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राजधानी में कौन क्या बनेगा और क्यों बनेगा मुरली प्वॉइंट्स प्रूफ के साथ
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राजधानी में कौन क्या बनेगा और क्यों बनेगापाण्डव सेना में अपना भविष्य जानते हो या स्पष्ट है कि क्या बनोगे और कौन सी राजधानी में? .......... पहले राजधानी में भी क्या बनेंगे। दूसरी राजधानी में क्या बनेंगे। यह पूरी जन्म पत्री एक-एक को अपने अंदर स्पष्ट होगी। .......... जितना.जितना योगयुक्त होंगे उतना भविष्य भी स्पष्ट हो जायेगा। (अ०वा०9.11.69 पृ०133 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 प्रालब्ध का भी साक्षात्कार प्रैक्टिकल में अभी होना तो है ना। कौन क्या बनेगा और क्यों बनेगा, किस आधार से बनेगा? यह सब स्पष्ट होगा। न चाहते हुए भी, न सोचते हुए भी उनका कर्म, सेवा, चलन, स्थिति, सम्पर्क व संबंध ऑटोमैटिकली ऐसा होता रहेगा जिससे समझ सकेंगे कि कौन क्या बनने वाला है।... कर्म में और दर्पण में हर एक का स्पष्ट साक्षात्कार होता रहेगा। (अ०वा०7.2.76 पृ०52 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 कर्म की रेखाओं से अपना भविष्य खुद ही देख सकते हो। यमुना के किनारे पर कौन रह सकेंगे? जिन्होंने सदा के लिए पुरानी दुनिया से किनारा किया है और बाप को सदा साथी बनाया र्है, वही यमुना के किनारे साथ महल वाले होंगे। श्री कृष्ण के साथ पढ़ने वाले कौन होंगे? पढ़ने पढ़ाने वाले साथी भी होंगे ना? जिसका सदैव पढ़ाई पढ़ाने और पढ़ने में विशेष पार्ट है वही वहाँ भी विशेष पढ़ाई के साथी बनेंगे। रास करने वाले कौन होंगे? जिन्होंने संगम पर बाप के साथ समान संस्कार मिलाने की रास मिलाई होगी। तो यहाँ जिनके बाप.समान संसकारों के(की) रास मिलती है वे वहाँ रास करेंगे। रॉयल फैमिली (Royal family- उच्च परिवार) में कौन आवेंगे? जो सदैव अपनी प्योरिटी के(की) रॉयल्टी में रहते हैं। कहाँ भी हद के आकर्षण में आँख नहीं डूबती। (अ०वा०2.2.77 पृ०62 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 प्रजा में सभी प्रकार के मनुष्य होते हैं। प्रजा माना ही प्रजा। बाप समझाते हैं यह पढ़ाई है, हरेक अपनी बुद्धि अनुसार ही पढ़ते हैं। हरेक को अपना­2 पार्ट मिला हुआ है। जिसने कल्प पहले जितनी पढ़ाई धारण की है, उतनी अभी भी करते हैं। पढ़ाई कभी छिपी नहीं रह सकती है। पढ़ाई अनुसार पद भी मिलता है। बाप ने समझाया है, आगे चल इम्तहान होगा। बिगर इम्तहान के ट्रान्सफर हो न सकें। तो पिछाड़ी में सब मालूम पड़ेगा; परन्तु अभी भी समझ सकते हो हम किस पद के लायक हैं। ...... ऐसे हम कैसे बन सकते हैं। फिर भी हाथ उठा देते हैं। यह भी अज्ञान ही कहेंगे। (मु०18.12.89 पृ०1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 इस समय के अधिकारी जन्म.जन्म के अधिकारी बनते हैं। इस समय के किसी न किसी स्वभाव वा संस्कार वा किसी सम्बंध के अधीन रहने वाली आत्मा जन्म-जन्म अधिकारी बनने के बजाए प्रजा पद के अधिकारी बनते हैं। राज्य अधिकारी नहीं।..........स्व अधिकारी अर्थात् सर्व कर्मेन्द्रियों रूपी प्रजा के राजा बनना। प्रजा का राज्य है या राजा का राज्य है? यह तो जान सकते हो ना- प्रजा का राज्य है तो राजा नहीं कहलायेंगे। प्रजा के राज्य में राजवंश समाप्त हो जाता है। (अ०वा०6.1.86 पृ०133 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 21 जन्म क्या करेंगे? कमाई करने वाले बनेंगे या राज्य अधिकारी बन राज्य करेंगे? रॉयल फैमिली को कमाने की ज़रूरत नहीं होती। प्रजा को कमाना पड़ेगा। उसमें भी नम्बर हैं। साहूकार प्रजा और साधारण प्रजा। गरीब तो होता ही नहीं। .......... लेकिन रॉयल फैमिली का अधिकार जन्म-जन्म प्राप्त करते हैं। तो क्या बनेंगे? अब बजट बनाओ। (अ०वा०15.1.86 पृ०157 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 नॉलेज (knowledge) के दर्पण में अपने को देखो। नॉलेज का दर्पण तो सबके पास है ना? जितनी नॉलेज कम उतना ही दर्पण पावरफुल अर्थात् क्लीयर (clear) नहीं होगा और अपने आपको भी क्लीयर देख न सकोगे कि मैं कौन हूँ और क्या बनने वाला हूँ? बाप से पूछने की भी ज़रूरत नहीं कि मैं क्या बनूँगा? स्वयं ही स्वयं को दर्पण में देख व जान सकते हो, किसी भी कर्म-इन्द्रियों के वशीभूत तो नहीं हो? क्या अपने अंदर भूतों को आह्वान करते हो? यह पाँच विकार ही तो भूत हैं-तुम जब भूतों का आह्वान करते हो तो गोया बाप से किनारा कर लेते हो; क्योंकि जहाँ भूत होंगे वहाँ भगवान नहीं होगा। (अ०वा०11.10.76 पृ०175 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 प्रजा केवल ज्ञान और योग की प्राप्ति करने की पुरुषार्थी होगी, वह संबंध में समीप नहीं होगी।......वह मर्यादा पूर्वक जीवन बनाने में यथायोग्य तथा यथा-शक्ति पुरुषार्थी होगी।......कोई-न-कोई संस्कार व स्वभाव के वशीभूत होने के कारण निर्बल आत्मा हाइजम्प; (High jump) नहीं दे सकती। इसलिए रॉयल....प्रजा बन जाते हैं। (अ०वा०14.7.74 पृ०109 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
राज्यअधिकारी की निशानियाँराज्य अधिकारी बनना है तो स्नेह के साथ पढ़ाई की शक्ति अर्थात् ज्ञान की शक्ति, सेवा की शक्ति, यह भी आवश्यक है। (अ०वा०18.1.85 पृ०132 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 राज्य पद श्रेष्ठ है तो पूज्य स्वरूप भी इतना ही श्रेष्ठ होता है। इतनी संख्या में प्रजा भी बनती है। प्रजा अपने राज्य अधिकारी विश्व महाराजन वा राजन को मात-पिता के रूप से प्यार करती है। इतना ही भक्त आत्माएँ भी ऐसे ही उस श्रेष्ठ आत्मा को वा राज्य अधिकारी महान आत्मा को अपना प्यारा ईष्ट समझ पूजा करते हैं। जो अष्ट बनते हैं वह ईष्ट भी इतने ही महान बनते हैं। (अ०वा०24.3.85 पृ०262 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 जितना बाप के समीप उतना परिवार के समीप। अगर परिवार के समीप नहीं होंगे तो माला में नहीं आएँगे। (अ०वा०27.3.85 पृ०281 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 सफलता की विधी हैः- बालक सो मालिक, समय पर बालक बनना, समय प्रमाण मालिक बनना। यह विधी आती है? अगर छोटी­सी बात को बालक के समय मालिक बनकर सिद्ध करेंगे तो मेहनत ज़्यादा और फल कम मिलेगा। और जो विधि को जानते हैं, समय प्रमाण उसको मेहनत कम और फल ज़्यादा मिलता है। वह सदा मुस्कुराता रहेगा। स्वयं भी खुश रहेगा और दूसरों को देखकर के भी खुश होगा। सिर्फ़ मैं बड़ा खुश रहता हूँ, यह नहीं; लेकिन खुश करना भी है, खुश रहना भी है, तब राजा बनेंगे। अपने को मोल्ड करेंगे तो गोल्डन एज का अधिकार ज़रूर मिलेगा। (अ०वा०17.12.89 पृ०87 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 राजा-रानी में फिर भी ताकत रहती है; क्योंकि वे धर्मात्मा होते हैं। धर्म करते हैं तब तो राजा बनते हैं। (मु०16.2.73 पृ०1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 देहीअभिमानी बनने बिगर राजाएँ बन न सकेंगे। (मु०3.3.69 पृ०2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 बेहद में चक्र लगाकर चक्रवर्ती बन रहे हो? जो एक स्थान पर बैठा रहता है उनको क्या कहा जाता? जो एक ही स्थान पर बैठ सर्विस भी कर रहे हैं; लेकिन बेहद में चक्र नहीं लगाते तो भविष्य में भी उन्हों को एक इन्डिविज्युअल राजाई मिल जावेगी। बाप भी सर्व के सहयोगी बने ना। वैसे विश्व का राजा वह बनेगा जो विश्व के(की) हर आत्मा से संबंध जोड़ेंगे और सहयोगी बनेंगे। जैसे बाप दादा विश्व के स्नेही और सहयोगी बने, वैसे बच्चों को भी फॉलो करना है, तब विश्व के महाराजन की जो पदवी है उसमें आने के अधिकारी बन सकते हो। (अ०वा०28.10.76 पृ०2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 राजा का अर्थ ही है दाता। अगर हद की इच्छा वा प्राप्ति की उत्पत्ति है तो वो राजा के बजाय मंगता (माँगने वाला) बन जाता है। (अ०वा०18.11.93 पृ०10 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 पर­उपकारी आत्मा ही राज्य­अधिकारी बन सकती है। ...... ज्ञान सुनाना- यह विशाल दिमाग़ की बात है वा वर्णन करने के अभ्यास की बात है। तो दिल और दिमाग़­दोनों में अंतर है। (अ०वा०15.11.89 पृ०20 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 जिस समय बहुत बुद्धि बिज़ी हो, उस समय ट्रायल करके देखो कि अभी­अभी अगर बुद्धि को इस तरफ़ से हटाकर बाप की तरफ़ लगाना चाहें तो सेकेण्ड में लगती है? ऐेसे तो सेकण्ड भी बहुत है। इसको कहते हैं कन्ट्रोलिंग पावर। जिसमें कन्ट्रोलिंग पावर नहीं वह रूलिंग पावर के अधिकारी बन नहीं सकते। (अ०वा०10.1.90 पृ०138 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 कई बच्चे रूह-रिहान करते हुए बाप से पूछते हैं कि हम भविष्य में क्या बनेंगे? राजा बनेंगे या प्रजा बनेंगे? बापदादा बच्चों को रेपॉन्ड करते हैं कि अपने आप को एक दिन भी चेक करो तो मालूम पड़ जाएगा कि मैं राजा बनूँगा वा साहूकार बनूँगा वा प्रजा बनूँगा। पहले अमृतवेले से अपने मुख्य तीन कारोबार के अधिकारी, अपने सहयोगी साथियों को चेक करो। वह कौन? 1. मन अर्थात् संकल्प शक्ति। 2. बुद्धि अर्थात् निर्णय शक्ति। 3. पिछले वा वर्तमान श्रेष्ठ संस्कार। यह तीनों विशेष कारोबारी हैं। जैसे आजकल के ज़माने में राजा के साथ महामन्त्री वा विशेष मन्त्री होते हैं, उन्हीं के सहयोग से राज्य कारोबार चलती है। सतयुग में मंत्री नहीं होंगे; लेकिन समीप के सम्बन्धी, साथी होंगे। किसी भी रूप में, साथी समझो वा मंत्री समझो। लेकिन यह चेक करो- यह तीनों स्व के अधिकार से चलते हैं? इन तीनों पर स्व का राज्य है वा इन्हों के अधिकार से आप चलते हो? मन आपको चलाता है या आप मन को चलाते हैं? जो चाहो, जब चाहो वैसा ही संकल्प कर सकते हो? जहाँ बुद्धि लगाने चाहो, वहाँ लगा सकते हो वा बुद्धि आप राजा को भटकाती है? संस्कार आपके वश हैं या आप संस्कारों के वश हो? राज्य अर्थात् अधिकार। राज्य-अधिकारी जिस शक्ति को जिस समय जो ऑर्डर करे, वह उसी विधिपूर्वक कार्य करे। एक दिन की दिनचर्या में चेक करके देखो- यह तीनों ही आपके विधिपूर्वक कार्य करते वा आप कहो एक बात, वह करें दूसरी बात? क्योंकि निरन्तर योगी अर्थात् स्वराज्य अधिकारी बनने का विशेष साधन ही मन और बुद्धि है। मन्त्र ही मनमनाभव का है। योग को बुद्धियोग कहते हैं। तो अगर यह विशेष आधारस्तम्भ अपने अधिकार में नहीं हैं वा कभी हैं, कभी नहीं हैं, अभी.अभी हैं, अभी-अभी नहीं हैं, तीनों में से एक भी कम अधिकार में है तो इससे ही चेक करो कि हम राजा बनेंगे या प्रजा बनेंगे? (अ०वा०21.1.87 पृ०22 अंत) मुरली प्रूफ देखें
राज्यअधिकारी की निशानियाँदैवी परिवार में अधिकारी बन ऑर्डर चलाना, यह नहीं चल सकता। स्वयं अपनी कर्म-इन्द्रियों को ऑर्डर में रखो तो स्वतः आपके ऑर्डर करने के पहले ही सर्व साथी आपके कार्य में सहयोगी बनेंगे। स्वयं सहयोगी बनेंगे, ऑर्डर करने की आवश्यकता नहीं। स्वयं अपने सहयोग की ऑफर करेंगे; क्योंकि आप स्वराज्य अधिकारी हैं। जैसे राजाओं के आगे स्वयं स्नेह की सौगातें सभी ऑफर करते हैं, ऐसे आप स्वराज्य अधिकारियों के आगे सर्व सहयोग की सौगात स्वयं ऑफर करेंगे। क्योंकि राजा अर्थात् दाता, तो दाता को कहना नहीं पड़ता अर्थात् मांगना नहीं पड़ता। (अ०वा०21.1.87 पृ०24 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 अधिकार की परिभाषा ही है बिना मेहनत, बिना मांगने के प्राप्त हो। (अ०वा०23.1.87 पृ०30 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 इन विशेष तीन शक्तियों- ‘मन-बुद्धि-संस्कार’ पर कन्ट्रोल हो तो इसको ही स्वराज्य अधिकारी कहा जाता है। तो यह सूक्ष्म शक्तियाँ ही स्थूल कर्मेन्द्रियों को संयम और नियम में चला सकती हैं। (अ०वा०7.3.90 पृ०172 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 जैसे साइंस की शक्ति धरनी की(के) आकर्षण से परे कर लेती है, ऐसे साइलेंस की शक्ति इन सब हद की आकर्षणों से दूर ले जाती है। इसको कहते हैं, सम्पूर्ण सम्पन्न बाप समान स्थिति। तो ऐसी स्थिति के अभ्यासी बने हो? स्थूल कर्मेन्द्रियाँ­यह तो बहुत मोटी बात है। कर्मेन्द्रिय­जीत बनना, यह फिर भी सहज है। लेकिन मन­बुद्धि­संस्कार, इन सूक्ष्म शक्तियों पर विजयी बनना यह सूक्ष्म अभ्यास है। जिस समय जो संकल्प, जो संस्कार इमर्ज करने चाहें वही संकल्प, वही संस्कार सहज अपना सकें-इसको कहते हैं- सूक्ष्म शक्तियों पर विजय अर्थात् राजऋषि स्थिति। जैसे स्थूल कर्मेन्द्रियों को ऑर्डर करते हो कि यह करो, यह न करो। हाथ नीचे न हो, ऊपर हो, तो ऊपर हो जाता है ना। ऐसे संकल्प और संस्कार और निर्णय शक्ति ‘बुद्धि’ ऐसे ही ऑर्डर पर चले। आत्मा अर्थात् राजा, मन को अर्थात् संकल्प शक्ति को ऑर्डर करे कि अभी­अभी एकाग्रचित हो जाओ, एक संकल्प में स्थित हो जाओ। तो राजा का ऑर्डर उसी घड़ी उसी प्रकार से मानना- यह है राज­अधिकारी की निशानी। ऐसे नहीं कि तीन/चार मिनट के अभ्यास बाद मन माने या एकाग्रता के बजाए हलचल के बाद एकाग्र बने, इसको क्या कहेंगे? अधिकारी कहेंगे? तो ऐसी चेकिंग करो। क्योंकि पहले से ही सुनाया है कि अंतिम समय की अंतिम रिज़ल्ट का समय एक सेकण्ड का क्वेश्चन एक ही होगा। इन सूक्ष्म शक्तियों के अधिकारी बनने का अभ्यास अगर नहीं होगा अर्थात् आपका मन आप राजा का ऑर्डर एक घड़ी के बजाए तीन घड़ियों में मानता है तो राज्य अधिकारी कहलाएँगे वा एक सेकण्ड के अंतिम पेपर में पास होंगे? कितने मार्क्स मिलेंगे? (अ०वा०27.11.87 पृ०150 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 संस्कार शक्ति के ऊपर राज्य अधिकारी अर्थात् सदा अनादि आदि संस्कार इमर्ज हो । नैचुरल संस्कार हों। मध्य अर्थात् द्वापर से प्रवेश होने वाले संस्कार अपने तरफ़ आकर्षित नहीं करें। संस्कारों के वश मजबूर न बनें। जैसे कहते हो ना कि मेरे पुराने संस्कार हैं। वास्तव में अनादि और आदि संस्कार ही पुराने हैं। यह तो मध्य द्वापर से आये हुए संस्कार हैं। तो पुराने संस्कार आदि के हुए वा मध्य के हुए? कोई भी हद की(के) आकर्षण के संस्कार अगर आकर्षित करते हैं तो संस्करों पर राज्य­अधिकारी कहेंगे? राज्य के अंदर एक शक्ति वा एक कर्मचारी ‘कर्मेन्द्रिय’ भी अगर ऑर्डर पर नहीं है तो उसको सम्पूर्ण राज्य­अधिकारी कहेंगे? आप सब बच्चे चैलेन्ज करते हो कि हम एक राज्य, एक धर्म, एक मत स्थापन करने वाले हैं। ......... अगर एक कर्मेन्द्रिय भी माया की दूसरी मत पर है तो एक राज्य, एक मत नहीं कहेंगे। तो पहले यह चेक करो कि एक राज्य, एक धर्म स्व के राज्य में स्थापन किया है वा कभी माया तख़्त पर बैठ जाती, कभी आप बैठ जाते हो? चैलेन्ज को प्रैक्टिकल में लाया है वा नहीं- यह चेक करो। चाहे अनादि संस्कार और इमर्ज हो जाए मध्य के संस्कार, तो यह अधिकारीपन नहीं हुआ ना। (अ०वा०27.11.87 पृ०151 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 जो संगमयुग पर अपना राजा बनता है वह प्रजा का भी राजा बन सकता है। जो यहाँ अपना राजा नहीं वह वहाँ प्रजा का राजा भी नहीं बन सकता।.......यहाँ अपना राजा बनने से क्या होगा? अपने को अधिकारी समझेंगे। अधिकारी बनने के लिए उदारचित का विशेष गुण चाहिए। जितना उदारचित होंगे उतना अधिकारी बनेंगे। (अ०वा०18.6.69 पृ०70 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 प्रकृति और माया के अधीन न होकर दोनों को अधीन करना चाहिए। अधीन हो जाने के कारण अपना अधिकार खो लेते हैं। तो अधीन नहीं होना है। अधीन करना है, तब अपना अधिकार प्राप्त करेंगे और जितना अधिकार प्राप्त करेंगे उतना प्रकृति और लोगों द्वारा सत्कार होगी। ....... जैसे लौकिक रचना से अधीन बनते हो, वैसे ही अब भी अपनी रचना संकल्पों के भी अधीन बन जाते हो। अपनी रचना कर्म­इन्द्रियों के भी अधीन बन जाते हो। अधीन बनने से ही अपना जन्मसिद्ध अधिकार खो लेते हो ना। (अ०वा०17.11.69 पृ०143 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 अधिकारी कभी अधीन नहीं होता। कोई भी बात के अधीन नहीं। जहाँ अधिकार है वहाँ अधीनता नहीं है और जहाँ अधीनता है वहाँ अधिकार नहीं है। अधिकार भूलता है तब अधीन होते। तो कोई भी वस्तु के, व्यक्ति के, संस्कार के अधीन नहीं होना। (अ॰ बापदादा की पर्सनल मुलाकात- अ०वा०25.1.94 पृ०144 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 जो निमित्त आधार शरीर को समझेंगे वह कभी भी अधीन नहीं बनेंगे।.... जो स्वयं ही अधीन हैं वह उद्धार क्या करेंगे।...........जब बंधनमुक्त हो जाएँगे तो जैसे टेलीफोन में एक/दो का आवाज़ कैच कर सकते हैं, वैसे कोई के संकल्प में क्या है, वह भी कैच करेंगे। (अ०वा०13.3.71 पृ०45 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 जो वरदान के अधिकारी बन जाते हैं वह किसके अधीन नहीं होते। ....कब कोई अधीनता का संकल्प भी न आये। (अ०वा०13.3.71 पृ०46 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 कभी अधीन नहीं बनना- चाहे संकल्पों के, चाहे माया के और भी कोई रूपों के अधीन नहीं बनना। इस शरीर के भी अधिकारी बनकर चलना और माया से भी अधिकारी बन उसको अपने अधीन करना है। संबंध के(की) अधीनता में भी न आना है। चाहे लौकिक, चाहे ईश्वरीय संबंध की भी अधीनता में न आना। सदा अधिकारी बनना है। यह स्लोगन सदैव याद रखना। (अ०वा०25.3.71 पृ०52 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 संस्कारों के अधीन भी नहीं होना है। कोई के स्नेह के अधीन भी नहीं होना है। वायुमण्डल के अधीन भी नहीं। ..... मजबूर नहीं होना है; परन्तु मजबूत होना है। (अ०वा०9.4.71 पृ०57 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 ताज, तिलक और तख़्त- यह तीनों ही संगमयुग की बड़ी से बड़ी प्राप्ति है। इस प्राप्ति के आगे भविष्य राज्य कुछ भी नहीं। जिसने संगमयुग का ताज,तख़्त न लिया उसने कुछ भी नहीं लिया। विश्व के कल्याण के जिम्मेवारी का ताज है। जब तक यह ताज धारण नहीं करते, तब तक बाप के दिल रूपी तख़्त पर विराजमान नहीं हो सकते। (अ०वा०24.5.71 पृ०85 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 जो विश्व के राजे बनने वाले हैं उन्हों की विशेषता यह है- सर्व आत्माओं को राज़ी रखना।(अ०वा०3.6.71 पृ०92 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 जो प्रैक्टिकल सबूत देंगे वह फर्स्ट नम्बर आएँगे। जो सोचते रहेंगे तो बाप भी राज्य­भाग्य देने के लिए सोचेंगे। जो स्वयं को स्वयं ही ऑफर करते हैं उनको बापदादा भी विश्व की राजधानी का राज्य­भाग्य पहले ऑफर करते हैं। अगर अपने को ऑफर नहीं करेंगे तो बापदादा भी विश्व का तख़्त क्यों ऑफर करेंगे। अपने को आपे ही ऑफर करो तो आफरीन कही जायेगी। (अ०वा०11.6.71 पृ०108 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 अगर अपने प्रति ही समय लगाते रहते हैं तो विश्व­महाराजन कैसे बनेंगे? तो विश्व महाराजन बनने के लिए विश्व­कल्याणकारी बनो। (अ०वा०21.6.72 पृ०315 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 जो पहला वायदा नष्टोमोहा होने का निभाते हैं वही पहले जन्म के राज्य में आते हैं। (अ०वा०22.7.72 पृ०340 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 ज्ञान के संस्कार भी बहुत समय से चाहिए ना। बहुत समय से अभी संस्कार न भरेंगे तो बहुत समय राज्य भी नहीं करेंगे। अंत समय भरने का पुरुषार्थ करेंगे तो राज्य­भाग्य भी अंत में पावेंगे। अभी से करेंगे तो राज्य­भाग्य भी आदि से पावेंगे। (अ०वा०22.11.72 पृ०380 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 एक राजा-रानी को दास-दासियां भी ढेर होती हैं। आगे राजाएँ लोग बहुत साहूकार थे। उन्हों के पास बहुत पैसे होते थे। इतने ही फिर दास-दासियां भी थे बहलाने लिए। डांस करने लिए। डांस आदि का शौक तो वहां भी रहता है। तो यह दास-दासियां भी सब चाहिए ना। इसलिए बहुत थोड़े निकलते हैं जो अच्छी रीति समझ और समझा सकते हैं। यह सब प्रदर्शनी की सर्विस से मालूमपड़ता जावेगा कौन अच्छी रीति समझाते हैं। (मु०29.3.77 पृ०1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 अपने जीवन में आने वाले विघ्न व परीक्षाओं को पास करना-वह तो बहुत कॉमन (common) है; लेकिन जो विश्व­महाराजन् बनने वाले हैं उनके पास अभी से ही स्टॉक (Stock) भरपूर होगा, जो कि विश्व के प्रति प्रयोग हो सके। (अ०वा०13.4.73 पृ०29 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 विश्व महाराजन् बनने के लिए जब तक विश्व सेवक नहीं बने हैं, तब तक विश्व महाराजन् नहीं बन सकते। विश्व महाराजन् बनने के लिए तीन स्टेजेस से पार करना पड़ता है। पहली स्टेज- एक सेकन्ड में बेहद का त्यागी- सोच करते समय गँवाने वाले नहीं; लेकिन झट से और एक धक से बाप पर बलिहार जाने वाले। दूसरी बात- बेहद के निरन्तर अथक सेवाधारी और तीसरी बात- सदैव बेहद के वैराग्यवृत्ति वाले। (अ०वा०27.9.75 पृ०133 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 जगदम्बा नम्बरवन में जाती है। हम भी उनको फॉलो करेंगे। मम्मा­बाबा के तख़्तनशीन बनेंगे। इस समय दिल पर चढ़ेंगे तो हम भी तख़्तनशीन बनेंगे। दिल पर तब चढ़ेंगे, जब सर्विस करेंगे। (मु०29.4.70 पृ०2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 राजाओं को नज़राना देते हैं, कब ऐसे हाथ में लेंगे नहीं। अगर लेना होगा तो इशारा करेंगे, सेक्रेट्री को जाए दो। बहुत रॉयल होते हैं। बुद्धि में यह ख़्याल रहता है इनसे लेते हैं तो उनको काम में भी लगाना है, नहीं तो लेंगे नहीं। कोई राजाएँ प्रजा से बिल्कुल लेते नहीं हैं। कोई तो बहुत लूटते हैं। राजाओं में भी फर्क़ होता है। अभी तुम सतयुगी डबल सिरताज राजाएँ बनते हो। (मु०10.6.85 पृ०2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 अपने को देखो कि क्या मैं स्वयं तक लाइट व माइट देने वाला बना हूँ? ..... जितने तक लाइट देने वाले अब बनेंगे उतने ही छोटे या बड़े राज्य के अधिकारी भविष्य में बनेंगे। अगर सिर्फ़ थोड़ी­सी आत्माओं के प्रति लाइट और माइट देने के निमित्त बनते हैं तो वहाँ भी थोड़ी­सी आत्माओं के ऊपर ही राज्य करने के अधिकारी बनेंगे। .......... लेकिन अधिकारी वह बनेंगे जो अभी से अपने स्वभाव, संस्कार और संकल्प के अधीन नहीं बनेंगे। जो अभी भी अपने संकल्प के अधीन होता है तो क्या वह अधिकारी हुआ? ...... इसलिए अब संकल्पों के भी अधीन नहीं, स्वभाव और संस्कार के भी अधीन नहीं होना है। जो अब से इन सबके अधिकारी बनेंगे, वह ही वहाँ राज्य अधिकारी बनेंगे। अब हिसाब निकालो कि कितना अधीन रहते हैं, .... फिर उसकी रिजल्ट से भी अपने भविष्य का साक्षात्कार कर सकते हो। (अ०वा०23.9.73 पृ०158अंत 159मध्य) मुरली प्रूफ देखें
राज्यअधिकारी की निशानियाँत्याग का पहला कदम है- देहभान का त्याग। जब देह के भान का त्याग हो जाता है, तो दूसरा कदम है- देह के सर्वसंबंध का त्याग। जब देह का भान छूट जाता तो क्या बन जाते? आत्माए देही वा मालिक। देह के बंधन मुक्त अर्थात् जीवनमुक्त राज्य अधिकारी। जब राज्य अधिकारी बन गये तो सर्व प्रकार की अधीनता समाप्त हो जाती......और अधिकारी अर्थात् स्वराज्यधारी की निशानी है मन और तन से सदा हर्षित।......राज्य अधिकारी सदा सिंहासन पर सेट होगा.......और अधिकारी सदा अपने को कम्फर्ट (आराम में) अनुभव करेगा।.......अधिकारी अर्थात् सदा मास्टर सर्वशक्तिवान, विघ्न विनाशक स्थिति की शान में स्थित होगा। परिस्थिति वा व्यक्ति, वैभव वायुमण्डल आदि यह सब मनोरंजन का खेल, वैराइटी खेल शान में रह मौज से देखता रहेगा।(अ०वा०6.4.82 पृ०346 अंत, 347आदि­मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 जितनी जो (यज्ञ की) सेवा करता है उतना सेवा का फल-समीप संबंध में आता है। यहाँ के सेवाधारी वहाँ के राज्य फैमिली(परिवार) के अधिकारी बनेंगे। यहाँ जितनी हार्ड(सख़्त) सेवा करते, उतना वहाँ आराम से सिंहासन पर बैठेंगे। और यहाँ जो आराम करते हैं, वह वहाँ काम करेंगे। हिसाब है ना। ..... इसलिए एक­2 सेकेन्ड का हिसाब कर चुक्तू भी करता। गिनती करके हिसाब देता है, ऐसे नहीं देता। ........ तो आज के सेवाधारी कल के राज­अधिकारी बनते हैं और आज के राज्य करने वाले कल के सेवा करने वाले बनते हैं। (अ०वा०21.10.87 पृ०99 मध्य) नोटः- अधिक जानकारी के लिए (अ॰वा॰4.1.80 पृ॰745 और अ॰वा॰21.1.87 पृ०22, 23, 24) की वाणियों का अध्ययन कीजिए। मुरली प्रूफ देखें
 राजाओं का राजा बनने का योग है। आप सभी राजयोगी हो या राजाई भविष्य में प्राप्त करनी है? अभी संगमयुग में भी राजा हो या सिर्फ़ भविष्य में बनने वाले हो? जो संगमयुग में राज्य पद नहीं पा सकते वह भविष्य में क्या पा सकते हैं? तो जैसे सर्व श्रेष्ठ योग कहते हो, ऐसा ही सर्व श्रेष्ठ योगी जीवन तो होना चाहिए न? क्या पहले अपनी कर्मेन्द्रियों के राजा बने हो? जो स्वयं के राजा नहीं वह विश्व के राजा कैसे बनेंगे? क्या स्थूल कर्मेन्द्रियों व आत्मा की श्रेष्ठ शक्तियाँ मन,बुद्धि,संस्कार अपने कन्ट्रोल (control) में हैं? अर्थात् उन्हों के ऊपर राजा बनकर राज्य करते हो? राजयोगी अर्थात् अभी राज्य चलाने वाले बनते हो। राज्य करने के संस्कार व शक्ति अभी से धारण करते हो। भविष्य 21 जन्म में राज्य करने की धारणा प्रैक्टिकल रूप में अभी आती है। सहज ज्ञान और राजयोग तीसरी स्टेज तक आया है? संकल्प को ऑर्डर (order) करो ‘स्टॉप’ (stop) तो स्टॉप कर सकते हो? बुद्धि को डायरैक्शन (Direction) दो कि शुद्ध संकल्प व अव्यक्त स्थिति व बीजरूप स्थिति में स्थित हो जाओ तो क्या स्थित कर सकते हो? ऐसे राजा बने हो? (अ०वा०28.6.73 पृ०118 आदि) मुरली प्रूफ देखें
राज्यअधिकारी की निशानियाँहे! कर्मेन्द्रियों के राज्य अधिकारी, अपनी राज्य सत्ता अनुभव करते हो? राज्य सत्ता श्रेष्ठ है वा कर्मेन्द्रियों अर्थात् प्रजा की सत्ता श्रेष्ठ है? प्रजापति बने हो? क्या अनुभव करते हो? स्टॉप कहा और स्टॉप हो गया। ऐसे नहीं कि आप कहो स्टॉप और वह स्टार्ट हो जाए। सिर्फ़ हर कर्मेन्द्रिय की शक्ति को आँख से इशारा करो तो इशारे से ही जैसे चाहो वैसे चला सको। ऐसे कर्मेन्द्रियजीत बनें तब फिर प्रकृतिजीत बन कर्मातीत स्थिति के आसनधारी सो विश्वराज्य अधिकारी बनो। तो अपने से पूछो- पहली पौढ़ी कर्मइन्द्रिय जीत बने हैं? हर कर्मेन्द्रिय ‘जी हजूर’ ‘जी हाजिर’ करती हुई चलती है?(अ०वा०14.1.82 पृ०237 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 हरेक को अपनी ज़िम्मेवारी आप उठानी है। अगर यह सोचेंगे कि दीदी, दादी व टीचर ज़िम्मेवार हैं तो इससे सिद्ध होता है कि आपको भविष्य में उन ही की प्रजा बनना है, राजा नहीं बनना है। यह भी अधीन रहने के संस्कार हुये न? जो अधीन रहने वाला है वह अधिकारी नहीं बन सकता। विश्व का राज्यभाग नहीं ले पाता। इसलिए स्वयं के ज़िम्मेवार, फिर सारे विश्व की ज़िम्मेवारी लेने वाले विश्वमहाराजन् बन सकते हैं। (अ०वा०30.5.73 पृ०81 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 अगर किसी को सम्भालना नहीं आता है तो किसी के सम्भालने में चलना पड़े ना। तो मास्टर रचयिता के बदले रचना बनना पड़े। (अ०वा०8.7.73 पृ०127 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 विश्व के महाराजन जो बनने वाले हैं उन्हीं (उन्हों) की अभी निशानी क्या होगी? यह भी ब्राह्मणों का विश्व है अर्थात् छोटा-सा संसार है तो जो विश्वमहाराजन् बनने हैं उन्हों का इस विश्व अर्थात् ब्राह्मण कुल के(की) हर आत्मा साथ संबंध होगा। जो यहाँ इस छोटे से परिवार, सर्व के संबंध में आवेंगे वह वहाँ विश्व के महाराजन बनेंगे। ...... एक होते हैं, जो स्वयं तख़्त पर बैठेंगे और एक फिर ऐसे भी हैं, जो तख़्तनशीन बनने वालों के नज़दीक सहयोगी होंगे। नज़दीक सहयोगी भी होना है तो उसके लिए भी अब क्या करना पड़ेगा? जो पूरा दैवी परिवार है, उन सर्व आत्माओं के किसी न किसी प्रकार से सहयोगी बनना पड़ेगा। एक होता है, सारे कुल के(की) सर्विस के निमित्त बनना और दूसरा होता है, सिर्फ़ निमित्त बनना है; लेकिन किसी न किसी प्रकार से सर्व के सहयोगी बनना। ऐसे ही फिर वहाँ उनके नज़दीक के सहयोगी होंगे। ........ एक­एक को अपना सहयोग देंगे तो सहयोग मिलेगा और जितने के यहाँ सहयोगी बनेंगे उतने के स्नेह के पात्र बनेंगे। और ऐसा ही फिर विश्व के महाराजन् बनेंगे। (अ०वा०25.12.69 पृ०163 मध्यांत 164मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 जो बहुत याद करेंगे उनको खुशी तो ज़रूर रहेगी। ..... राजा बनना है तो प्रजा भी बनानी पड़े। नहीं तो कैसे समझेंगे कि हम राजा बनेंगे। (मु०28.2.69 पृ०2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 जो एक ही स्थान पर स्थित हो सर्विस भी कर रहे हैं; लेकिन बेहद में चक्र नहीं लगाते हैं तो भविष्य में भी उन्हों को एक इन्डिविजुअल राजाई मिल जायेगी। ........ विश्व का राजा वह बनेंगे, जो विश्व की हर आत्मा से संबंध जोड़ेंगे और सहयोगी बनेंगे। (अ०वा०2.7.70 पृ०284 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 अपने को जितना अधिकारी समझते हो, उतना ही सत्कारी बनो। पहले सत्कार देना, फिर अधिकार लेना। ...... अगर सत्कार को छोड़ सिर्फ़ अधिकार लेंगे तो क्या हो जायेगा? जो कुछ किया वह बेकार हो जायेगा। (अ०वा०9.12.70 पृ०330 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 राजधानी को सजाने वाले सेवा और याद के बैलेन्स में रहो। हर संकल्प में भी सेवा हो। जब हर संकल्प में सेवा होगी तो व्यर्थ से छूट जायेंगे। तो चेक करना चाहिए जो संकल्प उठाए जो सेकेन्ड बीता वह सेवा और याद का बैलेन्स रहा? तो रिज़ल्ट क्या होगी? हर कदम में चढ़ती कला। हर कदम में पदम जमा होते रहेंगे तब तो राज्य­अधिकारी बनेंगे। तो सेवा और याद का चार्ट रखो। सेवा एक जीवन का अंग बन जाए। (अ०वा०2.1.80 पृ०170 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 सभी अपने को डबल राज्य­अधिकारी समझते हो? वर्तमान भी राज्य­अधिकारी और भविष्य में भी राज्य­ अधिकारी। ...... वर्तमान व भविष्य के राज्य­अधिकारी बनने के लिए सदा यह चेक करो कि मेरे में रूलिंग पावर कहाँ तक है, पहले सूक्ष्म शक्तियाँ, जो विशेष कार्यकर्ता हैं, उनके ऊपर कहाँ तक आपना अधिकार है। संकल्प शक्ति के ऊपर, बद्धि के ऊपर और संस्कारों के ऊपर।...... अगर यह तीनों कार्यकर्ता आप आत्मा अर्थात् राज्य­अधिकारी राजा के इशारे पर चलते हैं तो सदा वह राज्य यथार्थ रीति से चलता है। जैसे बाप को भी तीन मूर्तियों द्वारा कार्य कराना पड़ता है; इसलिए त्रिमूर्ति का विशेष गायन और पूजन है। त्रिमूर्ति शिव कहते हो। एक बाप के तीन विशेष कार्य­कर्ता हैं जिन द्वारा विश्व का कार्य कराते हैं। ऐसे आप आत्मा रचयिता हो और यह तीन विशेष शक्तियाँ अर्थात् त्रिमूर्ति शक्तियाँ आपके विशेष कार्य­कर्ता हैं। ...... मन है उत्पत्ति करने वाला अर्थात् संकल्प रचने वाला। बुद्धि है निर्णय करना अर्थात् पालना के समान कार्य करना। संस्कार हैं अच्छा व बुरा परिवर्तन कराने वाले। जैसे ब्रह्मा आदिदेव है, वैसे पहले आदि शक्ति है मन अर्थात् संकल्प शक्ति। ...... पहले यह चेक करो मुझ राजा का पहला आदि कार्य­कर्ता सदा समीप के साथी के समान इशारे पर चलता है? क्योंकि माया दुश्मन भी पहले इसी आदि शक्ति को बाग़ी अर्थात् ट्रेटर बनाती है और राज्य­ अधिकार लेने की कोशिश करती है। इसलिए आदि शक्ति को सदा अपने अधिकर की शक्ति के आधार पर सहयोगी, विशेष कार्य­कर्ता करके चलाओ। ........ आत्मा भी करावनहार है, करनहार ये विशेष त्रिमूर्ति शक्तियाँ हैं। पहले इनके ऊपर रूलिंग पावर है तो यह साकार कर्मेन्द्रियाँ उनके आधार पर स्वतः ही सही रास्ते पर चलेंगी। कर्मेन्द्रियों को चलाने वाली भी विशेष यह तीन शक्तियाँ हैं। अब रूलिंग पावर कहाँ तक आई है-यह चेक करो।..........मन अपनी मनमत पर चलावे, बुद्धि अपनी निर्णय शक्ति की हलचल करे, मिलावट करे, संस्कार आत्मा को भी नाच नचाने वाले हो जाएँ तो इसको एक धर्म नहीं कहेंगेए एक राज्य नहीं कहेंगे। तो आपके राज्य का क्या हाल है? त्रिमूर्ति शक्तियाँ ठीक हैं? कभी संस्कार बंदर का नाच तो नहीं नचाते हैं? बंदर क्या करता है? नीचे­ऊपर छलांग मारता है ना। संस्कार की भी अभी­अभी चढ़ती कला अभी­अभी गिरती कला। यह बंदर का नाच है ना। तो ये संस्कार नाच तो नहीं नचाते हैं ना? कन्ट्रोल में हैं ना सब?(अ०वा०4.1.80 पृ०173,आदि, 174, 175) मुरली प्रूफ देखें
राज्यअधिकारी की निशानियाँअकालतख़्तनशीन आत्मा अर्थात् राज्य­अधिकारी। ऐसे राज्य अधिकारी बन करके चलते हो? कर्मेन्द्रियों के अधीन तो नहीं होते? जहाँ अधीनता होगी, वहाँ कमज़ोरी होगी। आधा कल्प कमज़ोर रहे अब अपना राज्य लिया है? राज्य अथवा अधिकार लेने के बाद अधीनता समाप्त हो जाती है। तो राज्य अधिकारी हो ना। कोई कर्मेन्द्रिय अर्थात् कार्य­कर्ता आपके ऊपर राज्य तो नहीं करता? जैसे आज­कल की दुनिया में प्रजा का प्रजा पर राज्य है, वैसे आपके जीवन में प्रजा का राज्य तो नहीं है ना? प्रजा हैं यह कर्मेन्द्रियाँ। प्रजा के राज्य में सदा हलचल रहती है और राजा के राज्य में अचल राज्य चलता। तो अचल राज्य चल रहा है ना? (अ०वा०7.1.80 पृ०185 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 जो संगम पर सर्व के दिलों पर विजयी बनता है वही भविष्य में विश्व महाराजन बनते हैं। विश्व में सर्व आ जाते हैं। तो बीज यहाँ डालना है फल वहाँ लेना है। (अ०वा०2.4.70 पृ०239 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 वारिस अर्थात् अधिकारी। तो जो यहाँ सदा अधिकारी स्टेज पर रहते, कभी भी माया के अधीन नहीं होते, अधिकारीपन के शुभ नशे में रहते, ऐसे अधिकारी स्टेज वाले ही वहाँ भी अधिकारी बनेंगे। (अ०वा०2.2.77 पृ०62 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 वारिस क्वालिटी जो आप जैसे ही सेवा के उमंग­उत्साह में तन­मन­धन सहित रहते हुए भी सरेन्डर बुद्धि हो, इसको कहते है वारिस क्वालिटी। (अ०वा०24.2.84 पृ०161 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 वारिस हो तो वारिस की निशानी है- अतीन्द्रिय सुख के वर्से के अधिकारी। वारिस को बाप सभी कुछ विल करता है। जो वारिस नहीं होंगे उनको थोड़ा­बहुत देकर खुश करेंगे। (अ०वा०30.5.71 पृ०88 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
 यह तीनों ही होना चाहिए- मनसा में निराकारी स्टेज, वाचा में निरहंकारी और कर्म में निर्विकारी, ज़रा भी विकार ना हो। तेरा­मेरा, शान­मान- यह भी विकार हैं। अंश भी हुआ तो वंश आ जावेगा। संकल्प में भी विकार का अंश ना हो। त(ज)ब यह तीनों स्टेज हो जावेंगी, तब अपने प्रभाव से जो भी वारिस वा प्रजा निकलनी होगी वह फटाफट निकलेगी। (अ०वा०19.7.72 पृ०337 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 जब अपने को वारिस समझते हो तो वारिस वर्से के अधिकारी स्वतः ही होते हैं, माँगना नहीं पड़ता है। (अ०वा०6.8.72 पृ॰360 म॰) मुरली प्रूफ देखें
 जो बलिहार होता है उसमें हिम्मत ज़्यादा होती है। तो जितना­जितना अपने को बलिहार बनावेंगे उतना ही गले के हार में नज़दीक आवेंगे। अभी बलिहार होंगे फिर बनेंगे प्रभु के गले का हार। अगर बलिहार बन करके ही कर्म करेंगे तो दूसरों को भी बलिहार बनावेंगे। जिसको वारिस कहा जाता है। (अ०वा०19.7.69 पृ०93 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
महारथीएक हैं अपने वरदान वा वर्से की प्राप्ति के पुरुषार्थ के आधार से महारथी और दूसरे हैं कोई न कोई सेवा की विशेषता के आधार से महारथी। कहलाते दोनों ही महारथी हैं; लेकिन जो पहला नम्बर सुनाया- स्थिति के आधार वाले, वह सदा मन से अतीन्द्रिय सुख के, सन्तुष्टता के, सर्व के दिल के स्नेह के प्राप्ति स्वरूप के झूले में झूलते रहते हैं। और दूसरा नम्बर सेवा की विशेषता के आधार वाले तन से अर्थात् बाहर से सेवा की विशेषता के फलस्वरूप सन्तुष्ट दिखाई देंगे। सेवा की विशेषता के कारण सेवा के आधार पर मन की सन्तुष्टता है। सेवा की विशेषता कारण सर्व का स्नेह भी होगा ; लेकिन मन से वा दिल से सदा नहीं होगा। कभी बाहर से, कभी दिल से। लेकिन सेवा की विशेषता महारथी बना देती है।(अ०वा०3.3.88 पृ०279 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 सन्तुष्ट को सन्तुष्ट रखना महावीरता नहीं है, स्नेही को स्नेह देना महावीरता नहीं, सहयोगी साथ सहयोगी बनना महावीरता नहीं; लेकिन जैसे बाप अपकारियों पर भी उपकार करते हैं, कोई कितना भी असहयोगी बने, अपने सहयोग की शक्ति से असहयोगी को सहयोगी बनाना- इसको महावीरता कहा जाता है। (अ०वा०2.4.72 पृ०252 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 महारथी की यह निशानी है कि जब सर्वस्व अर्पण कर दिया तो उसमें तन­मन­धन, सम्पत्ति, समय, संबंध और सम्पर्क भी सब अर्पण किया ना? अगर समय भी अपने प्रति लगाया और बाप की याद या बाप के कर्तव्य में नहीं लगाया, तो जितना समय अपने प्रति लगाया, तो उतना समय कट हो गया। (अ०वा०6.2.74 पृ०19 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 महारथी को कोई बात मुश्किल अनुभव हो, वह महारथी ही नहीं। महारथी अपने सहयोग से और बाप के सहयोग से औरों की मुश्किल भी सहज करेंगे। महारथियों के संकल्प में भी कभी यह कैसे, ऐसे क्यों? यह प्रश्न नहीं उठ सकता। कैसे के बजाय ‘ऐसे’ शब्द आवेगा। (अ०वा०16.5.74 पृ०42 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 ईश्वरीय मर्यादा वही है जो कमज़ोर को कमज़ोर समझ छोड़ न दे; लेकिन उसको बल देकर बलवान बनावे और साथी बनाकर ऐसे कमज़ोर को हाई जम्प देने योग्य बनावे, तब कहेंगे महावीर। (अ०वा०2.4.72 पृ०252 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 महारथियों की विशेषता यह है जो सर्व की सन्तुष्टता का सर्टिफिकेट लेवें। तब कहेंगे महारथी। सन्तुष्टता ही श्रेष्ठता व महानता है। प्रजा भी इस आधार से बनेगी। सन्तुष्ट हुई आत्माएँ उनको राजा मानेंगी। कोई­न­कोई सेवा सहयोग द्वारा प्राप्त कराई हो- स्नेह की, सहयोग की, हिम्मत­उल्लास की और शक्ति दिलाने की प्राप्ति कराई हो तो महारथी और अगर सन्तुष्टता न कराई है तो नाम के महारथी हैं, वे काम के नहीं। ....... इसके लिये स्वयं को परिवर्तन करना पड़े। परन्तु यह सन्तुष्टता का सर्टीफिकेट ज़रूर लेना है। यह चेकिंग करो कि- कितनी आत्माएँ मेरे से सन्तुष्ट हैं? मुझे क्या करना है जो मेरे से सब संतुष्ट रहें? (अ०वा०31.10.75 पृ०252 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 महारथी में स्वयं को मोल्ड (Mold) करने की शक्ति होनी चाहिए। मोल्ड करने वाला ही गोल्ड (Gold) होता है। जो मोल्ड नहीं कर सकते वो रीयल (Real) गोल्ड नहीं हैं- मिक्स (Mix) हैं। मिक्स होना अर्थात् घोड़ेसवार।..........महारथी­जिसमें सर्व­सिफ्तें हों अर्थात् सर्व गुण सम्पन्न, सर्व कलाएँ और सर्व विशेषताएँ हों- अगर एक/दो कला कम है तो सर्व कला सम्पूर्ण नहीं। (अ०वा०31.10.75 पृ०253 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 महारथियों की यह विशेषता है कि उनमें मैं­पन का अभाव होगा। मैं निमित्त हूँ और सेवाधारी हूँ- यह नैचुरल स्वभाव होगा। स्वभाव बनाना नहीं पड़ता है। स्वभाव­वश संकल्प, बोल और कर्म स्वतः ही होता है। महारथियों के हर कर्तव्य में विश्व­कल्याण की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देगी। उसका प्रैक्टिकल सबूत व प्रमाण हर बात में अन्य आत्मा को आगे बढ़ाने के लिए पहले आप का पाठ पक्का होगा। पहले मैं नहीं। आप कहने से ही उस आत्मा के कल्याण के निमित्त बन जायेंगे। ऐसे महारथी जिनकी ऐसी श्रेष्ठ आत्मा है और ऐसा श्रेष्ठ स्वभाव हो, ऐसे ही बाप समान गाये जाते हैं। (अ०वा०27.10.75 पृ०236 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 महारथी अर्थात् महादानी। अपने समय का, अपने सुख के साधनों का, अपने गुणों का और अपनी प्राप्त हुई सर्वशक्तियों का भी अन्य आत्माओं की उन्नति­अर्थ दान करने वाला- उसको कहते हैं महादानी। ऐसे महादानी के संकल्प और बोल स्वतः ही वरदान के रूप में बन जाते हैं। जिस आत्मा के प्रति जो संकल्प करेंगे या जो बोल बोलेंगे वह उस आत्मा के प्रति वरदान हो जावेगा। (अ०वा०27.10.75 पृ०236 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
महारथीमहारथी अर्थात् डबल ताजधारी अर्थात् डबल सेवाधारी। स्वयं की और सर्व की सेवा का बैलेन्स हो,उसको कहेंगे ‘महारथी’। बच्चों के बचपन का समय स्वयं के प्रति होता है और ज़िम्मेवार आत्माओं का समय सेवा प्रति होता है। तो घोड़े सवार और प्यादों का समय स्वयं प्रति ज़्यादा जावेगा। स्वयं ही कभी बिगड़ेंगे, कभी धारणा करेंगे, कभी धारणा में फेल होते रहेंगे। कभी तीव्र पुरुषार्थ में, कभी साधारण पुरुषार्थ में होंगे। कभी किसी संस्कार से युद्ध तो कभी किसी संस्कार से युद्ध। वे स्वयं के प्रति ज़्यादा समय गँवायेंगे। लेकिन ‘महारथी’ ऐसे नहीं करेंगे। (अ०वा०22.1.76 पृ०11 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 अभी महारथियों के लिए विधि का समय नहीं है, बल्कि सिद्धि­स्वरूप के अनुभव करने का समय है। नहीं तो वर्तमान समय की अनेक परेशानियाँ, अब तक विधि में लगे रहने वाली आत्मा को अपनी शान से परे परेशान के प्रभाव में सहज लावेगी। ..... ऊँची स्थिति में स्थित हो नीचे रहने वालों का साक्षी हो खेल देखो। (अ०वा०29.8.75 पृ०82 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 किसी भी बात में रूकना नहीं चाहिए। जो रुकते हैं वे कमज़ोर होते हैं। महावीर कभी नहीं रूकते। ऐेसे नहीं विघ्न आएँ और रूक जावें। (अ०वा०20.6.73 पृ०105 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 महारथियों का अर्थ ही है महानता। तो महानता सिर्फ़ संकल्प में नहीं; लेकिन सर्व में महानता। यह है महारथियों की निशानी। संकल्प को प्रैक्टिकल में लाने के लिए सोच करने में समय नहीं लगता; क्योंकि महारथियों के संकल्प भी ऐसे ही होते हैं जो संकल्प प्रैक्टिकल में संभव हो सकते हैं। यह करें न करें, कैसे करें, क्या होगा इस(यह) सोचने की उनको आवश्यकता नहीं है। संकल्प ही ऐसे उत्पन्न होंगे जो संकल्प उठा और सिद्ध हुआ। (अ०वा०30.7.70 पृ०298 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 जो महारथी कहलाये जाते हैं उनकी प्रैक्टिस और प्रैक्टिकल साथ­साथ होना चाहिए। ....... महारथियों की निशानी होगी प्रैक्टिस की और प्रैक्टिकल हुआ। घोड़ेसवार प्रैक्टिस करने के बाद प्रैक्टिकल में आवेंगे और प्यादे प्लैन्स ही सोचते रहेंगे। (अ०वा०26.3.70 पृ०228 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 महारथियों के मुख से कब शब्द भी नहीं निकलेगा। कब करेंगे वा अब करेंगे। कब शब्द शोभता नहीं है। कब शब्द ही कमज़ोरी सिद्ध करता है। ...... मन,वचन,कर्म हर बात में निश्चयबुद्धि। ....... उनका संकल्प भी निश्चयबुद्धि। वाणी में भी निश्चय, कब भी कोई बोल हिम्मतहीन का नहीं। उसको कहा जाता है- महारथी। महारथी का अर्थ ही है महान्। (अ०वा०26.3.70 पृ०229 आदि) मुरली प्रूफ देखें
घोड़ेसवार, प्यादेमहारथियों की निशानी होगी प्रैक्टिस की और प्रैक्टिकल हुआ। घोडे़सवार प्रैक्टीस करने बाद प्रैक्टिकल में आवेंगे और प्यादे प्लैन्स ही सोचते रहेंगे। (अ०वा०26.3.70 पृ०228 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 महावीर बच्चों की विशेषता यह है- कि पहले याद को रखते, फिर सेवा को रखते। घोड़ेसवार और प्यादे पहले सेवा, पीछे याद। इसीलिए फर्क पड़ जाता है। पहले याद फिर सेवा करें तो सफलता है। पहले सेवा को रखने से सेवा में जो भी अच्छा­बुरा होता है उसके रूप में आ जाते हैं और पहले याद को रखने से सहज ही न्यारे हो सकते हैं। (अ०वा०29.4.84 पृ०281 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
प्रजावर्ग में साहूकारइसी तरह से साहूकार प्रजा भी होगी। तो यहाँ भी कई राजे नहीं बने हैं; लेकिन साहूकार बने हैं; क्योंकि ज्ञान रत्नों का खजाना बहुत है, सेवा कर पुण्य का खाता भी जमा बहुत है; लेकिन समय आने पर स्वयं को अधिकारी बनाकर सफलतामूर्त बन जाय वह कन्ट्रोलिंग पॉवर और रूलिंग पावर नहीं है अर्थात्-नॉलेजफुल हैं; लेकिन पावरफुल नहीं हैं। शस्त्रधारी हैं; लेकिन समय पर कार्य में नहीं ला सकते हैं। स्टॉक है; लेकिन समय पर न स्वयं यूज कर सकते और न औरों को यूज़ करा सकते हैं। विधान आता है; लेकिन विधी नहीं आती। ऐसे भी संस्कार वाली आत्माएँ हैं अर्थात् साहूकार संस्कार वाली हैं। जो राज्य अधिकारी आत्माओं के सदा समीप के साथी ज़रूर होते हैं; लेकिन स्वअधिकारी नहीं होते। (अ०वा०14.1.82 पृ०238 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 अब यह तो समझते हैं, अच्छा जो पढ़ते वह ऊँच पद पा लेते हैं। बहुत साहूकार बन जाते हैं प्रजा में। यहाँ रहने वालों को अंदर ही रहना पड़ता है। दास­दासियाँ बन जाते हैं। फिर त्रेता के अंत में 3,4,5,8 जन्म करके राजाई पद मिलेगा। उनसे तो वह साहूकार अच्छे हैं जो सतयुग से लेकर उन्हों की साहूकारी कायम रहती है। (मु०20.3.76 पृ०2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 कोई भी कर्म-इन्द्रियों के वशीभूत होना अर्थात् रूलिंग पॉवर नहीं है, जिससे की “स्व” पर राज्य नहीं कर सकता। ..... जब स्वयं पर प्रजा का राज्य है और कर्म -इन्द्रियाँ प्रजा हैं तो जब तक प्रजा का राज्य है तो समझो प्रजा बनने वाले हैं; ...... लेकिन प्रजा पर राज्य नहीं करते अर्थात् उनमें रूलिंग पावर नहीं है तो समझो वह साहूकार बनने वाले हैं। (अ०वा०11.10.76 पृ०175 अंत) मुरली प्रूफ देखें
दास-दासीबाप का बन और विकर्माजीत न बने तो पाप न कटे।याद की यात्रा में न रहे तो वह क्या पद पावेंगे। भल सरेन्डर हैं; परन्तु इनसे क्या फ़ायदा। जब तक पुण्यआत्मा बन औरों को न बनावे, तब तक ऊँच पद पाय न सकेंगे। ...... फिर नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार देरी से आवेंगे। ऐसे नहीं हमने सब कुछ सरेन्डर किया है; इसलिए डबल सरताज बनेंगे। नहीं। पहले दास-दासियाँ बनते­2 फिर पिछाड़ी में थोड़ा मिल जावेगा। बहुतों को यह अहंकार रहता है, हम तो सरेन्डर हूँ। अरे, याद बिगर क्या बन सकेंगे। दास­दासी बनने से साहूकार प्रजा बनना अच्छा है। दास­दासी भी कोई कृष्ण साथ थोड़े ही झूले में झूल सकेंगे। यह बहुत समझने की बातें हैं। (मु०23.8.67 पृ०2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 पढ़ेंगे नहीं और विकर्म करते रहेंगे तो एक तो सज़ा खानी पड़ेगी, दूसरा फिर जाकर नौकर-चाकर, दास-दासियाँ बनेंगे। विकर्मों का बोझा बहुत है। जन्म-जन्मान्तर दासी बनें, पिछाड़ी में पद पाया तो क्या हुआ। इससे तो प्रजा को बहुत धन मिलता है। वह किसके दास-दासियाँ नहीं बनते हैं। (मु०15.3.77 पृ०3 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
 स्वर्ग में जो दास-दासियाँ होंगी वह भी जो दिल पर चढ़े हुए होंगे। ऐसे नहीं कि सभी आ जावेंगे। (मु०9.8.70 पृ०3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 अगर पूरा पुरुषार्थ न करेंगे तो जाकर दास-दासियां बनेंगे। ....... सारी राजधानी स्थापन हो रही है। (मु०22.7.71 पृ०4 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 दासपन की निशानी है- मन से, चेहरे से उदास होना। उदास होना निशानी है दासपन की। ....... दास सदा अपसेट होगा ...... दास छोटी­सी बात में और सेकन्ड में कनफ्यूज़ हो जायेगा। ...... इन निशानियों से अपने आपको को देखो­ मैं कौन? दास वा अधिकारी? कोई भी परिस्थिति, कोई भी व्यक्ति, कोई भी वैभव, वायुमण्डल, शान से परे अर्थात् तख़्त से नीचे उतार दास तो नहीं बना देते अर्थात् ज्ञान से परे परेशान तो नहीं कर देते हैं? तो दास अर्थात् पेरशान। ....... दास आत्मा सदा अपने को परीक्षाओं के मझधार में अनुभव करेगी। ...... बापदादा दास आत्माओं की कर्मलीला देख रहम के साथ­2 मुस्कुराते हैं। साकार में भी एक हँसी की कहानी सुनाते थे। दास आत्माएँ क्या करत भईं। कहानी याद है? सुनाया था कि चूहा आता, चूहे को निकालते तो बिल्ली आ जाती, बिल्ली को निकालते तो कुत्ता आ जाता। ...... इसी कर्म लीला में बिज़ी रहते हैं; क्योंकि दास आत्मा है ना। तो कभी आँख रूपी चूहा धोखा दे देता, कभी कान रूपी बिल्ली धोखा दे देती। कभी बुरे संस्कार रूपी शेर वार कर लेता और बेचारी दास आत्मा उन्हों को निकालते­निकालते उदास रह जाती है। ...... यह है बहुत छोटी­सी कर्मेन्द्रियाँ। आँख, कान कितने छोटे हैं; लेकिन यह जाल बहुत बड़ी फैला देते हैं। ...... यह भी हर कर्मेन्द्रिय का जाल इतना बड़ा है, ऐसे फँसा देगा, जो मालूम ही नहीं पड़ेगा कि मैं फँसा हुआ हूँ। यह ऐसा जादू का जाल है जो ईश्वरीय होश से, ईश्वरीय मर्यादाओं से बेहोश कर देता है। जाल से निकली हुई आत्माएँ कितना भी उन दास आत्माओं को महसूस कराएँ ; लेकिन बेहोश को महसूसता क्या होगी? स्थूल रूप में भी बेहोश को कितना भी हिलाओ, कितना भी समझाओ, बड़े­बड़े माइक कान में लगाओ लेकिन वह सुनेगा? तो यह जाल भी ऐसा बेहोश कर देता है। और फिर क्या मज़ा होता है? बेहोशी में कई बोलते भी बहुत हैं ; लेकिन वह बोल बे अर्थ होता है। ऐसे रूहानी बेहोशी की स्थिति में अपना स्पष्टीकरण भी बहुत देते हैं ; लेकिन वह होता बे अर्थ है। दो मास की, छः की पुरानी बात, यहाँ की बात, वहाँ की बात बोलते रहेंगे। ऐसी है यह रूहानी बेहोशी। (अ०वा०6.4.82 पृ०347 आदि 349 आदि) मुरली प्रूफ देखें
दास-दासीबार-बार कोई न कोई कर्म-इन्द्रियों के वा देहधारियों और देह के सम्पर्क से उन्हों के दास बन जाते हैं और उदास हो जाते हैं तो समझो दास-दासी बनने वाले हैं। (अ०वा०11.10.76 पृ०176 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
 जो किसी भी समस्या वा संस्कार के अधीन बन उदास रहता है तो उदास वा उदासी ही निशानी है- दास­दासी बनना। (अ०वा०14.1.82 पृ०238 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
 बाबा के पास सच्चा समाचार देना चाहिए। बहुत हैं जो झूठ बोलते हैं। सर्विस बदले डिससर्विस कर लेते हैं। उन्हों की क्या गति होगी। दास­दासियाँ जाकर बनेंगे। (मु०7.8.65 पृ०4 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 बाबा कितना अच्छी रीति समझाते हैं। फिर बाहर जाकर हंगामा करते हैं तो फिर वहाँ चलकर दास­दासियाँ, नौकर­चाकर बनेंगे। बाबा ने कह दिया है- पिछाड़ी का जब समय होगा उस समय तुमको पूरा पता पड़ेगा। (मु०10.3.87 पृ०3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
साहूकारों के नौकर­चाकरडिस­सर्विस बहुत सत्यानाश कर देती है। अभी निश्चयए अभी­2 संशय में आ जाते। भक्ति वाले मनुष्य बहुत फतकाते हैं। भगवान थोड़े ही आ सकता। यह सब गपोड़े हैं। थोड़ा भी संशय आया तो बाहर जाकर उल्टा बतावेंगे। सारी की कमाई चट हो जाती; क्योंकि उस तरफ़ है माया। ..... ऐसे बहुत आते हैं फिर जाकर क्या-2 करते हैं। कोई तो अच्छी रीत समझते हैं, बरोबर यह तो बाप पढ़ाते हैं। कोई का तो निश्चय ही टूट जाता है। ........ ऐसे क्या पद पावेंगे? जाए नौकर बनेंगे। जो ऐसे बेमुख होते हैं भल ज्ञान सुना है, तो ज्ञान का विनाश नही होगा; परन्तु कोई संशय हुआ, डिससर्विस की तो क्या पद पावेंगे? वहाँ भी साहूकरों को दास­दासियाँ, नौकर आदि भी तो चाहिए ना। अनेक प्रकार के संशय आते हैं। यहाँ तो बहुत अच्छा­अच्छा कहते हैं। यह ज्ञान बहुत अच्छा है। ऐसा ज्ञान तो हमने कब ना सुना। यहाँ से घर जाते ही माया नाक से ऐसा पकड़ती जो और ही गालियाँ लिख भेजते। ऐसे भी होता है। ढेर की ढेर चिट्ठियाँ आती हैं। संशय बुद्धि हो जाते हैं। बाप कहते हैं- दास­दासियां, नौकर­चाकर आदि भी चाहिए ना! नहीं तो कहाँ से आवेंगे? इसलिए गायन है- संशय बुद्धि विनश्यन्ति। सद्गुरु का निंदक ठौर ना पाए। .... जैसे कर्म करते हैं वैसा फल पावेंगे ना। कोई तो यहाँ से गये अपने धंधे आदि में सब भूल जाते। कोई डिससर्विस करते, निंदा करते हैं। उनके लिए कहते हैं- सद्गुरु के निंदक वा सत्गुरु के बच्चों के निन्दक ठौर न पाए। सत्गुरु के बच्चों की भी निंदा न करनी चाहिए। (मु०5.7.70 पृ०3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
साहूकारों के नौकर­चाकरस्वर्ग का नाम सुनकर खुश नहीं होना चाहिए। फेल होकर पाई पैसे का पद पा लेना, इसमें खुश न होना चाहिए। भल स्वर्ग है; परन्तु उसमें पद तो बहुत हैं ना। फीलिंग तो आती है ना। मैं नौकर हूँ, मेहतर हूँ। पिछाड़ी में तुमको सभी साक्षात्कार होंगे। हम क्या बनेंगे। हम से क्या विकर्म हुआ है, जो ऐसी हालत हुई है। मैं महारानी क्यों नहीं बनूँ। (मु०2.1.69 पृ०2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 शिवबाबा के भण्डारे में सर्विस न करने से सत्यानाश हो जाती है। फिर पाई पैसे का पद पा लेते हैं। बाप के पास सर्विस के लिए आए और सर्विस न की तो क्या पद मिलेगा। यह राजधानी स्थापन हो रही है। इसमें नौकर-चाकर सभी तो बनेंगे। (मु०27.1.70 पृ०3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
दास-दासियों के भी दासअर्पण किया हुआ कुछ भी याद न आये। बाप कहते हैं मैं ऐसी चीज़ लेता ही नहीं हूँ, जो पिछाड़ी में रह जाए और भरकर देना पड़े। ..... 10/20 वर्ष बाद भी कहते हैं, हमारा यह दिया हुआ वापिस करो। अरे, तुमने कणा दाना दिया अथाह लेने लिए, फिर कहते हो हमने दिया। शर्म नहीं आता! कौड़ी देते हो हीरे लेते हो। फिर भी तुम दी हुई कौड़ी माँगते हो। तुमने इतना खाया वह भी निकालो पेट से। सर्विस कहाँ की? यह तो डिससर्विस करते हो ना। डिससर्विस करने से इतना दिन जो खाया वह भी तुम्हारे ऊपर कर्ज़ा चढ़ गया। तुम जाकर दासियों के भी दास बनेंगे। (मु०17.12.68 पृ०3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 अगर समझते हैं, हम देते हैं तो यह शिवबाबा की इनसल्ट करते हैं। ......... ऐसा कब संशय न लाना कि हमने शिवबाबा को दिया। यह समझो इनसल्ट करता हूँ। (मु०2.10.76 पृ०3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 अगर अपने आराम के लिए कमाते वा जमा करते हैं तो यहाँ भले आराम करेंगे; लेकिन वहाँ औरों को आराम देने लिए निमित्त बनेंगे। दास.दासियाँ क्या करेंगे! रॉयल फैमिली को आराम देने के लिए होंगे ना। (अ०वा०27.2.85 पृ०198 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
फोर्थ क्लास दास-दासीकोई-कोई ब्राह्मणियाँ अपन को बहुत ऊँच समझए दूसरों को नीच समझ कर चलती हैं। ...... कोई.कोई ब्राह्मणियाँ गुस्सा करती हैं। कोई बीमार है तो उनकी दवाई नहीं करती, खाना पूरा नहीं खिलाती। ..... ऐसे-ऐसे कर्तव्य करने से तो गोया तुम आसुरी सम्प्रदाय हो। बाप सिखलाते हैं आपस में प्रेम सीखो। नहीं तो निंदा करावेंगे। किसको दुःख न देना है, सुख देना है। अपना अहंकार न रहना चाहिए, मैं पढ़ाने वाली हूँ। ...... अपने को ऊँच, दूसरे को नीच कब नहीं समझना। नहीं तो दुःख फील होता है। अपन को सुखी रखते हैं। दूसरे को कुछ देते नहीं। ...... ऐसे जो अपन को ऊँच समझ रहते हैं उनका पद नीच हो पड़ता है। ऐसी अवस्था में ऊँच पद पा न सकेंगे। किसको तंग न करना चाहिए। .......... ब्राह्मणियों को बाबा सावधान कर रहे हैं। बहुत हैं जो अपन को ऊँच समझ दूसरे की परवरिश नहीं करती हैं। ..... बीमार है, उसकी दवाई न करना, न प्यार करना गोया लून-पानी हैं। .... बाप तो सभी को सावधानी देते हैं। नहीं तो मुफ्त अपना पद भ्रष्ट करेंगे। बाप तो समझाने का हक़दार है। कहेंगे, पच्छर न बनो। सर्विसएबुल बनो। सर्विस नहीं करते हैं, यज्ञ से खाते रहते हैं, लड़ते रहते तो ज़रूर पद भ्रष्ट हो जावेंगे। बाप तो सहन कर न सके कि यह जाकर फोर्थ क्लास के दासी आदि बने। तो बाबा मुरली में सावधानी देते हैं। अगर समझते न हैं और कहेंगे, यह भी देहअभिमान। बाप नहीं तो बच्चों को कैसे सावधान करेंगे। मुरली द्वारा, टेप द्वारा समझावेंगे। फिर टेलीविजन होगा तो सामने खड़े होकर कहेंगे। नाम भी लेंगे। तुम फलाने.2 आपस में लून-पानी हो लड़ते हो। लून-पानी होने से सर्विस को धोखा आ जावेगा। (मु०31.7.68 पृ०2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 दासियाँ तो महलों में होती हैं और प्रजा तो बाहर होती है। (कैसेट नं. 191) इस प्वाइंट को रखना है क्या? मुरली प्रूफ देखें
प्रजावर्ग और चण्डालयह राजधानी स्थापन होती है। फ़िक्र की कोई बात नहीं। जिसने थोड़ा भी ज्ञान सुना तो प्रजा में आ जावेंगे। ज्ञान का विनाश नहीं होता। बाक़ी जो यथार्थ जान पुरुषार्थ करते हैं वही ऊँच पद पाते।(मु०12.6.70 पृ०3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 यह करोड़ों को नॉलेज मिलनी है। थोड़ी बहुत नॉलेज भी लेते हैं तो प्रजा में आ जाते हैं। बाक़ी ऊँच पद पाने वाले की तो नैन-चैन, बात-चीत करना ही न्यारा होता है। फिर भी माया का तूफ़ान बहुतों को लेटा देती है। (मु०19.11.69 पृ०3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 बाबा ने समझाया है यह अविनाशी ज्ञान है इनका विनाश नहीं हो सकता। थोड़ा भी सुनते हैं तो उनको पद ज़रूर मिलता है। इतने सारी सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी राजधानी स्थापन होती है, तो प्रजा भी चाहिए ना। (मु०24.11.67 पृ०1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 बाप का बनकर फिर उनको छोड़ देते हैं, तो भी जीवनमुक्ति तो ज़रूर ही मिलेगी। स्वर्ग में झाड़ू लगाने वाला बन जावेंगे। स्वर्ग में तो जावेंगे; परंतु पद कम मिलेगा। (मु०24.12.67 पृ०1 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
 प्रदर्शनी में इतने ढेर आते हैं। वह सारी प्रजा बनती जावेगी; क्योंकि इस अविनाशी ज्ञान का विनाश नहीं होता है। बुद्धि में आ जावेगा पवित्र बन पवित्र दुनिया का मालिक बनना है। पुरुषार्थ जास्ती करेंगे तो प्रजा में ऊँच पद पावेंगे। नहीं तो कम प्रजा बनेंगे। (मु०2.2.71 पृ०2 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
 अगर एक समय एक ही कार्य करेंगे तो स्वयं का वा विश्व का एक समय भी एक कार्य की प्रालब्ध नई दुनिया में एक लाइट का क्राउन अर्थात् पवित्र जीवन, सुख सम्पत्ति की जीवन प्राप्त होगी; लेकिन राज्य का तख़्त और ताज नहीं प्राप्त होगा अर्थात् प्रजा पद की प्रालब्ध होगी। (अ०वा०22.1.76 पृ०1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 जन्म ले फिर भी मर पड़ते हैं। बाप का बनकर और फिर विकार में गिरते हैं तो मर पड़ते हैं। तुम्हारे पास आते हैं, कहते भी हैं बरोबर राइट है, वह हमारा बाप है, हम उनके संतान हैं। हाँ, हाँ कहते हैं। प्रभावित हो जाते हैं। बाहर गये और ख़लास। फिर आते ही नहीं। तो क्या होगा? या तो पिछाड़ी में आकर रिफ्रेश होंगे या तो फिर प्रजा में आ जायेंगे। (मु०20.3.69 पृ०3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 इनको कहा ही जाता है- पुरुषोत्तम संगमयुग। जबकि तुम पुरुषोत्तम बन रहे हो। तो वातावरण भी बहुत अच्छा होना चाहिए। छी-छी बातें न निकले। नहीं तो कहा जावेगा यह कम दर्जे के हैं। वातावरण से झट पता पड़ जाता है। मुख से वचन ही दुःख देने वाले निकलते हैं। तुम बच्चों को तो बाप का नाम बाला करना है ना। सदैव मुखड़ा हर्षित होना चाहिए। नहीं तो उनमें ज्ञान नहीं कहा जावेगा। मुख से सदैव रतन निकलें। यह लक्ष्मी-नारायण देखो कितने हर्षित मुख हैं। इन्हों की आत्मा ने ज्ञान रतन धारण किये हैं। मुख से भी ज्ञान रतन निकलते हैं। रतन ही सुनते-सुनाते थे। कितनी खुशी रहती है। (मु०11.1.76 पृ०1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 कई हैं मुख से मुरली नहीं चलाते; याद में रहते हैं; परन्तु यहाँ तो दोनों में तीखा जाना पड़े। साजन बहुत लवली है। उनको तो बहुत याद करना चाहिए। मेहनत है। प्रजा बनना तो सहज है। दास-दासियाँ बनना बड़ी बात नहीं। ज्ञान नहीं उठा सकते हैं। ऐसे ही रहे पड़े हैं तो दास-दासियाँ बन जावेंगे। (मु०3.3.71 पृ०1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 पिछाड़ी में तुमको सब साक्षात्कार होंगे। फर्स्ट क्लास दास-दासियाँ भी बनेंगी। फर्स्ट दासी कृष्ण का पालन करेगी। सफाई करने वाले, कपड़ा धुलाई करने वाली, बर्तन साफ़ करने वाली, खाना पकाने वाली सब होंगे ना। यहाँ से ही निकलेंगे ना! (मु०2.3.68 पृ०3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 सिर्फ़ परिवार वा भाई­बहनों का स्नेह नहीं। अभी यहाँ तक पहुँचे हैं- जो सेवा करते हैं उन्हों प्रति स्नेही बनते; लेकिन बाप के स्नेह की अनुभूति करें। उन्हों के भी दिल से बाबा निकले। तब तो प्रजा बनेंगे। ब्रह्मा की प्रजा, पहले विश्व­महाराजन की प्रजा बनेगी। जिसकी प्रजा बननी है उसका स्नेह तो अभी से चाहिए ना। (अ०वा०31.12.89 पृ०115 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 पूरा पढ़ेंगे नहीं तो प्रजा में चले जावेंगे। (मु०12.7.74 पृ०3 म०) मुरली प्रूफ देखें
 थोड़ी बात में फेल होने से फिर राजाई मिल न सके। प्रजा में चले जाते हैं। कितना घाटा पड़ जाता है। नम्बरवार तो पद होते हैं ना। (मु०28.6.68 पृ०3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 अगर वशीभूत बार­बार होते हो तो संस्कार अधिकारी बनने के नहीं ; लेकिन राज्य­अधिकारियों के राज्य में रहने वाले हैं। वह कौन हो गये? वह हुई प्रजा। (अ०वा०21.1.87 पृ०23 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
 कुछ ना कुछ कनेक्शन में आते हैं और प्रजा बन जाती है ; लेकिन अब तो इससे भी आगे बढ़ना है। (अ०वा०14.7.72 पृ०326 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 बाबा सिद्ध कर बताते हैं इनमें क्रोध का भूत है। ...... आसुरी चलन सुधरती नहीं तो फिर क्या नतीजा निकलेगा? क्या पद पावेंगे? कहाँ विश्व का मालिक, कहाँ चण्डाल का जन्म। चण्डाल भी बनते हैं ना। मसाने(शमशान) भी राजाओं के अलग-2 होते हैं। प्रजा के अलग होते हैं। चण्डालों का भी परिवार होगा। फर्क़ तो है ना। बाप समझाते हैं कोई सर्विस न करेंगे तो यह हालत हो जावेगी। कम पद। साक्षात्कार तो सभी को होता ही है। तुमको भी अपने पढ़ाई का साक्षात्कार होता है। साक्षात्कार होने बाद ही फिर ट्रान्सफर होते हैं। फिर नई दुनियाँ में आ जावेंगे। पिछाड़ी में साक्षात्कार होगा, कौन-कौन किस मार्क्स से पास हुआ। फिर रोयेंगे-पीटेंगे। सज़ा भी खावेंगे। पछतावेंगे, बाबा का कहना न माना। (मु०31.7.68 पृ०2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 बाबा के पास सच्चा समाचार देना चाहिए। बहुत हैं जो झूठ बोलते हैं। सर्विस बदले डिससर्विस कर लेते हैं। उन्हों की गति होगी। दास­दासियाँ जाकर बनेंगे या तो अगर टूट पड़ेंगे तो चाण्डाल का जन्म जाए लेंगे। (मु०7.8.65 पृ०4 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 बाप का बनकर फिर बाप को ही फारकती देते हैं तो जाकर चाण्डाल बनेंगे। और क्या करेंगे। (मु०26.3.69 पृ०3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 बाप कहते हैं ना जो मेरी जाकर निंदा कराते हैं, मेरा हाथ छोड़ जाते हैं तो प्रजा में चंडाल जाय बनते हैं। (मु०10.7.75 पृ०2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
राजकुल के चण्डालबाबा फरमान करे कोई को चिट्ठी न लिखो। फिर भी लिखते रहते हैं। तो ऐसे बच्चों को कपूत कहेंगे ना। श्रीमत पर चलना चाहिए ना। ..... छिपाकर चिट्ठी भेज देतेहैं तो बाबा समझ जाते हैं, ऐसे चण्डाल का जन्म पा लेंगे। (मु०17.12.71 पृ०3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 जो आश्चर्यवत् भागन्ति होते वे तो प्रजा में चंडाल बनेंगे; परंतु जो यहाँ रह बहुत शैतानी, चोरी-चकारी आदि करते हैं तो वो रॉयल घराने के चंडाल बनते हैं। फिर भी पिछाड़ी में उनको ताज-पतलून मिल जाती है। क्योंकि यहां गोद तो लेते हैं ना। (मु०9.8.64 पृ०4 आदि) मुरली प्रूफ देखें