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पवित्रता (ब्रह्मचर्य) मुरली प्वॉइंट्स प्रूफ के साथ
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पवित्रता की परिभाषा तथा उसका महत्वपवित्रता संगमयुगी ब्राह्मणों के महान जीवन की महानता है। पवित्रता ब्राह्मण जीवन का श्रेष्ठ श्रृंगार है। जैसे स्थूल शरीर में विशेष श्वास चलना आवश्यक है। श्वास नहीं तो जीवन नहीं। ऐसे ब्राह्मण जीवन का श्वास है पवित्रता। 21 जन्मों की प्रालब्ध का आधार अर्थात् फाउण्डेशन पवित्रता है। आत्मा अर्थात् बच्चे और बाप से मिलन का आधार पवित्र बुद्धि है। सर्व संगमयुगी प्राप्तियों का आधार पवित्रता है। पवित्रता, पूज्य पद पाने का आधार है।.....जहाँ सर्वशक्तिवान बाप है वहाँ अपवित्रता स्वप्न में भी नहीं आ सकती है। .........ब्राह्मणों की लाइफ ही पवित्रता है। ब्राह्मण जीवन का जीय-दान ही पवित्रता है। आदि-अनादि स्वरूप ही पवित्रता है। जब स्मृति आ गई कि मैं आदि-अनादि पवित्र आत्मा हूँ। स्मृति आना अर्थात् पवित्रता की समर्थी आना। तो स्मृति स्वरूप, समर्थ स्वरूप आत्माएँ तो निजी पवित्र संस्कार वाली, निजी संस्कार पवित्र हैं। ...ब्राह्मण जीवन अर्थात् सहज योगी और सदा के लिए पावन। पवित्रता ब्राह्मण जीवन के विशेष जन्म की विशेषता है। पवित्र संकल्प ब्राह्मणों की बुद्धि का भोजन है। पवित्र दृष्टि ब्राह्मणों के आँखों की रोशनी है। पवित्र कर्म ब्राह्मण जीवन का विशेष धन्धा है। पवित्र सम्बन्ध और सम्पर्क ब्राह्मण जीवन की मर्यादा है। (अ.वा.06.1.82 पृ.218 मध्य, 219 आदि-मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 संगमयुगी ब्राह्मण जीवन की विशेषता है- पवित्रता की निशानी यह लाइट का ताज, जो हर ब्राह्मण आत्मा को बाप द्वारा प्राप्त होता है। पवित्रता की लाइट का यह ताज उस रत्न-जड़ित ताज से अति श्रेष्ठ है। महान आत्मा, परमात्म-भाग्यवान आत्मा, ऊँचे ते ऊँची आत्मा की यह ताज निशानी है।.........पवित्रता की प्राप्ति आप ब्राह्मण आत्माओं को उड़ती कला की तरफ सहज ले जाने का आधार है। जैसे कर्मों की गति गहन गाई हुई है, तो पवित्रता की परिभाषा भी अति गुह्य है। पवित्रता माया के अनेक विघ्नों से बचने की छत्रछाया है। पवित्रता को ही सुख-शान्ति की जननी कहा जाता है। किसी भी प्रकार की अपवित्रता, दुःख वा अशान्ति का अनुभव कराती है। ...चाहे मुख्य विकारों के कारण हो वा विकारों के सूक्ष्म रूप के कारण हो। ......पवित्र जीवन अर्थात् बापदादा द्वारा प्राप्त हुई वरदानी जीवन है। ब्राह्मणों के संकल्प में वा मुख में यह शब्द कभी नहीं होने चाहिए कि इस बात के कारण वा इस व्यक्ति के व्यवहार के कारण मुझे दुःख होता है। कभी साधारण रीति में ऐसे बोल, बोल भी देते या अनुभव भी करते हैं। यह पवित्र ब्राह्मण जीवन के बोल नहीं हैं। ब्राह्मण जीवन अर्थात् हर सेकेण्ड सुखमय जीवन। चाहे दुःख का नज़ारा भी हो; लेकिन जहाँ पवित्रता की शक्ति है, वह कभी दुःख के नज़ारे में दुःख का अनुभव नहीं करेंगे; लेकिन दुःख-हर्ता सुख-कर्ता बाप समान दुःख के वायुमण्डल में दुःखमय व्यक्तियों को सुख-शान्ति के वरदानी बन सुख-शांति की अंचली देंगे, मास्टर सुख-कर्ता बन दुःख को रूहानी सुख के वायुमण्डल में परिवर्तन करेंगे। इसी को ही कहा जाता है- दुःख-हर्ता सुख-कर्ता।.........समय प्रमाण जब आज के व्यक्ति दवाइयों से कारणे-अकारणे तंग होंगे, बीमारियाँ अति में जाएँगी तो समय पर आप पवित्र देव वा देवियों के पास दुआ लेने लिए आएँगे कि हमें दुःख-अशान्ति से सदा के लिए दूर करो। पवित्रता की दृष्टि-वृत्ति साधारण शक्ति नहीं है। यह थोड़े समय की शक्तिशाली दृष्टि वा वृत्ति सदाकाल की प्राप्ति कराने वाली है। (अ.वा.14.11.87 पृ.132 मध्य, 133 आदि-अंत) मुरली प्रूफ देखें
 ब्राह्मण बनना अर्थात् पूज्य बनना; क्योंकि ब्राह्मण सो देवता होते हैं और देवताएँ अर्थात् पूजनीय। सभी देवताएँ पूजनीय तो हैं, फिर भी नम्बरवार ज़रूर हैं। किन देवताओं की पूजा विधिपूर्वक और नियमित रूप से होती है और किन्हीं की पूजा विधिपूर्वक नियमित रूप से नहीं होती। किन्हों के हर कर्म की पूजा होती है और किन्हों के हर कर्म की पूजा नहीं होती है। कोई का विधिपूर्वक हर रोज़ श्रृंगार होता है और कोई का श्रृंगार रोज़ नहीं होता है, ऊपर-2 से थोड़ा-बहुत सजा लेते हैं; लेकिन विधिपूर्वक नहीं। कोई के आगे सारा समय कीर्तन होता और कोई के आगे कभी-2 कीर्तन होता है। इन सभी का कारण क्या है? ......पूजनीय बनने का विशेष आधार पवित्रता के ऊपर है। जितना सर्व प्रकार की पवित्रता को अपनाते हैं, उतना ही सर्व प्रकार के पूजनीय बनते हैं और जो निरन्तर विधिपूर्वक आदि-अनादि विशेष गुण के रूप से पवित्रता को सहज अपनाते हैं, वही विधिपूर्वक पूज्य बनते हैं। सर्व प्रकार की पवित्रता क्या है? जो आत्माएँ सहज, स्वतः हर संकल्प में, बोल में, कर्म में सर्व अर्थात् ज्ञानी और अज्ञानी आत्माएँ, सर्व के सम्पर्क में सदा पवित्र वृत्ति, दृष्टि, वायब्रेशन से यथार्थ सम्पर्क-सम्बन्ध निभाते हैं- इसको ही सर्व प्रकार की पवित्रता कहते हैं। स्वप्न में भी स्वयं के प्रति या अन्य कोई आत्मा के प्रति सर्व प्रकार की पवित्रता में से कोई कमी न हो। मानो स्वप्न में भी ब्रह्मचर्य खण्डित होता है वा किसी आत्मा के प्रति किसी भी प्रकार की ईर्ष्या, आवेशता के वश कर्म होता या बोल निकलता है, क्रोध के अंश रूप में भी व्यवहार होता है तो इसको भी पवित्रता का खण्डन माना जाएगा। सोचो, जब स्वप्न का भी प्रभाव पड़ता है तो साकार में किए हुए कर्म का कितना प्रभाव पड़ता होगा! इसलिए खण्डित मूर्ति कभी पूजनीय नहीं होती। खण्डित मूर्तियाँ मन्दिरों में नहीं रहतीं, आजकल के म्यूजिय़म में रहती हैं। वहाँ भक्त नहीं आते। सिर्फ यही गायन होता है कि बहुत पुरानी मूर्तियाँ हैं, बस। उन्होंने स्थूल अंगों के खण्डित को खण्डित कह दिया है; लेकिन वास्तव में किसी भी प्रकार की पवित्रता में खण्डन होता है तो वह पूज्य पद से खण्डित हो जाते हैं। ऐसे, चारों प्रकार की पवित्रता विधिपूर्वक है तो पूजा भी विधिपूर्वक होती है। ......पूज्य, पवित्र आत्माओं की निशानी यही है- उन्हों की चारों प्रकार की पवित्रता स्वाभाविक, सहज और सदा होगी। उनको सोचना नहीं पड़ेगा; लेकिन पवित्रता की धारणा स्वतः ही यथार्थ संकल्प, बोल, कर्म और स्वप्न लाती है। यथार्थ अर्थात् एक तो युक्तियुक्त, दूसरा यथार्थ अर्थात् हर संकल्प में अर्थ होगा, बिना अर्थ नहीं होगा। ऐसे नहीं कि ऐसे में बोल दिया, निकल गया, कर लिया, हो गया। ऐसी पवित्र आत्मा सदा हर कर्म में अर्थात् दिनचर्या के हर कर्म में यथार्थ युक्तियुक्त रहती है। इसलिए पूजा भी उनके हर कर्म की होती है अर्थात् पूरे दिनचर्या की होती है। उठने से लेकर सोने तक भिन्न-2 कर्म के दर्शन होते हैं। ......पवित्रता की धारणा बहुत महीन बात है। पवित्रता के आधार पर ही कर्म की विधि और गति का आधार है। पवित्रता सिर्फ मोटी बात नहीं है। ब्रह्मचारी रहे या निर्मोही हो गए- सिर्फ इसको ही पवित्रता नहीं कहेंगे। पवित्रता ब्राह्मण जीवन का श्रृंगार है। तो हर समय पवित्रता के श्रृंगार की अनुभूति चेहरे से, चलन से औरों को हो। दृष्टि में, मुख में, हाथों में, पाँवों में सदा पवित्रता का श्रृंगार प्रत्यक्ष हो। कोई भी चेहरे तरफ देखे तो फीचर्स से उन्हें पवित्रता अनुभव हो। जैसे और प्रकार के फीचर्स वर्णन करते हैं, वैसे यह वर्णन करें कि इनके फीचर्स से पवित्रता दिखाई देती है, नयनों में पवित्रता की झलक है, मुख पर पवित्रता की मुस्कराहट है। (अ.वा.17.10.87 पृ.86 अंत, 87 आदि, 88 आदि-अंत) मुरली प्रूफ देखें
 वास्तव में याद वा सेवा की सफलता का आधार है- पवित्रता। सिर्फ ब्रह्मचारी बनना- यह पवित्रता नहीं; लेकिन पवित्रता का सम्पूर्ण रूप है- ब्रह्मचारी के साथ-2 ब्रह्माचारी बनना। ब्रह्माचारी अर्थात् ब्रह्मा के आचरण पर चलने वाले, जिसको फॉलो फादर कहा जाता है; क्योंकि फॉलो ब्रह्मा बाप को करना है। शिव बाप के समान स्थिति में बनना है; लेकिन आचरण वा कर्म में ब्रह्मा बाप को फॉलो करना है। हर कदम में ब्रह्मचारी। ब्रह्मचर्य व्रत सदा संकल्प और स्वप्न तक हो। पवित्रता का अर्थ है- सदा बाप को कम्पैनियन(साथी) बनाना और बाप की कम्पनी में सदा रहना। कम्पैनियन बना दिया, “मेरा बाबा”- यह भी आवश्यक है; लेकिन हर समय कम्पनी भी बाप की रहे। इसको कहते हैं सम्पूर्ण पवित्रता। ......परिवार का प्यार, परिवार का संगठन बहुत अच्छा है; लेकिन परिवार का बीज नहीं भूल जाए। बाप को भूल परिवार को ही कम्पनी बना देते हैं। बीच-2 में बाप को छोड़ा तो खाली जगह हो गई। वहाँ माया आ जाएगी। इसलिए स्नेह में रहते, स्नेह देते-लेते समूह को नहीं भूलें। इसको कहते हैं पवित्रता। ......कई बच्चों को सम्पूर्ण पवित्रता की स्थिति में आगे बढ़ने में मेहनत लगती है। इसलिए बीच-2 में कोई को कम्पैनियन बनाने का भी संकल्प आता है और कम्पनी भी आवश्यक है- यह भी संकल्प आता है। सन्यासी तो नहीं बनना है; लेकिन आत्माओं की कम्पनी में रहते बाप की कम्पनी को भूल नहीं जाओ, नहीं तो समय पर उस आत्मा की कम्पनी याद आएगी और बाप भूल जाएगा। तो समय पर धोखा मिलना सम्भव है; क्योंकि साकार शरीरधारी के सहारे की आदत होगी तो अव्यक्त बाप और निराकार बाप पीछे याद आएगा, पहले शरीरधारी याद आएगा। अगर किसी भी समय पहले साकार का सहारा याद आया तो नम्बरवन वह हो गया और दूसरा नम्बर बाप हो गया। जो बाप को दूसरे नम्बर में रखते तो उसको पद क्या मिलेगा- नम्बरवन(एक) वा टू(दो)? सिर्फ सहयोग लेना, स्नेही रहना वह अलग चीज़ है; लेकिन सहारा बनाना अलग चीज़ है। यह बहुत गुह्य बात है। इसको यथार्थ रीति से जानना पड़े। कोई-2 संगठन में स्नेही बनने के बजाय न्यारे भी बन जाते हैं। डरते हैं- ना मालूम फँस जाएँ, इससे तो दूर रहना ठीक है; लेकिन नहीं, 21 जन्म भी प्रवृत्ति में, परिवार में रहना है ना! तो अगर डर के कारण किनारा कर लेते, न्यारे बन जाते तो वह कर्म-सन्यासी के संस्कार हो जाते हैं। कर्मयोगी बनना है, कर्म-सन्यासी नहीं। संगठन में रहना है, स्नेही बनना है; लेकिन बुद्धि का सहारा एक बाप हो, दूसरा न कोई। बुद्धि को कोई आत्मा का साथ वा गुण वा कोई विशेषता आकर्षित नहीं करे। इसको कहते हैं पवित्रता। ......जीवन में दो चीज़ें ही आवश्यक हैं। एक- कम्पैनियन, दूसरी- कम्पनी। इसलिए, त्रिकालदर्शी बाप सभी की आवश्यकताओं को जान कम्पैनियन भी बढ़िया, कम्पनी भी बढ़िया देते हैं। ......तो पवित्रता निजी संस्कार के रूप में अनुभव करना, इसको कहते हैं श्रेष्ठ लकीर अथवा श्रेष्ठ रेखा वाले। (अ.वा.20.2.87 पृ.37 आदि, 38 आदि-अंत) मुरली प्रूफ देखें
 होली हंस अर्थात् स्वच्छता और विशेषता वाली आत्माएँ। स्वच्छता अर्थात् मन, वचन, कर्म, सम्बन्ध- सर्व में पवित्रता। पवित्रता की निशानी सदा ही सफेद रंग दिखाते हैं। आप होली हंस भी सफेद वस्त्रधारी, साफ दिल अर्थात् स्वच्छता स्वरूप हो। तन, मन और दिल से सदा बेदाग अर्थात् स्वच्छ हो। अगर कोई तन से अर्थात् बाहर से कितना भी स्वच्छ हो, साफ हो; लेकिन मन से साफ न हो, स्वच्छ न हो तो कहते हैं कि पहले मन को साफ रखो। साफ मन वा साफ दिल पर साहिब राज़ी होता है। साथ-2 साफ दिल वाले की सर्व मुराद अर्थात् कामनाएँ पूरी होती हैं। हंस की विशेषता स्वच्छता अर्थात् साफ है; इसलिए आप ब्राह्मण आत्माओं को होली हंस कहा जाता है। ......सम्पूर्ण स्वच्छता वा पवित्रता- यही इस संगमयुग में सबका लक्ष्य है। इसलिए ही आप ब्राह्मण सो देवताओं को सम्पूर्ण पवित्र गाया जाता है। ...गायन आपके ही देवता रूप का है; लेकिन बने कब? ब्राह्मण-जीवन में वा देवता-जीवन में? बनने का समय अब संगमयुग है। ......तन की स्वच्छता अर्थात् सदा इस तन को आत्मा का मन्दिर समझ उस स्मृति से स्वच्छ रखना। जितनी मूर्ति श्रेष्ठ होती है उतना ही मन्दिर भी श्रेष्ठ होता है। ...ब्राह्मण आत्माएँ सारे कल्प में नम्बरवन श्रेष्ठ आत्माएँ हैं! ब्राह्मणों के आगे देवताएँ भी सोने तुल्य हैं और ब्राह्मण हीरे तुल्य हैं! तो आप सभी हीरे की मूर्तियाँ हो। कितनी ऊँची हो गई! इतना अपना स्वमान जान इस शरीर रूपी मन्दिर को स्वच्छ रखो। सादा हो; लेकिन स्वच्छ हो। इस विधि से तन की पवित्रता सदा रूहानी खुशबू का अनुभव कराएगी। (अ.वा.6.1.90 पृ.125 आदि) मुरली प्रूफ देखें
पवित्रता की परिभाषा तथा उसका महत्वजैसे नामधारी ब्राह्मणों की निशानी चोटी और जनेऊ है वैसे सच्चे ब्राह्मणों की निशानी पवित्रता और मर्यादाएँ हैं। जन्म की वा जीवन की निशानी वह तो सदा कायम रखनी होती है ना। ...आत्मा शब्द तो सभी कहते हैं; लेकिन ब्राह्मण आत्मा सदा यही कहेंगे कि मैं शुद्ध, पवित्र आत्मा हूँ; श्रेष्ठ आत्मा हूँ; पूज्य आत्मा हूँ। ............वह स्वतः ही स्वयं को और सर्व को किस दृष्टि से देखेंगे? चाहे अलौकिक परिवार में, चाहे लौकिक परिवार कहो वा लौकिक स्मृति में रहने वाली आत्माएँ कहो, सभी के प्रति परम पूज्य आत्माएँ हैं वा पूज्य बनाना है यही दृष्टि में रहे। पूज्य आत्माओं अर्थात् अलौकिक परिवार की आत्माओं के प्रति अगर कोई भी अपवित्र दृष्टि जाती है तो यह स्मृति का फाउण्डेशन कमज़ोर है और यह महा, महा, महापाप है। किसी भी पूज्य आत्मा प्रति अपवित्रता अर्थात् दैहिक दृष्टि जाती है कि यह सेवाधारी बहुत अच्छे हैं, यह शिक्षक बहुत अच्छी है; लेकिन अच्छाई क्या है? अच्छाई है ऊँची स्मृति और ऊँची दृष्टि की। अगर वह ऊँचाई नहीं तो अच्छाई कौन-सी है! यह भी सुनहरी मृगमाया का रूप है, यह सर्विस नहीं है, सहयोग नहीं है; लेकिन स्वयं को और सर्व को वियोगी बनाने का आधार है। यह बात बार-2 अटेन्शन में रखो। बाप द्वारा निमित्त बने हुए शिक्षक वा सेवा के सहयोगी बनी हुई आत्माएँ, चाहे बहन हो या भाई हो; लेकिन सेवाधारी आत्माओं के सेवा के मुख्य लक्षण त्याग और तपस्या हैं, इसी लक्षण के आधार पर सदा त्यागी और तपस्वी की दृष्टि से देखो, न कि दैहिक दृष्टि से। श्रेष्ठ परिवार है तो सदा श्रेष्ठ दृष्टि रखो; क्योंकि यह महापाप कभी प्राप्ति स्वरूप का अनुभव करा नहीं सकता। ......इसी एक विकार से और विकार स्वतः ही पैदा हो जाते हैं। कामना पूरी न हुई तो क्रोध साथी पहले आएगा। इसलिए इस बात को हल्का नहीं समझो। इसमें अलबेले मत बनो। बाहर से शुभ सम्बन्ध है, सेवा का सम्बन्ध है, इस रॉयल रूप के पाप को बढ़ाओ मत। चाहे कोई भी दोषी हो इस पाप के; लेकिन दूसरे को दोषी बनाए स्वयं को अलबेले मत बनाओ। “मैं दोषी हूँ” जब तक यह सावधानी नहीं रखेंगे तब तक महापाप से मुक्त नहीं हो सकेंगे। ...और जब कोई भी इशारा मिलता है तो इशारे को इशारे से ख़त्म कर देना चाहिए। अगर जिद्द करते हो और सिद्ध करते हो, स्पष्टीकरण देने की कोशिश करते हो, इससे समझो स्पष्टीकरण अपने पाप की करते हो।......इसलिए जब हैं ही विश्व-परिवर्तन के कार्य में तो स्व-परिवर्तन कर लेना यही समझदारी का काम है। (अ.वा. 9.5.83 पृ.188 आदि, 189) मुरली प्रूफ देखें
 हद की कामनाएँ भी सूक्ष्म रूप से चैक करो- मुख्य काम विकार के अंश वा वंश हैं। इसलिए कामना वश सामना नहीं कर सकते। बेहद की मनोकामना पूर्ण करने वाले नहीं बन सकते। काम जीत अर्थात् हद की कामनाओं जीत। (अ.वा. 5.12.84 पृ.48 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 अगर प्योरिटी की भी कमी है तो यूनिटी में भी कमी है। (अ.वा.31.10.75 पृ.253 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 धर्मसत्ता को धर्मसत्ताहीन बनाने का विशेष तरीका है- पवित्रता को सिद्ध करना और राज्य सत्ता वालों के आगे एकता को सिद्ध करना। ......इन दोनों ही शक्तियों को सिद्ध किया तो ईश्वरीय सत्ता का झण्डा बहुत सहज लहराएगा। (अ.वा.21.2.85 पृ.186 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 द्वापर से लेकर किसी भी धर्मात्मा या महात्मा ने सर्व को होलीएस्ट नहीं बनाया है। स्वयं बनते हैं; लेकिन अपने फॉलोअर्स को, साथियों को होलीएस्ट, पवित्र नहीं बनाते और यहाँ पवित्रता ब्राह्मण जीवन का मुख्य आधार है। ......कभी-2 बच्चे अनुभव करते हैं कि अगर चलते-2 मन्सा में भी अपवित्रता अर्थात् वेस्ट वा निगेटिव, परचिंतन के संकल्प चलते हैं तो कितना भी योग पावरफुल चाहते हैं; लेकिन होता नहीं है; क्योंकि ज़रा भी अंशमात्र संकल्प में भी किसी प्रकार की अपवित्रता है, तो जहाँ अपवित्रता का अंश है वहाँ पवित्र बाप की याद जो है, जैसा है, वैसे नहीं आ सकती। जैसे दिन और रात इकट्ठा नहीं होता। इसीलिए बापदादा वर्तमान समय पवित्रता के ऊपर बार-2 अटेन्शन दिलाते हैं। कुछ समय पहले बापदादा सिर्फ कर्म में अपवित्रता के लिए इशारा देते थे; लेकिन अभी समय सम्पूर्णता के समीप आ रहा है; इसलिए मन्सा में भी अपवित्रता का अंश धोखा दे देगा। ...मन्सा को हल्का नहीं करना; क्योंकि मन्सा बाहर से दिखाई नहीं देती है; लेकिन मन्सा धोखा बहुत देती है। (अ.वा.1.3.99 पृ.62 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 प्योरिटी सिर्फ ब्रह्मचर्य व्रत को नहीं कहा जाता; संकल्प, स्वभाव, संस्कार में भी प्योरिटी। मानों एक-दूसरे के प्रति ईर्ष्या या घृणा का संकल्प है तो प्योरिटी नहीं, इम्प्योरिटी कहेंगे। प्योरिटी की परिभाषा में सर्व विकारों का अंश-मात्र तक न होना है। संकल्प में भी किसी प्रकार की इम्प्योरिटी न हो। (अ.वा.31.10.75 पृ.253 अंत) मुरली प्रूफ देखें
पवित्रता की परिभाषा तथा उसका महत्वसफल तपस्वी की निशानी उनके सूरत और सीरत में प्योरिटी की पर्सनैलिटी और प्योरिटी की रॉयल्टी सदा स्पष्ट अनुभव होगी। तपस्या का अर्थ ही है मन-वचन-कर्म और सम्बन्ध-सम्पर्क में अपवित्रता का अंश मात्र भी विनाश होना, नाम-निशान समाप्त होना। जब अपवित्रता समाप्त हो जाती है तो इस समाप्ति को ही सम्पन्न स्थिति कहा जाता है। सफल तपस्वी अर्थात् सदा स्वतः पवित्रता की पर्सनैलिटी और रॉयल्टी, हर बोल और कर्म से, दृष्टि और वृत्ति से अनुभव हो। प्योरिटी सिर्फ ब्रह्मचर्य नहीं, सम्पूर्ण पवित्रता अर्थात् संकल्प में भी कोई भी विकार टच न हो। जैसे ब्राह्मण जीवन में शारीरिक आकर्षण व शारीरिक टचिंग अपवित्रता मानते हो, ऐसे मन-बुद्धि में किसी विकार के संकल्प मात्र की आकर्षण व टचिंग, इसको भी अपवित्रता कहा जाएगा। पवित्रता की पर्सनैलिटी वाले, रॉयल्टी वाले मन-बुद्धि से भी इस बुराई को टच नहीं करते; क्योंकि सफल तपस्वी अर्थात् सम्पूर्ण वैष्णव। वैष्णव कभी बुरी चीज़ को टच नहीं करते हैं। तो उन्हों का है स्थूल, आप ब्राह्मण वैष्णव आत्माओं का है सूक्ष्म। (अ.वा.4.12.91 पृ.94 मध्य, 95 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 प्योरिटी सिर्फ ब्रह्मचर्य व्रत नहीं, ब्रह्मचर्य व्रत में तो आजकल के सरकमस्टांस अनुसार कई अज्ञानी भी रहते हैं। ज्ञान से नहीं; लेकिन हालातों को देखकर। कई भक्त भी रहते हैं। वो कोई बड़ी बात नहीं है; लेकिन प्योरिटी को सारे दिन में चैक करो- पवित्रता की निशानी है स्वच्छता, सत्यता। ...............तो अपवित्रता सिर्फ किसको दुःख देना या पाप कर्म करना नहीं है; लेकिन स्वयं में सत्यता, स्वच्छता विधिपूर्वक अगर अनुभव करते हो तो पवित्र हो। (अ.वा.6.4.95 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 पर्सनैलिटी कभी छिप नहीं सकती, प्रत्यक्ष दिखाई ज़रूर देती है। जैसे साकार ब्रह्मा बाप को देखा, प्योरिटी की पर्सनैलिटी कितनी स्पष्ट अनुभव करते थे। ये तपस्या के अनुभव की निशानी अब आप द्वारा औरों को अनुभव हो। सूरत और सीरत दोनों द्वारा अनुभव करा सकते हो। अभी भी कई लोग अनुभव करते भी हैं; लेकिन इस अनुभव को और स्वयं द्वारा औरों में फैलाओ। (अ.वा.4.12.91 पृ.96 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 पवित्रता के कारण ही परम पूज्य और गायन योग्य बनते हैं। पवित्रता ही श्रेष्ठ धर्म अर्थात् धारणा है। इस ईश्वरीय सेवा का बड़े से बड़ा पुण्य है- पवित्रता का दान देना। पवित्र बनाना ही पुण्य आत्मा बनाना है; क्योंकि किसी आत्मा को आत्म-घात महापाप से छुड़ाते हो। अपवित्रता आत्म-घात है; पवित्रता जीय-दान है। पवित्र बनाना अर्थात् पुण्य आत्मा बनाना। गीता के ज्ञान का वह वर्तमान परमात्म-ज्ञान का जो सार रूप में स्लोगन बताते हो, उसमें भी पवित्रता का महत्व बताते हो। पवित्र बनो, “योगी बनो” - यही स्लोगन महान आत्मा बनने का आधार है। ब्राह्मण जीवन के पुरुषार्थ के नम्बर भी पवित्रता के आधार पर हैं। भक्तिमार्ग में यादगार पवित्रता के आधार पर है। कोई भी भक्त आपके यादगार चित्र को पवित्रता के बिना टच नहीं कर सकते। जिस दिन विशेष देवी व देवताओं का दिवस मनाते हैं, उस दिन का महत्व भी पवित्रता रखते हैं। भक्ति का अर्थ ही है- अल्पकाल; ज्ञान का अर्थ है- सदाकाल। तो भक्त अल्पकाल के नियम पालन करते हैं। जैसे नवरात्रि मनाते हैं, जन्माष्टमी अथवा दीपमाला या कोई विशेष उत्सव मनाते हैं तो पवित्रता का नियम अल्पकाल के लिए ज़रूर पालन करते हैं। चाहे शरीर की पवित्रता व आत्मा के नियम, दोनों प्रकार की शुद्धि ज़रूर रखते हैं। आपकी यादगार ‘विजय माला’ - उनका भी सुमिरण करेंगे तो पवित्रता की विधिपूर्वक करेंगे। (अ.वा.23.1.80 पृ.234 आदि, 235 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 संकल्प में इतनी समर्थी है जो विश्व की आत्माओं तक शक्तिशाली संकल्प द्वारा सेवा कर सको, वृत्ति की शुद्धि अनुसार वायुमण्डल को शुद्ध कर सको। वृत्ति की शक्ति है! शुद्ध अर्थात् प्यूरिटी। प्यूरिटी का आधार है भाई-2 की स्मृति की वृत्ति। (अ.वा.4.1.79 पृ.176 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 डबल अहिंसक अर्थात् अपवित्रता अर्थात् काम महाशत्रु स्वप्न में भी वार न करे। सदा भाई-2 की स्मृति सहज और स्वतः अर्थात् स्मृति स्वरूप में हो। ऐसे डबल अहिंसक आत्म-घात का महापाप भी नहीं करते। आत्मघात अर्थात् अपने सम्पूर्ण सतोप्रधान स्टेज से नीचे गिर अपना घात नहीं करते। ऊँचाई से नीचे गिरना ही घात है।(अ.वा.15.10.75 पृ.186 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
पवित्रता की परिभाषा तथा उसका महत्वजितने भी ब्राह्मण हैं, हर एक ब्राह्मण चैतन्य सालिग्राम का मन्दिर है, चैतन्य शक्ति मन्दिर है। ...अभी के पुरुषार्थ के समय प्रमाण व विश्व के सम्पन्न परिवर्तन के समय प्रमाण इस समय कोई भी कर्म-इन्द्रिय द्वारा प्रकृति व विकारों के वशीभूत नहीं होना चाहिए, जैसे मन्दिर में भूत प्रवेश नहीं होते हैं। ......जहाँ अशुद्धि होती है वहाँ ही अशुद्ध विकार अथवा भूत प्रवेश होता है। चैतन्य सालिग्राम के मन्दिर में व चैतन्य शक्तिस्वरूप के मन्दिर में, असुर संहारनी के मन्दिर में आसुरी संकल्प व आसुरी संस्कार कभी प्रवेश नहीं कर सकते। .........जब ऐसी अपनी पवित्र प्रवृत्ति बनाओ तब ही विश्व-परिवर्तन होगा। (अ.वा.24.10.75 पृ.222 अंत, 223 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 कोई भी देहधारी में संकल्प से व कर्म से फँसना, इस विकारी देह रूपी साँप को टच करना अर्थात् अपनी की हुई अब तक की कमाई को ख़त्म करना है। चाहे कितना भी ज्ञान का अनुभव हो या याद द्वारा शक्तियों की प्राप्ति का अनुभव किया हो या तन, मन, धन से सेवा की हो; लेकिन सर्व प्राप्तियाँ इस देह रूपी साँप को टच करने से इस साँप के विष के कारण, जैसे विष मनुष्य को ख़त्म कर देता है वैसे ही यह साँप भी अर्थात् देह में फँसने का विष सारी कमाई को ख़त्म कर देता है। पहले की हुई कमाई के रजिस्टर पर काला दाग पड़ जाता है जिसको मिटाना बहुत मुश्किल है। जैसे योग-अग्नि पिछले पापों को भस्म करती है वैसे यह विकारी भोग भोगने की अग्नि पिछले पुण्य को भस्म कर देती है। इसको साधारण बात नहीं समझना। यह पाँचवीं मंज़िल से गिरने की बात है। कई बच्चे अब तक अलबेलेपन के संस्कार-वश इस बात को कड़ी भूल व पाप कर्म नहीं समझते हैं। वर्णन भी ऐसा साधारण रूप में करते हैं कि मेरे से चार-पाँच बार यह हो गया, आगे नहीं करूँगा। वर्णन करते समय भी पश्चाताप का रूप नहीं होता, जैसे साधारण समाचार सुना रहे हैं। अन्दर में लक्ष्य रहता है कि यह तो होता ही है, मंज़िल तो बहुत ऊँची है, अभी यह कैसे होगा? लेकिन फिर भी आज ऐसे पाप-आत्मा, ज्ञान की ग्लानि कराने वालों को बापदादा वॉर्निंग देते हैं कि आज से भी इस गलती को कड़ी भूल समझकर यदि मिटाया नहीं तो बहुत कड़ी सज़ा के अधिकारी बनेंगे। बार-2 अवज्ञा के बोझ से ऊँची स्थिति तक पहुँच नहीं सकेंगे। प्राप्ति करने वालों की लाइन के बजाय पश्चाताप करने वालों की लाइन में खड़े होंगे। प्राप्ति करने वालों की जय-जयकार होगी और अवज्ञा करने वालों के नैन और मुख ‘हाय-2’ का आवाज़ निकालेंगे और सर्व प्राप्ति करने वाले ब्राह्मण ऐसी आत्माओं को कुल-कलंकित की लाइन में देखेंगे। अपने किए विकर्मों का कालापन चेहरे से स्पष्ट दिखाई देगा। इसलिए अब से यह विकराल भूल अर्थात् बड़ी से बड़ी भूल समझ करके अभी ही अपनी पिछली भूलों का पश्चाताप दिल से करके बाप से स्पष्ट कर अपना बोझ मिटाओ। अपने आप को कड़ी सज़ा दो, ताकि आगे की सज़ाओं से भी छूट जाएँ। अगर अब भी बाप से छुपावेंगे व अपने को सच्चा सिद्ध करके चलाने की कोशिश करेंगे तो अभी चलाना अर्थात् अन्त में और अब भी अपने मन में चिल्लाते रहेंगे- क्या करूँ, खुशी नहीं होती, सफलता नहीं होती, सर्व प्राप्तियों की अनुभूति नहीं होती। ऐसे अब भी चिल्लावेंगे और अन्त में ‘हाय मेरा भाग्य’ कह चिल्लावेंगे। तो अब का चलाना अर्थात् बार-2 चिल्लाना। अगर अभी बात को चलाते हो तो अपने जन्म-जन्मांतर के श्रेष्ठ तकदीर को जलाते हो। इसलिए इस विशेष बात पर विशेष अटेन्शन रखो। संकल्प में भी इस विष-भरे साँप को टच नहीं करना। संकल्प में भी टच करना अर्थात् अपने को मूर्छित करना है। (अ.वा.24.10.75 पृ.249 मध्य, 250) मुरली प्रूफ देखें
 अगर आपकी मंसा द्वारा अन्य आत्माओं को सुख और शान्ति की अनुभूति नहीं होती अर्थात् पवित्र संकल्प का प्रभाव अन्य आत्मा तक नहीं पहुँचता तो उसका भी कारण चैक करो। किसी भी आत्मा की ज़रा भी कमज़ोरी अर्थात् अशुद्धि अपने संकल्प में धारण हुई तो वह अशुद्धि अन्य आत्मा को सुख-शान्ति की अनुभूति करा नहीं सकेगी। या तो उस आत्मा के प्रति व्यर्थ वा अशुद्ध भाव है वा अपनी मंसा पवित्रता की शक्ति में परसेन्टेज की कमी है, जिस कारण औरों तक वह पवित्रता की प्राप्ति का प्रभाव नहीं पड़ सकता। स्वयं तक है; लेकिन दूसरों तक नहीं हो सकता। लाइट है; लेकिन सर्चलाइट नहीं है। तो पवित्रता के सम्पूर्णता की परिभाषा है सदा स्वयं में भी सुख-शान्ति स्वरूप और दूसरों को भी सुख-शान्ति की प्राप्ति का अनुभव कराने वाले। ऐसी पवित्र आत्मा अपनी प्राप्ति के आधार पर औरों को भी सदा सुख और शान्ति, शीतलता की किरणें फैलाने वाली होगी। तो समझा सम्पूर्ण पवित्रता क्या है? (अ.वा.24.3.82 पृ.313 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 कहते हो सुख-शान्ति की जननी पवित्रता है। जब भी अतीन्द्रिय सुख वा स्वीट साइलेन्स का अनुभव कम होता है, इसका कारण पवित्रता का फाउण्डेशन कमज़ोर है। (अ.वा.23.12.93 पृ.77 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 पवित्रता की शक्ति इतनी महान है जो अपनी पवित्र मंसा अर्थात् शुद्ध वृत्ति द्वारा प्रकृति को भी परिवर्तन कर लेते। मंसा पवित्रता की शक्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण है- प्रकृति का भी परिवर्तन। स्व-परिवर्तन से प्रकृति का परिवर्तन। प्रकृति के पहले व्यक्ति। तो व्यक्ति परिवर्तन और प्रकृति परिवर्तन- इतना प्रभाव है मंसा पवित्रता की शक्ति का। ......अगर पवित्रता की परसेन्टेज़ में 16 कला से 14 कला हो गए तो क्या बनना पड़ेगा? जब 16 कला की पवित्रता अर्थात् सम्पूर्णता नहीं तो सम्पूर्ण सुख-शान्ति के साधनों की भी प्राप्ति कैसे होगी! (अ.वा.24.3.82 पृ.313 अंत, 314 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 ऐसे काम विकार नहीं है, सदा ब्रह्मचारी हैं; लेकिन किसी आत्मा के प्रति विशेष झुकाव है जिसका रॉयल रूप स्नेह है; लेकिन एक्स्ट्रा स्नेह अर्थात् काम का अंश। स्नेह राइट है; लेकिन ‘एक्स्ट्रा’ अंश है। (अ.वा.22.1.82 पृ.264 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 तो मंसा परिवर्तन हो इसमें डबल अटेन्शन दो। यह नहीं सोचो, सम्पन्न बनने तक संकल्प तो आएँगे ही; लेकिन नहीं। संकल्प अर्थात् बीज को ही योगाग्नि में जला दो जो आधाकल्प तक बीज फल न दे सके। वाचा के मुख्य दो पत्ते भी निकल न सकें। कर्मणा का तना और टाल-टालियाँ भी निकल न सकें। बहुत काल का भस्मीभूत बीज जन्म-जन्मांतर के लिए फल नहीं देगा। अन्त में इस सब्जेक्ट में सम्पूर्ण नहीं होना है; लेकिन बहुत काल का अभ्यास ही अन्त में पास कराएगा। अन्त में सम्पूर्ण होंगे, इसी संकल्प को पहले ख़त्म करो। अभी बने तो अन्त में भी बनेंगे। अब नहीं तो अन्त में भी नहीं। इसलिए इस अलबेलेपन की नींद से भी जग जाओ। (अ.वा.23.1.80 पृ.236 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 संकल्प, बोल और कर्म में पवित्रता की जितनी-2 धारणा है उसी प्रमाण रूहानियत की झलक सूरत में दिखाई देती है। ब्राह्मण-जीवन की चमक पवित्रता है। निरन्तर अतीन्द्रिय सुख और स्वीट साइलेन्स का विशेष आधार है- पवित्रता। तो पवित्रता नम्बरवार है तो इन अनुभूतियों की प्राप्ति भी नम्बरवार है। अगर पवित्रता नम्बरवन है तो बाप द्वारा प्राप्त हुई प्राप्तियाँ भी नम्बरवन हैं। पवित्रता की चमक स्वतः ही निरन्तर चेहरे पर दिखाई देती है। पवित्रता की रूहानियत के नयन सदा ही निर्मल दिखाई देंगे। सदा नयनों में रूहानी आत्मा और रूहानी बाप की झलक अनुभव होगी। ...पवित्रता सिर्फ ब्रह्मचर्य को न हीं कहा जाता; लेकिन सदा ब्रह्मचारी और सदा ब्रह्माचारी अर्थात् ब्रह्मा बाप के आचरण पर हर कदम में चलने वाले। उसका संकल्प, बोल और कर्म रूपी कदम नैचुरल ब्रह्मा बाप के कदम ऊपर कदम होगा, जिसको आप फुट स्टैप कहते हो। ......और जो ब्रह्माचारी है उनका चेहरा और चलन सदा ही अन्तर्मुखी और अतीन्द्रिय सुखी अनुभव होगा। (अ.वा.25.3.90 पृ.193 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 तुम्हारा आपस में भी कोई सम्बन्ध नहीं। ब्र.कु.कुमारियाँ भाई-बहन का सम्बन्ध भी गिरा देता है। सर्व सम्बन्ध एक से ही होना है, यह है नई बात। पवित्र होकर वापिस भी जाना है। (मु.ता.30.4.74 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 सद्गति वाले पवित्र होते हैं, उनको अपवित्र कोई छू न सके। लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर में बाउण्डरी लगी रहती है, कोई छू न सके; परन्तु अपने को मूत पलीती कोई समझते नहीं हैं। सारी दुनिया की मूत पलीती को बाप आकर स्वच्छ बनाते हैं; परन्तु मलेच्छों को भी पता नहीं है, हम मलेच्छ पत्थरबुद्धि हैं। अभी बाप बैठ समझाते हैं, तुम मूत पलीती हो, अब फिर पावन बनना है। (मु.ता.20.11.74 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 बाबा समझाते हैं पहली बात है पवित्रता की। काम-कटारी न चलानी है। यह विकार ही बड़ा दुश्मन है। जब से वाममार्ग में जाते हैं तब से भारत गिरता आता है। पहले नम्बर की हिंसा यह है। तुम हो डबल अहिंसक। काम की हिंसा को कोई भी जानते नहीं। दूसरी नम्बर की वायलेंस है क्रोध। (मु.ता.24.5.72 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 यह भाई-बहन का सम्बन्ध है नम्बरवन। विकार की दृष्टि ला न सके। बाप देखेंगे, बच्चा बन, प्रतिज्ञा कर फिर विकार में गिरे तो धर्मराज डण्डा भी बहुत मारेंगे। पवित्रता की प्रतिज्ञा पक्की रखनी है। बाप से हम विश्व का मालिक बनते हैं। एक जन्म विकार में न गए तो बड़ी बात है क्या! कई कहते हैं पीछे क्या होगा देखा जावेगा। साहूकार लोग तो अभी ही अपन को स्वर्ग में समझते हैं। इसलिए गरीबों के लिए सरेण्डर होना सहज है। (मु.ता.24.5.72 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 जो पवित्र बनते हैं वही पवित्र दुनिया के मालिक बन सकते हैं। पवित्रता की प्रतिज्ञा से ही इस आश्रम में आकर रह सकते हैं। ब्राह्मणों के ऊपर बड़ी रेस्पॉन्सिबिलिटी है। भूले-चूके किसको ले आते तो उनपर सज़ा पड़ जाती है। बड़ी विशाल बुद्धि चाहिए। बाप कहते हैं काम चिक्षा पर बैठ तुम काले बने हो। अब ज्ञान चिक्षा पर बैठ गोरा बनो। बहुत कहते हैं, अभी तो काम चिक्षा अच्छी लगती है, पवित्र कैसे बनेंगे? बाबा कह देते हैं- अच्छा, गटर में पड़े रहो। बाप तो कहते हैं पवित्र बनो। जिसके बुद्धि में विकार होगा वह वर्सा पा न (सके)। (रात्रि क्लास मु.ता.24.5.72) मुरली प्रूफ देखें
 आगे तुमको पता नहीं था कि यह धंधा(विकारी) न करना चाहिए। कोई अच्छे-2 बच्चे होते हैं, कहते हैं- हम ब्रह्मचर्य में रहेंगे। सन्यासियों को देख समझते हैं पवित्रता अच्छी है। पवित्र और फिर अपवित्र। दुनिया में अपवित्र तो बहुत रहते हैं। पाखाने में जाना भी अपवित्र बनना है; इसलिए फौरन स्नान करते हैं। अपवित्रता अनेक प्रकार की होती है। किसको दुःख देना भी अपवित्र कर्तव्य है। (मु.ता.14.7.74 पृ.1 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
 जैसे शराबी शराब बिगर रह नहीं सकते। शराब से बहुत नशा चढ़ता है; परन्तु अल्पकाल के लिए, ऐसे ही विकारी मनुष्यों की आयु कितनी छोटी हो जाती है। कहाँ निर्विकारी देवताओं की आयु एवरेज 125-150 होती है! एवर हेल्दी बनेंगे तो आयु भी बढ़ेगी। (मु.ता.8.8.75 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 मंसा में तूफान भल आए, कर्मेन्द्रियों से न करना है। (मु.ता.22.4.69 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 संकल्प वा स्वप्न में भी बाप से किनारा नहीं। ऐसे नहीं कि स्वप्न तो मेरे वश में नहीं हैं। स्वप्न का भी आधार अपनी साकार जीवन है। अगर साकार जीवन में मायाजीत हो तो स्वप्न में भी माया अंश मात्र में भी नहीं आ सकती। तो माया-प्रूफ हो जो स्वप्न में भी माया नहीं आ सकती? स्वप्न को भी हल्का नहीं समझो; क्योंकि जो स्वप्न में कमज़ोर होता है, तो उठने के बाद भी वह संकल्प ज़रूर चलेंगे और योग साधारण हो जाएगा। इसीलिए इतने विजयी बनो जो संकल्प से तो क्या; लेकिन स्वप्न मात्र भी माया वार नहीं कर सके। (अ.वा.13.10.92 पृ.41 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 अगर नम्बरवन निश्चय है तो चलते-2 मुख्य पवित्रता धारण करने में मुश्किल नहीं लगेगा। अगर पवित्रता स्वप्न मात्र भी हिलाती है, हलचल में आती है, तो समझो नम्बरवन फाउण्डेशन कच्चा है; क्योंकि आत्मा का स्वधर्म पवित्रता है। अपवित्रता परधर्म है और पवित्रता स्वधर्म है। तो जब स्वधर्म का निश्चय हो गया तो परधर्म हिला नहीं सकता। (अ.वा.4.12.95 पृ.47 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 सिर्फ याद के समय याद में रहना, इसको तपस्या नहीं कहा जाता। तपस्या अर्थात् प्योरिटी के पर्सनैलिटी और रॉयल्टी का स्वयं भी अनुभव करना और औरों को भी अनुभव कराना। सफल तपस्वी का अर्थ ही है विशेष महान आत्मा बनना। विशेष आत्माओं वा महान आत्माओं को देश की वा विश्व की पर्सनैलिटीज़ कहते हैं। पवित्रता की पर्सनैलिटी अर्थात् हर कर्म में महानता और विशेषता। (अ.वा.4.12.91 पृ.95 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 संकल्प द्वारा भी पाप होता है। संकल्प के पाप का भी प्रत्यक्षफल प्राप्त होता है। संकल्प में स्वयं की कमज़ोरी, किसी भी विकार की- पाप के खाते में जमा होती ही है; लेकिन अन्य आत्माओं के प्रति संकल्प में भी किसी विकार के वशीभूत वृत्ति है तो यह भी महापाप है। (अ.वा.3.12.78 पृ.94 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 सम्पूर्ण पवित्रता का अर्थ ही है- स्वप्न-मात्र भी अपवित्रता मन और बुद्धि को टच नहीं करे। ...... सम्पूर्ण पवित्रता मुश्किल है या सहज है? .........ये तो नहीं सोचते- “थोड़ा तो चलता ही है, चला लो, किसको क्या पता पड़ता है, कोई मंसा तो देखता ही नहीं है, कर्म में तो आते ही नहीं हैं”; लेकिन मंसा के वायब्रेशन्स भी छिप नहीं सकते। चलाने वाले को बापदादा अच्छी तरह से जानते हैं। ऐसे आउट नहीं करते, नहीं तो नाम भी आउट कर सकते हैं; लेकिन अभी नहीं करते। चलाने वाले स्वयं ही चलते-2, चलाते-2 त्रेता तक पहुँच जाएँगे। .........सारे चक्र में देखो, सिर्फ देव आत्माएँ हैं जिनका शरीर भी पवित्र है और आत्मा भी पवित्र है। और जो भी आए हैं, आत्मा पवित्र बन भी जाए; लेकिन शरीर पवित्र नहीं होगा। आप आत्माएँ ब्राह्मण जीवन में ऐसे पवित्र बनते हो जो शरीर भी, प्रकृति भी पवित्र बना देते हो; इसलिए शरीर भी पवित्र है तो आत्मा भी पवित्र है। (अ.वा.7.3.93 पृ.202 मध्य, 203 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 ब्रह्माकुमार-कुमारी बन अगर कोई भी साधारण चलन वा पुरानी चाल चलते हैं तो सिर्फ अकेला अपने को नुकसान नहीं पहुँचाते; क्योंकि अकेले ब्रह्माकुमार-कुमारी नहीं हो; लेकिन ब्राह्मण कुल के भाती हो। स्वयं का नुकसान तो करते ही हैं; लेकिन कुल को बदनाम करने का बोझ भी उसी आत्मा के ऊपर चढ़ता है। ब्राह्मण लोक की लाज रखना, यह भी हर ब्राह्मण का फर्ज़ है। ......जो लोक-लाज अनेक जन्मों की प्राप्ति से वंचित करने वाली है, वर्तमान हीरे जैसा जन्म कौड़ी समान व्यर्थ बनाने वाली है, यह अच्छी तरह से जानते भी हो, फिर भी उस लोक-लाज को निभाने में अच्छी तरह ध्यान देते हो, समय देते हो, एनर्जी लगाते हो। ......कभी वृत्ति के परहेज की धारणा अर्थात् धर्म को छोड़ देते हो, कभी शुद्ध दृष्टि के धर्म को छोड़ देते हो, कभी शुद्ध अन्न के धर्म को छोड़ देते हो, फिर अपने आपको श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए बातें बहुत बनाते हो। ......ब्राह्मण कुल ऊँचे ते ऊँची चोटी वाला कुल है। तो किस लोक वा किस कुल की लाज रखनी है! ......अल्पज्ञ आत्माओं को खुश कर लिया; लेकिन सर्वज्ञ बाप की आज्ञा का तो उल्लंघन किया ना! तो पाया क्या और गँवाया क्या? (अ.वा.18.4.82 पृ.380 अंत, 381 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 अगर सारे दिन में, चाहे उठने में, चाहे बैठने में, चाहे बोलने में, चाहे सेवा करने में, चाहे स्थूल सेवा की वा सूक्ष्म सेवा की; लेकिन अगर विधिपूर्वक नहीं की, विधि में भी अगर ज़रा-सा अंतर रह गया तो वो भी स्वच्छता अर्थात् पवित्रता नहीं। व्यर्थ संकल्प भी अपवित्रता है, क्यों? आप सोचेंगे कि हमने पाप तो किया ही नहीं, किसको दुःख तो दिया ही नहीं; लेकिन अगर व्यर्थ चला, समय गया, संकल्प गया, सन्तुष्टता गई तो आपके पवित्रता की फाइनल स्टेज के डिग्री में फर्क पड़ जाएगा। 16 कला नहीं बन सकेंगे। 15 कला, 14 कला, साढ़े पन्द्रह कला... नम्बरवार हो जाएगा। ......तो इसीलिए मोटे-2 रूप न पुरुषार्थ का रखो, न चेकिंग का रखो। अभी महीन बुद्धि बनो; क्योंकि समय समाप्त अचानक होना है, बताकर नहीं होना है। (अ.वा.6.4.95 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 ऐसे अलबेले नहीं बनना कि और तो सब छोड़ दिया बाकी कोई एक कर्मेन्द्रिय विचलित होती है वह भी समय पर ठीक हो जाएगी; लेकिन कोई एक कर्मेन्द्रिय की आकर्षण भी एक बाप का बनने नहीं देगी, एकरस स्थिति में स्थित होने नहीं देगी, नम्बरवन में जाने नहीं देगी। अगर कोई हीरे-जवाहर, महल-माड़ियाँ छोड़ दे और सिर्फ कोई मिट्टी के फूटे हुए बर्तन में भी मोह रह जाए तो क्या होगा? जैसे हीरा अपनी तरफ आकर्षित करता है वैसे हीरे से भी ज़्यादा वह फूटा हुआ बर्तन उसको अपनी तरफ बार-2 आकर्षित करेगा। न चाहते भी बुद्धि बार-2 वहाँ भटकती रहेगी। ऐसे अगर कोई भी कर्मेन्द्रिय की आकर्षण रही हुई है तो श्रेष्ठ पद पाने से बार-2 नीचे ले आएगी। ..........बापदादा बच्चों के कल्याण के लिए ही कहते हैं, पुराना छोड़ दो, अधमरे नहीं बनो। मरना है तो पूरा मरो, नहीं तो भले ही जिन्दा रहो। (अ.वा.3.4.82 पृ.337 मध्य, 341 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 अति-इन्द्रिय सुख में रहने वालों की निशानी क्या होगी? अति-इन्द्रिय सुख में रहने वाला कभी अल्पकाल के इन्द्रिय के सुख की तरफ आकर्षित नहीं होगा। जैसे कोई साहूकार रास्ते चलते हुए कोई चीज़ पर आकर्षित नहीं होगा; क्योंकि वह सम्पन्न है, भरपूर है। इसी रीति से अतीन्द्रिय सुख में रहने वाला इन्द्रियों के सुख को ऐसे मानेगा जैसे ज़हर के समान है। ......अगर चलते-2 इन्द्रियों के सुख तरफ आकर्षित होते, इससे सिद्ध है कि अतीन्द्रिय सुख की अनुभूति में कोई कमी है। .........इन्द्रियों के सुख का अनुभव कितने जन्म से कर रहे हो? उससे प्राप्ति का भी ज्ञान है ना? क्या प्राप्त हुआ? कमाया और गँवाया। जब गँवाना ही है तो फिर अभी भी उस तरफ आकर्षित क्यों होते? अतीन्द्रिय सुख की प्राप्ति का समय अभी भी थोड़ा समय है। यह अब नहीं तो कब नहीं मिलेगा। (अ.वा.14.5.77 पृ.149 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 होलीएस्ट बनने की मुख्य बात है- बाप से सच्चा बनना। सिर्फ ब्रह्मचर्य धारण करना यह प्यूरिटी की हाइएस्ट स्टेज (सर्वोच्च स्थिति) नहीं है; लेकिन प्यूरिटी(पवित्रता) अर्थात् रीयल्टी अर्थात् सच्चाई। (अ.वा.25.6.77 पृ.275 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 इतना बड़ा कार्य जिसके लिए निमित्त बने हुए हो उसको स्मृति में रखो। इतने श्रेष्ठ कार्य के आगे स्वयं के पुरुषार्थ में हलचल वा स्वयं की कमज़ोरियाँ क्या अनुभव होती हैं? ......अच्छी लगती हैं वा स्वयं से ही शर्म आता है? चैलेन्ज और प्रैक्टिकल समान होना चाहिए। (अ.वा.3.12.78 पृ.94 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 अगर किसी के प्रति भी स्वप्न मात्र भी लगाव हो, स्वार्थ हो तो स्वप्न में भी समाप्त कर देना। कई कहते हैं कि हम कर्म में नहीं आते; लेकिन स्वप्न आते हैं; लेकिन अगर कोई व्यर्थ वा विकारी स्वप्न, लगाव का स्वप्न आता है तो अवश्य सोने के समय आप अलबेलेपन में सोए। कई कहते हैं कि सारे दिन में मेरा कोई संकल्प तो चला ही नहीं, कुछ हुआ ही नहीं, फिर भी स्वप्न आ गया। तो चैक करो- सोने समय बापदादा को सारे दिन का पोतामेल देकर, खाली बुद्धि हो करके नींद की? ऐसे नहीं कि थके हुए आए और बिस्तर पर गए और गए- ये अलबेलापन है। चाहे विकर्म नहीं किया और संकल्प भी नहीं किया; लेकिन ये अलबेलेपन की सज़ा है; क्योंकि बाप का फरमान है कि सोते समय सदा अपने बुद्धि को क्लीयर करो, चाहे अच्छा, चाहे बुरा, सब बाप के हवाले करो और अपने बुद्धि को खाली करो। दे दिया बाप को और बाप के साथ सो जाओ, अकेले नहीं। अकेले सोते हो ना तभी स्वप्न आते हैं। अगर बाप के साथ सोओ तो कभी ऐसे स्वप्न भी नहीं आ सकते; लेकिन फरमान को नहीं मानते हो तो फरमान के बदले अरमान मिलता है। सुबह को उठ करके दिल में अरमान होता है ना कि मेरी पवित्रता स्वप्न में ख़त्म हो गई। ये कितना अरमान है! कारण है अलबेलापन। तो अलबेले नहीं बनो। जैसे आया वैसे यहाँ-वहाँ की बातें करते-2 सो जाओ; क्योंकि समाचार तो बहुत होते हैं और दिलचस्प समाचार तो व्यर्थ ही होते हैं। कई कहते हैं- और तो टाइम मिलता ही नहीं, जब साथ में एक कमरे में जाते हैं तो लेन-देन करते हैं; लेकिन कभी भी व्यर्थ बातों का वर्णन करते-2 सोना नहीं, ये अलबेलापन है। ये फरमान को उल्लंघन करना है। अगर और टाइम नहीं है और ज़रूरी बात है तो सोने वाले कमरे में नहीं; लेकिन कमरे के बाहर दो सेकेण्ड में एक/दो को सुनाओ, सोते-2 नहीं सुनाओ। .......तो जब आदि अर्थात् अमृतवेला और अंत अर्थात् सोने का समय अच्छा होगा तो मध्य स्वतः ही ठीक होगा। (अ.वा.16.11.95 पृ.25 अंत, 26 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 मन के प्रति बापदादा का डायरेक्शन है- मन को मेरे में लगाओ वा विश्व-सेवा में लगाओ। मन्मनाभव- इस मंत्र की सदा स्मृति रहे। इसको कहते हैं मन की स्वच्छता वा पवित्रता। (अ.वा.6.1.90 पृ.126 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 वास्तव में बाबा ने समझाया था, तुमको बैठना भी ऐसे चाहिए जो अंग अंग से न लगे। (मु.ता.17.3.74 पृ.2 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
 कहावत है शेरनी का दूध सोने के बर्तन में ठहरता है। इस बाप के ज्ञान धन के लिए भी सोने का बर्तन चाहिए। (मु.ता.17.3.99 पृ.3 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
पवित्रता में आँखों का महत्व और नाम-रूप की ग्रहचारीजब कोई किसके नाम-रूप में फँस पड़ते हैं तो बाप समझाते हैं यह क्रिमिनल आइज़ हैं। .........इसलिए बाप कहते हैं- हर एक अपनी अवस्था को देखें। बड़े-2 अच्छे महारथी अपने को देखें, हमारी बुद्धि किसके नाम-रूप में जाती तो नहीं है? फलानी बहुत अच्छी है, यह करें- कुछ अन्दर में आता है? यह तो बाबा जानते हैं, इस समय सम्पूर्ण सिविलाइज़्ड कोई है नहीं। वह तो बिल्कुल जो पास विद ऑनर 8 रत्न हैं, उनकी ही इस समय सिविलाइज़्ड हो सकती है। 108 भी नहीं। ज़रा भी चलायमानी न आए, बहुत मुश्किल है। कोई विरले ऐसे होते हैं। आँखें कुछ न कुछ धोखा ज़रूर देती हैं। तो ड्रामा जल्द किसकी सिविलाइज़्ड नहीं बनाएगा। खूब पुरुषार्थ कर अपनी जाँच करनी है- कहाँ हमारी आँखें धोखा तो नहीं देती हैं? विश्व का मालिक बनना बड़ी ऊँची मंज़िल है। ............अपनी सम्भाल रखनी है। बेहद के बाप को भी सच कभी नहीं बताते हैं। कदम-2 पर भूलें होती रहती हैं। थोड़ा भी उस क्रिमिनल दृष्टि से देखा, भूल हुई, फौरन नोट करो। 10-20 भूलें तो रोज़ करते ही होंगे जब तक अभूल बनें; परन्तु सच कोई बताते थोड़े ही हैं। (मु.ता.23.7.89 पृ.1 अंत, 2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 एक-2 आत्मा इंडिपेंडेंट है। भाई-बहन का भी नाता छुड़ा दिया। भाई-2 समझो। फिर भी क्रिमिनल आई छूटती नहीं है। वह अपना काम करती रहती है। इस समय मनुष्यों के अंग सब क्रिमिनल हैं। ......सबसे जास्ती क्रिमिनल अंग कौन-सा है? आँखें। विकार की आश पूरी नहीं हुई तो फिर हाथ चलाने लग पड़ते। पहले-2 हैं आँखें। तब सूरदास की भी कहानी है। (मु.ता.19.7.89 पृ.2 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
 क्रिमिनल आई बदलकर सिविल बन जाए, टाइम लगता है। स्त्री को समझे हम ब्रह्माकुमार-कुमारी भाई-बहन हैं, कितना फर्क हो जाता! स्त्री-पुरुष की चलन बदल भाई-बहन की हो जाए, डिफीकल्टी है। (मु.ता.9.12.90 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 मनुष्य कितने विकारी क्रिमिनल आई वाले हैं। एक मिनिस्टर बाबा के पास आया था। बोला, हमारी तो क्रिमिनल आई जाती है। (मु.ता.20.8.89 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 आशिक-माशूक एक विकार के लिए बनते हैं, दूसरे सिर्फ रूप पर फिदा होते हैं। तुम जानते हो, सेन्टर्स पर भी ऐसे माया के विघ्न बहुत पड़ते हैं। नहीं तो हमेशा मेल-फीमेल एक/दो के नाम-रूप में फँसते हैं। यहाँ तो माया ऐसी प्रबल है जो माता, माता के नाम-रूप में; कन्या, कन्या के नाम-रूप में फँस पड़ती हैं। पुरुषार्थ करते हुए भी माया एकदम पकड़ लेती है। (मु.ता.31.8.91 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 बाप इस पुरानी दुनिया से तुमको नफरत दिलाते हैं। इस समय सबकी आत्माएँ काली हैं तो उनको गौरा शरीर कैसे मिलेगा! भल करके चमड़ी किसकी सफेद है; परन्तु आत्मा तो काली है ना! जो सफेद खूबसूरत शरीर वाले हैं उनको अपना नशा कितना रहता है। खुद काला भूत होगा; परन्तु कहेगा, हमको स्त्री सफेद चाहिए। मनुष्यों को यह पता ही नहीं पड़ता है कि आत्मा गौरी कैसे बनती है। (मु.ता.12.7.84 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 अभी तक भी बहुत बच्चों की कम्पलेन्ट(शिकायत) है कि दृष्टि चंचल होती है वा दृष्टि खराब होती है। क्यों होती है? जबकि बाप का फरमान है- लौकिक देह अर्थात् शरीर में अलौकिक आत्मा को देखो, फिर देह को देखते क्यों हो? अगर आदत कहते हो, आदत से मजबूर हो वा अल्पकाल के किसी न किसी रस के वशीभूत हो जाते हैं तो इससे सिद्ध है कि आत्मा-परमात्मा प्राप्ति के रस में अभी तक अनुभवी नहीं हैं। (अ.वा.5.6.77 पृ.213 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 काम महाशत्रु है न! कशिश बहुत करते हैं। इसलिए सूरदास की भी कथा है। बाप कहते हैं यहाँ आँख निकालनी नहीं है। क्रिमिनल को सिविल बनाना है। इस समय की ही मेहनत है। सबसे महाशत्रु है यह काम; इसलिए सब क्रिमिनल बन गए हैं। तो फिर ऐसा चाहिए जो क्रिमिनल को बदल सिविल बनावें। (रात्रि क्लास मु.ता.31.1.74 पृ.4 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 जब क्रिमिनल आई टूटकर पक्की सिविल आई बन जाती है उसको कहा जाएगा कर्मातीत अवस्था। इतनी अपनी जाँच करनी है। इकट्ठे रहते भी विकार की दृष्टि न जाए। बीच में ज्ञान तलवार होगी- हम भाई-बहन हैं। (मु.ता.6.9.84 पृ.2 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
 तुम्हारे लिए यह आवाज़ होता है ना कि यह सबको भाई-बहन बनाते हैं। इससे शुद्ध नाता रहता है। क्रिमिनल दृष्टि नहीं जाती है। सिर्फ इस जन्म के लिए यह दृष्टि पड़ जाने से फिर भविष्य कब भी क्रिमिनल दृष्टि नहीं पड़ेगी। ऐसे नहीं कि वहाँ बहन-भाई समझते हैं। वहाँ तो जैसे महाराजा-महारानी होते हैं वैसे ही होते हैं। (मु.ता.6.9.84 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 जब ग्रहचारी बैठती तो कितना नुकसान हो जाता है वह बाप जानते हैं। साहूकार, गरीब बन पड़ते हैं। कारण तो होता है ना। बहुतों को बाबा समझाते भी रहते हैं- बच्चे, नाम-रूप में कभी नहीं फँसना, नहीं तो माया ऐसी है- नाक से पकड़ खड्डे में डाल देगी। माया बड़ा धोखा दे देगी। आशिक-माशूक यहाँ नहीं बनना है। .........तुम जानते हो, सेन्टर्स पर भी ऐसे माया के विघ्न बहुत पड़ते हैं। नहीं तो हमेशा मेल-फीमेल एक/दो के नाम-रूप में फँसते हैं। ......इसलिए बाबा सावधानी देते हैं कि बच्चे, माया बहुत फँसाने की कोशिश करेगी; लेकिन तुमको फँसना नहीं है। देह-अभिमान में नहीं आना चाहिए। अपने को आत्मा समझ बाप को याद करना है। (मु.ता.31.8.91 पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
 अपनी स्त्री होते हुए भी दूसरी कोई खूबसूरत देखेंगे तो झट वह खैंचेगी। ...दिल होती है उनको हाथ लगावें। आँखें सबसे जास्ती धोखा देती है। ............कोई गायन में होशियार होगी, श्रृंगार अच्छा होगा तो आँखें झट चलायमान हो जावेंगी। ...............तो जब ऐसी कोई स्त्री आदि सामने आती है तो किनारा कर लेना चाहिए, खड़ा हो देखना न चाहिए। ....................कोई को देखेंगे तो ख़्याल आवेगा यह तो बहुत अच्छी है। फिर बात करेंगे। दिल होगी उनको कुछ सौगात दूँ, यह खिलाऊँ। वही चिन्तन चलता रहेगा। (मु.ता.20.5.76 पृ.1 आदि, 2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 यह शरीर तो पुराना है। उनसे बिल्कुल नफरत आनी चाहिए। भल कितना भी सुन्दर हो, लॉ मुजीब तो सभी काले हैं; क्योंकि आत्मा काली है। ......दुनिया में तो काली और गौरी शक्ल पर चलता है। कोई-2 बगैर देखे सगाई कर लेते हैं, फिर जब शक्ल देखते हैं तो कहते हैं हमको ऐसी काली नहीं चाहिए। फिर झगड़ा हो जाता- हम पैसे को क्या करें! हमें तो सुहेनी चाहिए। ......(अभी) तुम्हारी काली आत्मा की सगाई हुई है गोरे साजन से। ......जो नाम-रूप में फँसते हैं उनको ही बन्दर-बन्दरी कहा जाता है। (मु.ता.8.9.73 पृ.2 आदि-मध्य, 4 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 अच्छे-2 सेन्टर्स के अच्छे-2 बच्चों की भी क्रिमिनल आई रहती है। (मु.ता.5.8.84 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
कलियुगी पतित दुनिया की परिस्थितिबाप ने दिन में कर्म करने की तो छुट्टी दी है। बाकी टाइम में रात को जाग कर यह अभ्यास करेंगे तो दिन में भी वह अवस्था रहेगी, मदद मिलेगी। रात का अभ्यास दिन में काम आवेगा। रात को भी जागना है 12 के बाद; क्योंकि 9 से 12 बजे तक यह टाइम तो सभी से डर्टी है। मनुष्य गोते खाते रहते हैं। इसलिए विचार-सागर-मंथन सवेरे करना होता है। (मु.ता.9.4.72 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 पढ़ाई सवेरे और शाम को होती है। दोपहर में वायुमण्डल ठीक नहीं होता है। रात्रि का भी 10 से 12 तक बिल्कुल खराब टाइम है। उसी समय जैसे कि विषय वैतरणी नदी में बहते हैं। आजकल तो न दिन न रात देखते हैं। पूरा वेश्यालय है। इस समय तमोप्रधान हैं ना। (मु.ता.6.7.75 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 भ्रष्टाचारी अर्थात् जो मूत से पैदा होते हैं। रावण राज्य में भ्रष्टाचारी काम ही करते रहते हैं। फिर गुल-2 बनाने बाप को ही तरस पड़ता है। भारत में ही आते हैं। (मु.ता.1.5.72 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 हमने आधा कल्प राज्य किया फिर वाममार्ग में गए। उनका भी फिर मन्दिर बना हुआ है जगन्नाथ का। उसमें देवी-देवताओं के बहुत गन्दे-2 चित्र दिखाए हैं। उसके लिए भी गवर्मेन्ट को रिपोर्ट करनी चाहिए। ऐसे विकारी के मंदिर थोड़े ही होने चाहिए। विलायत से बहुत गंदे चित्र मँगाते हैं। फॉरेनर्स लोग जब ऐसे चित्र देखते हैं तो फिर कहते हैं देवताएँ कितने गंदे हैं! कृष्ण को इतनी रानियाँ थीं! हिंदुओं ने अपने आप को ही चमाट मारी है। (मु.ता.2.5.72 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 उस लौकिक बाप से तो 63 जन्म सराप ही मिलता है; क्योंकि रावण के मत पर चलते हैं ना। हरेक बाप अपने बच्चों को सरापित ही करते हैं। काम चिक्षा पर बिठाते हैं। बाप आए फिर ज्ञान चिक्षा पर बनाते(बिठाते) हैं। (मु.ता.24.5.72 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 अमृतवेला, प्रभात सवेरे 2-3 बजे को कहा जाता है, जबकि सुमिरण भी कर सके। ऐसे थोड़े ही 12 बजे विकार से उठकर और भगवान का नाम कोई लेता होगा। बिल्कुल नहीं। अमृतवेला 12 बजे को नहीं कहा जाता है। उस समय तो मनुष्य पतित, गंदे होते हैं। वायुमण्डल ही सारा खराब कर सोते हैं। 12:30 बजे थोड़े ही कोई उठता है। अमृतवेला है ही 3-4-5 बजे का। (मु.ता.16.8.74 पृ.2 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
 भ्रष्टाचारी दुनिया में कोई भी श्रेष्ठाचारी नहीं होता। सभी पतित हैं। शरीर मूत से पैदा होता है। (रात्रि क्लास मु.ता.24.5.72 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
 तुम जानते हो, इस समय सभी मनुष्य जंगली जानवर है। एक/दो को काटते, मारते ही रहते हैं। इन जैसा क्रोध और विकार और कोई में होता नहीं। यह भी गायन है कि द्रौपदी ने पुकारा। बाप ने समझाया है तुम सब द्रौपदियाँ हो और पुरुष हैं सब दु:शासन। द्रौपदी ने पुकारा कि हमको नगन करते हैं। बाप समझाते हैं, ऐसे-2 अत्याचार करने वाले हैं, जिनको जानवरों से भी बदतर कहा जाता है। गऊ एक बार ही बैल के पास जाती है, फिर कब बैल के वाडे में आएगी नहीं। बैल के सामने कब आएगी नहीं, भाग जावेगी, लड़ पडे़गी। यहाँ मनुष्य देखो, कितने गंदे हैं! इसलिए द्रौपदी ने पुकारा है कि मुझे नगन न करो। जुआ की बात लिखी हुई है। कहा- दु:शासन मुझे नगन करते हैं। मैं रजस्वला हूँ, मुझे हाथ न लगाओ, नगन न करो। तो यहाँ के मनुष्य ऐसे हैं जो भल कुछ भी हो तो भी काला मुँह करने बिगर रहेंगे नहीं। जानवरों से भी बदतर हैं। सतयुग में तो नगन होने का हुक्म ही नहीं। इस समय है घोर अंधियारा। बाप देख रहे हैं कि कितना गंद है! कामी कुत्ते छोड़ते ही नहीं। इनके पास ज्ञान है तब ही पुकारती हैं। बड़े गंदे मनुष्य हैं! तुम भी समझ सकती हो, ऐसे हैं ना बरोबर। भगवानुवाच्य बाप कहते हैं- बच्चे, अब विकार में न जाओ। मैं तुमको स्वर्ग में ले चलता हूँ। (मु.ता.27.12.74 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 एक तो यह दुनिया ही वेश्यालय है और फिर वेश्याएँ भी तीर्थों आदि पर रहती हैं। एक तरफ स्नान करो, दूसरी तरफ गटर में घुटका खाओ। (मु.ता.9.1.74 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 बाप कहते हैं वास्तव में सब द्रौपदियाँ-दुशासन हैं। नगन तो सब होते हैं न! यह है बेहद की बात। शास्त्रों में एक द्रौपदी का नाम लिख दिया है। पाँच पति थे उनको, यह भी हो न सके। हिन्दू नारी तो एक पति ही करती है। पुरुष तो एक जूती गई, दूसरी ले लेते हैं। आजकल तो बहुत गंदगी है। अपनी बच्ची को भी खराब कर देते। कितनी छी-2 दुनिया है। अब बाप तुमको गुल-2 बनाते हैं। (मु.ता.22.1.74 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 आजकल मनुष्यों के पास पैसे बहुत हो गए हैं। तो 5 विकार भी तेज हो गए हैं। काम विकार कितना तेज है। काम बिगर रह नहीं सकते। 4-5 वर्ष रह फिर लिखते हैं- बाबा, आज भूत लगा, काला मुँह कर दिया। कितना धक्का खाया, एकदम 5 मारे से गिरे। पहले-2 है देह-अभिमान। ऊपर से गिरा ठक पुर्जा-2 हो गया। खलास। हडगुड बिल्कुल टूट जाते हैं। फिर पुरुषार्थ करने में टाइम लगता है। यह है सबसे बड़ी चोटी। इसलिए बाप कहते हैं काम महाशत्रु है। विकार को ही पतितपना कहा जाता है। (मु.ता.9.7.71 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 वह विद्वान, आचार्य, पण्डित आदि सब पतित हैं। विकार से पैदा होते हैं। भल साधु-महात्मा हों; परंतु देवताओं को हाथ नहीं लगा सकते; क्योंकि म्लेच्छ हैं। इसलिए बाउंडरी लगा देते हैं। कोई छू न सके। (मु.ता.20.11.74 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 मनुष्य देवता से बदल टट्टू गधे मिसल बन जाते हैं। गधे बेवकूफ होते हैं। घड़ी-2 मिट्टी में लेट कर मैले बन पड़ते हैं। बाप भी कहते हैं- ख़बरदार रहना! टट्टू मिसल फिर मैला न बनना। मैं तुम्हारी आत्मा को पावन बनाने आता हूँ। ऐसा न हो विकारी बन सारा शृंगार ही गँवा दो। (मु.ता.20.11.74 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 विकारी मनुष्य सब अछूत, म्लेच्छ हैं। इस समय सारी दुनिया अछूत(मेहतर) है; क्योंकि विष पीते-पिलाते हैं। (मु.ता.20.11.74 पृ.1 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
 कामी जो होते हैं, उनके लिए बहुत कड़े अक्षर कहे जाते हैं। कहते हैं, तुम तो कामी कुत्ते हो। बेहद का बाप भी समझाते हैं- हम तुमको जी.ओ.डी. बनाते हैं; रावण तुमको उल्टा डी.ओ.जी. बना देते हैं। यह है ही रावण राज्य। मिसाल देते हैं न- कुत्ते का पूँछ कितना भी सीधा करो; परंतु होगा ही नहीं। यहाँ भी समझाया जाता है- पावन बनो, फिर भी बनते नहीं। बाप कहते हैं- बच्चों, विकार में मत जाओ अर्थात् कुत्तरे मत बनो। बंदर मत बनो। काला मुँह मत करो। फिर भी लिखते हैं- बाबा, माया से हार खाकर काला मुँह कर बैठे। अज्ञान काल में भी कोई गंदा काम करते हैं तो कहते हैं, मुट्ठा! काला मुँह करके आए हो। (मु.ता.26.5.74 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 बाबा ने रात्रि को भी समझाया, किन्हों-2 की दृष्टि कामी रहती है अथवा सेमी कामी दृष्टि है। वेश्याएँ और लम्पट भी हैं न! यह हैं सबसे बड़े काँटे। इसमें भी कोई खास काँटे रखते हैं, जिनको कामी कुत्ता भी कहा जाता है। बहुत बड़ा-2 घर खास उन्हों के लिए बनाते हैं। जैसे कलकत्ते में कोई बड़ा आदमी वेश्या न रखे तो उनको बड़ा आदमी नहीं माना जाए। बहुत गन्द है। इसलिए भारत का नाम ही रखा हुआ है वेश्यालय। खास भी है, आम भी हैं। कॉमन और प्राइवेट होते हैं। खास अपने लिए रखते हैं। फिर खुद भी जाते हैं, दोस्तों को भी ले जाते हैं। तो बाप बैठ समझाते हैं, यह है वैश्यालय। विकार में जाते हैं या चेष्टा करते हैं कि फलाना बहुत अच्छा है, इनसे विकार में जावें। वेश्याओं का यह काम होता है। कब यहाँ भी ऐसी वृत्ति वाले आते हैं, जिनकी बुद्धि देह तरफ जाती है। कोई की सेमी बुद्धि जाती है। कोई नए-2 भी आते हैं जो पहले अच्छा-2 चलते हैं। ......उस समय शमशानी वैराग्य आता है। फिर वहाँ जंगल में जाते हैं तो खराब हो पड़ते हैं। दृष्टि गंदी हो पड़ती है। यहाँ जिनको अच्छा फूल समझ बागवान के पास ले आते हैं कि बाबा, यह बहुत अच्छा फूल है। कोई के लिए माली कान में आकर बतलाते हैं- यह फलाना फूल है। यह ऐसा है। माली तो ज़रूर बतावेंगे न। ऐसे नहीं कि बाबा अन्तर्यामी है। (मु.ता.16.7.74 पृ.1 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
 कोई में काम विकार जास्ती होता है तो कहते हैं यह तो कामी कुत्ता है। स्त्री भी कहती है, हमारा पति तो कामी कुत्ता दिखाई पड़ता है, घड़ी-2 विकार में जाते रहते हैं। कोई कहते, 7-8 मास में एक बार विकार में जाना होता। कोई कहते, मास-2। कोई हफ्ते-2। कोई बहुत कामी होते हैं तो रोज़ भी जाते हैं। उससे जास्ती विकारी तो दिन में दो-तीन बार भी विकार में जाते हैं। बाप समझाते हैं सतयुग में यह विकार नहीं हैं। ......विकारी दुनिया को निर्विकारी बनाना यह तो बाप का ही काम है। ............कहते हैं इस बिगर बच्चे कैसे पैदा होंगे? बाप समझाते हैं, अभी जो बिच्छू-टिण्डन पैदा होते हैं, यह मृत्युलोक के सम्प्रदाय हैं। तुम्हारा यह अन्तिम जन्म है। यह बिच्छू-टिण्डन मिसल बच्चे पैदा होना बन्द होना है। मृत्युलोक ही ख़त्म होना है। फिर इसके बाद विकारी लोग होंगे ही नहीं। इसलिए बाप से पवित्र बनने की प्रतिज्ञा करते हैं। (मु.ता.29.3.76 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 गटर में कोई मज़ा थोड़े ही है। यह है ही विषय सागर। रौरव नर्क में सब पड़े हैं। बहुत गन्द हैं। दिन-प्रतिदिन गंद वृद्धि को पाता रहता है। इनको कहा जाता है डर्टी वर्ल्ड, डेविल वर्ल्ड। एक/दो को दुःख ही देते; क्योंकि देह-अभिमान का भूत है, काम का भूत है। बाप कहते हैं इन भूतों को भगाओ। यह भूत ही तुम्हारा काला मुँह करते हैं। काम चिता पर बैठ काले बन जाते हैं, सड़ जाते हैं तब बाप कहते हैं फिर हम आकर ज्ञान अमृत की वर्षा करते हैं। इन गन्द से तो अभी एकदम घृणा आती है। यह है ज़हर अथवा भाड(गंद) खाना। अक्षर भी हैं मूत पलीती। ग्रन्थ बैठ पढ़ते हैं; परन्तु हैं सब विकारी। सूरत बहुत अच्छी, सीरत बन्दर जैसी है। (मु.ता.8.8.75 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 अभी तुम पवित्र बन रहे हो तो किचड़े वालों से कितना मिक्सअप होना पड़ता है। नहीं तो ऐसे किचड़े को शिवबाबा छू भी नहीं सकते। शिवबाबा बहुत सीकरेट है, बहुत पवित्र है। (मु.ता.30.10.84 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 एक तो याद की यात्रा में रहना है, जिससे गन्द निकले पवित्र बन जाएँगे। फिर तुम्हारी दिल नहीं होगी गन्दे से मिलने की; परन्तु सर्विस अर्थ तुमको बातचीत करनी पड़ती है। (मु.ता.30.10.84 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 ऐसे भी होते हैं, सिखलाने वाले माया के चम्बे से विकार में चले जाते हैं। आए हैं बहुतों को दुबन से निकालने, खुद फँस मरते हैं। माया बड़ी ज़बरदस्त है। (मु.ता.6.9.84 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 कोई से दिल लगाई, भाकी पहनी, तो समझो चट खाते में गया। उनका तो मुँह देखना भी अच्छा नहीं लगता। वह जैसे अछूत है। स्वच्छ नहीं है। अन्दर में दिल खाती है, बरोबर मैं अछूत हूँ। (मु.ता.12.7.84 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 बाप जानते हैं कि एकदम जलकर काले कोयले बन गए हैं। (मु.ता.30.10.84 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 देह-अभिमान में आकर बहुत छी-2 काम करते हैं। समझते हैं, हमको कोई देखता थोड़े ही है। क्रोध, लोभ तो प्राइवेट नहीं होता। काम में प्राइवेसी चलती है। दरवाज़ा बन्द कर काला मुँह करते हैं। काला मुँह करते-2 कृष्ण की आत्मा 84 जन्मों बाद काली बन गई है। गौरे से साँवला बना है तो सारी दुनिया उनके पिछाड़ी आ गई। द्वापर से लेकर गिरते-2 काले बन्दर बन गए हैं। ऐसे पतित दुनिया को बदलना भी ज़रूरी है। बाप कहते हैं तुमको शर्म नहीं आता? एक जन्म लिए पवित्र नहीं बनते हो। (मु.ता.9.11.74 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 तुम्हारे पास प्रदर्शनी आदि में भिन्न-2 प्रकार के मनुष्य आते हैं। कोई कहते हैं, जैसे भोजन ज़रूरी है वैसे यह विकार भी भोजन है। इन बिगर भूख में मर जावेंगे। अब ऐसी बात तो है नहीं। सन्यासी पवित्र बनते हैं फिर मर जाते हैं क्या! ऐसे-2 बोलने वाले लिए समझा जाता है कोई बहुत अजामिल, पापी होंगे जो ऐसे-2 कहते हैं। बोलना चाहिए, क्या इस बिगर तुम मर जावेंगे जो भोजन से इनकी भेंट करते हो! स्वर्ग में आने वाले जो होंगे वह होंगे सतोप्रधान, फिर पीछे सतो, रजो, तमो में भी तो आते हैं ना। जो पीछे आते हैं उन आत्माओं ने निर्विकारी दुनिया तो देखी नहीं है। तो वह आत्माएँ ऐसे-2 कहेंगे शरीर द्वारा कि इन बिगर हम रह नहीं सकते। सूर्यवंशी जो होंगे उनको तो फौरन बुद्धि में आवेगा यह तो सत्य बात है। बरोबर स्वर्ग में विकार का नाम-निशान न था। (मु.ता.5.3.75 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 इस दुनिया में तुम और कुछ न सुनो, न पढ़ो। तुम उन्हों का संग भी न करो। मेहतरों से मनुष्य किनारा करते हैं न! बाप ने समझाया है यह सब मनुष्य मेहतर ही मेहतर हैं। भार(गंद) खाने वाले हैं। ......कब-2 तो भार खाने वाले भी आ जाते हैं, जिनको अजामिल कहो, जो कुछ कहो। (मु.ता.17.3.74 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 मूत पीने की तो ऐसी आदत पड़ गई है जैसे शराबी शराब बिगर रह नहीं सकते। (मु.ता.10.4.73 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 देखो बच्चे, आ(ज)कल तो 70-80 वर्ष वाले भी विख को छोड़ते नहीं हैं, नहीं तो कायदा है- 60 वर्ष के बाद वानप्रस्थ (ले) लेना। ( मु.ता.1.9.73 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 शिव का मंदिर भी है। वहाँ ही लक्ष्मी-नारायण का चित्र, वहाँ ही राम का, वहाँ ही फिर कोसघर बनाते हैं। कहाँ देवताएँ अहिंसक, जो स्वर्ग में राज्य करते थे! उनके मन्दिरों में फिर कोसघर बनाते रहते हैं। ......मन्दिरों में भी शादी के लिए हॉल बनाते रहते हैं। (मु.ता.6.4.69 पृ.1 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
 कलियुग में देखो, मनुष्य का क्या हाल है! अख़बार में पड़ा था- 42 वर्ष का आदमी है, उनको 43 बच्चे हैं। फिर इतनी युगल गिनाई। ......कब तीन, कब चार बच्चे पैदा किए। ......तो उनको क्या कहेंगे? कुतरे। कुतरे से भी जास्ती। .........सतयुग में तो एक धर्म, एक भाषा, एक बच्चा होता है। (मु.ता.7.4.69 पृ.2 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
पवित्रता- कुमारियों के संदर्भ मेंजो भी गुरु लोग आदि हैं, सभी हैं हठयोगी। घरबार छोड़ देते हैं। बाबा छुड़ाते नहीं हैं। कहते हैं पवित्र बनो। कुमार और कुमारी पवित्र हैं। शादी के बाद वह दुशासन, वह द्रौपदी बन जाती। रावण सभी को दुशासन बना देते हैं। सभी द्रौपदियाँ और दुशासन रावण सम्प्रदाय है। बहुत करके पुरुष ही नगन करते हैं। तो द्रौपदी पुकारती है- बाबा, हमको नगन होने से बचाओ। हम पवित्र बन कृष्णपुरी में जाने चाहती हैं। कन्याएँ भी पुकारती हैं- माँ-बाप हमको तंग करते हैं, मारते हैं कि विकारी बनना ही होगा। यह समय ही ऐसा है। बाबा ने समझाया है, कन्या को माँ-बाप भी पाँव पड़ते हैं; क्योंकि पवित्र है। शादी करने से अपवित्र हो जाती है। ससुर घर जाती है तो फिर सभी के आगे माथा टेकना पड़ेगा; क्योंकि पतित बन जाती है। तब फिर पुकारती है- हे बाबा! पतित-पावन आओ। अब बाप कहते हैं, कुमारियाँ पतित न बनो, नहीं तो पुकारना पड़ेगा। पतित बनती ही क्यों हो? ऐसे थोड़े ही तुम्हारे गले में कोई फाँसी डाले तो तुम डाल देंगी। तुम जानवर थोड़े ही हो। अपन को बचाना चाहिए। बाप आए ही हैं पावन बनाने। कहते हैं स्वर्ग की बादशाही का वर्सा देने आया हूँ; इसलिए पवित्र बनना पड़े। कन्या पावन ही रहे। पतित बनेंगी तो पतित हो मर जावेंगी। स्वर्ग के सुख देख न सकेंगी। स्वर्ग में तो बहुत मौज है। (मु.ता.1.5.72 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 कुमारियों द्वारा ही परमपिता परमात्मा ने भीष्मों आदि को ज्ञान बाण मरवाए। दुनिया तो इन बातों को नहीं जानती। जगदम्बा सरस्वती कुमारी है न! बडे़-2 पण्डित सरस्वती सरनेम रखाते हैं। ......बरोबर अभी कन्याओं में ताकत जास्ती आती है; क्योंकि वह उल्टी सीढ़ी नहीं चढ़ी हैं। पुरुष जब स्त्री को लेता है तो उनमें मोह चला जाता है, फिर माँ-बाप, दादे आदि सबसे मोह निकल स्त्री के मुरीद बन जाते हैं। फिर बच्चे पैदा करते हैं तो उनमें मोह चला जाता। अभी तुम सबसे नष्टोमोहा बनते हो। (मु.ता.22.6.73 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 कुमारियों लिए तो जैसे मेहनत है ही नहीं, फ्री हैं। विकार में गए तो बड़ी पंचायत हो जाती है। कुमारी रहना अच्छा है, नहीं तो फिर अधरकुमारी नाम पड़ जाता। युगल भी क्यों बने? इसमें भी नाम-रूप का नशा चढ़ता है। यह भी मूर्खता है। भल बहादुरी दिखाते हैं, इसमें कोई संशय नहीं; परन्तु बड़ी अच्छी हिम्मत चाहिए, ज्ञान की पूरी पराकाष्ठा चाहिए। बहुत हैं जो हिम्मत करते हैं; परन्तु आग की आँच आ जाती है तो खेल खलास। इसलिए बाबा कहते हैं कुमारी फिर भी अच्छी है। अधरकुमारी बनने का ख़्याल भी क्यों करना चाहिए? कुमारियों का नाम बाला है। बाल ब्रह्मचारी हैं। बाल ब्रह्मचारी रहना अच्छा है। ताकत रहती है। दूसरे कोई की याद नहीं आवेगी। बाकी हिम्मत है तो करके दिखावे; परन्तु मेहनत है। दो हो पड़ते हैं ना! कुमारी है तो अकेली है। दो से द्वैत आ जाता है। जितना हो सके कुमारी रहना अच्छा है। उसमें तो घर आदि बनाना पड़ता है। कुमारी सर्विस में निकल सकती है। बंधन में पड़ने से फिर बंधन वृद्धि को पाते रहते हैं। ऐसा जाल बिछाना ही क्यों चाहिए, जो बुद्धि फँस पड़े! ऐसे जाल में न फँसना ठीक है। कुमारियों (के) लिए तो बहुत अच्छा है। ...उन्हों के लिए बहुत सहज है। स्टूडेंट लाइफ पवित्र लाइफ भी है। बुद्धि से भी फ्रेश रहते हैं। कुमारों को भी भीष्मपितामह जैसा बनना है। कल्प पहले भी रहे हैं तब तो दिलवाला मंदिर में यादगार बना है। (मु.ता.6.8.76 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 सभी कुमारियों ने जो बाप से पहला वायदा किया हुआ है कि एक बाप, दूसरा न कोई- वह निभाती हैं? इसी वायदे को सदा निभाने वाली कुमारी विश्व-कल्याण के अर्थ निमित्त बनती हैं। कुमारियों का पूजन होता है- पूजन का आधार है सम्पूर्ण पवित्र। तो कुमारियों का महत्व पवित्रता के आधार पर है। अगर कुमारी, कुमारी होते हुए भी पवित्र नहीं तो कुमारी जीवन का महत्व नहीं। तो कुमारीपन की जो विशेषता है, उसको सदा साथ-2 रखना, उसे छोड़ना नहीं; नहीं तो अपनी विशेषता को छोड़ने से वर्तमान जीवन का अति-इन्द्रिय सुख और भविष्य के राज्य का सुख, दोनों से वंचित हो जावेंगी। (अ.वा.28.10.75 पृ.243 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 माथा पावन के आगे झुकाया जाता है। (कन्या का मिसाल) जब विकारी बनती है तो सबके आगे सिर झुकाती और फिर पुकारती- हे पतित-पावन...। अरे! पतित बनती ही क्यों हो जो फिर पुकारना पड़े? (मु.ता.14.7.74 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 कुमारी जीवन की क्या महिमा है? कुमारियों को पूजा जाता है, क्यों? पवित्र आत्माएँ हैं। तो सभी पवित्र आत्माएँ पवित्र याद से औरों को भी पवित्र बनाने की सेवा में रहने वाली हो ना! ............तो सदा अपने को श्रेष्ठ कुमारी, पूज्य कुमारी समझो। मन्दिरों में जो शक्तियों की पूजा होती है, वही हो ना! (अ.वा.17.5.83 पृ.210 अंत, 211 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 जहाँ भी रहो, वहाँ सदा अपने को पूज्य महान आत्मा समझकर चलना। न आपकी दृष्टि किसी में जाए, न और किसी की दृष्टि आप पर जाए। ऐसी पूज्य आत्मा समझकर चलना। पूज्य आत्मा की स्मृति में रहने वाली कुमारियों के तरफ किसी की भी ऐसी दृष्टि नहीं जा सकती है। सदा इस बात में अपने को सावधान रखना। कभी भी अपने को हल्की स्मृति में नहीं रखना। ब्रह्माकुमारी तो बन गई,... कभी ऐसे अलबेले नहीं बनना। अभी तो दादी बन गई, दीदी बन गई...नहीं। यह तो कहने में भी आता है; लेकिन हैं श्रेष्ठ आत्मा, पूज्य आत्मा, शक्ति रूप आत्मा... शक्ति के ऊपर किसी की भी नज़र नहीं जा सकती। अगर किसी की गई तो दिखाते हैं- वह भैंस बन गया। भैंस जैसे काली होती है तो वह भैंस अर्थात् काली आत्मा बन गई और भैंस बुद्धि अर्थात् मोटी बुद्धि हो जाएगी। अगर किसी की भी बुरी दृष्टि जाती है तो वह मोटी बुद्धि, भैंस बुद्धि बन जाएगा। क्यों किसी की दृष्टि जाए! इसमें भी कमज़ोरी कुमारियों की कहेंगे। पाण्डवों की अपनी कमज़ोरी, कुमारियों की अपनी। इसलिए अपने को चेक करो। दादी-दीदियों को भी डर इसी बात का रहता है कि कोई की नज़र न लग जाए। तो ऐसी पक्की हो ना! कभी भी किसी से प्रभावित नहीं होना। यह सेवाधारी बहुत अच्छा है, यह सेवा में अच्छा साथी मददगार है, नहीं। यह तो इतना करता है, नहीं। बाप कराता है। मैं इतनी सेवा करती हूँ, नहीं। बाप मेरे द्वारा कराता है। तो न स्वयं कमज़ोर बनो और न दूसरों को कमज़ोर बनने की मार्जिन दो। इस बात में किसी की भी रिपोर्ट नहीं आनी चाहिए। (अ.वा.19.5.83 पृ.217 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 जो बाप की श्रीमत है उसी प्रमाण, उसी लकीर के अन्दर सदा रहने वाले सदा ऊपर उड़ते रहते हैं। तो लकीर के अन्दर रहने वाली कौन हुई? सच्ची सीता। तो सभी सच्ची सीताएँ हो ना? पक्का? लकीर के बाहर पाँव निकाला तो रावण आ जाएगा। रावण इंतज़ार में रहता है कि कहाँ कोई पाँव निकाले और मैं भगाऊँ! तो कुमारी अर्थात् सच्ची सीता। (अ.वा.8.10.81 पृ.29 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 कभी वह जीवन, खाना, पीना, घूमना- यह याद तो नहीं आता। दूसरों को देखकर यह नहीं आता कि हम भी थोड़ा टेस्ट तो करें। वह जीवन गिरने की जीवन है; यह जीवन चढ़ने की जीवन है। चढ़ने से गिरने की तरफ कौन जाएगा! ......जहाँ शुद्ध आत्माएँ हैं वहाँ सदा ही शुभ कार्य है। सभी आपस में संस्कार मिलाने की सबजेक्ट में पास हो ना। कोई खिटखिट नहीं, कहाँ भी दृष्टि-वृत्ति नहीं! एक बाप दूसरा न कोई... विशेष कुमारियों को इस बात में सर्टीफिकेट लेना है। जैसे नाम है बाल-ब्रह्मचारिणी वैसे संकल्प भी ऐसा पवित्र हो- इसको कहा जाता है स्कॉलरशिप लेना। (अ.वा.9.5.83 पृ.194 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 मैं तो ब्रह्माकुमारी बन गई, पवित्र आत्मा बन गई- अपनी उन्नति में, अपनी प्राप्ति में, अपने प्रति सन्तुष्टता में राज़ी होकर चल रहे हैं, यह बाप समान बेहद की वृत्ति रखने की स्थिति नहीं है। (अ.वा.27.3.83 पृ.98 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 कुमारी और कुमार को शादी करनी ही नहीं चाहिए, नहीं तो वह भी गृहस्थी हो पड़ेंगे। कुछ गंधर्वी विवाह का नाम भी है। .........वास्तव में मार भी सहन करनी चाहिए। मर जाना चाहिए; परन्तु अधर कन्या कभी नहीं बनना चाहिए। बाल-ब्रह्मचारी का नाम बहुत होता है। शादी की माना हाफ पार्टनर हो गई। कुमारी को कहा जाता है तुम तो पवित्र बनो। गृहस्थ-व्यवहार वालों को कहा जाता है गृहस्थ-व्यवहार में रहते कमल-फूल के समान रहो। उन्हों को ही मेहनत होती है। शादी न करने से बन्धन न रहेगा। कन्या को तो पढ़ना ही है और ज्ञान में बहुत मजबूत रहना है। (मु.ता.11.6.71 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 बहुत कुमारियाँ भी बड़ी गन्दी होती हैं। कितना भी समझाओ, समझती नहीं। बस, मूत पीने की ही तात लगी रहती है। काट(काम)-कटारी चलावे, मूत पीवे, वही चिन्तन चलता रहता है। ऐसे-2 भी हैं। .........हनीमून करने जाते हैं। काम-कटारी चलाने जाते हैं। ......सुनते हैं तो दिल होती है हम भी काला मुँह करें। (मु.ता.21.4.69 पृ.2 अंत, 3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 बाबा दिन-प्रतिदिन कड़े-2 अक्षर देते रहते हैं। लौकिक बाप भी समझाते हैं, शादी ना करो, काला मुँह हो जावेगा। तो बाप को भी जवाब दे देते हैं- काला मुँह कर, जल कर खतम हो जावेंगे। (मु.ता.21.4.69 पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
 आजकल तो इसके पिछाड़ी पाण(प्राण) भी दे देते हैं। कोई की किसके साथ दिल होती है, तो शादी नहीं कराई जाती है तो बस, घर में ही हंगामा मचा देते हैं। यह है ही गन्दी दुनिया। (मु.ता.21.4.69 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 कुमारियों को भी बाबा कहते हैं शादी तो बरबादी हो जावेगी। इस गटर में मत गिरो। क्या तुम बाप का भी नहीं मानेंगी? स्वर्ग की महारानी नहीं बनेंगी? अपने साथ प्रण करना चाहिए कि हम उस दुनिया में कब नहीं जावेंगी। उस दुनिया को याद भी नहीं करूँगी। शमशान को कभी याद करते हैं क्या? (मु.ता.4.3.75 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 कुमारियों को तो संगदोष से बहुत बचना है। बाप आए ही हैं एक/दो को खून करने से बचाने। काम-कटारी से एक/दो का खून करते हैं ना। बाप कहते हैं इस पतितपने से तुम आदि, मध्य, अंत दुःख पाते हो। (मु.ता.1.3.75 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 बोलो, हमको गटर में जाना न है। हमारी शादी के लिए पैसे तो निकाले ही होंगे। वह इस रूहानी सेवा में लगाओ। सेन्टर खोल कर दो। बाबा तो कन्याओं को देख बहुत खुश होते हैं कि यह बहुतों का कल्याण कर दिखावेंगी तो जन्म-जन्मांतर (के) लिए बहुत बड़ा ऊँच पद पावेंगी। (मु.ता.27.1.75पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 बाप निर्विकारी बनाते हैं तो कई बच्चियाँ बिल्कुल मजबूत हो जाती हैं- बस, हमको तो निर्विकारी बनना है। हम अकेली थी, अकेले ही जाना है। उनको कोई थोड़ा टच करेगा तो भी अच्छा न लगेगा। कहेंगी, यह हमको हाथ क्यों लगाते हैं? इनमें विकारी बास है। विकारी हमको टच भी न करे। इस मंज़िल पर पहुँचना है। .........वह कर्मातीत अवस्था पिछाड़ी में आवेगी। अभी ऐसा नहीं है कि सिर्फ आत्मा को ही देखते हैं। (मु.ता.27.6.74 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 50-100 रुपया देते हैं सिर्फ बाल बनाने लिए। इसको कहा जाता अति देह-अभिमान। वह फिर कब ज्ञान उठा न सके। बाबा कहते हैं बिल्कुल सिम्पुल बनो। ऊँची साड़ी पहनने से देह-अभिमान आता है। हमको वायल की साड़ी पहनी हुई है। देह-अभिमान तोड़ने लिए सब हल्का कर देना चाहिए। अच्छी चीज़ देह-अभिमान में लाती है। (मु.ता.6.7.75 पृ.3 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
 कुमारियाँ सदा ही पवित्र मानी जाती हैं। कुमारियों के पवित्रता की महिमा 100 ब्राह्मणों से भी ज़्यादा है। .........जब तक कुमारी है तब तक उसके पाँव पड़ते हैं और जब कुमारी शादी करती है तो उसी दिन सबके पाँव पड़ने लगती है। ...............सच्ची फ्रैण्ड हो ना! बाप ऐसा फ्रैण्ड मिला है जो कोई भी बात करो; लेकिन दिलाराम तक ही रहेगी। .........सारे विश्व में आकर्षण करने वाला बाप ही अनुभव होता है ना! .........कोई टी.वी. तो नहीं देखती हो? फिल्म तो नहीं देखती? अगर वह फिल्म देखी तो यह फिल्म ख़त्म। ......यह गृहस्थी जीवन के झंझट बाहर से दिखाई नहीं देते हैं; लेकिन अंदर बहुत बंधन है। ...इसलिए कुमारियाँ ऐसे बंधनों से बच गईं। (अ.वा.21.3.85 पृ.260 मध्य, 261 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 कुमारी है, कोई कुमार को याद किया तो कब मन शांत न होगा। बुद्धि चलती रहेगी। उसकी याद आती रहेगी। बाप समझाते हैं यह 5 भूत कम नहीं हैं। कहा जाता है इनमें भूतों की प्रवेशता है। (मु.ता.1.3.78 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 गृहस्थी जीवन है ही बकरी समान जीवन; कुमारी जीवन है पूज्य जीवन। अगर कोई एक बार भी गिरा तो गिरने से हड्डी टूट जाती है ना। .....टेस्ट करके फिर समझदार नहीं बनना। (अ.वा.26.1.88 पृ.236 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 रूहानी कुमारियाँ ही बाप के साथ रह सकतीं। .........जब एक बार अनुभव कर लिया कि बाप क्या और माया क्या! तो एक बार के अनुभवी कभी भी धोखे में नहीं आ सकते। माया भिन्न-2 रूप में आती है। कपड़ों के रूप में आएगी, माँ-बाप के मोह के रूप में आएगी, सिनेमा के रूप में आएगी, घूमने-फिरने के रूप में आएगी। माया कहेगी, यह कुमारियाँ हमारी बनें, बाप कहेंगे- हमारी बनें। तो क्या करेंगी? (अ.वा.9.5.84 पृ.304 अंत, 305 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 विशेष कुमारियों को शीतला नहीं बनना है, काली बनना है। शीतला भी किस रूप में बनना है, वह अर्थ भी तो समझती हो; लेकिन जब सर्विस पर हो, कर्तव्य पर हो तो काली रूप चाहिए। काली रूप होंगी तो कभी भी किस पर बलि नहीं चढ़ेंगी; लेकिन अनेकों को अपने ऊपर बलि चढ़ावेंगी। (अ.वा.28.5.70 पृ.255 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 कई बच्चियाँ लिखती हैं कि शादी के लिए बहुत तंग करते हैं, क्या करें? जो मजबूत सेन्सीबुल बच्चियाँ होंगी वो कब ऐसे लिखेंगी नहीं। लिखती हैं तो बाबा समझ जाते हैं कि कोई रीढ़-बकरी है। यह तो अपने ही हाथ में है जीवन को बचाना। (मु.ता.23.9.70 पृ.3 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
 कुमारियाँ अगर जिद पर रहें कि हम शादी करना नहीं चाहते तो गवर्मेन्ट कुछ कर नहीं सकती। समझा सकते हैं, हम ससुर घर जावें ही क्यों जो पुजारी बन सबके आगे झुकना पड़े! मैं कुमारी हूँ तो सब मेरे आगे सिर झुकाते हैं। तो हम क्यों न पूज्य रहें! (मु.ता.7.11.73 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 कुमारियाँ भी पतित बन पड़ती हैं। दोनों पतित बनते हैं। दोनों की दिल होती है तब ताली बजती है। अगर अपनी हिम्मत हो तो रड़ी ऐसे करे जो वह एकदम भाग जाए। (मु.ता.4.3.69 पृ.4 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 अब बाप कहते हैं इन कन्याओं द्वारा उद्धार कराऊँगा। कन्या का गायन है। कुमारी वह जो पियर और ससुर घर का 21 जन्मों लिए उद्धार करे। तुम इस (समय) कन्याएँ बनती हो ना। माताएँ भी कुमारी बन जाती है। .....कुमारियों ने कमाल की है। बाबा ने ही कुमारियों को उठाया है। ..............देखते हो पवित्रता में सुख भी है तो मान भी है। (मु.ता.6.3.73 पृ.2 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
 कुमारियों सेः- जब बाप मिल गया तो सर्व सम्बन्ध एक बाप से सदा हैं ही। पहले कहने मात्र थे, अभी प्रैक्टिकल हैं। भक्तिमार्ग में भी गायन ज़रूर करते थे कि सर्व सम्बन्ध बाप से हैं; लेकिन अब प्रैक्टिकल सर्व सम्बन्धों का रस बाप द्वारा मिलता है। ऐसे अनुभव करने वाली हो ना! जब सर्व रस एक बाप द्वारा मिलता है तो और कहाँ भी संकल्प जा नहीं सकता। (अ.वा.19.12.84 पृ.77 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 कुमारों का सदा प्योर और सतोगुणी रहने का यादगार कौन-सा है, मालूम है? सनतकुमार। उन्हों की विशेषता क्या दिखाते हैं? उन्हों को सदैव छोटा कुमार रूप ही दिखाते हैं। कहते हैं, उन्हों की सदैव 5 वर्ष की आयु रहती है। यह प्यूरिटी का गायन है। जैसे 5 वर्ष का छोटा बच्चा बिल्कुल प्योर रहता है ना। सम्बन्धों के आकर्षण से दूर रहता है। भल कितना भी लौकिक परिवार हो; लेकिन स्थित (स्थिति) ऐसी हो जैसे छोटा बच्चा प्योर होता है। वैसे ही प्योरिटी का यह यादगार है। कुमार अर्थात् पवित्र अवस्था। उसमें भी सिर्फ एक नहीं, संगठन दिखलाया है। दृष्टान्त में तो थोड़े ही दिखाए जाते हैं। तो यह आप लोगों का संगठन प्योरिटी का यादगार है। ऐसी प्योरिटी होती, जिसमें अपवित्रता का संकल्प वा अनुभव ही नहीं हो। (अ.वा.11.3.71 पृ.41 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 सीता और रावण का खिलौना देखा है ना! रावण के तरफ सीता क्या करती है? पीठ करती है ना! अगर पीठ कर लिया तो सहज ही उनके आकर्षण से बच जाएँगे। ......तो कुमारों को यह खिलौना सामने रखना चाहिए। माया की तरफ मुँह कर लेते हैं। (अ.वा.11.3.71 पृ.41 आदि -मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 सदैव हरेक नारी शरीरधारी आत्मा को शक्ति रूप, जगत माता का रूप, देवी का रूप देखना- यह है दिव्य नेत्र से देखना। कुमारी है, माता है, बहन है, सेवाधारी निमित्त शिक्षक है; लेकिन है कौन? शक्ति रूप। बहन-भाई के सम्बन्ध में भी कभी-2 वृत्ति और दृष्टि चंचल हो जाती है। इसलिए सदा शक्ति रूप हैं। शिव शक्ति हैं। शक्ति के आगे अगर कोई आसुरी वृत्ति से आते तो उनका क्या हाल होता है, वह तो जानते हो ना! हमारी टीचर नहीं, शिव शक्ति है। ईश्वरीय बहन है, इससे भी ऊपर सदा शिव शक्ति रूप देखो। (अ.वा.27.4.83 पृ.166 अंत, 167 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 कोई भी कर्मेन्द्रियाँ अपने बन्धन में नहीं बाँधे, इसको कहा जाता है- साक्षी। .....कभी आँख भी धोखा न दे। शारीरिक सम्बन्ध में आना अर्थात् आँख का धोखा खाना। तो कोई भी कर्मेन्द्रिय धोखा न दे। ..................सदा यह याद रखो कि हमारे ऊपर बहुत बड़ी ज़िम्मेवारी है। एक कमज़ोर तो एक के पीछे एक का सम्बन्ध है। (अ.वा.9.5.83 पृ.190 अंत, 191 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 कुमार सदा अपने को बाप के साथी समझते हो? ......वैसे भी जीवन में सदा कोई न कोई साथी बनाते हैं। ......ऐसा सच्चा साथी कभी भी मिल नहीं सकता। कितना भी प्यारा साथी हो; लेकिन देहधारी साथी सदा का साथ नहीं निभा सकते और यह रूहानी सच्चा साथी सदा साथ निभाने वाले हैं। तो कुमार अकेले हो या कम्बाइण्ड हो? फिर और किसको साथी बनाने का संकल्प तो नहीं आता है? कभी कोई मुश्किलात आए, बीमारी आए, खाना बनाने की मुश्किल हो तो साथी बनाने का संकल्प आएगा या नहीं? कभी भी ऐसा संकल्प आए तो इसे व्यर्थ संकल्प समझ सदा के लिए सेकेण्ड में समाप्त कर लेना; क्योंकि जिसे आज साथी समझकर साथी बनाएँगे, कल उसका क्या भरोसा! इसलिए विनाशी साथी बनाने से फायदा ही क्या! तो सदा कम्बाइण्ड समझने से और संकल्प समाप्त हो जाएँगे; क्योंकि सर्वशक्तिवान साथी है। (अ.वा.8.4.82 पृ.360 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 ब्रह्माकुमार का अर्थ ही है सदा प्यूरिटी की पर्सनैलिटी और रॉयल्टी में रहना। .....और यही प्युरिटी की रॉयल्टी धर्मराजपुरी की रॉयल्टी देने से छुड़ाएगी। ........जो भी देखे, हरेक ब्रह्माकुमार और कुमारी से यह पर्सनैलिटी अनुभव करे। शरीर की पर्सनैलिटी, वह तो आत्माओं को देहभान में लाती है और प्युरिटी की पर्सनैलिटी देही-अभिमानी बनाए बाप के समीप लाती है। तो विशेष कुमार ग्रुप को अब क्या सेवा करनी है? ........अनुभव कराओ कि ब्रह्माकुमार अर्थात् वृत्ति, दृष्टि, कृति और वाणी परिवर्तन। साथ-2 प्युरिटी की पर्सनैलिटी, रूहानी रॉयल्टी का अनुभव कराओ। आते ही, मिलते ही इस पर्सनैलिटी की ओर आकर्षित हों। सदा बाप का परिचय देने वाले वा बाप का साक्षात्कार कराने वाले रूहानी दर्पण बन जाओ, जिस चित्र और चरित्र से सर्व को बाप ही दिखाई दे। किसने बनाया? बनाने वाला सदा दिखाई दे। .........कुमार ग्रुप गवर्मेन्ट को भी अपने परिवर्तन द्वारा प्रभु परिचय दे सकते हो। गवर्मेन्ट को भी जगा सकते हो; लेकिन वह परीक्षा लेंगे। ऐसे ही नहीं मानेंगे। तो ऐसे कुमार तैयार हैं? गुप्त सी.आई.डी. आपके भी पेपर लेंगे कि कहाँ तक विकारों पर विजयी बने हैं। ......सभी सोच रहे हैं पता नहीं कौन-से सी.आई.डी. आएँगे! जान-बूझकर क्रोध दिलाएँगे। पेपर तो प्रैक्टिकल लेंगे ना! प्रैक्टिकल पेपर देने लिए तैयार हो? (अ.वा.24.4.83 पृ.162 आदि, 163 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 कुमार जीवन में बाप का बनना- कितने भाग्य की निशानी है! ऐसे अनुभव करते हो कि हम कितने बन्धनों में जाने से बच गए? .....देह के भान का भी बन्धन न हो। इस देह के भान से सब बन्धन आ जाते हैं। तो सदा अपने को आत्मा भाई-2 हैं- ऐसे ही समझकर चलते रहो। इसी स्मृति से कुमार जीवन सदा निर्विघ्न आगे बढ़ सकती है। संकल्प वा स्वप्न में भी कोई कमज़ोरी न हो, इसको कहा जाता है- विघ्न-विनाशक। (अ.वा.8.4.82 पृ.359 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 कुमार जीवन श्रेष्ठ जीवन है; क्योंकि पवित्र जीवन है और जहाँ पवित्रता है वहाँ महानता है। कुमार अर्थात् शक्तिशाली, जो संकल्प करें वह कर सकते हैं। ......स्वयं भी पवित्र रह, औरों को भी पवित्र रहने का महत्व बता सकते हो। ऐसी सेवा के निमित्त बन सकते हो। जो दुनिया वाले असम्भव समझते हैं वह ब्रह्माकुमार चैलेंज करते हैं- तो हमारे जैसा पावन कोई हो नहीं सकता, क्यों? क्योंकि बनाने वाला सर्वशक्तिवान है। दुनिया वाले कितना भी प्रयत्न करते हैं; लेकिन आप जैसे पावन बन नहीं सकते। आप सहज ही पावन बन गए। सहज लगता है ना? ........कुमारों की परिभाषा ही है चैलेंज करने वाले, परिवर्तन कर दिखाने वाले, असम्भव को सम्भव करने वाले। दुनिया वाले अपने साथियों को संग के दोष में ले जाते हैं और आप बाप के संग में ले जाते हो। उन्हें अपना संग नहीं लगाते, बाप के संग का रंग लगाते हो, बाप समान बनाते हो। (अ.वा.30.1.88 पृ.241 अंत, 242 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 अगर कुमार निर्विघ्न कुमार हैं, तो ऐसे कुमार बहुत महान गाए जाते हैं; क्योंकि दुनिया वाले भी कुमारियों के बजाय कुमारों के लिए समझते हैं कि कुमार योग्य बन जाएँ- यह मुश्किल है। .........कुमार, कुमारियों से भी नम्बर आगे जा सकते हैं; लेकिन निर्विघ्न कुमार हों; क्योंकि कुमारों को बहुत करके यही विघ्न आता है कि कोई साथी नहीं है, कोई साथी चाहिए, कम्पैनियन चाहिए। तो किसी न किसी रीति से अपनी कम्पनी बना देते हैं। कोई-2 कुमार तो कम्पैनियन भी बना देते हैं और कोई कम्पनी में आते हैं- बातचीत करना, बैठना, फिर कम्पैनियन बनाने का भी संकल्प आता है; लेकिन ऐसे भी कुमार हैं जो बाप के सिवाय न कम्पनी बनाने वाले हैं, न कम्पैनियन बनाने वाले हैं। सदा बाप की कम्पनी में रहने वाले कुमार सदा सुखी रहते हैं। .....सारा परिवार कम्पनी है, फिर तो ठीक; लेकिन दो-तीन या एक कोई कम्पनी चाहिए, वह राँग है। .....आख़िर तो विश्व को अपने आगे, बाप के आगे झुकाना तो है ना! ........कुमारी मैजॉरिटी फिर भी सेवा की कम्पनी में रहती है; लेकिन कुमारों को थोड़ा-सा कम्पनी का संकल्प आता है, तो पाण्डव भवन बनाकर सफल रहें, ऐसा कोई करके दिखाओ; लेकिन आज पाण्डव भवन बनाओ और कल पाण्डव एक ईस्ट में चला जाए, एक वेस्ट में चला जाए- ऐसा पाण्डव भवन नहीं बनाना। बापदादा को कुमारों के ऊपर विशेष नाज है कि अकेले रहते भी पुरुषार्थ में चल रहे हैं। कुमार आपस में दो-तीन साथी बनकर क्यों नहीं चलते! साथी सिर्फ फीमेल ही नहीं चाहिए, दो कुमार भी रह सकते हैं; लेकिन एक/दो के निर्विघ्न साथी होकर रहें। (अ.वा.27.11.89 पृ.46 मध्य, 47 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 गृहस्थ-व्यवहार में रहते हुए- इसका मतलब यह नहीं कि कोई को गृहस्थ न है तो ज़रूरी जाना ही पड़े। नहीं, व्यवहार तो ज़रूर चाहिए। सबको शरीर निर्वाह ज़रूर करना है। इसके लिए प्रबन्ध करना चाहिए। गृहस्थ में जाने से फिर बच्चों आदि में मोह पड़ जाता है। गृहस्थ में जो गए हैं उनको भी शरीर निर्वाह करना है। फिर कमल-फूल समान पवित्र रहना है। बुद्धि (कहीं) और तरफ न जाए। एक बाप को ही याद करना है; क्योंकि बाप के पास वापिस जाना है। अभी विकार की सीढ़ी चढ़नी न है। गन्धर्वी विवाह का जो गायन है, वह तो बचाने लिए कराया जाता है; क्योंकि बहुत सताते हैं। मनुष्य फिर कहते हैं, शादी बिगर सिजरे का नाम कौन निकालेगा? अभी बाप कहते हैं- पतित मनुष्य सिजरे की अब दरकार नहीं है। अब तो पावन सिजरा चाहिए। (मु.ता.28.11.73 पृ.2 अंत, 3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 गृहस्थ में रहने वाले भी बहुत होते हैं जो शादी करना पसन्द नहीं करते हैं, झंझट समझते हैं। शादी करना, फिर बाल-बच्चे आदि सम्भालना- ऐसी जाल फैलाएँ ही क्यों जो खुद ही फँस पड़ें! ऐसे बहुत यहाँ भी आते हैं। 40 साल हो गए ब्रह्मचारी रहते। इसके बाद क्या शादी करेंगे? स्वतन्त्र रहना पसन्द करते हैं। तो बाप उनको देख खुश होते हैं। समझते हैं, यह तो है ही बंधनमुक्त। बाकी रहा शरीर का बंधन। उसमें देह सहित सबको भूलने का होता है। (मु.ता.11.7.84 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 कुमार और कुमारियाँ तो हैं ही पवित्र। उन्हों को फिर समझाया जाता है ऐसे गृहस्थ में फिर जाना नहीं है जो फिर पवित्र होने का पुरुषार्थ करना पड़े। ........बैचलर्स(कुमार) तो सब धर्मों में बहुत रहते हैं; परन्तु सेफ्टी से रहना ज़रा मुश्किल होता है। फिर भी रावण राज्य में रहते हैं ना। विलायत में भी ऐसे बहुत मनुष्य शादी नहीं करते हैं। फिर पिछाड़ी में कर लेते हैं कम्पैनियनशिप के लिए। क्रिमिनल आई से नहीं करते हैं। (मु.ता.19.9.84 पृ.2 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
 ईश्वरीय राह पर चलने वाले यहाँ का कोई भी मर्तबा नहीं लेंगे। अगर कोई कहते हैं मैं शादी करता हूँ तो आसुरी राह पर चलने वाला हो गया। बाप तो तुमको ले जाते हैं बहिस्त में, फिर अगर दोज़ख की याद आई, गटर में जाकर पड़े तो उनको कहेंगे डर्टी ब्रूट्स। तुमको तो दैवी परिवार का बनना है। गटर में जाने की कब आस भी न रखना है। (मु.ता.27.1.75 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 तुम्हारे पास गन्धर्वी विवाह करते हैं, फिर भी दूसरे दिन खेल खलास कर देते। देरी थोड़े ही लगती है; क्योंकि स्त्री है माया का रूप। कितनी कशिश करती है! दोनों बिगर तो दुनिया नहीं चल सकती। तो भी पवित्र बनने का पुरुषार्थ इस समय ही होता है। (मु.ता.18.7.89 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 कोई भी कर्म-इन्द्रिय अपने तरफ आकर्षित न करे, सदा बाप की तरफ आकर्षित रहें। किसी भी व्यक्ति व वस्तु की तरफ आकर्षण न जाए। ऐसे राज्य अधिकारी तपस्वी कुमार हो? बिल्कुल विजयी; क्योंकि वायुमण्डल तो कलियुगी है ना और साथ भी हंस और बगुलों का है। ऐसे वातावरण में रहते हुए स्वराज्यधारी (स्वराज्य अधिकारी) होंगे तब सेफ रहेंगे। ज़रा भी दुनिया के वायब्रेशन की आकर्षण न हो। (अ.वा.29.10.81 पृ.94 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 सिर्फ कुमारों को एक बात अटेन्शन में रखनी है- सदा अपने को बिज़ी रखो, खाली नहीं। शरीर और बुद्धि दोनों से बिज़ी रहो। ......जैसे कर्म की दिनचर्या सेट करते हो ऐसे बुद्धि की भी दिनचर्या सेट करो। .....बिज़ी रहने वाले को किसी भी रूप से माया वार नहीं कर सकती। (अ.वा.11.5.83 पृ.199 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 अपने हाथ से भोजन बनाना बहुत अच्छा है। अपने लिए और बाप के लिए प्यार से बनाओ। पहले बाप को खिलाओ। ........कुमारों का आपस में ग्रुप होना चाहिए। कभी कोई बीमार पड़े तो एक की ड्यूटी हो। एक-दूसरे की मदद कर सेवा करो। कभी भी पूँछ लगाने का संकल्प नहीं करना, नहीं तो बहुत परेशान हो जाएँगे। बाहर से तो पता नहीं चलता; लेकिन अगर लगा दिया तो मुश्किल हो जाएगी। अभी तो स्वतंत्र हो, फिर ज़िम्मेवारी बढ़ जाएगी। सभी ने बाप को कम्पैनियन बनाया है ना? तो एक कम्पेनियन छोड़कर दूसरा बनाया जाता है क्या? ये तो लौकिक में भी अच्छा नहीं माना जाता। (अ.वा.30.11.79 पृ.67 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 अगर सिर्फ कुमार रहेंगे तो माया आएगी, ब्रह्माकुमार रहेंगे तो माया भाग जाएगी। तो जैसे ब्रह्मा आदि देव है, ब्रह्माकुमार भी आदि रत्न होंगे। आदि देव के बच्चे मास्टर आदि देव। आदि रत्न समझेंगे तो अपने जीवन के मूल्य को जानेंगे। (अ.वा.30.11.79 पृ.66 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 कुमारियों को कहते हैं 100 ब्राह्मणों से उत्तम एक कन्या और कुमार कितनों से श्रेष्ठ हैं? सात शीतलाओं के साथ एक कुमार दिखाते हैं तो आप 700 ब्राह्मणों से उत्तम हुए। .........माया कितना भी हिलाने की कोशिश करे; लेकिन आप अंगद के मुआफिक ज़रा भी नहीं हिलो, नाखून से भी हिला न सके। (अ.वा.30.11.79 पृ.68 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 कुमारों का चित्र सदा बाप के साथ रहने का दिखाया है, तुम्हीं से खेलूँ, तुम्हीं से खाऊँ- यह चित्र देखा है सखे रूप से। (अ.वा.1.12.78 पृ.91 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 यह भी पूछना है, कब से पवित्र रहते हो? अगर जवान लड़का है, कहते हैं 6 मास से पवित्र हैं। विश्वास नहीं करना चाहिए। विषय सागर में गिर पड़ते हैं। .....घड़ी-2 कशिश होती है। (मु.ता.20.3.74 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 शादी नहीं करते हो तो उनको घर से निकाल देते हैं। कहते हैं, कसाई बनो तो हमारे कुल में रहो, नहीं तो निकल जाओ। (मु.ता.13.4.69 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
पवित्रता- माताओं के संदर्भ मेंशिव भगवानुवाच्य माताएँ स्वर्ग का द्वार हैं और शंकराचार्यवाच्य नारी नर्क का द्वार खोलती हैं। तुम ब्राह्मणियाँ बन सबको स्वर्ग का द्वार दिखाती हो। (मु.ता.26.5.74 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 कलियुगी मनुष्यों की रसम-रिवाज़ ही अलग। इन्हों का है विषय सागर में गोता खाना। यह विष खाना तो मीरा को भी पसन्द नहीं था। अभी तुम कितनी मीराएँ हो! वह तो एक मीरा थी। अब तुम सब मीराएँ हो। कलियुगी लोक-लाज, कुल मर्यादा पसन्द नहीं करती हो। तुम कलियुगी लोक-लाज छोड़ती हो तो झगड़ा कितना होता है। तुमको बाप ने श्रीमत दी है- काम महाशत्रु है। (मु.ता.11.6.74 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 कोई-2 बड़े अच्छे फूल लाते हैं। तड़फते हैं बाबा पास जावें। कैसे-2 युक्तियों से बच्चियाँ आती हैं। ......घर में मार खाती हैं तो भी कहतीं- शिवबाबा, हमारी रक्षा करो। उनको ही सच्ची द्रौपदी कहा जाता है। पास्ट जो हो गया सो फिर रिपीट होना है। कल पुकारा था न! आज बाबा आए हैं बचाने लिए। युक्तियाँ बतलाते हैं, ऐसे-2 भूँ-2 करो। तुम हो ब्राह्मणी। वह पति है कीड़ा। उनपर भूँ-2 करते रहो। बोलो, भगवानुवाच्य- काम महाशत्रु है। उनको जीतने से हम विश्व का मालिक बनते हैं। कोई न कोई समय अबलाओं के वाक्य लग जाते हैं तो फिर ठण्डे हो जाते हैं। कहते- अच्छा, भल जाओ। ऐसा बनाने वाले पास जाओ। मेरी तकदीर में नहीं है, तुम तो जाओ। ऐसे बहुत द्रौपदियाँ पुकारती हैं। बाबा लिखते हैं- भूँ-2 करो। कोई-2 स्त्रियाँ भी ऐसी होती हैं जिनको सूपनखा-पूतना कहा जाता है, फिर पुरुष उनको भूँ-2 करते हैं। वह कीड़ा बन पड़ती हैं। विकार बिगर रह नहीं सकती हैं। दुःशासन निर्विकारी और द्रौपदी विकारी पूतना बन पड़ती है। ऐसे भी होता है। ..........कोई कहती हैं, पति मर गया है, फिर भी दृष्टि दूसरे तरफ जाती है। चाचा मिला, मामा मिला, गुरु मिला, जो आया उनसे काला मुँह कर देतीं वा चेष्टा रखती हैं, जिसको बाबा सेमी कहते हैं। बाप कहते हैं, विकारी जो बनते हैं उनका काला मुँह होता है। पतित माना काला मुँह। (मु.ता.16.7.74 पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
 कलंकीधर बनने वालों पर कलंक भी लगते हैं। इसमें नाराज़ न होना चाहिए। अख़बार वाले कुछ भी खिलाफ डालते हैं; क्योंकि पवित्रता की बात है। अबलाओं पर अत्याचार होंगे। कोई-2 माइयाँ भी ऐसे होती हैं डण्डा मारने (में) भी देरी नहीं करतीं पुरुषों को। कहेंगी, यह क्या करते हो? क्या सीखकर आए हो? सारी दुनिया कैसे चलती? तुम टेडे(टेढ़े) बन पड़े हो। अकासुर-बकासुर नाम भी हैं। स्त्रियों के भी नाम पूतना-सूपनखा है बरोबर। (मु.ता.10.8.79 पृ.2 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
 बड़े ते बड़ी चोट है काम विकार की। इसलिए कहा जाता है काम महाशत्रु है। यही पतित बनाते हैं। काम के ऊपर ही सारी कहानी है। स्त्री को भगाते हैं कामी पुरुष, नहीं तो भगाकर क्या करेंगे! ऐसे नहीं कि श्रीकृष्ण ने कोई काम के लिए भगाया। ......झगड़ा होता ही है विकार पर। विकार के लिए न छोड़ेंगे तो ज़रूर कहेंगे, इससे तो बर्तन साफ करें, वह अच्छा है। पोंछा-झाड़ू लगावेंगे; परन्तु पवित्र रहेंगे। इसमें हिम्मत बहुत चाहिए। जब कोई बाप की शरण में आते हैं तो फिर माया भी लड़ने शुरू करती है। पाँच विकारों की बीमारी और ही अधिक उथलती है। पहले तो पक्का निश्चय बुद्धि होना है। जीते जी मरना है। (मु.ता.6.8.76 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 अबलाओं पर अत्याचार होते हैं यह भी गायन है। विष के कारण बहुत मार खाती हैं। बहुत पाप-आत्माएँ हैं। कोई-2 स्त्रियाँ भी ऐसी हैं जो विष के लिए पति को तंग करती हैं। (मु.ता.5.11.74 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 वह पति, जो विख पिलाते हैं, उनको कितना याद करते हैं और यहाँ बाप, जो अमृत पिलाते हैं, कौड़ी से हीरा बनाते हैं, उनको याद नहीं करते। ऐसे बाप को तो कितना याद करना चाहिए। (मु.ता.9.4.72 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 बाप कहते हैं ड्रामा अनुसार तुम बाँधेली गाई हुई हो। अबलाओं पर अत्याचार होते ही इस विख पर हैं। ड्रामा अनुसार यह भी होना है। मार खा-खाकर आख़िर आकर शरण लेती हैं ब्रह्माकुमारियों की। तुम जानते हो शिवबाबा की शरण ले(नी) होती है। सबसे समर्थ वह है। (मु.ता.5.8.71 पृ.4 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 काम का भूत है बहुत कड़ा। एकदम काला मुँह कर देते हैं। क्रोध काला मुँह नहीं करता है। रावणराज्य में ही यह विकार रूपी सर्प डँसता है। स्त्री को नागिन कहते हैं। खुद भी तो बड़े नाग हैं ना! यह भी बुद्धि में नहीं आता है- नाग बिगर नागिन कैसे कही जावेंगी। उन्होंने स्त्री का नाम बिगाड़ा है। अब फिर बाप नाम बाला करते हैं। शिवाचार्य कहते हैं, हम माताओं द्वारा स्वर्ग का द्वार खोलते हैं। शंकराचार्य कहते हैं, माताएँ नर्क का द्वार खोलती हैं। (मु.ता.9.8.71 पृ.4 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
 पवित्रता पर ही झगड़ा पड़ता है। अगर ज़बरदस्ती गंदा करते हैं तो क्या कर सकती हो! अच्छा, शिवबाबा को याद करती रहो। केस तो बहुत होते हैं ना! विघ्न तो बहुत पड़ेंगे। (मु.ता.18.12.71 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 रुद्र ज्ञान यज्ञ में अनेक प्रकार के असुरों के विघ्न पड़ेंगे। फिर मनुष्य समझते हैं, असुर लोग ऊपर से गोबर, गन्द आदि डालते थे; परन्तु नहीं। तुम देखते हो, कितने विघ्न पड़ते हैं! अबलाओं पर अत्याचार होते हैं तब तो पाप का घड़ा भरेगा। बाप कहते हैं, थोड़ा सहन करना पड़ेगा। तुम अपने बाप को और वर्से को याद करते रहो। मार खाने समय भी बुद्धि में यह याद करो- शिवबाबा। (मु.ता.2.6.71 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 माताओं के लिए तो बहुत खुशी की बात है; क्योंकि बाप आया ही है माताओं के लिए। गऊपाल बनकर गऊ माताओं के लिए आए हैं। इसी का तो यादगार गाया हुआ है। (अ.वा.15.1.83 पृ.54 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 बापदादा देख रहे थे कि मेरे बच्चों को पुरानी दुनिया में कितना सहन करना पड़ता है। आत्मा के लिए मौज़ों का समय है; लेकिन शरीर से सहन भी करना पड़ता है। ...भागवत आप सबके सहन शक्ति के चरित्रों का यादगार है। तो सहन करना नहीं; लेकिन यादगार चरित्र बन रहे हैं। अभी तक भी यही गायन सुन रहे हो कि भगवान के बच्चों ने बाप के मिलन के स्नेह में क्या-2 किया। गोपीवल्लभ के गोप-गोपिकाओं ने क्या-2 किया। तो यह सहन करना नहीं; लेकिन सहन (शक्ति वाले) ही शक्तिशाली बना रहे हैं। (अ.वा.19.5.83 पृ.214 आदि-अंत) मुरली प्रूफ देखें
 माताएँ तो बापदादा को अति प्रिय हैं; क्योंकि माताओं ने बहुत सहन किया है। तो बाप ऐसे बच्चों को सहन करने का फल सहयोग और स्नेह दे रहे हैं। सदा सुहागवती रहना। इस जीवन में कितना श्रेष्ठ सुहाग मिल गया है। जहाँ सुहाग है वहाँ भाग्य तो है ही। इसलिए सदा सुहागवती भव! (अ.वा.1.11.81 पृ.104 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 माताएँ वा बहनें भी सदा अपने शिवशक्ति स्वरूप में स्थित रहें। मेरा विशेष भाई, विशेष स्टूडेंट नहीं। (अ.वा.27.4.83 पृ.167 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 हरेक शक्ति द्वारा बाप प्रत्यक्ष हो जाए तभी जय-जयकार हो जाएगी। शक्तियों द्वारा बाप की प्रत्यक्षता हुई है तभी सदा शिव-शक्ति इकट्ठा दिखाया है। जो शिव की पूजा करेंगे वह शक्ति की ज़रूर करेंगे। बाप और शक्तियों का गहरा सम्बन्ध है; इसलिए पूजा साथ-2 होती है। शक्तियों ने बाप की प्रत्यक्षता का झण्डा लहराया है तभी तो पूजा होती है। (अ.वा.30.11.79 पृ.72 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 माताएँ गिरीं तो चरणों तक, चढ़ती हैं तो एकदम सिर का ताज। बहुत गिरा हुआ बहुत ऊँचा चढ़ जाए तो खुशी होगी ना! (अ.वा.30.11.79 पृ.73 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 शक्तियाँ अपने शक्ति रूप में आ गईं तो सभी को वायब्रेशन फैलता रहेगा। गृहस्थी में रहते ट्रस्टी होकर रहेंगी तो न्यारी रहेंगी। अपना और अन्य का जीवन सफल बनाने के निमित्त बनेंगे। सदा इसी नशे में रहो, हम कल्प पहले वाली गोपियाँ हैं। बाप मिला गोया सब कुछ मिला। कोई अप्राप्त वस्तु है ही नहीं। (अ.वा.30.11.79 पृ.73 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 द्रौपदी ने भी पुकारा है, यह दुःशासन हमको नगन करते हैं। यह भी खेल दिखाते हैं कि द्रौपदी को कृष्ण 21 साड़ियाँ देते हैं। (मु.ता.2.9.89 पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
 माताओं की मदद से बहुत नाम बाला हो सकता है। जितने आए हैं उतने सभी हैंड्स सर्विस में मददगार बन जाएँ तो बहुत जल्दी नाम बाला कर सकते हो; क्योंकि युगलमूर्त बन चलने वाली हो। इसलिए ऐसे युगल सर्विस में बहुत अपना शो कर सकते हो। ऐसे कर्तव्य करके दिखाओ जो आपके कर्तव्य हर आत्मा को आपकी तरफ आकर्षण करे। माताओं का ग्रुप सो भी ऐसी माताएँ जो कि युगल रूप में चल रही हैं, उनको समय निकालना सहज हो सकता है। .............जैसे एक-2 कुमारी 100 ब्राह्मणों से उत्तम गाई हुई है वैसे एक-2 माता जगतमाता है। कहाँ 100 ब्राह्मण, कहाँ सारा जगत! तो किसकी ऊँची महिमा हुई? एक-2 माता जगतमाता बनकर जगत की आत्माओं के ऊपर तरस, स्नेह और कल्याण की भावना रखो। (अ.वा.1.3.71 पृ.31 आदि, 32 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 बाप कहते हैं, माताओं का नाम बहुत बाला करना है। पुरुषों को इसमें मदद करनी चाहिए। यह पवित्र रहने चाहती हैं तो पवित्र रहने दो। बाप सिद्ध कर बतलाते हैं, नर्क का द्वार तो पुरुष बनते हैं। स्त्री का पति मर जाता है तो स्त्री विधवा बन जाती है। शादी भी नहीं करती। पुरुष तो दो-तीन शादियाँ भी कर लेते हैं। वह थोड़े ही पत्नीव्रता बनते हैं। तो जास्ती नर्क का द्वार कौन ठहरे? शास्त्रों में तो द्रौपदी को पाँच पति दिखाई(दिखाए) हैं। इससे भी कितना नुकसान कर दिया है। .....लम्पट पुरुष होते हैं। 4-5 स्त्रियाँ भी रखते हैं। पैसे वाले बड़े-2 आदमी बहुत गन्दे होते हैं। स्त्री कब दूसरा पुरुष नहीं करती। तो बाप आकर माताओं और कुमारियों को उठाते हैं। .....मनुष्य समझते हैं, विकार बिगर सृ मुरली प्रूफ देखें
 ष्टि कैसे बढ़ेगी! बाप कहते हैं, अब यह बिच्छू-टिण्डन वाली सृष्टि नहीं चाहिए। .......गवर्मेंट भी कहती है पैदाइश कम हो। ......माँ-बाप कुमारी को कंस के हवाले करते हैं कुसने लिए। .....कंस-जरासंधी, रावण आदि यह सब आसुरी नाम हैं। (मु.ता.6.3.73 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 माताओं का ही मुख्य नाम है। सन्यासियों का भी उद्धार माताओं को करना है। (मु.ता.7.3.73 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 त्रिया चरित्र तो मशहूर हैं। एक खेल है जिसमें दिखाया है- अपन को बचाने लिए स्त्री कितने चरित्र करती हैं। तुम बहुत युक्तियाँ कर सकती हो। भक्ति में बैठ जाओ। कहो- बाबा ने हमको साक्षात्कार कराया है, पतित दुनिया विनाश होने वाली है। हम वैकुण्ठ भी देखते हैं। बाप कहते हैं- ख़बरदार रहना! विष पिया तो दोजक(दोज़ख) चले जावेंगे; पवित्र बनेंगे तो पवित्र दुनिया का मालिक बनेंगे। मैंने तो अब प्रतिज्ञा की है। ऐसे-2 युक्ति से समझाना है- तुमको विष चाहिए तो भल दूसरी शादी कर लो। मुझे तो बाप से वर्सा लेना है; परन्तु पहले तो पक्की नष्टोमोहा वाली चाहिए। ऐसे नहीं फिर बच्चे आदि याद पड़ते रहें। ........जो तीखे होंगे वह तो कहेंगे- कुछ भी करो, मार डालो, हम पवित्र ज़रूर बनेंगे। भल बाहर जाकर गन्दा होता रहे। हम उनके पीछे क्यों अपनी जान गवाएँ! ......मार-मारकर मार दे, तुम शिवबाबा की याद में रहो। बाबा की याद में मर जाओ तो भी बेड़ा पार है। बोलो, तुम हमको सताते हो, हम गवर्मेंट को चिट्ठी लिखते हैं- हम भारत को पावन बनाने पवित्र बनती हैं, यह पवित्र रहने न देता है। (मु.ता.21.9.73 पृ.2 मध्य-अंत, 3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 अधर कुमारी, कुमारी कन्या का मंदिर भी है न। गृहस्थी से निकल कर फिर बाप के बच्चे बने हैं तो उन्हों को अधर कहा जाता है। (मु.ता.24.4.73 पृ.4 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 बच्चियाँ कहती हैं, हमको बहुत मारते हैं, तंग करते हैं। बाबा, आप अपनी शरण में लो; परन्तु इसमें भी बड़ी खिटपिट होती है। गवर्मेन्ट की खिटपिट होती है, फिर अख़बारों में धम-2 मचा देते हैं। तो बाँधेलियों को बंद कर देते हैं। इसलिए बड़ा खबरदारी से कदम उठाना है। एक के कारण बहुत बाँध हो जाती हैं। (मु.ता.20.3.74 पृ.4 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 बाप आ करके माताओं को गुरु पद देते हैं। (मु.ता.6.3.73 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 माता की महिमा है। सभी धर्म वालों के ऊपर माता होनी चाहिए। सभी को माँ जगदम्बा बैठ लोरी दे। बच्चे पैदा होते हैं माता द्वारा। जगदम्बा सभी की माता ठहरी। तुम सभी को उनके आगे सिर झुकाना है। माता समझा सकती है- यह भ्रष्टाचारी दुनिया श्रेष्ठाचारी कैसे बने वा इस भारत में शान्ति कैसे स्थापन हो। (मु.ता.11.1.72 पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
 कई बच्चियाँ बहुत याद करती हैं। शिवबाबा कहने से ही कई बच्चों को प्रेम का(के) आँसू आ जाते हैं- कब जाए मिलेंगे। देखा नहीं है तो भी तड़फते रहते हैं। (मु.ता.20.5.71 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 यह तो बाप जानते हैं विकार के लिए कितने झगड़े चलते हैं। विघ्न पड़ते हैं। कहते हैं- बाबा, हमको पवित्र रहने नहीं देते। बाप कहते हैं- अच्छा बच्चे, तुम याद की यात्रा में रह, जन्म-जन्मांतर के पाप जो सिर पर हैं वह बोझा उतारो। घर में बैठे शिवबाबा को याद करते रहो। (मु.ता.5.9.84 पृ.2 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
 बाबा कहते हैं, यह अत्याचार सहन करने पड़ेंगे बाबा के निमित्त। (मु.ता.20.9.92 पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
 वास्तव में बाप तो आकर माताओं का मर्तबा ऊँच करते हैं। गाया भी जाता है- पहले लक्ष्मी, पीछे नारायण। तो लक्ष्मी की इज़्ज़त जास्ती ठहरी। (मु.ता.19.12.71 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 माताओं को विशेष खुशी होनी चाहिए कि हमारे लिए खास बाप आए हैं। और जो भी आए, उन्होंने पुरुषों को आगे किया। धर्मपिताएँ धर्म स्थापन करके चले गए। माताओं को किसी ने भी नामी-ग्रामी नहीं बनाया और बाप ने “पहले माता” का सिलसिला स्थापन किया। तो माताएँ सिकीलधी हो गईं ना! कितने सिक से बाप ने ढूँढ़ा और अपना बना लिया। (अ.वा.11.5.83 पृ.201 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 जब से बापदादा ने माताओं के ऊपर नज़र डाली तब से दुनिया वालों ने भी “लेडीज़ फर्स्ट” का नारा ज़रूर लगाया। (अ.वा.21.3.83 पृ.96 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 माताओं का एक अभ्यास होता है, उस अभ्यास को पक्का करने के लिए बुलाया है। वो कौन-सा अभ्यास है जो कुमारियों में नहीं, माताओं में होता है? सती बनने का। सती बनना अर्थात् पूरा ही बलि चढ़ना। सती बनने का मुख्य गुण क्या होता है? लगन लगाए बैठी होती है। .....सती बनने के लिए त्याग भी चाहिए। नष्टमोहा चाहिए। (अ.वा.15.9.69 पृ.104 आदि) मुरली प्रूफ देखें
पवित्रता-गृहस्थियों के संदर्भ मेंघर मन्दिर लगे, गृहस्थी नहीं। जैसे मन्दिर का वायुमण्डल सबको आकर्षित करता, ऐसे आपके घर से पवित्रता की खुशबू आए। जिस प्रकार अगरबत्ती की खुशबू चारों ओर फैलती, इसी प्रकार पवित्रता की खुशबू दूर-2 तक फैलनी चाहिए, इसको कहा जाता है पवित्र प्रवृत्ति। (अ.वा.17.10.81 पृ.48 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 अपनी विशेषता को जानते हो? इस ग्रुप की विशेषता क्या है? यह ग्रुप सन्यासी, महात्माओं को भी नीचे झुकाने वाला है। सन्यासी अर्थात् आजकल की महान आत्माएँ। तो आजकल के महात्मा कहलाने वालों को भी अपने जीवन द्वारा बाप का परिचय दिलाने वाले हो। ............सभी की गाड़ी दो पहिये वाली ठीक चल रही है ना? कभी कोई पहिया नीचे-ऊपर तो नहीं होता? एक पहिया आगे चले, दूसरा पीछे, ऐसे तो नहीं होता! आप सबकी यही विशषता हो- जो एक/दो से आगे भी रहो और एक/दो को आगे करने वाले भी। एक/दो को आगे रखना ही आगे होना है। ऐसे नहीं, मैं पुरुष हूँ और वह समझे, मैं शक्ति हूँ। अगर आप शक्ति हो तो वह पाण्डव भी कम नहीं, तो शक्तियाँ भी कम नहीं। दोनों ही बाप के सहयोगी हैं; इसलिए पाण्डव आगे हैं या शक्तियाँ आगे हैं, यह भी नहीं कह सकते। शक्तियों को ढाल इसीलिए कहते हैं; क्योंकि वह अपने को बहुत समय से नीचे समझती हैं; इसलिए नशा चढ़ाने के लिए आगे रखा है। शक्तियों को आगे रखने में ही पाण्डवों को फायदा है। शक्ति पीछे रहेगी तो आपको भी पीछे खींच लेंगी; क्योंकि शक्तियों में आकर्षण करने की शक्ति ज़्यादा होती है। इसलिए शक्तियों को आगे रखना ही आपका आगे होना है। (अ.वा.29.10.81 पृ.92 मध्य-अंत, 93 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 प्रवृत्ति में रहते भी सदा देह के सम्बन्ध से निवृत्त रहो, तभी पवित्र प्रवृत्ति का पार्ट बजा सकेंगे। मैं पुरुष हूँ, यह स्त्री है, यह भान स्वप्न में भी नहीं आना चाहिए। आत्मा भाई-भाई है, तो स्त्री-पुरुष कहाँ से आए! युगल तो आप और बाप हो ना, फिर यह मेरी युगल है- ऐसा कैसे कह सकते? यह तो निमित्त मात्र सिर्फ सेवा अर्थ है, बाकी कम्बाइण्ड रूप तो आप और बाप हो। फिर भी बापदादा मुबारक देते हैं हिम्मत पर। (अ.वा.29.10.81 पृ.94 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 जो प्रवृत्ति में रहते हैं उन्हों के लिए सहज बात इसलिए है कि उन्हों के सामने सदैव कन्ट्रास्ट है। कन्ट्रास्ट होने के कारण निर्णय करना सहज हो जाता है। निर्णय करने की शक्ति कम है; इसलिए सहज नहीं भासता है। एक बार जब अनुभव कर लिया कि इससे प्राप्ति क्या है तो फिर निर्णय हो ही जाता है। ठोकर का अनुभव एक बार किया तो फिर बार-2 थोड़े ही ठोकर खाएँगे। निर्णय शक्ति कम है तो फिर मुश्किल भी हो जाता है। तो यह प्रवृत्ति में अथवा परिवार में रहते हैं, उसके अनुभवी होने के कारण, सामने कन्ट्रास्ट होने के कारण, धोखे से बच जाते हैं। (अ.वा.13.3.71 पृ.46 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 अभी तुम ज्ञान चिक्षा पर बैठ गोरा बनते हो। बच्चों को भी यह पुरुषार्थ कराना है। हम ज्ञान चिक्षा पर बैठे हैं, तुम फिर काम चिक्षा पर क्यों बैठने की करते हो। अगर पुरुष ज्ञान उठाया, स्त्री न उठाती तो भी झगड़ा पड़ता है। यज्ञ में विघ्न तो पड़ते ही हैं। यह ज्ञान कितना लम्बा-चौड़ा है। (मु.ता.1.5.72 पृ.2 अंत) मु.ता.4.5.77) मुरली प्रूफ देखें
 बाप किसको भी कान से पकड़ सकते हैं। शर्म नहीं आता है! बाबा तुमको कहते हैं काला मुँह न करो। प्रतिज्ञा करो। क्या तुम यह प्रतिज्ञा नहीं कर सकते हो? भगवानुवाच है ना! आत्माओं का बाप है। एक वही सभी को पावन बनावेंगे। वही कहते हैं तुम पतित, पत्थर बुद्धि हो। अब बाप कहते हैं जास्ती पापात्मा न बनो। काला मुँह मत करो। अगर करेंगे तो धर्मराज डण्डा मार ख़त्म कर देंगे। यह बाप ही कह सकते हैं। तुमको शर्म नहीं आता है! यह सिर्फ अन्तिम जन्म पवित्र बनो तो तुम गोरा बनेंगे। तुमने 64 जन्म काला मुँह किया है तो भी अजन पेट नहीं भरा है। एक जन्म (के) लिए पवित्र नहीं बनते हो। तुमको बहुत सज़ा मिलेगी। धर्मराज हड्डी-2 तोड़ देंगे। तो भी सुनते नहीं। बाबा अथवा मम्मा युक्ति से कह सकते हैं। माँ तुमको कहती हैं काला मुँह न करो। तुम बिल्कुल ही पत्थर बुद्धि, कंगाल, विषयी बन गए हो। अब काला मुँह मत करो, नहीं तो थप्पड़ मार देंगे। माँ कह सकती हैं। बच्चों को हक नहीं है। भाई-बहन तो आपस में लड़ पड़े। माँ-बाप का तो रिगार्ड रखते हैं। वह भी समझ कर बोलना पड़ता है, नहीं तो झगड़ा हो जाए। (मु.ता.4.2.72 पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
 काला मुँह तो करते हैं ना। नगन तो होते हैं ना। बाप कहते हैं कोई भी हालत में नगन न होना है। (मु.ता.24.9.77 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 बड़ी युक्ति से स्थापना होती है। विघ्न भी पड़ेंगे। कितने अत्याचार होते हैं! मैजॉरिटी पुरुष जास्ती तंग करते हैं। कहाँ-2 स्त्रियाँ भी बड़ा तंग करती हैं। अब बाप माताओं द्वारा स्वर्ग के द्वार खोलते हैं। हैं तो पुरुष भी। माता जन्म देती है तो उनको पुरुष से इज़ाफा ज(ास्ती) मिलना है। (मु.ता.9.1.74 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 जबकि बुद्धि की सगाई बाप से हुई है तो उनको याद करो ना! फिर दूसरे को क्यों याद करते हो? शर्म नहीं आता? क्रिमिनल आँखें हो जाती हैं। सगाई अर्थात् बुद्धि में शिवबाबा की याद। स्त्री-पुरुष की भी ऐसी सगाई हो जाती है ना! याद ठहर जाती है। (मु.ता.14.11.74 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 बाबा के पास बहुत बच्चे हैं जो शादी करके भी पवित्र रहते हैं। सन्यासी तो कहते हैं यह हो नहीं सकता जो दोनों इकट्ठे रह सकें। (मु.ता.26.12.85 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 पहलवान से माया भी पहलवान हो लड़ती है। ...8-10 वर्ष बाद भी फिर काम से हार खा लेते हैं। इतना काम बलवान है! देह-अभिमान में आने से झट विकार मुँह दिखाने आवेंगे। (मु.ता.28.11.74 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 लिखते हैं- बाबा, हम काला मुँह कर बैठा, अब आप कृपा करो, क्षमा करो। अब इसमें क्षमा की तो बात ही नहीं। तमोप्रधान काम करने से तुम ही गिर पड़ते हो। वह खुशी, वह याद की यात्रा रह न सके। अपने पैर पर आपे ही कुल्हाड़ा मारते हैं। बाप सभी को आशीर्वाद देते हैं क्या? वह तो बात ही नहीं। संगदोष में आए अथवा माया के वश हो कुछ कर लिया। अपने पैर पर कुल्हाड़ा मारा। (मु.ता.29.11.74 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 इस प्रकार की कहानी है- एक कुमारी मटका भरने आती थी, एक कुमार को कहा यह मटका मेरे सिर पर ऐसे रखो जो अंग, अंग से न लगे। कहानी बहुत अच्छी बनाते हैं, जो इस समय काम आती है। उसने कहा, हम ऐसे ही मटका रखेंगे। अच्छा, फिर अनायास दोनों की सगाई हो गई। सगाई तो बिगर देखे कर लेते हैं। सो जब एक/दो को देखा तो कुमार ने कहा, यह तो वही कुमारी है, जिसने हमसे प्रण लिया था। बस, वह प्रण याद आने से अलग-2 सो गए। प्रतिज्ञा की तलवार बीच में थी- अंग, अंग से न लगे। थोड़े दिन बाद माँ-बाप ने पूछा तो बोला, हमारा अंग, अंग से नहीं लगता है; क्योंकि हमारा ऐसे प्रण किया हुआ था। ऐसे कुछ कहानी है। यह भी ऐसे हैं ना! स्त्री-पुरुष साथ रहते भी समझते हैं हमारी तो प्रतिज्ञा की हुई है, अंग अंग से न लगे। यहाँ बीच में ज्ञान तलवार है। उनकी थी प्रतिज्ञा की तलवार। ......परन्तु लिखते हैं- बाबा, कशिश होती है। वह अवस्था अजुन पक्की नहीं हुई है। कुछ न कुछ अंग लग जाते हैं। (मु.ता.6.9.84 पृ.2 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
 स्त्री के लिए पति से पूछो वा स्त्री से पति के लिए पूछो तो झट से बताएगी इनमें यह खामियाँ हैं। इस बात में यह तंग करता है या तो कहेंगे, हम दोनों ठीक चलते हैं, कोई किसको तंग नहीं करते हैं। दोनों एक/दो के मददगार, साथी हो चलते हैं। कोई तो एक/दो को गिराने की कोशिश करते हैं। (मु.ता.29.10.84 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 पवित्रता के लिए भी बहुत मूँझते हैं कि क्या करें? कैसे कम्पेनियन होकर रहें? कम्पेनियन होकर रहने का भी अर्थ क्या है? विलायत में जब बूढ़े होते हैं तो फिर कम्पेनियन रखने के लिए शादी कर लेते हैं, सम्भाल के लिए। ऐसे बहुत हैं जो ब्रह्मचारी हो रहना पसन्द करते हैं। (मु.ता.11.7.84 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 बाबा ऑर्डिनेन्स निकालते हैं- बच्चे, काम महाशत्रु है। यह तुमको आदि, मध्य, अन्त दुःख देते हैं। अभी तुमको गृहस्थ-व्यवहार में रहते हुए पावन बनना है। (मु.ता.11.7.84 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 प्रवृत्ति वालों को बापदादा एक बात के लिए मुबारक देते हैं कि जब से प्रवृत्ति मार्ग वाले सेवा साथी बने हैं तो सेवा में नाम बाला करने से एग्ज़ाम्पल बने हैं। पहले लोग समझते थे कि ब्रह्माकुमार या ब्रह्माकुमारी बनना माना घरबार छोड़ना.. यह डर था ना! और अभी समझते हैं कि इन्हों का तो घर भी बहुत अच्छा चलता, धन्धा भी बहुत अच्छा चलता, खुद भी खुश रहते, तो यह देख करके समझते हैं कि हम भी बन सकते हैं। तो एग्ज़ाम्पल बन गए ना! (अ.वा.25.11.95 पृ.43 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 एक तो किसको दुःख नहीं देना है। ऐसे नहीं, कोई को विष चाहिए, वह नहीं देते हो तो यह कोई दुःख देना है। ऐसे तो बाप कहते नहीं हैं। कोई ऐसे भी बुद्धू निकलते हैं जो कहते हैं- बाबा कहते हैं ना, किसको दुःख नहीं देना है, अब यह विष माँगते हैं तो उनको देना चाहिए, नहीं तो यह भी किसको दुःख देना हुआ ना। ऐसे समझने वाले मूढ़मति भी हैं। बाप तो कहते हैं- पवित्र ज़रूर बनना है। आसुरी चलन और दैवी चलन की भी समझ चाहिए। (मु.ता.25.10.89 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 सदा कमल आसन पर विराजमान रहो। कभी भी पानी वा कीचड़ की बूँद स्पर्श न करे। कितनी भी आत्माओं के सम्पर्क में आते सदा न्यारे और प्यारे रहो। सेवा के अर्थ सम्पर्क है। देह का सम्बन्ध नहीं है, सेवा का सम्बन्ध है। प्रवृत्ति में सम्बन्ध के कारण नहीं रहे हो, सेवा के कारण रहे हो। (अ.वा.28.4.82 पृ.400 अंत, 401 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 फलक से कहते हैं ना कि आग-कपूस इकट्ठा रहते भी आग नहीं लग सकती। चैलेन्ज है ना! ...तो आप सभी युगलों की ये चैलेन्ज है या थोड़ी-2 आग लगेगी फिर बुझा देंगे? (अ.वा.16.11.95 पृ.24 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 पढ़ाई हमेशा प्यूरिटी में ही होती है। पवित्रता से धारणा अच्छी होती है। प्यूरिटी बिगर नॉलेज ठहर न सकेगी। विकार में गया और बुद्धि से प्वाइंट्स एकदम निकल जावेंगी। जैसे गूंगा बन जावेगा। (मु.ता.13.2.73 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 अपने को कमल-पुष्प समान अति न्यारा और सदा बाप का प्यारा अनुभव करते हो? कमल-पुष्प एक तो हल्का होने के कारण जल में रहते भी जल से न्यारा रहता है, प्रवृत्ति होते हुए भी स्वयं निवृत्त रहता है। ऐसे ही आप सब भी लौकिक या अलौकिक प्रवृत्ति में रहते हुए निवृत्त अर्थात् न्यारे रहते हो? निवृत्त रहने के लिए विशेष अपनी वृत्ति को चैक करो। जैसी वृत्ति वैसी प्रवृत्ति बनती है। वृत्ति कौन-सी रखनी है? आत्मिक वृत्ति और रूहानी वृत्ति। इस वृत्ति द्वारा प्रवृत्ति में भी रूहानियत भर जाएगी अर्थात् प्रवृत्ति में भी रूहानियत के कारण अमानत समझ कर चलेंगे। ...मेरेपन में ही मोह के साथ-2 अन्य विकारों की भी प्रवेशता होती है। मेरापन समाप्त होना अर्थात् विकारों से मुक्त, निर्विकारी अर्थात् पवित्र बनना है, जिससे प्रवृत्ति भी पवित्र प्रवृत्ति बन जाती है। विकारों का नष्ट होना अर्थात् श्रेष्ठ बनना है। ......प्रवृत्ति को पवित्र प्रवृत्ति बनाया है? सबसे पहली प्रवृत्ति है अपनी देह की प्रवृत्ति, फिर है देह के सम्बन्ध की प्रवृत्ति। तो पहली प्रवृत्ति, देह के हर कर्म-इन्द्रिय को पवित्र बनाना है। (अ.वा.24.10.75 पृ.221 आदि, 222 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 जब तक देह की प्रवृत्ति को पवित्र नहीं बनाया है तब तक देह के सम्बन्ध की प्रवृत्ति, चाहे हद की और चाहे बेहद की हो, उसको भी पवित्र प्रवृत्ति नहीं बना सकेंगे। ब्रह्माकुमार और ब्रह्माकुमारियों की प्रवृत्ति कौन-सी है? जैसे हद के सम्बन्ध की प्रवृत्ति है वैसे ब्रह्माकुमार और कुमारी के नाते से सारे विश्व की आत्माओं से साकारी भाई-बहन का सम्बन्ध- इतनी बड़ी बेहद की प्रवृत्ति है; लेकिन पहले अपनी देह की प्रवृत्ति बनावें, तब बेहद की प्रवृत्ति को भी पवित्र बना सकेंगे। कहावत है- ‘चैरिटी बिगिन्स एट होम’, पहले अपनी देह की प्रवृत्ति अर्थात् घर को पवित्र बनाने की सेवा करनी है, फिर बेहद की करनी है। तो पहले अपने आपसे पूछो कि अपने शरीर रूपी घर को पवित्र बनाया है? संकल्प को, बुद्धि को, नयनों को और मुख को रूहानी अर्थात् पवित्र बनाया है? जैसे दीपावली पर घर के हर कोने को स्वच्छ करते हैं, कोई एक कोना भी न रह जाए, इतना अटेन्शन रखते हैं- ऐसे हर कर्म-इन्द्रिय को स्वच्छ बनाकर आत्मा का दीपक सदाकाल के लिए जगाया है? (अ.वा.24.10.75 पृ.222 आदि) मुरली प्रूफ देखें
पवित्रता- अधर कुमारों (पाण्डवों) के संदर्भ मेंपाण्डव अर्थात् संकल्प और स्वप्न में भी हार न खाने वाले। विशेष यह स्लोगन याद रखना कि पाण्डव अर्थात् सदा विजयी। स्वप्न भी विजय का आए। इतना परिवर्तन करना। सभी जो बैठे हो, विजयी पाण्डव हो। वहाँ जाकर हार खा ली, यह पत्र तो नहीं लिखेंगे? माया आ नहीं जाती; लेकिन आप उसे खुद बुलाते हो। कमज़ोर बनना अर्थात् माया को बुलाना। तो किसी भी प्रकार की कमज़ोरी माया को बुलाती है तो पाण्डवों ने क्या प्रतिज्ञा की? सदा विजयी रहेंगे। ...ऐसे प्रतिज्ञा करने वालों को सदा बापदादा की बधाई मिलती रहती है। (अ.वा.17.4.83 पृ.151 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 दुनिया में और भी पुरुष हैं; लेकिन उन्हों से न्यारे और बाप के प्यारे बन गए; इसलिए पुरुषोत्तम बन गए। औरों के बीच में अपने को अलौकिक समझते हो ना! चाहे सम्पर्क में लौकिक आत्माओं के आते; लेकिन उनके बीच में रहते हुए भी मैं अलौकिक न्यारी हूँ, यह तो कभी नहीं भूलना है ना! क्योंकि आप बन गए हो हंस, ज्ञान के मोती चुगने वाले होली हंस हो। वह हैं गन्द खाने वाले बगुले। वे गन्द ही खाते, गन्द ही बोलते... तो बगुलों के बीच में रहते हुए अपना होलीहंस जीवन कभी भूल तो नहीं जाते! कभी उसका प्रभाव तो नहीं पड़ जाता? वैसे तो उसका प्रभाव है मायावी और आप हो मायाजीत, तो आपका प्रभाव उनपर पड़ना चाहिए, उनका आप पर नहीं। तो सदा अपने को होलीहंस समझते हो? ...तो होलीहंस सदा स्वच्छ, सदा पवित्र। पवित्रता ही स्वच्छता है। ...होलीहंस संकल्प भी अशुद्ध नहीं कर सकते। संकल्प भी बुद्धि का भोजन है। अगर अशुद्ध वा व्यर्थ भोजन खाया तो सदा तन्दुरुस्त नहीं रह सकते। (अ.वा.17.4.83 पृ.150 मध्य, 151 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 अपने को अधर कुमार तो समझते हो ना? संकल्प वा सम्बन्ध में अधर कुमार की स्मृति नहीं रहती है? जैसे देखो, पहले बहन-भाई की स्मृति में स्थित किया गया, उसमें भी देखा गया कि बहन-भाई की स्मृति में भी कुछ देह-अभिमान में आ जाते हैं; इसलिए उससे भी ऊँची स्टेज भाई-भाई की बताई। ऐसे ही अपने को अधर कुमार समझ कर चलते हो गोया प्रवृत्ति मार्ग के बन्धन में बँधी हुई आत्मा समझ कर चलते हो। इसलिए अब इस स्मृति से भी परे। अधर कुमार नहीं; लेकिन ब्रह्माकुमार हूँ। अब मरजीवा बन गए तो मरजीवा जीवन में अधर कुमार का सम्बन्ध है क्या? मरजीवा जीवन में प्रवृत्ति वा गृहस्थी है क्या? मरजीवा जीवन में बाप-दादा ने किसको गृहस्थी बना कर नहीं दी है। एक बाप और सभी बच्चे हैं ना, इसमें गृहस्थीपन कहाँ से आया? तो अपने को ब्रह्माकुमार समझ कर चलना है। अगर अधर कुमार की स्मृति भी रहती है तो जैसी स्मृति वैसी स्थिति भी रहती है। इस कारण अभी इस स्मृति को भी ख़त्म करो कि हम अधर कुमार हैं। नहीं, ब्रहमाकुमार हूँ। जो बापदादा ने ड्यूटी दी है उस ड्यूटी पर श्रीमत के आधार पर जा रहा हूँ। मेरी प्रवृत्ति है या मेरी युगल है, यह स्मृति भी राँग है। युगल को युगल की वृत्ति से देखना वा घर को अपनी प्रवृत्ति की स्मृति से देखना इसको मरजीवा कहेंगे? जैसे देखो, हर चीज़ को सम्भालने के लिए ट्रस्टी मुकर्रर किए जाते हैं। यह भी ऐसे समझ कर चलो- यह जो हद की रचना बापदादा ने ट्रस्ट बनाकर सम्भालने के लिए दी है, वह मेरी रचना नहीं; लेकिन बापदादा द्वारा ट्रस्टी बन इसको सम्भालने के लिए निमित्त बना हुआ हूँ। ट्रस्टीपन में मेरापन नहीं होता। ...जैसे साकार में बाप को देखा, लौकिक सम्बन्ध की वृत्ति, दृष्टि वा स्मृति स्वप्न में भी संकल्प में थी? तो फॉलो फादर करना है ना। क्या वही लौकिक सम्बन्धी साथ नहीं रहते थे क्या? तो आप लोगों को भी साथ रहते हुए इस स्मृति और वृत्ति में चलने की हिम्मत रखनी है। इस भट्ठी में क्या परिवर्तन करके जाएँगे? अधर कुमार का नाम-निशान समाप्त। (अ.वा.12.7.72 पृ.322 आदि, 323 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 रोज़-2 कितना समझाया जाता है, फिर भी साण्डेपने का देह-अभिमान बड़ा मुश्किल टूटता है। यही महारोग है। ......देही-अभिमानी बने तब काम पर जीत पा सकें। (मु.ता.15.11.74 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 आज बहुत अच्छी रीति याद करते हैं। कल देह के अहंकार में ऐसे आ जाते हैं जैसे साण्डे। साण्डे को अहंकार बहुत होता है। इसमें एक कहावत है- सरमण्डल(सुरमण्डल) के साज से देह-अभिमानी साण्डे क्या जाने! ......ऐसे साण्डे लोग बाप के आगे भी गुर्र-2 करते हैं। ऐसे फीलिंग आती है। बहुत देह-अभिमानी साण्डे हैं। (मु.ता.5.11.74 पृ.1 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
 एक तो काम महाशत्रु है, पुरुषों की सत्यानाश कर देता है। जैसे ऊँट का मिसाल देते हैं। वह अपने ही मूत में खिसकता है। इनके पैर बहुत लम्बे होते हैं। यह भी मनुष्य ह्यूमन ऊँट हैं। घड़ी-2 अपने मूत में गिर पड़ते हैं। ......इसलिए माताओं ने पुकारा हमें नगन होने से बचाओ। (मु.ता.9.7.71 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 बाप से प्रतिज्ञा भी करते- बाबा, हम कब विकार में नहीं जावेंगे। आपसे तो 21 जन्मों का वर्सा ज़रूर लेंगे। फिर भी गिर पड़ते। स्त्री का मुख देखा और खलास। अक्ल ही चट हो जाती है। बाप कहते हैं, काम विकार पर जीत पाने से तुम जगतजीत बनेंगे। ......एक/दो को देखने से काम की आग लग जाती है। बाप कहते हैं, काम चिता पर बैठ तुम कितने साँवरे बन गए हो। अब फिर तुमको गोरा बनाते हैं। (मु.ता.22.1.74 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 बाप कहते हैं, मेरी खातिर अब तुम पतित मत बनो। भल स्त्री सामने हो, तुम अपने को आत्मा समझ मुझ बाप को याद करो। देखते हुए नहीं देखो। (मु.ता.14.7.84 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 बहुत तूफान आवेंगे। बूढ़ा होगा 80 वर्ष का, उनको भी ऐसे तूफान आवेंगे बा(त) मत पूछो। ख़बरदार रहना है। कर्मेन्द्रियों से कोई विकर्म न करना है, नहीं तो सौणा पाप बन जाता है। (मु.ता.2.6.71 पृ.4 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 रावण राज्य में ही यह विकार रूपी सर्प डँसता है। स्त्री को नागिन कहते हैं। खुद भी तो बड़े नाग हैं ना। यह भी बुद्धि में नहीं आता है- नाग बिगर नागिन कैसे कही जावेगी! उन्होंने स्त्री का नाम बिगाड़ा है। अब फिर बाप नाम बाला करते हैं। (मु.ता.9.8.71 पृ.4 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
 एक तो है काम-कटारी की मारामारी। दूसरी फिर यह मारामारी। काम के लिए स्त्री को भी मार देते हैं। (मु.ता.18.12.71 पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
 कई पतित भी होते हैं। चलते-2 गिर पड़ते हैं, तो छिपकर फिर आए अमृत पीते हैं। वास्तव में जो अमृत छोड़कर विष खाते हैं, उनको कुछ समय आने नहीं देते; परन्तु यह भी गायन है- जब अमृत बाँटा जाता था तो विकारी असुर छिपकर आए बैठते थे। कहते हैं, इन्द्रसभा में ऐसे अपवित्र आकर बैठते। एक परी उस विकारी को ले आई फिर उनका क्या हाल हुआ! विकारी तो ज़रूर गिर पड़ेंगे। ......कहते हैं, वह पत्थर जाकर बना। अब ऐसे नहीं कि पत्थर वा झाड़ कोई मनुष्य बनते हैं। नहीं, पत्थर बुद्धि बन गए हैं। (मु.ता.6.9.84 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 ऐसे तो पाण्डव भी किसी हिसाब से नारियाँ ही हो। आत्मा नारी है और परमात्मा पुरुष है। तो क्या हुआ? आत्मा कहती है, आत्मा कहता है- ऐसे नहीं कहा जाता। कुछ भी बन जाओ; लेकिन नारी तो हो। परमात्मा के आगे तो आत्मा नारी है। आशिक नहीं हो, सर्व सम्बन्ध एक बाप से निभाने वाले हो। (अ.वा.21.3.83 पृ.96 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 अधर कुमारों का ग्रुप है- कमल-पुष्पों का गुलदस्ता। प्रवृत्ति में रहते विघ्न-विनाशक की स्टेज पर रहते हो ना? .......जैसे एक घण्टा सफल करते हो तो लाख गुणा जमा होता, ऐसे एक घण्टा वेस्ट जाता है तो लाख गुणा घाटा होता है। इसलिए अब व्यर्थ का खाता बन्द करो। हर सेकेण्ड अटेन्शन। (अ.वा.30.11.79 पृ.69 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 ईश्वरीय दरबार में कोई असुर रह न सके। मूत पलीती मनुष्य को बैठने का हुक्म नहीं है। (मु.ता.15.3.77 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 पहले-2 दुर्योधन ही स्त्री को नगन करते हैं। ऐसे नहीं, स्त्री, पुरुष को नगन करती है। स्त्री में शर्म रहता है। पुरुष (निर्लज्ज) होते हैं। इसलिए दिखाया है, द्रौपदी की चीर उतारी थी। हर एक मनुष्य मात्र पुरुष दुर्योधन, स्त्री द्रौपदी। (मु.ता.13.4.73 पृ.5 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 मेल्स भी ऐसे बहुत दवाइयों से (कर्मेन्द्रियों की चंचलता को) ख़त्म कर देते हैं, फिर नंगे रहते हैं। नहीं तो नंगा रहना मासी का घर नहीं। (मु.ता.21.4.73 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 अधर कुमारी, कुमारी कन्या का मंदिर भी है न। गृहस्थी से निकल कर फिर बाप के बच्चे बने हैं तो उन्हों को अधर कहा जाता है। (मु.ता.24.4.73 पृ.4 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
पवित्रता- सन्यासियों के सन्दर्भ मेंभ्रष्टाचारी का मतलब यह नहीं- चोरी, ठगी आदि करना। लॉ कहता है, जो भी विकार में जाते हैं वह भ्रष्टाचारी ही हैं। कहेंगे, सन्यासी तो विकार में नहीं जाते हैं; परन्तु वह भी जन्म तो भ्रष्टाचार से लेते हैं ना। .........सन्यासी भी भ्रष्टाचारी हैं; क्योंकि विख से पैदा होते हैं। (मु.ता.4.2.72 पृ.1 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
 जितना योगी बनते जावेंगे, कर्मेन्द्रियाँ शान्त होती जावेंगी। देह-अभिमान में आने से कर्मेन्द्रियाँ चंचल होती हैं। आत्मा जानती है हमको प्राप्ति हो रही है। शरीर से अलग होते जावेंगे। कर्मेन्द्रियाँ कमज़ोर होती जावेंगी। सन्यासी लोग दवाइयाँ खाकर कर्मेन्द्रियों को शान्त करते हैं। वह तो हठयोग हो गया ना। तुमको तो योगबल से काम लेना है। योगबल से तुम वश नहीं कर सकते हो? जितना आत्म-अभिमानी होते जावेंगे तो कर्मेन्द्रियाँ शान्त हो जावेंगी। बड़ी मेहनत करनी पड़ती है। (मु.ता.6.8.76 पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
 बाबा के पास बहुत बच्चे हैं जो शादी करके भी पवित्र रहते हैं। सन्यासी तो कहते हैं, यह हो नही सकता जो दोनों इकट्ठे रह सकें। (मु.ता.26.12.85 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 अरविन्द घोष को 50-60 वर्ष हुए, अब तो देखो, कितने उनके आश्रम बन गए हैं! वहाँ कोई निर्विकारी बनने की बात थोड़े ही है। वह तो समझते हैं, गृहस्थ-व्यवहार में रहते पवित्र कोई रह नहीं सकता। सन्यासी खुद भी समझते हैं, हम ही नहीं रह सकते तो दूसरे को कैसे कहें! अभी तो सब तमोप्रधान हैं। माताएँ, सन्यासियों को फिर अपने गुरु बना बैठतीं। लज्जा नहीं आती कि उन्होंने तो हमारी हमजिन्स को तलाक दे दिया है। फिर भी उनको गुरु बनाती रहती हैं। गुरुओं की चेलियाँ बन जातीं। बहुत गन्दे बन जाते। बाप तो ऐसे नहीं कहते हैं। बाप कहते हैं, गृहस्थ-व्यवहार में रहते सिर्फ यह एक जन्म पवित्र बनो। जन्म-जन्मांतर तो पतित रहे ही। (मु.ता.7.9.75 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 सन्यासी भी ऐसे नहीं कहेंगे, पवित्र बनो; क्योंकि खुद ही शादियाँ कराते हैं। अच्छा, मास-2 विकार में जाओ, गृहस्थियों को यह कहेंगे। ब्रह्मचारियों को ऐसे नहीं कहेंगे कि शादी नहीं करना है। (मु.ता.18.7.89 पृ.2 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
 छोटे-2 मठ-पंथ निकलते रहते हैं। अरविन्द आश्रम है, कितनी जल्दी-2 वृद्धि को पाते हैं; क्योंकि उनमें विकार के लिए कोई मना नहीं करते हैं। ......गीता पाठी कहते भी हैं, भगवानुवाच- काम महाशत्रु है, उनको जीतने से जगतजीत बनते हैं। .............बहुत प्यार से पूछना चाहिए- स्वामी जी! आपने सुनाया, काम महाशत्रु है, इनपर जीत पाने से जगतजीत, विश्व का मालिक बनेंगे, फिर आप यह तो बताते नहीं कि पवित्र कैसे बनो। (मु.ता.29.3.79 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 ग्रन्थ पढ़ने पर बैठते हैं तो ऐसे भी नहीं सभी निर्विकारी होते हैं। पैदा तो सभी भ्रष्टाचार से ही होते हैं। फिर उनमें कोई अच्छे-बुरे होते हैं। कोई अच्छे, कोई बहुत विकारी भी होते हैं। सन्यासियों में भी ऐसे होते हैं। शेर वाला सन्यासी था। पहले सन्यासी था, फिर गृहस्थी बना है। कुमारियाँ आदि बहुत जाती थीं। आख़रीन शादी कर ली। फिर बच्चे भी हुए। दूसरे कोई से बच्चा हो जाए तो नाम बदनाम हो जाए। सन्यासी का तो और ही नाम बदनाम हो जाए। (मु.ता.14.1.71 पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
 उनका हठयोग अच्छा भी है, बुरा भी है; क्योंकि देवताएँ जब वाममार्ग में जाते हैं तो भारत को थमाने लिए पवित्रता ज़रूर चाहिए। तो उसमें भी मदद करते हैं। (मु.ता.31.10.84 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 कई वल्लभाचारी भी होते हैं, टच करने नहीं देते। तुम जानते हो, उन्हों की आत्मा कोई निर्विकारी, पवित्र नहीं होती है। ...यह नहीं समझते कि हम विकारी, अपवित्र हैं। शरीर तो भ्रष्टाचार से पैदा हुआ है। (मु.ता.7.9.84 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 आँखें बहुत धोखा देने वाली हैं। इसलिए सन्यासी लोग आँखें बन्द कर बैठते हैं। स्त्री को पिछाड़ी में, पुरुष को आगे में बिठाते हैं। कई ऐसे भी होते हैं जो स्त्री को बिल्कुल देखते ही नहीं हैं। (मु.ता.20.5.76 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 पूछा जाता है, आपने सन्यास क्यों किया? घरबार क्यों छोड़ा? कहते थे, विकार से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है; इसलिए घरबार छोड़ा जाता है। अच्छा, जंगल में जाकर रहते हो, फिर घरबार की याद आती होगी? बोला, हाँ। बाबा का देखा हुआ है, एक सन्यासी तो फिर वापस घर भी आ गया था। ......कुम्भ के मेले में बहुत छोटे-2 नागे लोग आते हैं। दवाई खिलाते हैं, जिससे कर्मेन्द्रियाँ ठण्डी पड़ जाती हैं। तुम्हारा तो है योगबल से कर्मेन्द्रियों को वश में करना। योगबल से बस(वश) होते-2 आखरीन ठण्डी हो ही जाएँगी। (मु.ता.21.8.84 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
 पहले-2 जब भीख माँगने आते थे तो आँखें नीचे कर सिर्फ कहते थे- माता! भिक्षा। बस। ऐसे के फिर माताएँ पैर बैठ छुएँ, क्या यह मान है? माताओं से यह काम कराना होता है क्या? इसलिए मम्मा ने इन सबको लिखा था, यह श्री-श्री 108 जगत्गुरु कहलाते हैं। अब वास्तव में जगत अर्थात् सारी वर्ल्ड हो गई। (मु.ता.1.9.84 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
पवित्रता- सन्यासियों के सन्दर्भ मेंस्त्री, जिसको विधवा बनाकर चले जाते, जिनके लिए कहते- नर्क का द्वार है, स्त्रियों के ही गुरु बन बैठते हैं। ...अब तुम तो उन गुरुओं से बच गए। (मु.ता.1.9.84 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 सन्यासी सन्यास करते हैं; इसलिए पवित्र आत्मा हैं। बाप ने समझाया है, वह भी सभी पुनर्जन्म लेते हैं। ...विष से जन्म ले फिर जब बड़े बालिग बन जाते हैं तो सन्यास कर लेते हैं। ......उन्हों को तो गृहस्थी घर में जन्म लेना पड़े। उनको कहा ही जाता है हद का सन्यास। महान आत्मा, न कि महान परमात्मा। (मु.ता.19.8.89 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 यहाँ के सन्यासी भल पवित्र बनते हैं, फिर भी विकार से पैदा होते हैं। ......यह हैं निवृत्ति मार्ग के। स्त्रियाँ तो धक्के खा न सकें। यह सब अभी कलियुग में खराबियाँ हो गई हैं, स्त्रियों को भी सन्यासी बनाकर ले जाते हैं। फिर भी उन्हों की पवित्रता पर भारत थमा रहता है। जैसे पुराने मकान को पोची आदि लगाई जाती है तो जैसे नया बन जाता है। यह सन्यासी भी पोची दे कुछ बचाव करते हैं। (मु.ता.31.8.89 पृ.2 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
 विवेकानन्द और रामकृष्ण भी दो बड़े सन्यासी होकर गए हैं। सन्यास की ताकत रामकृष्ण में थी। बाकी भक्ति का समझाना-करना, वह विवेकानन्द का था। ......बाप ऐसे नहीं कहते कि स्त्री को माँ कहो। बाप तो कहते हैं, उनको भी आत्मा समझो। ......सन्यासियों की बात अलग है। उसने स्त्री को माँ समझा। माँ की बैठ बड़ाई की है। यह ज्ञान का रास्ता है, वैराग की बात अलग है। वैराग में आकर स्त्री को माँ समझा। माता अक्षर में क्रिमिनल आई नहीं होगी। बहन में भी क्रिमिनल दृष्टि जा सकती है। माता में कभी खराब ख्याल नहीं जाएँगे, बहन से आ जाते हैं। शादी भी कर लेते हैं। बाप की बच्चे में भी क्रिमिनल दृष्टि जा सकती है, माँ में कभी नहीं जाएगी। सन्यासी स्त्री को माँ समझने लगा। उनके लिए ऐसे नहीं कहते कि दुनिया कैसे चलेगी? पैदाइस कैसे होगी? (मु.ता.1.9.89 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 ऐसे नहीं यहाँ आकर रहना है, वह तो फिर सन्यास हो गया। घरबार छोड़ यहाँ आकर रहें। तुमको तो कहा जाता है, गृहस्थ-व्यवहार में रहते पवित्र बनो। (मु.ता.1.9.89 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 सन्यासियों की माला होती नहीं। वह हैं निवृत्तिमार्ग वाले। वह प्रवृत्तिमार्ग वालों को ज्ञान दे न सकें पवित्र बनने के लिए। (मु.ता.19.8.89 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 सतोप्रधान सन्यासी जो थे वह बहुत निडर रहते थे। जानवर आदि कोई से डरते नहीं थे। उस नशे में रहते थे। ......उनमें बड़ी कशिश होती थी। जंगल में भोजन मिलता था। दिन-प्रतिदिन तमोप्रधान होने से ताकत कम होती जाती है। (मु.ता.11.10.89 पृ.2 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
 पोप कितने की शादियाँ कराते हैं। बाबा तो यह काम नहीं करते। सन्यासी, निवृत्तिमार्ग वाले भी शादी-सगाई कराते हैं। भल खुद पवित्र हैं, फिर भी दूसरों को पतित बनाने शादी कराते हैं। लोग इसको पतितपना नहीं समझते हैं। जबकि खुद पवित्र बनते हैं तो फिर औरों को पतित क्यों बनाते हैं? (मु.ता.30.10.90 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
पवित्रता- वेश्याओं के संदर्भ मेंबाप कहते हैं, गणिकाओं आदि को उठाओ। सबसे डर्टी हैं वेश्याएँ। एक है कॉमन, दूसरी- खास। स्त्री और पुरुष में स्त्री है खास। बाकी वह काम दुकान निकाल बैठती। सतयुग में ऐसी बातें नहीं होतीं। वह है ही शिवालय बेहद का। अभी बेहद का वेश्यालय है। बिल्कुल तमोप्रधान हैं। इससे जास्ती मार्र्जिन नहीं। (मु.ता.9.1.74 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
 बाबा को वण्डर लगता है, एक दिन गणिकाएँ आदि भी आकर समझ जावेंगी। पिछाड़ी में आने वाले तीखे हो जावेंगे। (मु.ता.29.1.79 पृ.2 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
 बाप ने समझाया है वेश्या है अधम ते अधम। वह अच्छी रीति आकर समझें। उन्हों को रहना तो फिर भी घर में ही है। ऐसे नहीं कि उनको बैठ हम खिलावेंगे, रहावेंगे। वह तो जैसे अपने घर में रहती है वैसे ही रहें। सिर्फ छुट्टी ले आकर पढ़े। (मु.ता.29.4.69 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
 बाबा तो कहते रहते हैं, वेश्याओं को भी उठाना है। यह है ही वेश्यालय। भारत का नाम भी इन्होंने ही गिराया है। इसमें मुख्य चाहिए योगबल। यह बिल्कुल ही पतित हैं। पावन होने लिए याद की यात्रा चाहिए। अभी वह याद का बल बहुत कम है। वेश्याओं को भी आत्मा समझ उठाओ, फिर घृणा नहीं आवेगी। आत्माएँ तो सब गिरी हुई हैं; परन्तु उनके लिए घृणा आती है। यह हैं नम्बरवन पतित। सो फिर नम्बरवन पावन बनना है। करके यह जन्म अच्छा था; परन्तु है तो नम्बरवन पतित न। तो इन गणिकाओं को भी उठाना है तब तुम्हारा नाम बाला होगा। अपन को आत्मा निश्चय कर बोलेंगे कि हम भाई को समझाते हैं, तो फिर घृणा नहीं आवेगी; परन्तु वह अवस्था नहीं है। ......गणिकाओं का भी उद्धार तो करना है न। अच्छी-2 माताएँ अनुभवी हो जो जाकर समझावें। कन्याओं को तो अनुभव नहीं है। माताएँ समझा सकेंगी- हम भी