Skip Navigation Links
लक्ष्मी-नारायण मुरली प्वॉइंट्स प्रूफ के साथ
Murli PointPDFDownload
ब्रह्माकुमारियों के आगे प्रजापिता अक्षर ज़रूर लिखना है। प्रजापिता कहने से बाप सिद्ध हो जाता है। (मु. 7.9.77 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
लक्ष्मी-नारायण का चित्र बहुत अच्छा है। इनमें सारा सेट है। त्रिमूर्ति भी, लक्ष्मी-नारायण भी, राधे-कृष्ण भी हैं। यह चित्र भी कोई रोज देखता रहे तो याद रहे शिवबाबा ब्रह्मा द्वारा हमको यह बना रहे हैं।” (मु. 7.8.65 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
अपना एम ऑब्जेक्ट देखने से ही रिफ्रेशमेंट आ जाती है, इसलिए बाबा कहते हैं कि यह लक्ष्मी-नारायण का चित्र हरेक के पास होना चाहिए।... यह चित्र दिल में प्यार बढ़ाता है।” (मु. 11.1.66 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
सभी के घर में यह ल.ना. का चित्र ज़रूर होना चाहिए। कितना एक्युरेट चित्र है। इनको याद करेंगे तो बाबा याद आवेगा। बाबा को याद करो तो यह याद आवेगा।” (मु. 1.1.69 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बाबा कहते हैं जब भी फुर्सत मिले तो ल.ना. के चित्र सामने आकर बैठो। रात को भी यहाँ आकर सो सकते हो । इन ल.ना. को देखते-2 सो जाओ।” (मु. 20.1.74 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
राधे-कृष्ण साथ फिर ल.ना. का क्या संबंध है, यह बाप ही आकर समझाते हैं।” (मु. 29.4.71 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
कृष्ण का तो जब स्वयंवर हो ता है, नाम ही बदल जाता है। हाँ, ऐसे कहेंगे लक्ष्मी-नारायण के बच्चे थे। राधे-कृष्ण ही स्वयंवर बाद लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। तब एक बच्चा हो ता है। फिर उनकी डिनायस्टी चलती है। (मु. 16.8.70 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
“ ल.ना. के चित्र के साथ राधे-कृष्ण भी हों तो समझाने में सहज होगा। यह है करेक्ट चित्र। इसकी लिखत भी बड़ी अच्छी है।” (मु. 2.1.73 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
ल.ना.के फीचर्स बदलने नहीं चाहिए। नहीं तो कहेंगे इतने फीचर्स होते हैं क्या। फीचर्स एक ही होनी चाहिए।” (मु. 24.2.73 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
“ निराकार से क्या निराकारी वर्सा चाहिए? ” (मु. 7.10.73 पृ. 4 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
ल.ना. को गॉड-गॉडेज़ कहते हैं अर्थात् गॉड द्वारा यह वर्सा पाया है।” (मु. 7.2.76 पृ.1 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
इन ल.ना. को निराकार ने ऐसा बनाया।” (मु. 24.5.64 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
कहते हैं ना कि गॉड-गॉडेज का राज्य था। भगवती श्री लक्ष्मी, भगवान श्री नारायण का राज्य कहा जाता है। थे तो अब कहाँ गए?... अभी भी वह भिन्न नाम-रूप में यहाँ हैं यह राज़ सभी(अभी) तुम जानते हो । यह बातें समझने से बच्चों को खुशी होनी चाहिए कि बाप हमको पढ़ा ऐसा बना रहे हैं। नम्बरवन हीरो, हीरोइन यह हैं।” (मु. 9.12.71 पृ.1 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
यह ल.ना. चैतन्य में थे तो सुख ही सुख था। सब धर्म वाले इनको पूजते, गार्डन ऑफ अल्लाह कहते हैं। ” (मु. 2.10.70 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
पहले है परमपिता परमात्मा रचयिता।” (मु. 20.10.73 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
जैसे त्रिमूर्ति का चित्र है, नीचे लिखते हैं दैवी स्वराज्य जन्मसिद्ध अधिकार है। ” (मु. 19.3.75 पृ.1आदि) मुरली प्रूफ देखें
ब्राह्मण भी यहाँ बनना है। देवता भी यहाँ ही बनावेंगे।” (मु. 27.2.76 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
जब जन्मसिद्ध अधिकार है तो जन्म लेने से ही प्राप्त है- तब अधिकारी तो बन ही गए ना। (अ.वा.29.1.75 पृ.30 अंत) मुरली प्रूफ देखें
बाप स्वर्ग का रचयिता है तो ज़रूर स्वर्ग का वरसा ही देगा और देंगे भी ज़रूर नर्क में।” (मु. 8.6.68 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
तुम बच्चों को सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण यहाँ (संगमयुग पर) बनना है।” (मु. 25.3.74 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
लाल टीका है सूरत की शोभा। चन्दन है आत्मा की शोभा।” (पुरानी अ.वा.6.7.69 पृ.82 अंत) मुरली प्रूफ देखें
मस्तक में यह स्मृति धारण करो कि मैं आनन्द स्वरूप हूँ- यह मस्तक की चिन्दी हो गई। (अ.वा. 9.1.80 पृ.190 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
इतनी ज़िम्मेवारी के अधिकारी समझ करके चलो। स्व-परिवर्तन, विश्व-परिवर्तन दोनों के ज़िम्मेवारी के ताजधारी सो विश्व के राज्य के ताज अधिकारी होंगे। संगमयुगी ताजधारी सो भविष्य ताजधारी। वर्तमान नहीं तो भविष्य नहीं। वर्तमान ही भविष्य का आधार है। चेक करो और नॉलेज के दर्पण में दोनों स्वरूप देखो - संगमयुगी ब्राह्मण और भविष्य देवपदधारी। दोनों रूप देखो और फिर दोनों में चेक करो- ब्राह्मण जीवन में डबल ताज है वा सिंगल ताज है? एक है पवित्रता का ताज, दूसरा है प्रैक्टिकल जीवन में पढ़़ाई और सेवा का। दोनों ताज समान हैं? सम्पूर्ण हैं वा कुछ कम हैं? अगर यहाँ कोई भी ताज अधूरा है, चाहे पवित्रता का, चाहे पढ़ाई वा सेवा का, तो वहाँ भी छोटे-से ताज अधिकारी वा एक ताजधारी अर्थात् प्रजा पद वाले बनना पड़ेगा; क्योंकि प्रजा को भी लाइट का ताज तो होगा अर्थात् पवित्र आत्माएँ होंगी; लेकिन विश्वराजन् वा विश्वमहाराजन् का ताज नहीं प्राप्त होगा। कोई महाराजन्, कोई राजन् अर्थात् राजा, महाराजा और विश्व महाराजा, इसी आधार पर नम्बरवार ताजधारी होंगे। (अ.वा. 12.10.81 पृ.37 आदि) मुरली प्रूफ देखें
ताज है जिम्मेवारी का। स्वयं की जिम्मेवारी और विश्व की जिम्मेवारी। ”(अ.वा. 11.7.74 पृ.102 अंत) मुरली प्रूफ देखें
जितना बड़ा ज़िम्मेवारी का ताज उतना ही सतयुग में भी बड़ा ताज मिलेगा। ” (अ.वा. 11.7.70 पृ.289 अंत) मुरली प्रूफ देखें
बाबा ने यह भी समझाया है डबल सिरताज यह सिर्फ नाम है। बाकी लाइट का ताज वहाँ कोई रहता नहीं है। यह तो पवित्रता की निशानी है।” (मु. 9.11.69 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
कभी स्वप्न में भी अपवित्रता के संकल्प नहीं आये इसको कहा जाता है प्योरिटी की पर्सनैलिटी वाले।” (अ.वा. 8.1.79 पृ.191 आदि) मुरली प्रूफ देखें
भविष्य का ताज और त़ख्त इस ताज और त़ख्त के आगे कुछ भी नहीं है। ” (अ.वा. 6.6.73 पृ.87 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
तख्त को तो जानते हो- बाप के दिलत़ख्तनशीन। लेकिन यह दिल तख्त इतना प्योर है जो इस तख्त पर सदा बैठ भी वही सकते जो सदा प्योर हैं। बाप तख्त से उतारते नहीं; लेकिन स्वयं उतर आते हैं। (अ.वा. 12.12.79 पृ.107 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
बापदादा सभी को विशेष एक गिफ्ट दे रहे हैं। कौन-सी? विशेष एक श्रृंगार दे रहे हैं। वह है “सदा शुभ चिंतक की चिंदी”। ताज के साथ-साथ यह चिन्दी ज़रूर होती है। जैसे आत्मा बिन्दी चमक रही है ऐसे मस्तक के बीच यह चिन्दी की मणी भी चमक रही है।” (अ.वाणी. 19.3.81 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
लाल टीका है सूरत की शोभा। चन्दन है आत्मा की शोभा।” (अ.वा. 6.7.69 पृ.82 अंत) मुरली प्रूफ देखें
मस्तक में यह स्मृति धारण करो कि मैं आनन्द स्वरूप हूँ- यह मस्तक की चिन्दी हो गई।” (अ.वा. 9.1.80 पृ.190 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
जैसे मस्तक में तिलक चमकता है वैसे भाई-2 की स्मृति अर्थात् आत्मिक स्मृति की निशानी मस्तक बीच बिन्दी चमक रही थी।” (अ.वा. 23.3.81 पृ.86 आदि) मुरली प्रूफ देखें
अमृतवेले सदा अपने मस्तक में विजय का तिलक अर्थात् स्मृति का तिलक लगाओ।... सुहाग की निशानी भी तिलक है। (अ.वा. 21.11.92 पृ.86 आदि) मुरली प्रूफ देखें
अमृतवेले सदा तीन बिंदियों का तिलक लगाओ। आप भी बिंदी, बाप भी बिंदी और जो हो गया, जो हो रहा है, नथिंग न्यु, तो फुलस्टॉप भी बिंदी। (अ.वा.9.1.93 पृ.165 अंत) मुरली प्रूफ देखें
बाबा कहते हैं तुमको राजतिलक दे रहा हूँ। मैं स्वर्ग का रचयिता तुमको राजतिलक न दूँगा तो कौन देगा? कहते हैं ना तुलसीदास चन्दन घिसे..... यह बात यहाँ की है। वास्तव में राम शिवबाबा है।” (मु. 5.3.73 पृ.3 आदि)3 मुरली प्रूफ देखें
त़ख्त को तो जानते हो- बाप के दिलत़ख्त नशीन। लेकिन यह दिल त़ख्त इतना प्योर है जो इस त़ख्त पर बैठ भी वही सकते जो सदा प्योर हैं। बाप त़ख्त से उतारते नहीं; लेकिन स्वंय उतर आते हैं। (अ.वा.12.12.79 पृ.107 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
भविष्य का ताज और त़ख्त इस ताज और त़ख्त के आगे कुछ भी नहीं है।” (अ.वा.6.6.73 पृ.87 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
नयनों में रूहानियत की चमक, रूहानी नज़र। जिस्म को देखते हुए न देख रूहों को देखने के अभ्यास की चमक थी। रूहानी प्रेम की झलक थी।” (अ.वा. 23.3.81 पृ.86 आदि) मुरली प्रूफ देखें
दिव्य नयनों द्वारा अर्थात्..... दृष्टि द्वारा शान्ति की शक्ति, प्रेम की शक्ति, सुख वा आनन्द की शक्ति सब प्राप्त हो ती है।” (अ.वा. 11.11.89 पृ.15 आदि, 18मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
ऐसे बहुत पुरुष आते हैं- जिनकी स्त्रियाँ नहीं आती हैं। मानती ही नहीं हैं। लिखते हैं कि बाबा हमारी स्त्री तो शूर्पनखा, पूतना है। बहुत तंग करती है। क्या करुँ। बाबा तो लिखते हैं तुम तो कोई कमजोर हो। उनको समझाओ। तुमने तो प्रतिज्ञा की थी कि आज्ञा मानेंगी। तुम अपनी स्त्री को ही वश नहीं कर सकते हो तो विकारों को कैसे वश करेंगे। तुम्हारा फर्ज़ है स्त्री को अपने हाथ में रखना। प्यार से समझाना। (मु. 24.4.72 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
होंठों पर प्रभु प्राप्ति आत्मा और परमात्मा के महान मिलन की और सर्व प्राप्तियों की मुस्कान...। चेहरे पर मात-पिता और श्रेष्ठ परिवार से बिछुड़े हुए कल्प बाद मिलने के सुख की लाली...। (अ.वा.23.3.81 पृ.86 आदि) मुरली प्रूफ देखें
नर और नारी दोनों ही जो ज्ञान को सिमरण करते हैं वह ऐसे हर्षित रहते हैं। तो हर्षित रहने का साधन क्या हुआ? ज्ञान का सिमरण करना। जो जितना ज्ञान को सिमरण करते हैं वह उतना ही हर्षित रहते हैं।” (अ.वा. 16.6.72 पृ.309 अंत) मुरली प्रूफ देखें
आवाज़ से हँसना न है। ल.ना. को हर्षितमुख कहा जाता है। हर्षितमुख रहना और हँसना अलग बात है। हर्षित मुख रहने से वह गुप्त खुशी रहती है। आवाज़ से हँसना बुरी बात है। हर्षित रहना सभी से अच्छा है। खिल-2 करना भी एक विकार है। ” (मु. 8.9.73 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
कानों द्वारा भी आनन्द स्वरूप बनने की बातें सुनते रहना, यह कानों का श्रृंगार है। ” (अ.वा. 9.1.80 पृ.190 अंत) मुरली प्रूफ देखें
मुख द्वारा अर्थात् गले में भी आनन्द दिलाने की बातें हों- यह गले की माला हो गई।” (अ.वा. 9.1.80 पृ.190 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
हाथों द्वारा अर्थात् कर्म में भी आनन्द स्वरूप की स्थिति हो -ये हाथों के कंगन हो गए।” (अ.वा. 9.1.80 पृ.190 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
शक्तियों के अलंकार, और शक्तियों की ललकार और शक्तियों के किस कार्य का गायन है।--- घुंगरू डालकर असुरों के ऊपर नाचना है। नाचने से क्या होता है? जो भी चीज़ होगी वह दबकर ख़त्म हो जावेगी। निर्भयता और विनाश की निशानी यह घुंगरू की झंकार है। (अ.वा. 4.11.76 पृ.2) मुरली प्रूफ देखें
शक्तियों का या गोपिकाओं का यादगार है, खुशी में नाचना। पाँव में घुंघरू डालकर नाचते हुए दिखाते हैं। जो सदा खुशी में रहते उनके लिए कहते- खुशी में नाच रहा है। नाचते हैं तो पांव ऊपर रखते हैं। ऐसे ही जो खुशी में नाचने वाले होंगे उनकी बुद्धि ऊपर रहेगी। देह की दुनिया व देहधारियों में नहीं; लेकिन आत्माओं की दुनिया में, आत्मिक स्थिति में होंगे।” (अ.वा. 21.5.77 पृ.168 अंत) मुरली प्रूफ देखें
पाँव द्वारा आनन्द स्वरूप बनाने की सेवा की तरफ पाँव हों अर्थात् कदम-2 आनन्द स्वरूप बनने और बनाने को ही उठें, यह पाँव का श्रृंगार है।” (अ.वा. 9.1.80 पृ.190 अंत) मुरली प्रूफ देखें
जैसे बाप निराकार से आकारी वस्त्र धारण करते हैं। आकारी और निराकारी बाप-दादा बन जाते हैं- आप भी आकारी फरिश्ता ड्रेस पहनकर आओ, चमकीली ड्रेस पहनकर आओ, तब मिलन होगा। ड्रेस पहनना नहीं आता है क्या? ड्रेस पहनो और पहुँच जाओ। यह ऐसी ड्रेस है जो माया के वॉटर या फायर प्रूफ है। ” (अ.वा.28.11.79 पृ.59 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बाप-दादा द्वारा भिन्न-भिन्न टाइटिल्स बच्चों को मिले हुए हैं। तो भिन्न-भिन्न टाइटिल्स की स्थिति रूपी ड्रेस और भिन्न-भिन्न गुणों के श्रृंगार के सेट हैं।...उसी टाइटिल की स्थिति में स्थित होना अर्थात् ड्रेसेज़ को धारण करना। कभी विश्व-कल्याणकारी की ड्रेस पहनो, कभी मास्टर सर्व शक्तिवान की और कभी स्वदर्शन चक्रधारी की। जैसा समय, जैसा कर्तव्य वैसी ड्रेस धारण करो।...अब एक सेट समझ लिया? पूरा ही सेट ही धारण कर लिया? ऐसे अलग-अलग समय पर अलग-अलग सेट धारण करो।.... तो आपके इतने श्रेष्ठ श्रृंगार के सेट हैं। वह धारण क्यों नहीं करते हो ? पहनते क्यों नहीं हो ? इतनी सब भिन्न-भिन्न प्रकार की सुन्दर ड्रेसेज़ छोड़कर देह-अभिमान के स्मृति की मिट्टी वाली ड्रेस क्यों पहनते हो ? ” (अ.वा.9.1.80 पृ.190 अंत ,191आदि) मुरली प्रूफ देखें
सतयुग में तो बुद्धू होंगे। इन ल.ना. को कुछ भी नॉलेज नहीं है।” (मु. 17.4.71 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
बाप समझाते हैं तुम कितने बेसमझ बन गए हो । अब समझदार बनाते हैं। यह (ल.ना.) समझदार हैं, तब तो विश्व के मालिक हैं। बेसमझ तो विश्व के मालिक हो न सकें।” (मु. 29.7.70 पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
तुम जानते हो कि अभी हम ईश्वरीय संतान हैं, फिर हम दैवी संतान बनेंगे तो डिग्री कम हो जावेगी। यह (ल.ना.) भी डिग्री कम है; क्योंकि इनमें ज्ञान नहीं है। ज्ञान ब्राह्मणों में है। ज्ञान बिगर मनुष्य को क्या कहेंगे? अज्ञानी। इन (ल.ना.) को अज्ञानी नहीं कहेंगे। इन्होंने ज्ञान ही से यह पद पाया है। (मु. 4.6.67 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
अब हीरे जैसा जन्म तो सब कहेंगे इन ल.ना. का ही है।” (मु. 5.2.67 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
तुम (सब) बता देंगे इन ल.ना. का जन्म कब हुआ। आज से 10 वर्ष कम 5000 वर्ष हुआ। फिर कल 9 वर्ष कम 5000 वर्ष।” (सन् 66 की वाणी है) (मु. 4.3.70 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
पुरुषोत्तम संगमयुग पर हीरे जैसा जीवन बनता है। इनको (ल.ना.) को हीरे जैसा नहीं कहेंगे। तुम्हारा हीरे जैसा जन्म है। तुम हो ईश्वरीय संतान, ... यह दैवी संतान।” (मु. 28.4.68 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
नारायण से पहले तो श्रीकृष्ण है, फिर तुम ऐसे क्यों कहते हो नर से नारायण बने? क्यों नहीं कहते हो नर से कृष्ण बने? पहले-2 नारायण थोड़े ही बनेंगे। पहले तो श्रीकृष्ण प्रिन्स ही बनेंगे ना।... बाप कहते हैं अभी तुम (हम बच्चे) नर से नारायण, नारी से लक्ष्मी बनने वाले हो । गाया भी जाता है बेगर टू प्रिन्स।” (मु. 16.7.68 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
ल.ना. ने ज़रूर आगे (2018) जन्म में संगम पर राज्य लिया है। लक्ष्मी-नारायण ही 84 जन्म भोग अब इस अंतिम जन्म में हैं। ल.ना. को राज्य किसने दिया? देने वाला कोई तो होगा ना। तो यह सिद्ध होता है ज़रूर भगवान (ने) दिया होगा; पंरतु कैसे दिया। सतयुग आदि में यह महाराजा-महारानी कैसे बने यह बाप बैठ समझाते हैं।” (मु. 21.4.72 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
कृष्ण का कितना नाम गाया जाता है। उनके बाप का नाम ही नहीं। उनका बाप कहाँ है? ज़रूर राजा का बच्चा होगा ना। ....कृष्ण जब है तब थोड़े ही पतित रहते हैं। जब वह बिल्कुल खलास हो जाते हैं तब यह गद्दी पर बैठते हैं, अपना राज्य ले लेते हैं। तब से ही उनका संवत् शुरू होता है। लक्ष्मी-नारायण से ही संवत् शुरू होता है।” (मु. 29.1.71 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
हमारा नया वर्ष तो हो गा 1-1-1। एक तारीख, एक मास, एक वर्ष।” (मु. 22.10.68 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
दिन-प्रतिदिन इम्प्रूवमेंट बहुत होती जावेगी। कहीं बच्चे चित्रों में तिथी-तारीख याद लगाना भूल जाते हैं। ल.ना. के चित्र में तिथी-तारीख ज़रूर होनी चाहिए।” (मु. 3.6.67 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
यह अभी जानते हैं हम सो (संगमयुगी) ल.ना. बनते हैं। हम सो राम-सीता बनेंगे।” (मु. 25.5.72 पृ.3 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
सतयुग में ल.ना. का राज्य है। फिर वही त्रेता में भी राज्य करते हैं।” (मु. 9.11.72 पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
सतयुग को रामपुरी कहा जाता है। अक्षर कहते हैं; परंतु यह नहीं जानते कि राम कौन है? ” (मु.4.3.70 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
जिस नाम से (रामराज्य की) स्थापना होती तो ज़रूर उनका नाम ही रखेंगे।” (मु. 25.5.74 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
रामराज्य है सतयुग (के ) आदि में।” (मु. 2.8.76 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
जब विश्वराजन बनेंगे तो विश्व का बाप ही कहलाएँगे ना। विश्व के राजन विश्व के बाप हैं ना। (अ.वा.6.8.70 पृ.303 अंत) मुरली प्रूफ देखें
विश्व राजन बनना व सतयुगी राजन बनना इसमें भी अंतर है।” (अ.वा.28.1.85 पृ.146 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
राम भी वास्तव में जगतजीत था ना। (मु. 15.1.72 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
ऊँच-ते-ऊँच बाप से ऊँच-ते-ऊँच वरसा मिलता है। वह (वरसा) है ही भगवान (भगवती का)। फिर सेकेंड में हैं ल.ना. विश्व के मालिक।” (मु. 8.1.67 पृ.2 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
भगवान (शिव) ने ज़रूर भगवती-भगवान पैदा किये। (मु. 24.5.64 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
वह है ही वण्डर ऑफ वर्ल्‍ड स्वर्ग। पैराडाइज़। यहाँ सात वण्डर्स कहते हैं ना। यह हैं मायावी। ईश्वरीय वण्डर है स्वर्ग। वह स्वर्ग का वण्डर अभी न है तो माया के वण्डर्स बनते हैं।” (मु. 9.2.68 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
स्वर्ग को भी वण्डर कहा जाता है ना। कितना शोभनिक है। माया के सात वण्डर्स हैं। बाप का है एक वण्डर। वह सात वण्डर्स एक पूर में रखो और यह एक पूर में रखो तो भी यह भारी हो जावेगा।” (मु. 5.12.68 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
तुम स्वर्ग की स्थापना कर रहे हो । तुम्हारे जैसा इंजीनियर, ऑफिसर कोई हो न सके।” (मु. 23.2.68 पृ.4 अंत) मुरली प्रूफ देखें
1. सतयुग की दिनचर्या में प्रकृति के नैचुरल साज जगायेंगे लेकिन संगमयुगी ब्राह्मणों के आदिकाल- अमृतवेले से श्रेष्ठता देखो तो कितनी महान है। वहाँ प्रकृति का साधन है और संगमयुग पर आदिकाल अर्थात् अमृतवेले कौन जगाता है? स्वयं प्रकृति का मालिक भगवान तुम्हें जगाता है। 2. मधुर साज़ कौन-सा सुनते हो ? बाप रोज़“बच्चे - मीठे बच्चे” कहकर बुलाते हैं। यह नैचुरल साज़, ईश्वरीय साज़ सतयुगी प्रकृति के साज़ से कितना महान है। उसके अनुभवी हो ना? तो सतयुगी साज़ महान हैं या ये संगमयुग के साज़ महान हैं? साथ-2 सतयुग के संस्कार और प्रारब्ध बनाने व भरने का समय है। संस्कार भरते हैं, प्रारब्ध बनती है। इसी संगमयुग पर ही सब होता है। 3. वहाँ सतोप्रधान अति स्वादिष्ट रस वाले वृक्ष के फल खाएंगे। यहाँ वृक्षपति द्वारा सर्वसंबंध के रस, सर्वप्राप्ति-संपन्न प्रत्यक्ष फल खाते हो । 4. वह गोल्डन एज का फल है और यह डायमन्ड एज का फल है, तो श्रेष्ठ कौन-सा हुआ? 5. वहाँ दास-दासियों के हाथ में पलेंगे यहाँ बाप के हाथों में पल रहे हो । 6. वहाँ महान आत्माएँ माँ-बाप होंगे, यहाँ परमात्मा माता-पिता हैं। 7. वहाँ रतन जड़ित झुलों में झूलेंगे यहाँ सबसे बड़े-से-बड़ा झूला कौन-सा है, वह जानते हो ? बाप की गोदी झूला है। बच्चे के लिए सबसे प्यारा झूला माता-पिता की गोदी है। सिर्फ़ एक झूला भी नहीं, भिन्न-2 झूलों में झूल सकते हो। अतीन्द्रिय सुख का झूला, खुशियों का झूला।--- 8. वहाँ रत्नों से खेलेंगे, खिलौनों से खेलेंगे, आपस में खेलेंगे लेकिन यहाँ बाप कहते हैं, सदा मेरे से, जिस भी रूप में चाहो उस रूप में खेल सकते हो । सखा बन करके खेल सकते हो, बंधू बन खेल सकते हो । बच्चा बन करके भी खेल सकते हो । बच्चा बना करके भी खेल सकते हो । ऐसा अविनाशी खिलौना तो कभी नहीं मिलेगा। जो न टूटेगा, न फूटेगा और खर्चा भी नहीं करना पड़ेगा। 9. वहाँ आराम से गदेलों पर सोयेंगे, यहाँ याद के गदेलों पर सो जाओ। 10. वहाँ निन्द्रा-लोक में चले जाते हो; लेकिन संगम पर बाप के साथ सूक्ष्मवतन में चले जाओ। 11. वहाँ के विमानों में सिर्फ़ एक लोक का सैर कर सकेंगे और अब बुद्धि रूपी विमान द्वारा तीनों लोगों का सैर कर सकते हो । 12. वहाँ विश्वनाथ कहलायेंगे और अब त्रिलोकीनाथ हो । 13. वहाँ दो नेत्री होंगे, यहाँ तीन नेत्री हो । 14. संगमयुग के अंतर में अर्थात् नालेजफुल, पावरफुल, ब्लिसफुल इसके अंतर में वहाँ क्या बन जायेंगे? रॉयल बुद्धू बन जायेंगे। 15. दुनिया के हिसाब से परमपूज्य होंगे, विश्व द्वारा माननीय होंगे; लेकिन नालेज के हिसाब से महान अंतर पड़ जायेगा। 16. यहाँ तो गुडमार्निंग, गुडनाइट बाप से करते हो और वहाँ आत्माएँ आत्माओं से करेंगी। 17. वहाँ विश्व राज्य-अधिकारी होंगे, राज्य-कर्ता होंगे और यहाँ विश्व कल्याणकारी, महादानी, वरदानी हो । तो श्रेष्ठ कौन हुए? सतयुगी बातें तो सुनकर सदा खुशी स्वरूप बन जाओ। 18. वहाँ वैराइटी प्रकार का भोजन खायेंगे और यहाँ ब्रह्मा भोजन खाते हो जिसकी महिमा देवताओं के भोजन से भी अति श्रेष्ठ है। तो सदा सतयुगी प्रारब्ध और वर्तमान समय के महत्व और प्राप्ति को साथ-2 रखो। (अ.वाणी 7.1.80 पृ.753, 754, 755) मुरली प्रूफ देखें
ऐसे दुनिया में जाते हैं जहाँ शेर बकरी इकट्ठे जल पीते हैं।” (मु. 8.5.70 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
बाबा कहे यह काम न करो, मानेंगे नहीं। ज़रूर उल्टा काम करके दिखावेंगे। राजधानी स्थापन हो रही है, उसमें तो हर प्रकार की(के) चाहिए ना।” (मु.10.12.68 पृ.3 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
विश्व का राजा वह बनेगा जो विश्व के (की) हर आत्मा से संबंध जोड़ेंगे और सहयोगी बनेंगे। जैसे बापदादा विश्व के स्नेही और सहयोगी बने, वैसे बच्चों को भी फॉलो करना है, तब विश्व के महाराजन की जो पदवी है उसमें आने के अधिकारी बन सकते हो ।” (अ.वा. 28.10.76 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
देहीअभिमानी बनने बिगर राजाएँ बन न सकेंगे।” (मु. 3.3.69 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
राज्य अधिकारी बनना है तो स्नेह के साथ पढ़ाई की शक्ति अर्थात् ज्ञान की शक्ति, सेवा की शक्ति, यह भी आवश्यक है। (अ.वा. 18.1.85 पृ.132 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
जो महारथी कहलाए जाते हैं उनकी प्रैक्टिस और प्रैक्टिकल साथ-2 होना चाहिए।... महारथियों की निशानी होगी प्रैक्टिस की और प्रैक्टिकल हुआ। घोड़ेसवार प्रैक्टिस करने के बाद प्रैक्टिकल में आवेंगे और प्यादे प्लैन्स ही सोचते रहेंगे।” (अ.वा. 26.3.70 पृ.228 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
महावीर बच्चों की विशेषता यह है कि पहले याद को रखते, फिर सेवा को रखते। घोड़ेसवार और प्यादे पहले सेवा, पीछे याद। इसीलिए फर्क पड़ जाता है। पहले याद, फिर सेवा करें तो सफलता है। पहले सेवा को रखने से सेवा में जो भी अच्छा-बुरा होता है उसके रूप में आ जाते हैं और पहले याद को रखने से सहज ही न्यारे हो सकते हैं।” (अ.वा. 29.4.84 पृ.281 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
इसी तरह से साहूकार प्रजा भी होगी। तो यहाँ भी कई राजे नहीं बने हैं; लेकिन साहूकार बने हैं; क्योंकि ज्ञान रत्नों का खजाना बहुत है, सेवा कर पुण्य का खाता भी जमा बहुत है; लेकिन समय आने पर स्वयं को अधिकारी बनाकर सफलतामूर्त बन जायँ वह कंट्रोलिंग पावर और रूलिंग पावर नहीं है अर्थात् नॉलेजफुल हैं; लेकिन पावरफुल नहीं हैं। शस्त्रधारी हैं; लेकिन समय पर कार्य में नहीं ला सकते हैं। स्टॉक है; लेकिन समय पर न स्वयं यूज़ कर सकते और न औरों को यूज़ करा सकते हैं। विधान आता है; लेकिन विधि नहीं आती। ऐसे भी संस्कार वाली आत्माएँ हैं अर्थात् साहूकार संस्कार वाली हैं। जो राज्य अधिकारी आत्माओं के सदा समीप के साथी ज़रूर होते हैं; लेकिन स्व-अधिकारी नहीं होते।” (अ.वा. 14.1.82 पृ.238 अंत, 239 आदि) मुरली प्रूफ देखें
जो प्रजा में साहूकार बनने होंगे वह ज्ञान भी सुनेंगे, बीज भी बोयेंगे; लेकिन पढ़ाई ज्यादा नहीं पढ़ेंगे। पवित्र रहेंगे। (मु.31.7.73 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
कोई भी कर्म-इन्द्रियों के वशीभूत होना अर्थात् रूलिंग पावर नहीं है, जिससे कि “स्व” पर राज्य नहीं कर सकता।... जब स्वयं पर प्रजा का राज्य है और कर्म-इन्द्रियाँ प्रजा हैं तो जब तक प्रजा का राज्य है तो समझो प्रजा बनने वाले हैं।” (अ.वा. 11.10.75 पृ.175 अंत) मुरली प्रूफ देखें
बार-2 कोई न कोई कर्म-इन्द्रियों के वा देहधारियों और देह के सम्पर्क से उन्हों के दास बन जाते हैं और उदास हो जाते हैं तो समझो दास-दासी बनने वाले हैं।” (अ.वा. 11.10.75 पृ.176 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
जो आश्चर्यवत् भागन्ति होते वे तो प्रजा में चंडाल बनेंगे; परंतु जो यहाँ रह बहुत शैतानी, चोरी-चकारी आदि करते हैं तो वो रॉयल घराने के चंडाल बनते हैं। फिर भी पिछाड़ी में उनको ताज-पतलून मिल जाती है।... यहाँ गोद तो लेते हैं ना।” (मु. 9.8.64 पृ.4 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बाप कहते हैं ना जो जाकर मेरी निंदा करते हैं, ग्लानि करते हैं, हाथ छोड़जाते हैं वो प्रजा में जाकर चाण्डाल बनते हैं।” (मु. 10.7.67 पृ.3 आदि)90 मुरली प्रूफ देखें
कब क्रोध न करना है। उसी समय तुम ब्राहमण नहीं, चाण्डाल हो; क्योंकि क्रोध का भूत है। (मु. 7.5.77 पृ.3मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
पढ़ाई से कब रूठना नहीं है। कोई से अनबनत हो तो भी पढ़ाई नहीं छोड़नी चाहिए। पढ़ाई से लड़ने-झगड़ने का ताल्लुक़ नहीं। पढ़ेंगे-लिखेंगे होंगे नवाब। लड़ेंगे-झगड़ेंगे तो नवाब थोड़े बनेंगे। वह तो फिर तमोप्रधान चलन हो जाती है।” (मु. 5.3.69 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
तुम बच्चों को रेगुलर बनना है। बापदादा रेगुलर किसको कहते हैं। रेगुलर उनको कहा जाता है जो सुबह से लेकर रात तक जो भी कर्तव्य करता है वह श्रीमत के प्रमाण करता है। सबमें रेगुलर।--- रेगुलर चीज़ अच्छी होती है। जितना जो रेगुलर होता है उतना दूसरों की सर्विस ठीक कर सकता है। ” (अ.वा. 23.10.70 पृ.316 अंत) मुरली प्रूफ देखें
जहाँ तक जीना है अमृत पीना है, शिक्षा को धारण करना है। अपसेन्ट तो कब न होना चाहिए। यहाँ-वहाँ से ढूँढ़कर, कोई से लेकर भी मुरली पढ़नी चाहिए। बाबा जानते हैं- बहुत बच्चे हैं, अच्छे-2 नंबरवन में जिनको गिनते हैं, वह भी मुरली मिस कर देते हैं। अपना ही घमण्ड आ जाता है। अरे, भगवान बाप पढ़ाते हैं, (उ)समें तो एक दिन भी मिस न होना चाहिए। ऐसी-2 गुह्य प्वॉइन्ट्स निकतली(निकलती) हैं, जो तुम्हारा वा किसका भी कपाट खुल सकते हैं।” (मु.16.6.68 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
यहाँ के नम्बरवन रेगुलर और पंक्चुअल गॉडली स्टूडेन्ट वहाँ भी साथ-2 पढ़ेंगे; क्योंकि ब्रह्मा बाप नम्बरवन गॉडली स्टूडेन्ट है।” (अ.वा. 8.1.79 पृ.189 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
प्रिन्स का ज़रूर राजा-महाराजा पास ही जन्म होगा।” (मु. 21.4.71 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
कोई ऊपर से नई आत्माएँ तो नहीं आईं, जिनको भगवान ने राजाई दे दी। नहीं। इन्हों को पुराना से नया बनाया हुआ है। जिसको रिज्युविनेट वा काया कल्पतरू भी कहा जाता है।” (मु. 11.3.73 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
प्रकृति को भी पावन बनाना है, तब ही विश्व परिवर्तन होगा।” (अ.वा. 25.5.73 पृ.72 अंत) मुरली प्रूफ देखें
ऐसी कोई बात नहीं जो तुमसे लागू नहीं होती है। तुम सर्जन भी हो, सर्राफ भी हो, धोबी भी हो। सब खासियतें (विशेषताएँ) तुम्हारे में आ जाते हैं।” (मु. 14.4.68 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
तुम वण्डरफुल हो ना। सारे भारत को ही तुम निरोगी बनाते हो। वह डॉक्टर लोग भी तुम्हारे आगे क्या हैं।” (मु. 23.2.68 पृ.4 अंत) मुरली प्रूफ देखें
नानक ने भी कहा न- मूत पलीती कपड़ धोय। लक्ष्य सोप है न! बाबा कहते हैं मैं कितना अच्छा धोबी हूँ। तुम्हारे वस्त्र (आत्मा और शरीर) कितना शुद्ध बनाता हूँ। ऐसा धोबी कब देखा? ” (मु. 21.5.64 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
वह बाप भी है, नइया को पार लगाने वाला खेवइया भी है।... क्या शरीर को ले जावेंगे? अभी तुम बच्चे समझते हो बरोबर हमारी आत्मा को पार ले जाते हैं।... इनको वस्त्र भी कहते हैं, नइया भी कहते हैं।” (मु. 3.11.68 पृ.1 मध्यादि, 2 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
बाप बैठ अर्थ समझाते हैं। जैसे सर्प पुरानी खल आपे ही छोड़ देते हैं और नई खल आ जाती है। उनके लिए ऐसे नहीं कहेंगे एक शरीर छोड़ दूसरे में प्रवेश करती है। नहीं। खल बदलने का एक ही सर्प का मिसाल है। वह खल उसको देखने में आते हैं। जैसे कपड़ा उतारा जाता है वैसे सर्प भी खल छोड़देता। दूसरी मिल जाती है। सर्प तो जीता ही रहता है। ऐसे भी नहीं सदैव अमर रहता है। द¨/तीन खल बदली कर फिर मर जावेंगे।” (मु.18.7.70 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
ऊपर जाना माना मरना, शरीर छोड़ना। मरना कौन चाहते? यहाँ तो बाप ने कहा है तुम इस शरीर को भी भूल जाओ। जीते जी मरना तुमको सिखलाते हैं। (मु.25.8.74 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
यह तो बहुत ही बड़ा वैल्युएबल शरीर है। इस शरीर द्वारा ही आत्मा को बाप से (विश्व की बादशाही की) लॉटरी मिलती है। (मु.8.10.68 पृ.1 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
इस योगबल से तुम कितने कंचन बनते हो । आत्मा और काया दोनों कंचन बनती है।” (मु.5.12.68 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
विनाश होने बाद थोड़े बचते हैं। उनमें पुण्यात्मा भी रहते हैं। फिर हिसाब-किताब चुक्तू कर सतयुग में तो सब पावन होंगे। संगम पर कुछ पतित कुछ पावन रहते हैं, फिर पतित खलास हो फिर पावन ही पावन रहेंगे।” (मु. 7.6.64 पृ.4 आदि) मुरली प्रूफ देखें
अभी तो दुनिया में 500 करोड़ मनुष्य हैं। सतयुग में जब इन ल.ना. का राज्य हो ता है तो वहाँ 9 लाख हो ते हैं।” (मु. 4.9.69 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
पहले-2 है देवी-देवताओं की संख्या। पहले-2 आदि सनातन देवी-देवता धर्म वाले ल.ना. आवेंगे अपनी प्रजा सहित। और कोई प्रजा सहित नहीं आते। वो एक आवेगा, फिर तीसरा आवेगा।” (मु. 17.5.65 पृ.1 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
राम-(सीता) को भी सतयुग के पहले ल.ना. का दास-दासी बनना पड़े; क्योंकि ल.ना. फुल पास हुए। वो फेल हुआ (यज्ञ में); इसलिए उनको क्षत्रिय कहते हैं। (मु. 20.5.64 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
भल पहले अनपढ़, पढ़े-लिखे आगे भरी ढोते हैं; परन्तु महाराजा-महारानी तो बनेंगे न।” (मु. 8.8.73 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
बाप बच्चों का ओबीडियेंट सर्वेंट हो ता है ना। बच्चों को पैदा कर, उनकी सम्भाल, पढ़ा..., बड़ा बनाकर, फिर बूढ़ा हो ता है तो सारी मिल्कियत बच्चों को देकर खुद.... वानप्रस्थी बन जाते हैं।.... तो बाप-माँ बच्चों के सर्वेंट ठहरे ना।” (मु.16.10.68 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
सतयुग में तुम ही आपस में भाई-बहन थे।... दूसरा को ई सम्बंध नहीं।” (मु. 4.5.74 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
बच्चा किस आयु में आवेगा। वहाँ तो सभी रेग्युलर चलता है ना। वह तो आगे चल कर मालूम पड़ेगा। ऐसे तो नहीं 15/20 वर्ष में कोई बच्चा होगा, जैसेकि यहाँ होता रहता है। नहीं। वहाँ आयु ही 150 वर्ष हो ती है, तो बच्चा कब आवेगा। जब फुल जवानी हो ती है। आधा लाइफ से थोड़ा आगे। उस समय बच्चा आता है; क्योंकि वहाँ आयु बड़ी होती है। एक ही तो बच्चा आना है। फिर बच्ची भी आनी है। कायदा होगा। पहले बच्चा या बच्ची की आत्मा आती है। विवेक कहते हैं पहले बच्चे की ही आत्मा आनी चाहिए। पहले मेल, पीछे फीमेल।” (मु. 29.6.68 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
राधा कुमारी है, कृष्ण कुमार। तो कृष्ण (को) स्वामी कैसे कहेंगे? जब स्वयंवर बाद ल.ना. बनें तब स्वामी कहा जाए।” (मु. 29.9.77 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
इस समय का प्यार भी अशुद्ध है। देवी-देवताओं का प्यार तो बहुत शुद्ध होगा न। मनुष्य समझते है प्यार विकार का ही होता है। परन्तु प्यार तो अनेक प्रकार के हो ते हैं। मोर डेल का भी प्यार है न। आंसू का जल है जिससे बच्चे का शरीर बनता है। एक बूँद से जानवर का गर्भ हो सकता है तो पता नहीं और भी कोई प्यार की रीति हो । तो ऐसे क्यों कहना चाहिए देवताएँ ज़रूर विकार से ही जन्म लेते हैं।” (मु.15.9.73 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
पूछते हैं बच्चे कैसे पैदा होंगे? बोलो कृष्ण को सम्पूर्ण निर्विकारी कहते हो ना। तो जरूर सम्पूर्ण निर्विकारी का बच्चा होगा। योगबल से पैदाइश होगी। देखो पपीते का झाड़ है। मेल फिमेल एक दो के बाजू में होने से बच्चा पैदा हो जाता है। मेल फिमेल बाजू में न होंगे तो बच्चा होगा नहीं। वन्डरफुल बात है ना। तो वहाँ क्यों नहीं योगबल से बच्चा हो सकता है। जैसे मोर डेल का मिसाल है। उनको कहते ही हैं नेशनल बर्ड। प्रेम के आँसू से गर्भ हो जाता है। यह विकार तो नहीं हुआ ना। (मु. 2.12.71 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
वहाँ यह साला, भान्जा, चाचा आदि बहुत (सम्बंध) नहीं होते। सम्बंध बहुत हल्के होते हैं। ” (मु.12.10.74 पृ.3 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
सतयुग में भी तुम ही आपस में भाई-बहन थे।... दूसरा कोई सम्बंध नहीं। ” (मु.22.5.69 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
सतयुग, त्रेता में तो होता ही है एक बच्चा, एक बच्ची। पिछाड़ी में करके थोड़ी गड़बड़ होती है। परन्तु विकार की बात नहीं। (मु.12.12.76 पृ.1 ) मुरली प्रूफ देखें
सतयुग में इतने बच्चे होते ही नहीं। करके मुश्किल से कोई को 3 हो । पीछे आस्ते-2 बच्चे जास्ती होते हैं। (मु. 23.9.71 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
सतयुग का अर्थ ही है, जो भी प्रकृति के सुख हैं, आत्मा के सुख हैं,बुद्धि के सुख हैं, मन के सुख हैं, सम्बन्ध के सुख हैं, जो भी सुख होते वह सब हाजिर हैं। तो अब सोचो प्रकृति के सुख क्या होते हैं, मन का सुख क्या होता है, सम्बन्ध का सुख क्या होता है- ऐसे इमर्ज करो। जो भी आपको इस दुनिया में अच्छे-ते-अच्छा दिखाई देता है- वह सब चीजें पवित्र रूप में सम्पन्न रूप में, सुखदायी रूप में वहाँ होंगी। चाहे धन कहो, तन कहो, मन कहो, मौसम कहो, सब प्राप्ति जो श्रेष्ठ-ते-श्रेष्ठ है उसको ही सतयुग कहा जाता है। एक बहुत अच्छे-ते-अच्छी सुखदायी सम्पन्न फैमली समझो; वहाँ राजा प्रजा समान मर्तबे होते हुए भी परिवार के रूप में चलता है। यह नहीं कहेंगे कि यह दास-दासी हैं। नम्बर होंगे, सेवा होगी; लेकिन दासी है इस भावना से नहीं चलेंगे। जैसे परिवार के सब संबंध खुश मिज़ाज, सुखी परिवार, समर्थ परिवार, जो भी श्रेष्ठता है वह सब है। दुकानों में भी खरीदारी करेंगे तो हिसाब-किताब से नहीं। परिवार की लेन-देन के हिसाब से कुछ देंगे कुछ लेंगे। गिफ्ट ही समझो। जैसे परिवार में नियम होता है- किसके पास ज़्यादा चीज़ होती है तो सभी को बाँटते हैं। हिसाब-किताब की रीति से नहीं। कारोबार चलाने के लिए कोई को ड्यूटि मिली हुई है, कोई को कोई। जैसे यहाँ मधुबन में है ना। कोई कपड़े सम्भालता, को ई अनाज सम्भालता, कोई पैसे तो नहीं देते हो ना। लेकिन चार्ज वाले तो हैं ना। ऐसे वहाँ भी होंगे। सब चीजें अथाह हैं, इसलिए जी हाजिर। कमी तो है ही नहीं। जितना चाहिए जैसा चाहिए वह लो। सिर्फ़ बिज़ी रहने का यह एक साधन है। वह भी खेल 2 है। कोई हिसाब-किताब किसको दिखाना तो है नहीं। यहाँ तो संगम है ना। संगम माना एकानामी। सतयुग माना- खाओ, पिओ, उड़ाओ। इच्छा मात्रम् अविद्या है। जहाँ इच्छा होती वहाँ हिसाब-किताब करना होता। इच्छा के कारण ही नीचे ऊपर होता है। वहाँ इच्छा भी नहीं, कमी भी नहीं। सर्व प्राप्ति हैं और सम्पन्न भी हैं तो बाकी और क्या चाहिए। ऐसे नहीं अच्छी चीज़ लगती तो ज़्यादा ले ली। भरपूर होंगे। दिल भरी हुई होगी। सतयुग में तो जाना ही है ना। प्रकृति सब सेवा करेगी। (अ.वा.14.1.84 पृ.106-107) मुरली प्रूफ देखें
सिवाय एक धर्म के और कुछ भी न रहेगा। सिर्फ भारत ही रहेगा। अगर होंगे भी तो पहाड़ ही होंगे। शायद पहाड़ भी ढक जाते होंगे। अगर जलमई कहें तो क्या इतने2 ऊँचे-2 पहाड़ियाँ हैं हिमालय आदि क्या यह सब चले जावेंगे? इतना पानी ऊँच चढ़ जावेगा। वहाँ तो तुमको कहाँ पहाड़ों आदि भी जाने की दरकार नहीं रहती। ऐसे नहीं तुम कहाँ घूमने जावेंगे। कहाँ भी जाने की दरकार नहीं। कोई भी एक्सीडेंट आदि नहीं।” (मु.9.2.68 पृ.2 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
वह सृष्टि ही नई बन जावेंगी। वहाँ कितने अच्छे-2 फल-फूल होते हैं। हर चीज़ वहाँ अच्छी होती है। गंद करने, दुख देने वाली कोई चीज़ होती ही नहीं। इसलिए उनको स्वर्ग कहा जाता है।” (मु.3.7.73 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
नई दुनिया को ही टावर ऑफ सुख कहा जाता है। वहाँ तो मैले आदि कोई चीज़ होती ही नहीं। ऐसी मिट्टी ही नहीं होती तो (जो) मैला हो। न ऐसी हवाएँ ही लगती हैं, जो मकानों को ख़राब करें। कचड़ा वहाँ होता ही नहीं। स्वर्ग की तो बहुत महिमा है। इसके लिए पुरुषार्थ करना है। ” (मु.9.2.68 पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
पक्षी जनावर आदि सभी सतोप्रधान होते हैं। वह भी निडर बन जाते। यहाँ तो बुलबुल अथवा चिडियाँ मनुष्य को देखकर भागते हैं। वहाँ तो शेर-बकरी को भी डर नहीं रहता। तो ऐसे-2 अच्छे पक्षी तुम्हारे आगे घूमते-फिरते रहेंगे। वह भी कायदेसिरे। ऐसे नहीं कि घर के अंदर घुस आवेंगे। गंद करके जाएँ, नहीं। बहुत कायदेवान दुनिया बन जाती है।” (मु. 12.8.68 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
स्वर्ग में क्या-2 होगा। वहाँ थोड़े ईंट मिट्टी आदि होंगे। जिसमें पैर खऱाब हो। वहाँ तो जमीन पर भी घास के जैसे गलीचे बिछाये हुए होंगे। जिस पर चलते होंगे। प्रजा भी ऐसे ही चलती है। तुम बच्चे समझते हो हम नई दुनिया मे होंगे। जहाँ कोई किसम की मिट्टी आदि ना होंगी जो दाग हो । ऐसी कोई चीज़ न होंगी जो ठोकर आदि लगे।... स्वर्ग में तो क्या लगा पड़ा होगा। कितनी रोशनी होंगी। बत्ती भी देखने में नहीं आवेंगी। सोझरा ही सोझरा होगा।” (मु.9.3.71 पृ.1 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
तुम स्वर्ग में कितने सुखी रहते हो । हीरे जवाहरों के महल होते हैं वहाँ। अमेरिका, रशिया आदि में कितने साहुकार हैं। परन्तु स्वर्ग जैसे सुख हो न सके। सोने की ईटों महल तो कोई बना न सके। सोने के महल होते ही है सतयुग में। यहाँ सोना होता ही कहाँ? वहाँ तो लेट्रिन में भी जवाहर लगे हुए होंगे। यहाँ तो सोना है ही कहाँ। हीरों का भी कितना दाम हो गया है।” (मु. 5.3.70 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
कितने बड़े-2 मकान 50 मंजिल, 100 मंजिल के बनाते हैं। स्वर्ग में कोई इतने मंजिल की मकान आदि होते ही नहीं। आजकल यहाँ यह बनाते रहते हैं। तो मनुष्य समझते हैं सतयुग में भी ऐसे मकान नहीं होते हैं जैसे यहाँ हम बनाते हैं। बाप खुद समझाते हैं इतना झाड़ सारे विश्व पर होता है तो वहाँ माड़ियाँ आदि बनाने की दरकार ही नहीं। ढेर-के-ढेर जमीन पड़े रहते हैं। यहाँ तो जमीन है नहीं। इसलिए जमीन का दाम कितना बढ़ गया है। वहाँ तो जमीन का भाव लगता ही नहीं। न तो म्युनिसीपैलिटी का टैक्स आदि लगता है। जिसको जितनी जमीन चाहिए ले सकते हैं। वहाँ तुमको सभी सुख मिल जाते हैं। सिर्फ बाप की इस एक नालेज से। मनुष्य 100 माड़ियाँ आदि बनाते हैं उसमें भी पैसा तो लगता है ना। वहाँ पैसे आदि लगते ही नहीं। अथाह धन रहता है। पैसे का कदर ही नहीं। ढेर के ढेर पैसे होंगे तो क्या करेंगे? सोने के, हीरे के,मोतियों के महल बना देते हैं।” (मु. 27.6.69 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
वह सूर्य, चांद और सितारे आदि तो हैं ही हैं। सतयुग में भी हैं तो अभी भी हैं। इनका बदल सदल नहीं होता।” (मु. 12.7.76 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
वहाँ तो मंदिर, म्युजियम होते नहीं। नैचुरल ब्युटि होती है। मनुष्य बहुत थोड़े। सुगंध आदि की भी दरकार नहीं रहती। हर एक को अपना-अपना फर्स्ट क्लास बगीचा होता है, फर्स्ट क्लास फूल होते हैं। वहाँ की तो हवा भी फर्स्ट क्लास होगी। कब तंग नहीं करेंगे। वहाँ सदैव बहारी मौसम रहेगी। अगरबत्ती की भी दरकार नहीं।” (मु. 12.6.74 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
ऐसी सफियतें होंगी जो न गर्मी न ठंडी होंगी। पंखे भी बहुत होते हैं, जब गर्मी होती है। वहाँ तो गर्मी का दुख ही नहीं, जो पंखे आदि हो। उसका तो नाम ही है स्वर्ग। हैविन। वहाँ अपार सुख होते हैं।” (मु. 16.4.68 पृ.3 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
आपके फॉरेन के स्थान बहुत छोटे-2 टापू बन जाएँगे, जहाँ पिकनिक करने जाएँगे।” (अ.वा. 31.12.70 पृ.336 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
जो गाया हुआ है देवताओं के आगे प्रकृति हीरे रत्नों की थालियां भर कर आये। पृथ्वी और सागर यह आपके लिए चारों ओर फैला हुआ सोना और मोती, हीरे एक स्थान पर इकट्ठा करने के निमित्त बनेंगे। इसी को कहा जाता है थालियां भरकर आये। थाली में बिखरी हुई चीज़ इकट्ठी हो जाती है ना। तो यह भारत और आस पास यह स्थान थाली बन जायेंगे। सेवक बनकर विश्व के मालिकों के लिए तैयारी कर आपके आगे रखेंगे। (अ.वा.4.2.80 पृ.269 अंत) मुरली प्रूफ देखें
बाप कितना समझाते हैं सतयुग में बीमारियाँ आदि होती ही नहीं। यहाँ तो अनेक प्रकार की बीमारियाँ अनगिनत हैं। कितनी दवाईयाँ डॉक्टर लोग देते हैं। वहाँ यह खांसी आदि कुछ भी नहीं होती। (मु. 10.8.68 पृ.1 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
सतयुग में यह भूत प्रेत आदि कुछ भी नहीं होगा।” (मु. 4.3.69 पृ.1अंत) मुरली प्रूफ देखें
अभी तक हिन्दी नहीं समझते हो ! क्योंकि सतयुग में जाना है, वहाँ आपकी यह (सिंधी) भाषा नहीं हो गी। आप सबकी आदि भाषा हिन्दी है ना। तो बोलना नहीं भी आवे तो समझना तो आवे ना।.... समझने के लिए पुरुषार्थ करो; क्योंकि बाप जिस भाषा में बोलते हैं वह भाषा तो समझनी चाहिए ना। वैसे भी देखो अगर इंग्लिश बोलने वाले माँ-बाप होंगे तो बच्चे भी क्या सीखेंगे? तो बाप की भाषा तो समझनी चाहिए।” (अ.वा.9.12.93 पृ.57 आदि) मुरली प्रूफ देखें
कलियुगी दुनियाँ के कोई भी रसम-रिवाज़ वहाँ हो ते नहीं। यहाँ होती है लोक-लाज कुल की मर्यादा...... फ़र्क है ना। वहाँ के मर्यादा को सत्य मर्यादा कहा जाता है। यहाँ तो है असत्य मर्यादा।” (मु.7.6.68 पृ.1 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
सतयुग-त्रेता में कोई पतित होता नहीं उसको कहा ही जाता है स्वर्ग।” (मु. 3.6.79 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
वहाँ (सतयुग में) तो बड़ी फर्स्ट क्लास सफाई रहती है।.... वहाँ शरीर का तो मूल्य कोई रहता नहीं। बस बिजली पर रखा और खलास।.... ऐसे भी नहीं कि हड्डियां नदियों आदि में डालते होंगे। वहाँ यह रसम रिवाज़ होंगी ही नहीं। शरीर को उठाया और डाला बिजली में। शरीर को उठाकर ले जाना यह भी तकलीफ है ना। वहाँ यह तकलीफ भी होती नहीं। बिजली में डाला, खलास। यहाँ तो शरीर पिछाड़ी कितना मनुष्य रोते हैं। याद करते हैं। ब्राह्मण खिलाते हैं। वहाँ यह बातें नहीं होती। (मु.3.11.71 पृ.2 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
सतयुग में तुम पवित्र रहते थे। उसको कहा ही जाता है पवित्र दुनिया। एक बच्चा होता है। यहाँ तो 5-7 बच्चे पेट चीरकर निकालते हैं। सतयुग में ला बना हुआ है। जब समय होता है तो दोनों को सा. हो जाता है। अब बच्चा होने वाला है। इसको कहा जाता है योगबल। पूरे टाइम पर बच्चा पैदा हो जाता। कोई तकलीफ नहीं। कब रोने का आवाज़ नहीं। आजकल तो कितनी तकलीफ से बच्चे पैदा होते हैं। यह है ही दुःखधाम। सतयुग है सुखधाम।” (मु.8.8.65 पृ.2 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
स्वर्ग में मोह होता नहीं। वहाँ जब शरीर छोड़ने का टाइम होता है तो बैठे-2 खुशी से छोड़ देते हैं। शरीर भी टाइम पर छोड़ते। स्त्री कब विडो (विधवा) बनती नहीं। जब टाइम पूरा होता है, बूढ़ा होता है तो समझते हैं अब फिर जाकर बच्चा बनेंगे। फिर वो भी बूढ़े बन जाते हैं तो शरीर छोड़ देते हैं सर्प का मिसाल। (मु.8.8.65 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
वहाँ कब अकाले मृत्यु नहीं होता। यहाँ तो देखो कैसे अकाले मृत्यु होती रहती है। गर्भ में भी मर जाते हैं। तुम अभी काल पर जीत पा रहे हो। जानते हो वह है अमरलोक। यह है म़त्‍युलोक। वहाँ जब बूढ़े होते हैं तो साक्षात्कार होता है। हम यह शरीर छोड़ जाकर बच्‍चा बनेंगे। बुढ़ापा पूरा होगा और शरीर छोड़ देंगे। नया शरीर मिलेगा वह तो अभी भी है ना। बैठे-2 खुशी से शरीर छोड़ देते हैं। यहाँ तो उस अवस्था में रह शरीर छोड़ने लिए मेहनत लगती है। यहाँ की मेहनत वहाँ फिर कॉमन हो जाती है।” (मु.10.4.70 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
वहाँ भी तुम बूढ़े होंगे तो सा. होगा हम बच्चा बनते हैं। खुशी होती है। बचपन तो सबसे अच्छा है। बैठे-2 शरीर छोड़ देते हैं। जाकर बच्चा बनते हैं। बाजे आदि बजते रहते हैं। दुःख की कोई बात नहीं। गुल-2 बच्चा निकलता है। गंद आदि कुछ नहीं। बिल्कुल स्वच्छ रीति निकलते हैं।” (मु.21.9.75 पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
यह गायन भी है स्वर्ग में सुख बहुत होते हैं। आयु भी बड़ी होती है। अकाले मृत्यु नहीं होती।” (मु. 3.9.69 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
इस पुरुषार्थ से हम ऐसा श्रृंगारा हुआ बनेंगे। वहाँ क्रिमिनल आई होती नहीं, तो भी अंग सभी ढके हुए होते हैं। यहाँ तो देखो कितने नंगी रहती हैं, जो कोई भल देखे और हमारे पर फिदा होकर हमारा भी काला मुँह करें, अपना भी करें। यह छी-2 बातें रावण राज्य में सीखते हैं। इस ल.ना. को देखो ड्रेस आदि कितनी अच्छी है। यहाँ सभी हैं देह-अभिमानी। इन्हों को देह-अभिमानी नहीं कहेंगे। इन्हों की तो नेचरल ब्यूटी रहती है। बाप तुमको ऐसा नेचरल ब्यूटीफुल बनाते हैं।” (मु. 5.12.68 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
इतना बड़ा तो ल.ना. होते नहीं। बहुत बहुत 6 फुट होंगे।” (मु.31.3.73 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
लक्ष्मी-नारायण की पतली कमर कहाँ है? ठीक जैसे होते हैं तैसे होते हैं। ये सभी नॉनसेन्स निकली हुई है कहाँ-2 से। भक्तिमार्ग में जो किस्म-2 के चित्र बनाए हैं तो समझते हैं वहाँ देवताएँ ऐसे थे। देवताएँ एकदम हूबहू (ऐसे हैं) जैसे अभी इस समय में अच्छे, खूबसूरत, नेचुरल ब्यूटी बच्चे हैं; क्योंकि बाबा ने समझाया है ना कि पाँच तत्व इस समय में तमोप्रधान हैं, जिनसे शरीर बनते हैं। वहाँ सतयुग में सतोप्रधान हैं, तो उनसे काया कल्प वृक्ष समान।” (मु.17.9.64 पृ.5 आदि) मुरली प्रूफ देखें
आत्मा पवित्र बनने से शरीर भी फर्स्‍ट क्‍लास मिलता है। यहाँ तो आर्टिफिशियल फैशन है। पाउडर आदि लगाकर सुहेनी बन जाती हैं। वहाँ तो नैचुरल ब्युटिफुल होते हैं।” (मु.12.6.74 पृ.3 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
वहाँ शरीरों की कोई मरम्मत नहीं होती है जितनी यहाँ करते हैं। कितनी मरम्मत करनी पड़ती है। वहाँ तो भले बुड्ढे भी हो जाओ, तुम्हारे दाँत वगैरह सब साबूत। मजाल है जो वहाँ कोई का एक दांत टूट सके ! लॉ नहीं कहता है; क्योंकि दाँत टूटा तो डिसफिगर हुआ। यानी देखने में कुछ बुरा लगे। ऐसी कोई भी चीज़ नहीं होती है। एकदम 16 कला सम्पूर्ण। शरीर भी ऐसा फर्स्टक क्लास। कभी झूँझा, चूचे, चंगाले या लंगड़े-लूले होते ही नहीं हैं। यहाँ तो लंगड़े-लूले जन्म भी ले लेते हैं, अंधे भी जन्म ले लेते हैं, दो-चार मत्थे वाले भी जन्म ले लेते हैं, वहाँ बिल्कुल ही एक्युरेट।” (मु.17.9.64 पृ.5 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
वहाँ आत्मा प्योर होने से शरीर भी मखमल जैसा होता है। नो डिफेक्टेड।” (मु. 27.2.68 पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
सतसुग में सब कर्मइन्द्रियाँ निर्विकारी बन जाती हैं। अंग-2 सुगंधित हो जाते हैं। अभी तो बाँसी छी-2 अंग हैं। ..... अभी तो सब कर्मइन्द्रियों में बदबुएँ हैं। यह शरीर कोई काम का नहीं।” (मु.12.7.74 पृ.1 अंत, पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
तुम ब्रह्माकुमारियाँ कहती हो हम भ्रष्टाचारी भारत को 10 वर्ष में श्रेष्ठाचारी बनावेंगी।” (मु.30.8.66 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
जब कोई लिटरेचर बनाना है तो उसमें तारीख लिखनी है। आज से यानी 1966 से 10 वर्ष के अन्दर हम अपनी इस भारतभूमी को स्वर्ग बना कर छोड़ेंगे।” (मु.13.8.66 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
हम अख़बार में क्या डालें। यह भी तुम लिख सकते हो यह महाभारत लड़ाई कैसे पावन दुनिया का गेट खोलती है, आकर समझो। कल्प पहले मिसल इस महाभारत लड़ाई से सतयुग की स्थापना कैसे होती है, आकर समझो। 10 वर्ष में देवी-देवताओं की राजधानी स्थापन हो जावेगी। गॉड फादर से वर्थ राइट लेना हो तो आकर लो।” (मु. 24.11.66 पृ.2 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
भारत माता (शिव) शक्ति अवतार अंत का यही नारा है। (अ.वा.21.1.69 पृ.24 आदि) मुरली प्रूफ देखें
तुमको मालूम है टिड्डियों का झुंड कितना बड़ा होता है। सबकी यूनिटी हो ती है। पहले आगे वाला बैठा तो सब बैठ जायेंगे। मधुमक्खियाँ भी ऐसी होती हैं। रानी ने घर छोड़़ा तो सब भागेंगी उनके पिछाड़ी। वह जैसे उन्हों का साजन हुआ। उनमें फिर सजनी ही राज्य करती है हमजिन्स पर। (मु.17.11.91 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
माखी (शहद) की मक्खियाँ होती हैं उनमें भी क्वीन होती है। बाकी सब उनके आसुक होती है। क्वीन गई तो उनके पिछाड़ी सब भागेगी। लव है ना। कितनी समझ है उनमें।” (मु.20.1.74 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
सबसे तीखा झुण्ड मधुमक्खियों का होता है। बहुत आपस में एकता होती है। इन्हों का हेड रानी होती है। भारत में भी पहले-2 रानी पीछे राजा; इसलिए मदरकन्ट्री कहते हैं।” (मु.24.6.68 पृ.2 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
मक्खियों की भी रानी होती है। रानी के साथ पीछे-2 सब मक्खियाँ जाती हैं। रानी अर्थात् माँ साथ उनका कितना संबंध है।” (मु. 3.6.76 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
लक्ष्मी का यादगार डबल रूप में एक तरफ धन-देवी अर्थात् दाता का रूप संगमयुग का यादगार है जो सदैव धन देते रहते हैं। यह संगमयुग पर अविनाशी धन-देवी के रूप में चित्र दिखाया जाता है। सतयुग में तो कोई लेने वाला ही नहीं होगा तो देंगे किसको? यह संगमयुग के श्रेष्ठ कर्तव्य की निशानी है। और दूसरे तरफ ताजपोशी दिवस के रूप में मनाया जाता है। ताजपोशी भविष्य की निशानी है और धन-देवी संगमयुग के दाता रूप की निशानी है। दोनों ही युग को मिला दिया है; क्योंकि संगमयुग छोटा-सा युग है; लेकिन जितना छोटा है उतना महान है। सर्व महान कर्तव्य, महान स्थिति, महान प्राप्ति, महान अनुभव इस छोटे-से युग में होते हैं। बहुत प्राप्तियाँ, बहुत अनुभव होते और संगमयुग के बाद सतयुग जल्दी आता है, इसलिए संगमयुग और सतयुग के चित्र और चरित्र मिला दिए हैं। चित्र सतयुग का, चरित्र संगम का दे देते हैं।” (अ.वा. 21.10.87 पृ.94 अंत) मुरली प्रूफ देखें
कितने भी कारण हो- मैं निवारण करने वाली हूँ न कि कारण को देख कमजोर बनना है।... इसको विजयी कहा जाता। ऐसे श्रेष्ठ लक्षणधारी भविष्य में लक्ष्मी रूप बनते हैं। लक्ष्मी अर्थात् लक्षण वाली।” (अ.वा. 4.3.72 पृ.239 अंत) मुरली प्रूफ देखें
लक्ष्मी स्वरूप अर्थात् धन-देवी और नारायण स्वरूप अर्थात् राज्य अधिकारी। लक्ष्मी को धन-देवी कहते हैं। वो धन नहीं; लेकिन ज्ञान के खज़ाने जो मिले हैं उस धन की देवियाँ।” (अ.वा. 21.01.80 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
लक्ष्मी अर्थात् सम्पत्ति की देवी। वह स्थूल सम्पत्ति नहीं, नॉलेज की सम्पत्ति, शक्तियों रूपी सम्पत्ति की देवी अर्थात् देने वाली।... चाहे नॉलेज देवे, चाहे शक्तियाँ देवे।” (अ.वा. 23.1.76 पृ.20 आदि) मुरली प्रूफ देखें
टीचर को भी सबक देना है। खिर होना चाहिए। कोई भी कुछ कहेगा नहीं। फिर भी बाप के बने तो पेट तो मिल सकता है। शरीर निर्वाह के लिए बहुत मिलेगा। अहमदाबाद में वेदान्ती बच्ची है। उसने इम्तिहान दिया, उसमें एक प्वाइंट थी गीता का भगवान कौन? इसने परमपिता परमात्मा शिव लिख दिया, इनको नापास कर दिया। और जिन्होंने कृष्ण भगवान लिखा उनको पास कर दिया। जिस बच्ची ने सच बताया तो उनको ना जानने कारण नापास कर दिया। फिर लड़ना पड़े। मैंने तो यह सच लिखा है। गीता का भगवान है ही निराकार परमपिता परमात्मा। कृष्ण, जो देहधारी है वो तो हो ना सके। परंतु बच्ची की दिल थी इस रूहानी सर्विस करने की तो छोड़ दिया। नहीं तो ऐसी-2 बातों में तुम लड़ों तो नाम बाला हो जावे। गवर्मेंट कहे यह समझाते तो बहुत अच्छा है।” (मु. 7.7.70 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
दीपमाला पर लक्ष्मी का चित्र थाली में रख उनकी पूजा कर फिर रख देते हैं। वह है महालक्ष्मी। युगल है ना। मनुष्य इन बातों को नहीं समझते। लक्ष्मी को पैसा कहाँ से मिलेगा। युगल तो चाहिए ना। तो है युगल। नाम फिर महालक्ष्मी रख देते हैं।” (मु. 14.10.68 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
दीपमाला पर लक्ष्मी का आवाह्न करते हैं क्यों? नारायण ने क्या गुनाह किया। लक्ष्मी को भी धन तो नारायण ही देता होगा ना। वास्तव में धन कोई लक्ष्मी से नहीं मिलता। धन तो जगतअम्बा से मिलता है। तुम जानते हो जगतअम्बा वो ही फिर श्रीलक्ष्मी बनती है तो उन्होंने अलग-2 कर दिया है।” (मु. 14.10.73 पृ.3 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
हे सत्यभामा, हे कर्मादेवी! तुम क्या करती हो ? जब तक औरों को स्वर्गवासी न बनाया है तो स्वर्ग में कैसे जावेंगे! बस, ऐसे ही बैठे हो। कौड़ी से हीरे जैसा साहुकार बनाना यह बाप का धंधा बच्चों को भी करना चाहिए ना! भारत को हीरे जैसा पावन बनाओ। ” (मु.14.7.63 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
तो अब खड़ा होना चाहिए। ऐसे शंकराचार्य की सेना पर जीत पहननी है। ऐसे थोड़े ही घर में चुप कर बैठने से जीत पहनेंगे। झुण्डों में (घु)स जाना है। उनको मुरली प्रूफ देखें
अरे ,बंधन को तो तोड़ना पड़े ना! समझाना है, हमको तो सर्विस पर जाना है। कौरवों को माइयों और पाण्डवों की माइयाँ की भेंट करो। वो हैं हिंसक; तुम अहिंसक। वो कितनी फुर्त हैं, बाहर जाकर लेक्चर आदि करती हैं। तुम तो वो ही जैसी गृहस्थी रीढ़-बकरियाँ हो। ज्ञान-योगबल से समझाना तो है ना! बंधन करते-2 रह जावेंगी। सर्विस कहाँ की? प्रजा कहाँ बनाती हो ? ” (मु.14.7.63 पृ.2 अंत,पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
शेरनी शक्तियों की तो शेर पर सवारी दिखाई है। शेर बहादुर हो ता है। तुम रीढ़-बकरी तो नहीं हो ना। शेर सदा गजगोर करते हैं। तुम भी ज्ञान गजगोर करते हो। जो बादल नहीं बनते, वह क्या महारानी-महाराजा बनेंगे? ” (मु.14.7.63 पृ.4 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
शिव भगवानुवाच माताएँ स्वर्ग का द्वार खोलती हैं।... इसलिए वंदे मातरम् गाया जाता है। वन्दे मातरम् तो पिता भी अण्डरस्टुड है। (मु.10.6.69 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
शंकर क्या करते हैं? उनका पार्ट ऐसा वण्डरफुल है जो तुम विश्वास कर न सको।” (मु.14.5.70 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
सहज नष्टोमोहा होना यह बहुत काल के योग के विधि की सिद्धि है।” (अ.वाणी 25.11.93 पृ.26 आदि ) मुरली प्रूफ देखें
बाप विनाश उनसे कराते हैं जिस पर कोई पाप न लगे।” (मु. 29.4.70 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
तुम कह सकते हो रामायण की कथा सारी भारत पर ही है। सिर्फ समझाने का खिर चाहिए। (मु. 12.1.75 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें