा पास जन्म लेने से प्रिंस बनते हैं, फिर राजा बनते हैं; परंतु तुम इस पढ़ाई से (डायरैक्ट) राजा बनते हो। (मु. 7.7.74 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
अपने कमज़ोर संकल्पों को भी अब समर्थ बनाओ। यह जो कहावत है कि ‘संकल्प से सृष्टि रची’। यह इस (संगमयुगी) समय की बात है। (अ.वा. 9.1.75 पृ.11 आदि) मुरली प्रूफ देखें
लक्ष्य तो सभी का फर्स्ट (ल.ना.) का है ना? लास्ट में भी अगर आये तो क्या हर्जा, ऐसा लक्ष्य तो नहीं है ना? अगर यह लक्ष्य भी रखते हैं कि जितना मिला उतना ही अच्छा तो उसको क्या कहा जावेगा? ऐसी निर्बल आत्मा का टाइटिल कौन-सा होगा? ऐसी आत्माओं का शास्त्रों में भी गायन है.... कि जब भगवान ने भाग्य बाँटा तो (अलबेलेपन की आधी नींद में) वे सोये हुये थे। अलबेलापन भी आधी नींद है।... ऐसे को कहा जाता है- आए हुए भाग्य को ठोकर लगाने वाले। (अ.वा. 4.5.73 पृ.54 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बाप तुम बच्चों को 21 जन्मों लिए 100 परसेंट हेल्दी बनाते हैं। (मु. 21.10.74 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
अंत में जब एकदम कर्मातीत अवस्था हो जावेगी तब निरोगी बनेंगे। (मु. 28.2.73 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
प्रकृति को भी पावन बनाना है, तब ही विश्व परिवर्तन होगा। (अ.वा. 25.5.73 पृ.72 अंत) मुरली प्रूफ देखें
जैसे सर्प का मिसाल है। एक खल छोड़ दूसरी लेता है। उसको कोई मरना नहीं कहा जाता।... एक शरीर छोड़ दूसरा ले लेते हैं। यह अभ्यास यहाँ डालना है। (मु. 12.2.75 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
मैं कितना अच्छा धोबी हूँ। तुम्हारा (शरीर रूपी) वस्त्र कितना शुद्ध बनाता हूँ। ऐसा धोबी कब देखा। (मु. 22.5.73 पृ.3 अंत)। मुरली प्रूफ देखें
आत्मा और काया कंचन बन जावेंगे यह कमाल है ना। (मु. 2.10.74 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
इस योगबल से तुम कितने कंचन बनते हो। आत्मा और काया दोनों कंचन बनती है। (मु. 5.12.74 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
आत्मा और शरीर रूपी नैया को पार ले जाने वाला एक ही बाप खिवैया है। (मु. 3.11.74 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
ऊपर जाना माना मरना, शरीर छोड़ना। मरना कौन चाहते? यहाँ तो बाप ने कहा है तुम इस शरीर को भी भूल जाओ। जीते जी मरना तुमको सिखलाते हैं। (मु. 25.8.74 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
यह बहुत वैल्युएबल शरीर है। इस शरीर द्वारा ही आत्मा को बाप द्वारा (विश्व की बादशाही की) लॉटरी मिलती है। (मु. 8.10.74 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
इस संगमयुग को पुरुषोत्तम युग वा सर्वश्रेष्ठ युग क्यों कहते हो? क्योंकि आत्मा में हर प्रकार के धर्म की, राज्य की, श्रेष्ठ संस्कारों की, श्रेष्ठ सम्बंधों की, श्रेष्ठ गुणों की सर्वश्रेष्ठता अभी रिकॉर्ड के समान भरता जाता है। 84 जन्मों की चढ़ती कला, उतरती कला, दोनों के संस्कार इस समय आत्मा में भरते हो। रिकॉर्ड भरने का समय अभी चल रहा है। (अ.वा. 30.5.73 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
आत्मा में हर जन्म के संस्कारों का रिकार्ड इस समय भर रहे हो। (अ.वा. 9.5.77 पृ.134,135) मुरली प्रूफ देखें
जो भी सारी दुनिया की (500 करोड़) आत्मायें हैं उनको पार्ट बजाना है। जैसे नये सिरे शूटिंग होती जाती है; परन्तु यह अनादि शूटिंग हुई पड़ी है। (मु. 9.9.74 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
इन (संगमयुग) को करके बहुत में बहुत 100 वर्ष दो। (मु. 1.12.72 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
बाप जास्ती समय नहीं रहते हैं। 50 वर्ष नहीं तो करके 100 वर्ष लगते हैं। उत्थल-पाथल पूरी हो फिर राज्य शुरू हो जाते हैं। (मु.25.9.71 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
100 वर्षीय संगमयुग में से मन-बुद्धि रूपी आत्मा-सुधार से सम्बंधित सूक्ष्म राजधानी स्थापना का कार्य पहले 50/60 वर्षों में पूरा होता है। (मु. 24.7.72 एवं 25.7.77 पृ.2 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
पुरुषोत्तम मास, पुरुषोत्तम वर्ष का भी अर्थ नहीं समझते हैं। तुम बच्चे जानते हो यह पु.संगमयुग 50 वर्ष का छोटा है। (वास्तव में पु.मास और पु.वर्ष इन्हीं 50 वर्षों में प्रत्यक्ष होते हैं) (मु. 2.3.74 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
इतना 50 वर्ष कोई भी यज्ञ नहीं चलता।... तुम्हारा यह यज्ञ 50 वर्ष चलता है। (मु.11.5.73 पृ.2 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
बाप आकर 50 वर्ष में पत्थरबुद्धि से पारसबुद्धि बनाते हैं। (मु. 5.6.74 पृ.2 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
मैं आता हूँ 40/50 वर्ष। उसमें भी 36 वर्ष पूरे हुए हैं। (मु. 9.4.73 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
40/50 वर्ष में बाप आकर तुम (ब्राह्मणों) को पढ़ाते हैं। (मु. 7.9.74 पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
तमोप्रधान से सतोप्रधान बनने में 40 से 50 वर्ष लगते हैं। (मु. 6.10.74 पृ.2 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
जितने देवी-देवताएँ सतयुग-त्रेता के हैं वह सब गुप्त यहाँ बनने हैं। (मु. 5.2.74 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
सतयुग अंत में वृद्धि होकर 9 लाख से 2 करोड़ हो गये होंगे। (मु. 22.3.76 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
ब्रह्मा की 100 वर्ष की आयु में ख़तम हो जाता है। (मु. 22.3.76 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
इन साधनों द्वारा अभी तक विश्व की अंश मात्र आत्माओं को ही संदेश दे पाये हो। (अ.वा. 25.5.73 पृ.72 अंत) मुरली प्रूफ देखें
भारत में 33 करोड़ देवताओं की लिमिट है। (मु. 23.3.73 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
ब्राह्मण कोई सब सतयुग में नहीं आते। त्रेता अंत (की शूटिंग) तक आवेंगे। (मु. 3.1.75 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
ब्रह्मा का पार्ट स्थापना के कार्य में अंत तक नूँधा हुआ है। .......मनुष्य सृष्टि की सर्ववंशावली रचने का सिर्फ ब्रह्मा के लिए ही गायन है-ग्रेट-2 ग्रैंड फादर। (अ.वा. 30.6.74 पृ.83 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
तुम्हारे सेंटर्स लाखों की तादाद में हो जाएँगे। (मु. 28.2.71 पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
गली-2 में सेन्टर होना है। (मु. 3.10.72 पृ.2 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
मुरली छपती है, आगे चल लाखों-करोड़ों की अंदाज़ में छपने लग पडे़गी। (मु. 22.6.74 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
कलंकीधर पिछाड़ी कुत्ते भौंकते हैं। (मु. 26.6.72 पृ.4 अंत) मुरली प्रूफ देखें
हर एक मनुष्य मात्र को, हर चीज़ को (हर धर्म को) सतो, रजो, तमो में आना होता है, नई से पुरानी ज़रूर होती है।... तो कहेंगे न पहले सतोप्रधान, फिर ज़रूर सतो, रजो, तमो तुमको ज्ञान मिला है। (मु. 13.6.76 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
तुम आकर भट्ठी में पड़े, कोई देख न सके, मिल न सके। कोई को देखते ही नहीं थे तो फिर दिल किससे लगावेंगे? (सिवाय सत् बाप के)। (मु. 8.7.74 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
अभी (कलियुगी शूटिंग में) तो भक्ति की कितनी धूमधाम हो गई है। मेले-मलाखड़े भी लगते हैं तो मनुष्य जाकर दिल बहला आवें। (मु. 4.5.74 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
मेले-मलाखड़े सब दुर्गति में ले जाने वाले हैं। (मु. 25.11.72 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
वह है मैला होने के मेले। (मु. 17.1.74 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
प्रजापिता ब्रह्मा मुखवंशावली घोर अंधेरे में थे। तो ज़रूर ब्रह्मा भी घोर अंधेरे में होगा। ब्रह्मा मुखवंशावली सोझरे में हैं तो ब्रह्मा भी सोझरे में होंगे। गाते तो बहुत हैं। बहुत भटकते हैं दूर-2 (आबू जैसे) पहाड़ों पर, ठिकानों, मंदिरों में, मस्जिदों में। (परंतु समझते कुछ नहीं) (मु. 10.10.73 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
ब्रह्मा का अथवा तुम ब्राह्मणों का ही दिन और रात गाया जाता है।... कलियुग में वा सतयुग में यह ज्ञान किसको भी होता नहीं। इसलिए गाया जाता है ब्रह्मा का दिन, ब्रहमा की रात। (मु. 10.5.76 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
ब्रह्मा और ब्र.कु.कुमारियों के लिए यह बेहद की दिन और रात है। (मु. 29.6.77 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
सद्गुरू और गुरू में भी रात-दिन का फ़र्क़ है। वह (ज्ञानसूर्य सद्गुरू शिव) ब्रह्मा का दिन कर देते, वह (देहाभिमानी गुरू अज्ञान अंधेरी) रात कर देते। (मु. 27.2.74 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
कहते हैं प्रजापिता ब्रह्मा का दिन फिर रात, तो प्रजा और ब्रह्मा ज़रूर दोनों ही इकट्ठे होंगे ना। तुम समझते हो हम ब्राह्मण ही आधा कल्प (सन् 68 तक मम्मा-बाबा के ज़माने में) सुख भोगते हैं। फिर (बाद में) आधा कल्प (देहधारी गुरुओं से) दुःख। यह बुद्धि से समझने की बात है। (मु. 21.11.74 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
10 वर्ष (की घोषणा) से 9 वर्ष, 9 वर्ष से अब 2 वर्ष बाकी रहे हैं।... अभी कलियुग (के शूटिंग) का अंत आकर हुआ है। (मु. 4.2.74 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
एक दिन ऐसा भी आवेगा जो (ब्राह्मणों की) दुनिया बहुत खाली हो जावेगी। सि़र्फ भारत ही रहेगा।... 2/4 वर्ष में सि़र्फ भारत (अर्थात् ज्ञानधन से भरतू 108 बीजरूप आत्माओं का समूह) ही रहेगा। (मु. 14.8.74 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
अब एक/डेढ़ वर्ष में हम ही थोड़े बाक़ी होंगे और इतने सब (संगमयुगी मत-मतांतरों के) धर्मखण्ड आदि नहीं होंगे, हम ही विश्व के मालिक होंगे। (मु. 10.7.74 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
बाक़ी (विनाश में) 2 वर्ष हैं। ऐसे मत समझना 3 वर्ष हो जावेंगे। 1 वर्ष होगा; परंतु 3 नहीं होंगे। (मु. 9.11.74 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
शास्त्र आदि जो पढ़ते हैं वह जैसे ढेढरों मिसल ट्रां-ट्रां करते, अर्थ कुछ नहीं समझते। (मु. 19.8.74 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
गीता, भागवत, रामायण, चंद्रकांत वेदान्त आदि सब इस समय के हैं। (मु. 8.7.61 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
गीता, भागवत, महाभारत आदि में जो भी लिखा हुआ है उसकी अभी भेंट कर सकते हो। (मु. 19.4.73 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
महिमा भी वह होनी चाहिए जो आपके सम्पूर्ण स्वरूप की है। (अ.वा. 20.1.74 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
लॉर्ड का टाइटिल वास्तव में बड़े आदमी को मिलता हैै। वो तो सबको देते रहते हैं। इण्डियन भी बड़े आदमी जो हैं उनको लॉर्ड कहते हैं। (मु. 13.10.74 पृ.1 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
(संगमयुगी) राधे-कृष्ण तो प्रिंस-प्रिंसेज थे। दोनों अपनी-2 राजधानी में रहते थे। ज़रूर स्वयंवर होगा (जैसा कि सीढ़ी के चित्र में ऊपर विजयमाला लिये हुये राधा को कृष्ण के सामने दिखाया भी गया है)। राधे-कृष्ण का (अपना) राज्य तो है नहीं। सूर्यवंशी और चंद्रवंशी घराना है। चंद्रवंशी में तो सूर्यवंशी कृष्ण आ न सके। (क्योंकि ऊँच कुल का है) तो बड़ी मूँझ हो गई है। (मु. 10.5.73 पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
पीपल के पत्ते पर कृष्ण का बड़ा अच्छा चित्र दिखलाते हैं। वह है (ज्ञान) गर्भ महल, जहाँ आराम से बैठा रहता है। (संकल्पों की) सज़ा आदि तो कुछ भी नहीं खाते। (मु. 30.9.74 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
अब (ज्ञान) समुद्र में पीपल के पत्ते पर कोई ऐसा होता नहीं है। यह दिखाया है कि कैसे आराम से रहते हैं। फिर समय होता है तो जन्म लेते हैं, जैसे कि बिजली चमक जाती है। (मु. 10.10.74 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
ल.ना. को बड़ा होने में 20/25 वर्ष लगे ना। (मु. 2.5.71 पृ.2 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
किसको भी पता नहीं है (कि) कृष्ण फिर द्वापर में कहाँ से आवेगा। (मु. 9.3.76 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
जयंती भी कृष्ण की मनाते हैं। ल.ना. की क्यों नहीं? (शूटिंग का) ज्ञान न होने के कारण कृष्ण को फिर द्वापर में ले गये हैं। (मु. 2.3.74 पृ.3 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
द्वापर में कृष्ण के साथ कंस, जरासिंधी आदि बैठ दिखाये हैं। वास्तव में इस (तामसी शूटिंग) समय सब हैं राक्षस सम्प्रदाय। (मु. 10.10.73 पृ.3 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
‘कृष्णपुरी और कंसपुरी।’ दिखलाते हैं कृष्ण को (विषय वैतरणी) उस पार ले गये। है इस संगम की बात। (सतयुगी) कृष्ण को उस पार नहीं ले गये। यह तो बेहद (के संगमयुगी कृष्ण) की बात है। अभी हम उस पार जा रहे हैं ना। (मु. 17.11.72 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
कृष्ण जन्माष्टमी मनाते हैं। बच्चा तो माता के (गुप्त ज्ञान) गर्भ से ही निकला। फिर दिखाते हैं उनको (निराकार बने राम की बुद्धिरूपी) टोकरी में ले जाते हैं। अब कृष्ण तो वर्ल्ड का प्रिंस । उनको फिर डर काहे का? वहाँ (सतयुग में) कंस आदि कहाँ से आये? ......(बातें संगमयुग की हैं) अब तुमको (सारी बातें) अच्छी रीति समझाना चाहिए। (मु. 15.2.74 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
देवकी को 8वाँ नं. श्रीकृष्ण बच्चा पैदा हुआ। अब (सतयुग में) आठवाँ नं. कृष्ण जन्म लेगा।... परंतु सतयुग में 8 बच्चे तो होते नहीं हैं।... फिर दिखलाते हैं उनका बाप (शिवराम मिश्र) उनको नदी से पार ले जाता था। (मु. 18.8.72 पृ.2 मध्यादि, 3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
कृष्ण की आत्मा पर (सन् 76/98 के आस-पास तमोप्रधान) कलियुग (की शूटिंग) में कलंक लगता है और उन्होंने सतयुग में लगाया है। मुरली प्रूफ देखें
मटके फोड़ना, यह करना, यह सब कृष्ण के लिए झूठ बोलते हैं। (मु. 23.8.74 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
सूक्ष्म बात का ही यादगार स्थूल रूप में होता है। (अ.वा. 11.2.75 पृ.68 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बाबा, बच्चे बहुत अशांत करते हैं। स्वर्ग में कृष्ण थोड़े ही माँ-बाप को अशांत करेगा। शास्त्र में (यादगार) लिखा है (यज्ञ) माँ को तंग किया। उनको (नित नये-2 डायरैक्शन रूपी छोटी-2 रस्सियों से) बांधा गया। ऐसा हो नहीं सकता। स्वर्ग में कोई किसको (तंग नहीं करते), जानवर भी तंग नहीं करते तो मनुष्य कैसे करेंगे! (मु. 17.5.73 पृ.4 आदि) मुरली प्रूफ देखें
माताएँ श्रीकृष्ण को मुख में मक्खन देती हैं। (मु. 25.4.77 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
विश्व के मालिकपने का मक्खन है। (मु. 6.8.78 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
राम को कब झुलाते नहीं हैं। कृष्ण को कितना (गोप-गोपीजन ज्ञान झूले में) झुलाते हैं। उनके लिए ही कहते हैं कृष्ण साँवरा (अर्थात् विकारी) और कृष्ण गोरा। (मु. 21.7.72 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
दिखाते हैं (गुजराती) गोप-गोपियों ने कृष्ण को (ज्ञान) डांस कराया (अर्थात् खूब नाच नचाया)। यह बात इस समय की है। (मु. 6.4.78 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
पहला नं. बच्चू, उनको द्वापर में ठोंक दिया है। (काँटों की जंगली दुनिया में घूमने वाला) भील बना दिया है। नाचू बना दिया है। (ताकि 108 विजयी वत्सों के घर-2 में जाकर ज्ञान का नंगा नाच नाचता फिरे) (मु. 17.11.77 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
सुनाते क्या हैं? यही कृष्ण भगवानुवाच्य। घोड़ेगाड़ी आदि दिखाते हैं। सो भी कृष्ण को कोचमैन बना दिया है। ऐसे तो गीता (रूपी मुरली) नहीं पढ़ी जाती। (मु. 6.10.73 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
कृष्ण को चार घोड़े वाली गाड़ी पर दिखाते हैं। आगे बंगाल में भी 4 घोड़े वाली गाड़ी का फैशन था। राजाएँ लोग भी उनमें चढ़ते थे। (मु.1.11.73 पृ.3 का मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
वहाँ (त्रेता में) राम को 4 भाई तो होते नहीं (वास्तविक बात संगमयुग की है) (मु. 29.3.77 पृ.1 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
कृष्ण को भी 4 भुजाएँ दिखाते हैं। (मु.19.2.75 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
अभी तुम समझते हो जो श्रीकृष्ण सतयुग का प्रिंस था सो फिर 84 जन्मों बाद (अब स्वर्ग के 21 जन्मों में से पहले जन्म में) बेगर बना है। (मु. 10.9.76 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
गाँव का छोरा तो गरीब होगा ना। (मु. 8.2.75 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
यह कहते हैं कृष्ण भगवान है नहीं। वह तो सबसे जास्ती अर्थात् पूरे 84 जन्म लेते हैं। इस समय (सन् 74 में) वह कहाँ होगा? ज़रूर बेगर होगा। (मु. 21.9.74 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
मैं तुमको (अर्थात् हम बच्चों में किसी एक को) प्रिंस श्रीकृष्ण जैसा बनाता हूँ। जो फर्स्ट प्रिंस स्वर्ग का था वह अब 84 जन्म लेकर आय बेगर बना है। (मु. 20.8.76 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
वह (कृष्ण) पूरे 84 जन्म लेकर गाँवड़े का छोरा बना है। वो (सतयुगी) श्रीकृष्ण सूर्यवंशी, वैकुण्ठ का मालिक, उनकी आत्मा 84 जन्मों के बाद फिर गाँवड़े का छोरा बना है।... तत् त्वम्। (अर्थात् राम की आत्मा भी गाँवड़े का छोरा बनी है; क्योंकि दोनों का शरीर रूपी रथ तो एक ही है) (मु.16.11.76 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
अब यह रिजल्ट आउट होनी है। राख कौन बनते हैं और कितने बनते हैं और कोटों में से, लाखों में से एक कौन निकलते हैं, वह भी देखेंगे। (अ.वा. 23.9.73 पृ.161 आदि) मुरली प्रूफ देखें
रावण जब से आते हैं तब से भारत में लड़ाई शुरू होती है। (मु. 8.8.68 पृ.3 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
दस वर्ष (साथ में ) रहने वाले ध्यान में जाय मम्मा-बाबा को ड्रिल कराते थे। हेड होकर बैठते थे। उनमें बाबा प्रवेश कर डायरैक्शन देते थे। (मु. 25.7.67 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
मम्मा-बाबा को भी ड्रिल सिखलाते थे। डायरैक्शन देती थीं ऐसे-2 करो। टीचर हो बैठती थीं। हम समझते थे यह तो बहुत अच्छा नम्बर माला में आवेंगी। वह भी गुम हो गए। यह सब समझना पड़े न। हिस्ट्री तो बहुत बड़ी है। (मु. 28.5.74 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
भारत माता (शिव) शक्ति अवतार अंत का यही नारा है। (अ.वा. 21.1.69 पृ.24 आदि) मुरली प्रूफ देखें
वेश्याएँ भी पुरुषार्थ कर माला का दाना भी बन सकती हैं। (मु. 31.1.74 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
वास्तव में गुरू तो एक ही होता है सद्गति के लिए। बाक़ी सब हैं दुर्गति के लिए। (मु. 14.2.74 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
यह ढिंढोरा पिटवाते रहो- एक सद्गुरू निराकार द्वारा सद्गति, अनेक मनुष्य गुरुओं द्वारा दुर्गति। (मु. 11.3.69 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
भगवान ने जब योग सिखाया तो स्वर्ग बन गया। मनुष्यों के योग सिखलाने से तो स्वर्ग से नर्क बन गया। ( मु. 22.4.72 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
मनुष्य योग सिखाकर रोगी बना देते हैं। बाबा की (पाकिस्तान में) योग (सिखाने) से हम एवर हेल्दी बन जाते हैं। (रात्रि मु.1.5.73 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
प्रदर्शनी की राय बाबा ने थोड़े ही निकाली। यह रमेश बच्चे का इन्वेंशन है। (मु. 13.6.72 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
आसुरी मत पर अनेक ढेर के ढेर चित्र बने हैं। (मु. 8.5.74 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
भक्ति मार्ग के सारे चित्र झूठे और बनावटी हैं। (मु.28.9.69 पृ.4 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
मुरली द्वारा सर्व समस्याओं का हल मिल सकता है। (मु. 20.5.77 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
प्राइममिनिस्टर, प्रेसिडेन्ट आदि हैं तो उनके कितने वज़ीर हैं। ज़रूर (मुरली का राज़ समझने की) अक्ल नहीं है तब तो वज़ीर रखते हैं न एडवाइज देने लिए। (मु. 10.5.74 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
राय लेते हैं बेवकूफ; क्योंकि उनमें (श्रीमत समझने की) अपनी अक्ल नहीं है। (मु. 5.6.74 पृ.2 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
जब बहुत पाप आत्मा बन जाते हैं तब वज़ीर, गुरु आदि रखना पड़ता है। (मु. 10.2.74 पृृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
रावण जब (सत्ता में) आते हैं तो पहले-2 घर में से लड़ाई शुरू होती है। जुदा-2 हो जाते हैं। उसमें ही लड़ मरते हैं। अपना-2 प्रोविंस अलग कर देते हैं। (मु. 8.8.74 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
इस ब्रह्मा के पास तो कुछ भी नहीं है।... इनका चित्र रखने की भी दरकार नहीं। (मु. 27.2.75 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
भक्तिमार्ग में मनुष्यों की बुद्धि में अनेकों की याद आती है। शिव के (सच्चे-2) मंदिर (अर्थात् सेवाकेंद्रों और संगमयुगी भक्तों के घर-2) में जाओ तो वहाँ और भी ढेर चित्र रखे हुए होंगे। तो व्यभिचारी ठहरे न। सबके आगे सिर झुकाते रहते। (मम्मा-बाबा-दीदी-दादी आदि देहधारी) गुरुओं की भी मूर्ति बनाकर रखते हैं। (मु. 28.2.74 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
कनिष्ठ हैं दैत्य। कनिष्ठ मनुष्य बैठ उत्तम मनुष्यों की महिमा गाते हैं। मंदिर बनाकर ताज वालों को बिगर ताज वाले नमन करते हैं। सीढ़ी में शायद कुछ ऐसा है चित्र। (मु. 7.3.74 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बाबा बहुत कड़े-2 अक्षर देते हैं। देवियों को भी कटारी, इतनी भुजाएँ क्यों देते हैं? जैसे रावण को भुजाएँ दी हैं वैसे देवियों को भी दी हैं। तुमको तो इतनी भुजाएँ हैं नहीं; परंतु रावण सम्प्रदाय है ना; इसलिए भुजाएँ भी दे दी हैं। रावण सम्प्रदायवासी ही उनकी पूजा करते हैं। देवियों की पूजा गोया रावण की पूजा। फिर इनसल्ट कितनी करते हैं। देवियों को सजाकर पूजा आदि कर फिर कहते हैं ‘डूब जा’। नहीं डूबती तो ऊपर चढ़कर भी डुबोते हैं। कितनी नॉनसेन्स बुद्धि, आसुरी बुद्धि है। (मु. 7.4.68 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
कई हट्टी-कट्टी ब्राह्मणियाँ कपड़े भी धुलवाती हैं। बर्तन भी साफ़ करवाती हैं। वास्तव में उनको सभी कुछ अपने हाथ से करना है। तबीयत की बात अलग है। यहाँ सभी सुख ले लेंगे तो वहाँ (अब आने वाले संगमयुगी 21वें हीरे तुल्य सर्वश्रेष्ठ जन्म में) सुख गँवा देंगे। यहाँ ही नवाब बन जाते हैं। (मु. 26.10.72 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
गुड़ियों के खेल में इतने मस्त कि यदि कोई (बाप के) घर का सही रास्ता बतावे तो कोई सुनने के लिए तैयार नहीं। (अ.वा. 19.10.75 पृ.201 आदि) मुरली प्रूफ देखें
जो कुम्भकरण की अज्ञान नींद में बहुत जास्ती सोये हुए हैं वही कुम्भ का मेला मनाते रहते हैं। यह नागे साधु लोग कुम्भ का मेला लगवाते हैं... उन्हों की फिर मीटिंग होती है। (मु. 7.1.77 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
अभी तो भक्ति की कितनी धूमधाम हो गई है। मेले-मलाखड़े भी लगते हैं तो मनुष्य जाकर दिल बहला आवे। (मु. 4.5.74 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
बाबा थोड़े ही तुमको कहेंगे कि जिस्मानी (मधुबन की) यात्रा पर चलो या जाओ। (मु. 13.5.73 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
जिस्मानी पंडों को (मधुबन आदि) तीर्थ कितने याद पड़ जाते हैं; क्योंकि घड़ी-2 जाते हैं। (मु. 4.9.73 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
परमात्मा कोई (आबू) पहाड़ (पर) तो नहीं बैठा है।... (मम्मा-बाबा के) जड़ चित्रों का दर्शन करने जाते हैं। (मु. 4.9.73 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बाप कहते हैं जो (तीर्थों के) धक्के खाते हैं वे मुझे नहीं जानते हैं। उन (जिस्मानी गुरू-भक्तों) को पता नहीं है कि बाप (पढ़ाई) पढ़ाकर वर्सा दे रहे हैं विश्व का मालिक बनाने। तुम (यज्ञ से देश निकाला पाये हुये पांडव) अभी धक्के खाने से छूट गये हो। (वर्सा पाने के लिए तीर्थों में गुरुओं के धक्के खाने की दरकार नहीं) (मु. 2.6.73 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
पहले-2 चंचलता पुरुषों में आती है। स्त्रियों में लाज रहती है। (मु. 7.3.78 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
पांडवों को गार्ड बनाकर शक्तियों की रखवाली के लिए निमित्त बनाया हुआ है। पांडवों को पीछे रहकर शक्तियों को आगे करना है। गाइड नहीं बनना है। गार्ड बनना है। जब पांडव गाइड बनते हैं तो गड़बड़ होती है। इसलिए पांडव सेना को गार्ड बनना है। (अ.वा. 2.4.70 पृ.235 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
भक्त लोगों को जब कोई कार्य मुश्किल लगता है तो भगवान के ऊपर रख देते हैं ना! सहज में स्वयं और मुश्किल में भगवान। अब तो बाप ने सर्वशक्तियों का और सर्व कर्तव्यों का आपको निमित्त बना दिया है ना!... जो बाप की ज़िम्मेवारियाँ रही हुई हैं वह अब तुम बच्चों की हैं। (अ.वा. 24.4.74 पृ.30 आदि) मुरली प्रूफ देखें
कोई मरता है तो पितर खिलाते हैं। फिर उनसे बैठ पूछते हैं फलानी चीज़ कहाँ छोड़ गए हो? आगे बोलते थे। सभी बुलाते थे। अभी तो तमोप्रधान हो गए हैं। आगे खास तीर्थों पर जाते थे, आत्मा को बुलाते थे। (मु. 17.4.70 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
अब व्यक्त द्वारा अव्यक्त मिलन भी (धीरे-2) समाप्त होता जावेगा। (अ.वा. 24.12.72 पृ.387 अंत) मुरली प्रूफ देखें
इसी माया रूपी रावणराज्य में शिवाचार्योवाच है कि खुले आम सच्चे सोने के (ज्ञान) गहने पहनने पर (रूहानी) गवर्मेंट प्रतिबंध लगा देती है। पहनने वालों की गुप्त जाँच-पड़ताल और धर-पकड़ होने से फिर बड़े-2 महारथियों द्वारा अंदर ही अंदर चोर बाजारी और तस्करी चलती रहती है। (मु. 8.10.74 पृ.3 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
अब शीघ्र ही दोनों सत्ता वाले अपनी गद्दियाँ छोड़ हैंड्स अप करेंगे; क्योंकि सारे के सारे ही अयोग्य हैं। (अ.सं. 6.9.79) मुरली प्रूफ देखें
इस (कलियुगी शूटिंग के) समय वह (कृष्ण उ़र्फ ब्रह्मा) कहाँ होगा? ज़रूर बेगर (में प्रविष्ट) होगा। जैसे क्राइस्ट के लिए भी कई समझते हैं कि वह बेगर के रूप में है। (मु. 21.9.74 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
सतयुग को रामपुरी कहा जाता है। अक्षर कहते हैं; परंतु यह नहीं जानते कि राम कौन है? (मु. 6.3.75 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
जिस नाम से (रामराज्य की) स्थापना होती है तो ज़रूर उनका नाम ही रखेंगे। (मु.25.5.74 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
रावण राज्य तो ज़रूर ख़लास होना चाहिए। यज्ञ में भी प्योर ब्राह्मण चाहिए ना। (मु. 11.1.75 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
विनाश ज्वाला इस रुद्र ज्ञान यज्ञ से ही प्रज्वलित हुई है। (मु. 10.10.73 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
सबसे श्रेष्ठ दृष्टि है अनुभव की। अनुभव के नेत्र से जो देखते हैं वो कभी भी किसी के कहने से हलचल में नहीं आ सकते। देखा हुआ फिर भी सोचना पड़ेगा - पता नहीं ठीक देखा, नहीं देखा। लेकिन ‘अनुभव की आँख’ से देखने, अनुभव करने वाली चीज़ सदा ही यथार्थ होती है। (अ.वा. 31.12.92 पृ.154 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
बाप कहते हैं, मैं एक-2 आत्मा को सकाश देता हूँ। सामने बैठ लाइट देता हूँ। तुम तो ऐसे नहीं करेंगे। (मु. 15.4.74 पृ.4 अंत) मुरली प्रूफ देखें
एक भी पॉवरफुल संगठन होने से एक-दुसरे को खींचते हुए १०८ की माला का संगठन एक हो जावेगा। एक-मत का धागा हो और संस्कारों की समीपता हो तब-ही माला भी शोभेगी । (अ.वा. 09.12.75 पृ.272 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
एक-दो मिलकर 12 हो जावेंगे ऐसा हाई जम्प लगाओ, तब ही बाप समान बेहद के सेवाधारी बनेंगे।... अलग-2 ग्रुप बनाओ। जैसे शुरू में पुरुषार्थियों के ग्रुप थे। हम शरीक (एक जैसे) पुरुषार्थियों के ग्रुप हों। (अ.वा. 23.11.79 पृ.43 अंत, 44 आदि) मुरली प्रूफ देखें
पंजाब (में बीज बोने) वालों को 12 ही मास के 12 ही फल देने चाहिए। (अ.वा. 7.1.80 पृ.183 अंत) मुरली प्रूफ देखें
तुमको रुद्रमाला में पिरोना है।... तुम अब जानते हो यह है रुद्रमाला और ज्ञानी तू आत्माओं की माला। (मु. 8.3.73 पृ.3 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
पहले-पहले रुद्र की माला बनती है। (मु.17.12.69 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
नॉलेजफुल स्टेज अर्थात् सारी नॉलेज के हरेक प्वाइंट के अनुभवी स्वरूप बनना। (अ.वा.15.3.81 पृ.46 आदि) मुरली प्रूफ देखें
विस्तार तो अच्छा बना रही हो। अब संगठन का सार (माला) बनाना है।... अब ऐसा (संगठन का) किला मज़बूत करो। इतना किला पक्का हो जो माया की हिम्मत ही न रहे। (अ.वा.28.11.79 पृ.62 मध्य, 63 अंत) मुरली प्रूफ देखें
ऐसा अविनाशी संगठन बनाओ जो कोई भी कम्पलेंट न रहे। वृद्धि बहुत कर रहे हो, सि़र्फ विघ्न-विनाशक बनो और बनाओ। (अ.वा.3.12.79 पृ.80 अंत, 81 आदि) मुरली प्रूफ देखें
अब विस्तार ज़्यादा हो रहा है इसलिए वारिस छिप गये हैं। अब उनको प्रत्यक्ष करो। समझा-(जिसके अज्ञान की रात गुज़र गई हो) गुजरात को क्या करना है। दूसरे सम्पर्क में लावें, आप सम्बंध में लाओ तो नम्बरवन हो जायेंगे। इस वर्ष का प्लैन भी बता दिया। अभी विस्तार में बिज़ी हो गये हैं। जैसे वैराइटी वृक्ष बढ़ता है तो बीज छिप जाता है और फिर अंत में बीज ही निकलता है। विस्तार में ज़्यादा बिज़ी हो गये हो। अब फिर से बीज अर्थात् (108) वारिस क्वालिटी निकालो। जो आदि में (माला बनाते थे) सो अंत में करो। (अ.वा. 21.1.80 पृ.230 अंत, 231 आदि) मुरली प्रूफ देखें
शुरू में भी स्थापना के समय अख़बार में क्या डलवाया था? लोगों ने कहा, ‘ओम (आउम=ब्र.वि.शंकर) मण्डली’ गई कि गई और बाप ने डलवाया ”ओम मंडली सारे वर्ल्ड में (दि) रिचेस्ट है, मालामाल है, सब भूख मर सकते हैं; लेकिन बाप के बच्चे भूखे नहीं मर सकते; क्योंकि (डायरैक्ट अमरनाथ शिवशंकर से) ‘अमर भव’ का वरदान मिला हुआ है। (अ.वा. 30.1.79 पृ.252 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
यह 80 का वर्ष विशेष हर (ज्ञानी तू) आत्मा को यथा योग्य वर्सा देने का वर्ष है।... इस वर्ष में... तन-मन-धन, समय आदि जो भी है, सब लगाकर फाइनल सर्व आत्माओं में से सिलेक्ट करो... जो जिसके योग्य है उनको वैसा ही संदेश दे फाइनल करो। अभी सेवा की फाइल फाइनल करो... सिलेक्शन की मशीनरी तेज़ करो। देखेंगे, कितने में फाइल तैयार करते हो? पहले विदेश फाइल तैयार करता है या देश? जिसको जिस धर्म में जाना है, स्टैम्प लगा दो। (अ.वा.18.1.80 पृ.219 से 221) मुरली प्रूफ देखें
ब्रह्मा बाप के तीव्र पुरुषार्थ के संस्कार को तो जानती हो, आज भी बाबा बोले- अब माला तैयार करो। माला तैयार होना अर्थात् खेल ख़तम।... 100 की माला फिर भी 90 परसेंट बन गई; लेकिन 8 की माला में बदली बहुत थी... मतलब तो आज ब्रह्मा बाप को माला तैयार करने का तीव्र संकल्प था। (अ.वा. 18.1.79 पृ.230 मध्य, 231 अंत) मुरली प्रूफ देखें
नॉलेजफुल बंधन में कैसे रह सकते हैं? जैसे दिन और रात इकट्ठा नहीं रह सकते...जब ब्रह्माकुमार-कुमारी बन गये तो बंधन कैसे हो सकता? ब्रह्मा बाप निर्बंधन है तो बच्चे बंधन में कैसे रह सकते? (अ.वा. 19.3.81 पृ.75 आदि) मुरली प्रूफ देखें
निमित्त मात्र डायरैक्शन प्रमाण प्रवृत्ति में रह रहे हो, सम्भाल रहे हो; लेकिन अभी-2 ऑर्डर हो कि चले आओ तो चले आयेंगे या बंधन आयेगा? सभी स्वतंत्र हो? बिगुल बजे और भाग आयें, ऐसे नष्टोमोहा हो? ज़रा भी 5 परसेंट भी अगर मोह की रग होगी तो 5 मिनट देरी लगायेंगे और (नं.) ख़त्म हो जायेगा; क्योंकि सोचेंगे, निकलें या न निकलें। तो सोच में ही समय निकल जायेगा। इसलिए सदा अपने को चैक करो कि किसी भी प्रकार का देह का, सम्बंध का, वैभवों का बंधन तो नहीं है। जहाँ बंधन होगा वहाँ आकर्षण (खींचतान) होगी। इसलिए बिल्कुल स्वतंत्र। इसको ही कहा जाता है- बाप समान कर्मातीत स्थिति। (अ.वा. 10.12.79 पृ.104 अंत) मुरली प्रूफ देखें
निर्बंधन आत्मा ही ऊँची स्थिति का अनुभव कर सकेगी। बंधन वाला तो नीचे ही बंधा रहेगा, निर्बंधन ऊपर उड़ेगा। सभी ने अपना पिंजड़ा तोड़ दिया है। बंधन ही पिंजड़ा है।...कोई भी मेरापन है तो पिंजड़े में बंद हो। अभी पिंजड़े की मैना नहीं, स्वर्ग की मैना हो गई।... जब बाप के बच्चे बने तो बच्चा अर्थात् स्वतंत्र। (अ.वा. 5.12.78 पृ.106 आदि,मध्य) मुरली प्रूफ देखें
जो हर कल्प की अति समीप आत्माएँ वा पद्मापद्म भाग्यशाली आत्माएँ हैं उनकी रूप-रेखा और वेला क्या होती है वह जानते हो? ऐसी आत्माएँ सेकिंड में पहुँची और बाप की बनीं।........अभी भी परिवर्तन की मार्जिन है। अभी टू लेट का बोर्ड नहीं लगा है।......लास्ट चांस है। इसलिए बीती सो बीती करो, भविष्य को श्रेष्ठ बनाओ। इसलिए बापदादा फिर भी सबको चांस दे रहे हैं, फिर उलहना नहीं देना- हम कर सकते थे; लेकिन किया नहीं, समय नहीं मिला, सरकमस्टांसिज नहीं थे। अभी भी रहमदिल बाप के रहम का हाथ सबके ऊपर है इसलिए अपने ऊपर भी रहमदिल बनो। (अ.वा. 21.12.78 पृ.143 से 145) मुरली प्रूफ देखें
शेर की विशेषता है अकेले होते हुए भी अपने को बादशाह समझते हैं अर्थात् निर्भय होते हैं। तो पंजाब के (बीजरूप) निवासी ऐसे निर्भय हैं ना।... पंजाब (राजधानी की) स्थापना के आदि में अपना विशेष शक्ति रूप का दृश्य अच्छा दिखलाया। अनेक प्रकार की हलचल में भी अचल रहे हैं; क्योंकि पंजाब की धरनी (माता) विशेष धर्म की धरनी है, ऐसे धर्म की धरनी में आदि सनातन धर्म की स्थापना करना इसमें सामना करके विजयी बने हैं।.....बड़े (संगठित) आवाज़ से ललकार करो, छोटे आवाज़ से करते हो तो छोटा आवाज़ वहाँ के (संगमयुगी) गुरुद्वारों के आवाज़ में छिप जाता है। (अ.वा. 19.12.78 पृ.136-137) मुरली प्रूफ देखें
अनेकों में फँसना यह आयरन एज है। अथॉरिटी से और सत्यता से बोलो (एक ओंकार), संकोच से नहीं। सत्यता प्रत्यक्षता का आधार है। (बाप की) प्रत्यक्षता करने के लिए पहले स्वयं को प्रत्यक्ष करो, निर्भय बनो। एक बल, एक भरोसे पर अचल और अटल रहने वाले- यह अनुभव अनेकों को निश्चयबुद्धि बनाने वाला होता। (अ.वा. 23.1.79 पृ.239 अंत, 240 आदि) मुरली प्रूफ देखें
अपने महावीरों का ऐसा विशेष ग्रुप बनाओ जो दृढ़ संकल्प द्वारा जाननहार और करनहार का साक्षात् स्वरूप बन करके दिखाएँ... यू.पी. जोन विशेष भाग्यशाली रहा... मेले भी हुए, सम्मेलन भी हुए। अभी कोई नई रूप-रेखा बनाओ। (अ.वा. 5.12.78 पृ.103 से 105) मुरली प्रूफ देखें
छोटे-2 ग्रुप बनाकर चारों ओर पहले कुछ अपने सहयोगी बनाओ, स्टूडेण्ट्स कॉम्पीटीशन रखी ना, फिर उसमें से एक चुना। ऐसे हर स्थान पर छोटे-2 ग्रुप बनें और फिर उन सबका एक स्थान पर संगठन हो फिर नाम बाला होगा। (अ.वा. 14.11.78 पृ.61 अंत, 62 आदि) मुरली प्रूफ देखें
देहली निवासियों को तैयार होना चाहिए... अभी से तीव्र तैयारियाँ करने लग जाना है...देहली पर सबको चढ़ाई करनी है। देहली की धरनी (माताओं) को प्रणाम ज़रूर करना है। देहली का विशेष पार्ट (राजधानी की) स्थापना में है... देहली के तरफ़ सभी की नज़र है, बाप की भी नज़र है... देहली की महावीर पांडवसेना तो बहुत है। पांडवों को मिलकर हर मास कोई सबूत देना चाहिए; क्योंकि देहली के सपूत मशहूर हैं। सपूत अर्थात् (सेवा का) सबूत देने वाले। देहली से सेवा की प्रेरणा मिलनी चाहिए। जैसे सेंट्रल गवर्मेंट है तो सेंटर द्वारा सर्व स्टेशन्स को डायरैक्शन मिलते हैं वैसे सेवा के प्लैन्स वा सेवा को नवीनता में लाने के लिए पार्लियामेंट होनी चाहिए। यही (रूहानी संगठन का किला रूपी) पांडव भवन, पांडव गवर्मेंट की पार्लियामेंट है। तो पार्लियामेंट में सब तरफ़ के सर्व मेम्बर्स की राय से नये रूल तैयार होते हैं। देहली से हर मास विशेष प्लैन्स आउट होने चाहिए तब समाप्ति समीप आवेगी... पहले तो प्लानिंग पार्टी बनाओ जिसमें चारों ओर के महारथी और शक्तियों का भी सहयोग लो। सेवा के प्रति समय प्रति समय देहली में संगठन होना ही चाहिए। (अ.वा. 26.12.78 पृ.153 से 156 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
सेवा में समय दो। जब तक तैयार नहीं होते हो तब तक राज्य आने में देरी है। सेवा का कोई नया प्लैन बनाया है?... ब्राह्मणों का संगठन होना ही, हाज़िर होना ही सेवा है। यह कोई कम बात नहीं है। समय पर हाज़िर होना, एवररेडी होना।... संगठित रूप में आवाज़ बुलंद होना यह भी सेवा है। (अ.वा.9.3.81 पृ.32 आदि) मुरली प्रूफ देखें
हद की प्रवृत्ति में अपना ज़्यादा समय देते हो या बेहद में? बनना है बेहद का मालिक और समय देते हद में, तो क्या होगा? बेहद के मालिक बनने वाले बेहद की सेवा में ज़रूर लगेंगे। हद निमित्त मात्र, सारा अटेंशन बेहद की सेवा में। बेहद में जाकर सेवा करो, सर्विस में नया मोड़ लाओ। (अ.वा. 1.2.79 पृ.261 अंत) मुरली प्रूफ देखें
पर्सनल प्रोग्राम बनाते तो आवाज़ बुलंद नहीं हो सकता। अब फिर जब ऐसी (संगठित) सेवा करेंगे तब महायज्ञ की समाप्ति समारोह करेंगे। अभी तो आरम्भ किया है। (अ.वा. 19.3.81 पृ.72 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
(ईश्वरीय ज्ञान से) वंचित हुई आत्माओं को सम्पर्क और सम्बंध में कैसे लायें?... बाप का कर्तव्य असम्भव को भी सम्भव करने का है... कितनी वंचित आत्माओं को बाप का परिचय दे तृप्त आत्मा बनाने वाली हो? (अ.वा. 3.2.79 पृ.262 से 266) मुरली प्रूफ देखें
हर ब्राह्मण बच्चों के घर में बाप (की टीचरशिप) का यादगार (गीता-पाठशाला) ज़रूर होनी चाहिए। जैसे घर-2 में राजा-रानी का फोटो लगाते हैं ना। तो ब्राह्मणों के घर में यह विशेष (बाप के प्रैक्टिकल कर्म की) यादगार हो। जो भी आये उसको बाप का परिचय देते रहो। (अ.वा. 14.11.79 पृ.22 अंत) मुरली प्रूफ देखें
शक्तियाँ हैं ही पांडवों के लिए ढाल। ढाल मज़बूत होगी तो वार नहीं होगा। इसलिए माताओं को आगे रखने में पांडवों को खुश होना चाहिए। अगर स्वयं आगे रहेंगे तो डण्डे खाने पड़ेंगे। शक्तियों को आगे रखेंगे तो पाण्डवों की भी महिमा है। (अ.वा. 4.12.79 पृ.89 अंत) मुरली प्रूफ देखें
आजकल बापदादा कौन सा काम कर रहे हैं? फाइनल माला बनाने के पहले मणकों के सिलेक्शन का (नं.वार) सेक्शन बना रहे हैं। तब तो ज़ल्दी-2 पिरोते जायेंगे ना। (अ.वा. 28.1.80 पृ.251 अंत) मुरली प्रूफ देखें
यह भी तिलक का गायन है ना कि भक्तों को भगवान (संगमयुग में प्रैक्टिकल) तिलक लगाने आया। तो इस वर्ष आज्ञाकारी बच्चों को स्वयं बाप आपके सेवा स्थान (गीता पाठशाला) अर्थात् तीर्थ स्थान पर सफ़लता का तिलक देने आयेंगे। बाप तो रोज़ (कहीं न कहीं) चक्कर लगाने आते ही हैं। अगर बच्चे सोये हुये हों, वह उनकी ग़फ़लत है।...तो ज्योति जगाकर बैठो तब तो बाप आयेंगे। कइयों को जगाते भी हैं फिर सो जाते हैं। आवाज़ भी अनुभव करते हैं फिर भी अलबेलेपन की नींद में सो जाते हैं। (अ.वा. 6.2.80 पृ.279 अंत, 280 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बापदादा भी छोटी-2 सभाएँ करते हैं ना। जैसे आप लोग कभी ज़ोन हैड्स की मीटिंग करते हो।... बापदादा भी वहाँ ग्रुप बुलाते हैं।... पेपर्स को वैरीफाय तो फिर भी (न.वार) बच्चों से करायेंगे... भाई, भाई से वैरिफाय तो करायेंगे ना। (अ.वा. 16.1.80 पृ.213 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
पांडव नाम से दिलशिकस्त आत्मा स्वयं को उत्साह दिलाती है कि 5 पांडवों के समान बाप का साथ लेने से विजयी बन जायेंगे। थोड़े हैं तो कोई हर्जा नहीं।... बाप के भाग्य को तो आत्माएँ वर्णन करती हैं; लेकिन आप (मणकों) के भाग्य को बाप वर्णन करते हैं। इससे बड़ा भाग्य न हुआ है, न होगा। (अ.वा. 4.2.80 पृ.267, 270) मुरली प्रूफ देखें
भक्त, भगवान के आगे परिक्रमा लगाते हैं; लेकिन भगवान अब क्या करते हैं? भगवान बच्चों के (आगे) पीछे परिक्रमा लगाते हैं। आगे बच्चों को करते पीछे खुद चलते हैं। सब कर्म में चलो बच्चे, चलो बच्चे कहते रहते हैं। यह विशेषता है ना। बच्चों को मालिक बनाते, स्वयं बालक बन जाते, इसलिए रोज़ मालेकम् सलाम कहते हैं।... जिस समय ऑर्डर करते हो और हाज़िर हो जाते हैं। (अ.वा. 18.1.81 पृ.9 अंत, 10 आदि) मुरली प्रूफ देखें
एडवांस पार्टी का भी कार्य कोई कम नहीं है। सुनाया ना वह जोर-शोर से अपने प्लैन बना रहे हैं। वहाँ भी नामीग्रामी हैं। (अ.वा. 25.1.80 पृ.246 आदि) मुरली प्रूफ देखें
एडवांस (पार्टी) का ग्रुप, उसमें भी जो विशेष नामी-ग्रामी आत्माएँ हैं उनका संगठन बहुत मज़बूत है। (दिल्ली राजधानी में कृष्ण का) श्रेष्ठ जन्म, फर्स्ट जन्म दिलाने के लिए (बुद्धि रूपी) धरनी तैयार करने का वंडरफुल पार्ट इन आत्माओं द्वारा तीव्र गति से चल रहा है। (अ.वा. 18.1.80 पृ.222 अंत) मुरली प्रूफ देखें
संगठित रूप का, ज्वाला रूप शांतिकुण्ड का महायज्ञ रचना है।... इस वर्ष (रुद्रमाला की यादगार विकलांग वर्ष सन् 81) स्वयं की शक्तियों द्वारा, स्वयं के गुणों द्वारा, निर्बल आत्माओं को बाप के समीप लाओ।... इच्छा रूपी एक टांग अब प्रत्यक्ष रूप में दिखाई दे रही है; लेकिन उन्हें अपनी शक्ति से हिम्मत की दूसरी टांग दो। तब बाप के समीप चल करके आ सकेंगे।... लंगड़ों को चलाना है... इसी वर्ष में......संगठित रूप में प्रत्यक्षता का, एक बल, एक भरोसे का नारा लेकर सेवा की स्टेज पर आना है। (अ.वा.20.1.81 पृ.13 से 15) मुरली प्रूफ देखें
सुनना और सुनाना भी बहुत हो गया। साकार रूप में सुनाया, अव्यक्त रूप में भी कितना सुनाया, एक वर्ष नहीं; लेकिन 13 वर्ष। अभी तेरहवें में तेरा ही होना चाहिए ना। तेरा हूँ। (अ.वा. 21.3.81 पृ.80 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
अभी वह समय नहीं है। अभी तो चल जाता है, कोई हिसाब लेने वाला ही नहीं है; लेकिन थोड़े समय के बाद अपने आपको ही पश्चाताप होगा। (अ.वा. 18.1.79 पृ.232 मध्य) (क्योंकि) मुरली प्रूफ देखें
अभी थोड़े समय के अंदर धर्मराज का रूप प्रत्यक्ष अनुभव करेंगे; क्योंकि अब अंतिम समय है। (अ.वा. 22.10.70 पृ.310 अंत) मुरली प्रूफ देखें
विशेष इस वर्ष (80/81) में रहे हुए गुप्त वारिसों को प्रत्यक्ष करो। अब तक जो किया है वह बहुत अच्छा किया है, अभी और भी चारों ओर की आत्माएँ वन्स मोर करें। वाह-2 की ताली बजायें- ऐसा विशेष कार्य भी यू.पी. वाले करेंगे। (अ.वा. 12.12.79 पृ.110 अंत) मुरली प्रूफ देखें
यह है विधि-विधाताओं की सभा... विधि-विधाताओं की विशेष शक्ति है... सत्यता अर्थात् रियलिटी... सत्य बाप का सत्य परिचय मिलने से अथॉरिटी से कहते हो परम-आत्मा हमारा बाप है। (रुद्रमाला के) वर्से के अधिकार की शक्ति से कहते हो बाप हमारा और हम बाप के।... आप पाँच पांडव अर्थात् कोटों में कोई थोड़ी-सी आत्माएँ चैलेंज करते हो... नये-2 आये हैं ना! ऐसे तो नहीं समझते हम थोड़े हैं; लेकिन ऑलमाइटी अथॉरिटी आपका साथी है। सत्यता की शक्ति वाले हो। 5 नहीं हो; लेकिन विश्व का रचयिता आपका साथी है। इसी फलक से बोलो। (अ.वा. 11.4.81 पृ.141 से 145) मुरली प्रूफ देखें
सभी अपने को इस (संगमयुगी) विश्व के अंदर (सागर के 60 हज़ार पुत्र रूपी) सर्व आत्माओं में से चुनी हुई श्रेष्ठ आत्मा समझते हो? यह समझते हो कि स्वयं बाप ने हमें अपना बनाया है? बाप ने (सन् 78 पृ.2 के अनुसार) विश्व के अंदर से कितनी थोड़ी (16 हज़ार 108) आत्माओं को चुना और उनमें से हम श्रेष्ठ (108) आत्माएँ हैं। यह संकल्प करते ही क्या अनुभव होगा? अतीन्द्रिय सुख की प्राप्ति होगी।... इसको कहा जाता है नवीनता। नया दिन, नई रात, नया परिवार... सब कुछ नया। (अ.वा. 9.3.81 पृ.34 आदि) मुरली प्रूफ देखें
देहली क्या करेगी? जमुना के किनारे पर अभी राजयोग महल बनेंगे... यू.पी. को धर्मयुद्ध का खेल दिखाना चाहिए। सुनाया ना, अभी तो सि़र्फ (संगमयुगी) धर्म नेताएँ जो ऊँची आँखें करके सामना करते थे, अभी आँखें नीचे की हैं; लेकिन अब सिर झुकाना है। अब आप लोगों की स्टेज पर आते हैं; लेकिन अपनी स्टेज पर (मधुबन में) आपको चीफ गेस्ट कर बुलावें, तब कहेंगे कि सिर झुकाया है। (अ.वा. 24.12.79 पृ.146 अंत) मुरली प्रूफ देखें