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कल्पवृक्ष मुरली प्वॉइंट्स प्रूफ के साथ
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बाप कल्प-2 आकर कल्पवृक्ष की नॉलेज देते हैं; क्योंकि खुद बीजरूप है। सत् है, चैतन्य है। इसलिए कल्पवृक्ष का सारा राज़ समझाते हैं। (मु. 17.11.68. पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
ज्ञान में तो सिर्फ बीज को जानना होता है। बीज के ज्ञान से सारा झाड़ (बुद्धि में) आ जाता है। (मु. 29.9.77 पृ.2 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
बीज के साथ-2 वृक्ष की जड़ में आप आधारमूर्त(उद्धारमूर्त) श्रेष्ठ आत्माएँ हो। (अ.वा. 12.1.82 पृ.233 अंत) मुरली प्रूफ देखें
ब्राह्मण आत्माएँ आदि देव की आदि रचना हो। इसलिए कल्प वृक्ष में ब्राह्मण फाउंडेशन अर्थात् जड़ में दिखाए गए हैं। अपना स्थान देखा है ना? तो वृक्ष में आप आदि रचना बीज के समीप जड़ में दिखाए गए हो। इसलिए डायरैक्ट रचना हो। (अ.वा. 8.4.92 पृ.181 आदि) मुरली प्रूफ देखें
राख कौन बनते हैं और कितने बनते हैं और कोटों में से, लाखों में से एक कौन निकलते हैं, वह भी देखेंगे। (अ.वा. 23.9.73 पृ.161 आदि) मुरली प्रूफ देखें
यह पढ़ाई कोटों में कोऊ ही पढ़ेंगे। (मु. 20.4.70 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
पुराने झाड़ को रिजुबिनेट करना है । नया सैम्पलिंग लगाना है । अभी हम देवी-देवता सनातन धर्म का कलम लगाय रहे हैं। (मु. 5.2.68 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
जब यह सैर कर लौटे तो नए वृक्ष की कलम को देखा। कलम में कौन थे? आप सभी अपने को कलम समझते हो? वृक्ष का आधार समझते हो? जब पुराने वृक्ष को बीमारी लग गई, जड़-जड़ीभूत हो गया तो अब नया वृक्ष-आरोपण आप आधार मूर्तियों द्वारा ही होगा। ब्राह्मण हैं ही नए वृक्ष की जड़ें अर्थात् फाउंडेशन। (अ.वा. 19.10.75 पृ.201 अंत) मुरली प्रूफ देखें
ब्रह्मा-सरस्वती भी वास्तव में मम्मा-बाबा नहीं हैं। (मु. 31.3.72 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
मनुष्य समझते हैं एडम ब्रह्मा, ईव सरस्वती। वास्तव में यह राँग है। निराकार गॉड फादर है तो मदर भी ज़रूर (निराकार स्टेज वाली ही) होगी। (मु. 18.5.73 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
यह मात-पिता, ब्रह्मा-सरस्वती दोनों कल्पवृक्ष के नीचे बैठे हैं, राजयोग सीख रहे हैं। तो ज़रूर उन्हों के गुरू चाहिए। (मु. 28.1.73 पृ.2 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
भल कहते हैं दादा को क्यों रखा है? अरे! प्रजापिता ब्रह्मा तो ज़रूर यहाँ चाहिए ना। यह तो पतित है। झाड़ में देखते हो नीचे तपस्या में बैठे हैं...; परन्तु यह तो बदलते रहते हैं। यह तो मुख्य है यह तो सदैव कायम है। (मु. 9.11.66 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
यह मनुष्य सृष्टि रूपी झाड़ एक ही है। उनका एक ही बीज है। इसको कल्पवृक्ष कहा जाता है। और कोई झाड़ को कल्पवृक्ष नहीं कहा जाता। इसके नीचे कपिलदेव और कामधेनु अब बैठी हुई हैं। कपिलदेव को आदि देव ब्रह्मा भी कहते हैं। नाम तो बहुत रख दिए हैं। अब कामधेनु कोई गऊ तो नहीं है। मनुष्यों ने फिर गऊ रख दी है। (मु. 19.3.73 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
दैवी धर्म का फाउंडेशन ही सड़ गया है। बाकी ऐसे नहीं कहेंगे कि फाउंडेशन था नहीं।... प्रायः गुम है। (मु. 5.12.71 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
बनियन ट्री का मिसाल एक्युरेट है। आदि सनातन देवी-देवता धर्म का फाउंडेशन है नहीं। बाकी सारा झाड़ खड़ा है। (मु. 8.7.68 पृ.2 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
बड़ के झाड़ का मिसाल भी इनके ऊपर ही है। संन्यासी लोग भी मिसाल देते हैं; परन्तु उनकी बुद्धि में कुछ भी नहीं है। तुम तो जानते हो कैसे आदि सनातन देवी-देवता धर्म प्रायः लोप हो जाता है। अभी वह फाउंडेशन है नहीं। बाकी सारा झाड़ खड़ा है। सभी धर्म हैं। बाकी एक धर्म नहीं है। बड़ का झाड़ भी देखो कैसे खड़ा है। थुर है नहीं, फिर भी झाड़ सदैव हरा-भरा है। दूसरे झाड़ फाउण्डेशन बिगर सूख जाते हैं; क्योंकि थुर बिगर पानी कैसे मिले; परन्तु वह बड़ का झाड़ सारा ताजा खड़ा है। यह वण्डर है ना। वैसे ही इस झाड़ में भी देवी-देवता धर्म है नहीं। (मु. 25.12.86 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
कोई प्रशंसा करे और मुस्कराए-इसको सहनशीलता नहीं कहते; लेकिन दुश्मन बन, क्रोधित हो अपशब्दों की वर्षा करे, ऐसे समय पर भी सदा मुस्कुराते रहना, संकल्प मात्र भी मुरझाने का चिह्न चेहरे पर न हो। इसको कहा जाता है सहनशील। दुश्मन आत्मा को भी रहमदिल भावना से देखना, बोलना, सम्पर्क में आना। इसको कहते हैं सहनशीलता। (अ.वा. 30.1.88 पृ.239 आदि) मुरली प्रूफ देखें
जैसे यादगार शास्त्रों में महावीर हनुमान के लिए दिखाते हैं कि इतना बड़ा पहाड़ भी हथेली पर एक गेंद के समान ले आया। ऐसे, कितनी भी बड़ी पहाड़ समान समस्या हो, तूफान हो, विघ्न हो; लेकिन पहाड़ अर्थात् बड़ी बात को छोटा-सा खिलौना बनाए खेल की रीति से सदा पार किया वा बड़ी भारी बात को सदा हल्का बनाए स्वयं भी हल्के रहे और दूसरों को भी हल्का बनाया। इसको कहते हैं सहनशीलता। छोटे से पत्थर को पहाड़ नहीं; लेकिन पहाड़ को गेंद बनाया। विस्तार को सार में लाना, यह है सहनशीलता। (अ.वा. 30.1.88 पृ.239 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
अन्य धर्म की स्थापना और इस देवी-देवता धर्म की स्थापना में विशेष क्या अंतर है? अन्य धर्म जो भी स्थापन हुए हैं वह वाणी बल द्वारा; लेकिन देवी-देवता धर्म स्थापन होता है- अपनी लाइफ बनाने से। यहाँ पहले प्रैक्टिकल लाइफ का भाषण चाहिए। मुख का भाषण पीछे। (अ.वा. 22.1.76 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
जो कोई भी बात को सहन कर लेता है तो सहन करना अर्थात् उसकी गहराई में जाना। जैसे सागर के तले में जाते हैं तो रत्न लेकर आते हैं। ऐसे ही जो सहनशील होते हैं वह गहराई में जाते हैं, जिस गहराई से बहुत शक्तियों की प्राप्ति होती है। सहनशील ही मनन शक्ति को प्राप्त कर सकता है। सहनशील जो होता है वह अंदर-ही-अंदर अपने मनन में तत्पर रहता है और जो मनन में तत्पर रहते हैं वही मग्न रहते हैं। (अ.वा. 8.6.71 पृ.97 आदि) मुरली प्रूफ देखें
सूर्यवंशीः- सदा बाप के साथ और सर्वसंबंध की अनुभूतियों में लवलीन रहेंगे। सूर्यवंशी चढ़ती और उतरती कला में नहीं आते।... सूर्यवंशी सदा विश्व-कल्याण की ज़िम्मेदारी को निभाते हुए जितनी बड़ी ज़िम्मेदारी उतना ही डबल लाइट रूप होंगे।... सूर्यवंशी अपने वृत्ति और वायब्रेशन की किरणों द्वारा अनेक आत्माओं को स्वस्थ अर्थात् स्वस्मृति में स्थित करने का अनुभव करावेंगे। (अ.वा. 6.1.79 पृ.181, 182 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
बाबा के प्यार में सहन करना, सहन नहीं है, यह त्याग का भाग्य लेना है। इस त्याग का प्रत्यक्ष फल मिलना है। भविष्य तो परछाई है ही। (अ.सं. 18.3.01 पृ.106 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
आपकी सहनशीलता से गाली देने वाले भी आपको गले लगाएँगे। सहनशीलता में इतनी शक्ति है; लेकिन थोड़ा समय सहन करना पड़ता है। (अ.वा. 25.10.02 पृ.13 अंत) मुरली प्रूफ देखें
राम कहा जाता है बाप को। (मु. 6.9.70 पृ.3 के मध्य) मुरली प्रूफ देखें
जैसे साकार बाप की विशेषता देखी। हर-एक के दिल से यह आवाज़ निकलता रहा- हमारा बाबा! चाहे पच्छड़माल हो, फिर भी “हमारा बाबा!” यह अनुभव हर आत्मा का रहा। (अ.वा. 7.2.75 पृ.52 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
तुम हो आदि सनातन देवी-देवता धर्म के पक्के। तुम्हारी बुद्धि में ऊँच-ते-ऊँच भगवान है। (मु. 26.2.68 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
ब्राह्मण रूप में वृक्ष की जड़ में हो और देवता रूप में वृक्ष के तना हो। और सभी धर्म आप तना से निकलते हैं। तो आप डायरैक्ट रचना का कितना महत्त्व है! डायरैक्ट बीज के साथ संबंध है। उन्हों का इनडायरैक्ट संबंध है, आपका डायरैक्ट है। (अ.वा. 8.4.92 पृ.181 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
अभी तुम बच्चे जानते हो बरोबर हम असल देवता धर्म के थे। वह धर्म बहुत सुख देने वाला है। (मु. 21.6.65 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
आदि सनातन देवी-देवता धर्म को ही हीरो-हीरोइन कहा जाता है।हीरे जैसा जन्म और कौड़ जैसा जन्म तुम्हारे लिए गाया हुआ है। (मु. 21.1.99. पृ 2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
गीता भी है देवी-देवताओं का धर्मशास्त्र। तुम्हारा दूसरे कोई धर्म में जाने से क्या फायदा। हरेक अपनी कुरान, बाइबिल आदि ही पढ़ते हैं। अपने धर्म को जानते हैं। एक भारत ही अधर्मी बना है। सभी धर्मों में चले जाते हैं। और सभी अपने-2 धर्म में हैं। (मु. 3.5.70 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
गीता तो है ही सभी शास्त्रों का मात-पिता। ऐसे नहीं कि सिर्फ़ भारत के शास्त्रों का मात-पिता है। नहीं । जो भी बड़े-ते-बड़े शास्त्र सारी दुनिया में हैं सभी का मात-पिता है। (मु. 20.2.73 पृ.1 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
मेरी मत तो मशहूर है। श्रीमत्भगवत् गीता। (मु. 3.5.70 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
ऐसे कोई भी शास्त्र में लिखा हुआ नहीं है कि क्राइस्ट को याद करने से आत्मा तमोप्रधान से सतोप्रधान बन जाएगी। एक गीता में ही है कि मामेकम् याद करो। गॉड फादर का शास्त्र है ही गीता। (मु. 20.11.91 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
तुम भारतवासियों को तो गीता पढ़नी है। अपना धर्म शास्त्र छोड़ दूसरे का सुनना-पढ़ना यह तो व्यभिचार हुआ। (मु. 19.9.87 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
बाप कहते हैं रावण ने तुमको बिल्कुल ही तुच्छ बुद्धि बना दिया है। खास भारतवासियों को। तुम देवी-देवता थे यह भी भूल गये हो तो तुच्छ बुद्धि हुए ना। अपने धर्म को भूल जाना यह है तुच्छ बुद्धि का काम। (मु. 13.5.70 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
अभी पता पड़ा है हम जो देवी-देवता थे सो फिर कैसे वाममार्ग में आते हैं। वाममार्ग विकारी मार्ग को कहा जाता है। (मु. 29.4.70 पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
वास्तव में हिन्दू कोई धर्म है नहीं। धर्म भ्रष्ट, कर्म भ्रष्ट हो पड़े हैं इसलिए अपने को देवी-देवता कहलाते नहीं।... हिन्दुओं को अपने धर्म का पता नहीं है। भारत का असुल में देवी-देवता धर्म है। वह चला आना चाहिए; परन्तु आदि सनातन देवी-देवता धर्म को भूल जाने कारण कह देते हमारा धर्म हिन्दू है। हिन्दू धर्म तो होता ही नहीं। कितने पत्थर बुद्धि हैं। (मु. 21.6.70 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
यह भी तुम समझते हो यह सुख और दुख का खेल है। तुम्हारे बुद्धि में है आधा कल्प है सुख आधा कल्प है दुख। बाप समझाते हैं पौना से भी जास्ती सुख भोगते हो। आधा कल्प के बाद भी तुम बहुत धनवान थे। कितने बड़े-2 मन्दिर आदि बनाते थे। दुख तो पीछे होता है। जब बिल्कुल तमोप्रधान भक्ति बन जाती है। (मु. 13.5.68 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
सभी धर्म वालों से देवता धर्म की आदमशुमारी जास्ती होगी; परंतु वह कन्वर्ट हो गए हैं।... इसलिए थोड़ी संख्या हो जाती है। यह भी ड्रामा। इसमें समझने की बड़ी विशाल बुद्धि चाहिए। (मु. 25.9.73 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
हिंदुओं को मुसलमान लोग काफर कहते हैं; क्योंकि वो अपने धर्म को जानते ही नहीं हैं। कब किसी को मानेंगे, कब किसी को मानेंगे। बहुतों के पास जाते रहेंगे। क्रिश्चियन लोग कब किसी के पास जावेंगे नहीं। (मु. 1.3.67 पृ.2 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
मुख्य हैं ही 4 धर्म- डिटीज़्म, इस्लामिज़्म, बौद्धिज़्म, क्रिश्चियनिज़्म। बाकी फिर इनसे वृद्धि होती गई है। इन भारतवासियों को पता ही नहीं पड़ता हम किस धर्म के हैं। धर्म का मालूम नहीं है तो धर्म ही छोड़ देते। (मु. 21.9.68 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
सागर में विशेष दो शक्तियाँ सदैव देखने में आवेंगी।... (ज्ञान) लहरों द्वारा सामना भी करते हैं और हर वस्तु व व्यक्ति को स्वयं में समा भी लेते हैं। (अ.वा. 21.9.75 पृ.121 आदि) मुरली प्रूफ देखें
सागर के बच्चे हैं, सागर की विशेषता है ही समाना। जिसमें समाने की शक्ति होगी वही शुभ भावना, कल्याण की कामना कर सकेंगे। इसलिए दाता बनना, समाने के शक्ति स्वरूप सागर बनना। (अ.वा.31.3.86 पृ.298 आदि) मुरली प्रूफ देखें
अगर कोई सामना करे तो तुम कायदे सिर लड़ो। (मु.7.7.70 पृ.2 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
जैसे चन्द्रमा की कलाएँ बढ़ती और घटती रहती हैं, वैसे चन्द्रवंशी कब बहुत उमंग-उत्साह में सम्पूर्ण स्टेज का अनुभव करेंगे और कब स्वयं को सम्पूर्णता से बहुत दूर अनुभव करेंगे।... कब 100 के मणके के समान चमकेगा कब अपनी कमज़ोरियों की माला बाप के आगे बार-2 सुमिरण करेगा। (अ.वा. 6.1.79 पृ.181 आदि, 182 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
क्षत्रियों का सदा तीर-कमान के बोझ उठाने का खेल। हर समय पुरुषार्थ की मेहनत का कमान है ही है। एक समस्या का समाधान करते ही हैं तो दूसरी समस्या खड़ी हो जाती। ब्राह्मण सदा समाधान स्वरूप हैं। क्षत्रिय बार-2 समस्या को समाधान करने में लगे हुए रहते।... क्षत्रिय क्या करत भये। इसकी कहानी है ना- चूहा निकालते तो बिल्ली आ जाती। आज धन की समस्या, कल मन की, परसों तन की वा संबंध-सम्पर्क वालों की। मेहनत में ही लगे रहते हैं। सदा कोई-न-कोई कम्प्लेंट ज़रूर होगी। चाहे अपनी हो, चाहे दूसरों की हो। (अ.वा.3.5.84 पृ.289 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
जो माया से हार खाते उनको क्षत्रिय कहा जाता है। (मु. 21.10.68 पृ.2 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
एक भारत ही है जिसने किसका भी राज्य छीना न है। (मु. 6.9.75 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
भारत में कोई भी आवेगा तो भारतवासी उनको पनाह देंगे। (मु. 22.6.65 पृ.3 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
चन्द्रवंशी राम को बाण आदि दिए हैं। वास्तव में ज्ञान बाण की बात है। वह नापास हुआ इसलिए निशानी दे दी है। (मु. 2.12.82 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
अब रामचन्द्र की पूजा करते हैं, उनको यह भी पता नहीं है कि राम कहाँ गया। तुम जानते हो कि राम की आत्मा ज़रूर पुनर्जन्म लेती रहती होगी। यहाँ इम्तहान में नापास होती है। परन्तु कोई न कोई रूप में होगी तो ज़रूर ना। यहाँ ही पुरुषार्थ करते रहते हैं। इतना नाम बाला है राम का, तो ज़रूर आयेंगे, उनको नालेज लेनी पड़ेगी।... वह तो ज़रूर पढ़ते होंगे। अपनी बैटरी चार्ज करते होंगे। (मु. 19.9.89 पृ.1 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
वाममार्ग विकारी मार्ग को कहा जाता है। (मु. 29.4.70 पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
भल पतित बनना है वह तो कायदा है एक स्त्री से ही पतित बनें। दूसरा कोई से पतित बनना बेकायदे है। (मु. 8.10.68 पृ.1 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
पतित मनुष्यों को कहा जाता है कामी कुत्ता। कोई एक स्त्री होते दूसरी करता है तो कहा जाता है यह तो कामी कुत्ता है। रात-दिन विकार में ही फंसा हुआ है। (मु. 15.10.68 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
काम कटारी का काँटा लगाते हैं। काम कटारी का काँटा लगाना यह तो जंगली जानवरों का काम है। एक दो को दुःख देते हैं ना। (मु. 13.4.69. पृ.1 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
हरेक धर्म वालों की सिकल आदि अलग है। कोई सीदी(काले), कोई गोरे। (मु. 3.5.70 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
इस्लामी देखो कितने काले हैं। इनकी भी फिर बहुत ब्रान्चेज निकलती रहती हैं। मुहम्मद तो बाद में आता है। पहले हैं इस्लामी। (मु. 27.8.69 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
विकारी को पतित कहना, भ्रष्टाचारी कहना बात एक ही है। पतित,भ्रष्टाचारी माना विकार में जाने वाला। क्रोधी को पतित भ्रष्टाचारी नहीं कहा जाता है। (मु. 15.11.66 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
आगे मनुष्यों की बलि चढ़ती थी। वह भी गवर्मेंट ने बंद किया है। मनुष्यों के माँस को महाप्रसाद समझ बाँटते थे, वह फिर खाते भी थे। अभी बकरे का महाप्रसाद समझते हैं। (मु. 8.11.68 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
संन्यासी तो आते ही बाद में हैं। इस्लामी, बौद्धी के भी बाद में आते हैं। क्रिश्चियन से कुछ पहले आते हैं। (मु. 17.11.74 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
यहाँ तुम बाप के संग बैठे हो तो अच्छा समझते हो। बाहर जाने से संग में पता नहीं फिर क्या हाल होगा। संगदोष तो बहुत होता है ना।... बाहर में तो मनुष्य क्या-2 खाते रहते हैं। खास चीनी लोग का खान-पान बड़ा गंदा होता है। (मु. 14.11.71 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
तुम डबल अहिंसक हो। न मारते हो अर्थात् न किस पर गुस्सा करते हो। न काम-कटारी चलाते हो। नॉनवाइलेन्स तुम हो। नम्बरवन हिंसा है काम-कटारी चलाना। दुनिया में कोई नहीं जानते कि पहला नंबर दुश्मन कौन है। (मु. 30.8.73 पृ.4 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
इस समय यह अमेरिका, रशिया आदि जो हैं, यह सभी माया का भभका है।... 100 वर्ष में यह सभी हुए हैं।... यह है रुण्य के पानी मिसल राज्य। इसको माया का पॉम्प कहा जाता है।... देह अहंकार तोड़ना चाहिए। (मु. 21.3.72 पृ.2 अंत, 3 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
क्राइस्ट जब आया उनके पीछे उनकी आत्माएँ आती गईं। उन्हों के पास क्या था? कुछ भी नहीं। जंगल में नंगे रहते थे। पत्तों के कपड़े पहनते थे। उस समय विकार की चेष्टा नहीं रहती थी। (मु. 1.3.73 पृ.2 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
पहले-2 क्राइस्ट आदि यूरोप तरफ चले गए। (मु. 26.7.71 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
जिन्होंने मूसल निकाले हैं वह अभी अपने कुल का नाश करने एक/दो को धमकी दे रहे हैं। हैं सब क्रिश्चियन लोग। वही यूरोपवासी यादव ठहरे। (मु. 16.2.74 पृ.1 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
सबसे खौफ़नाक मनुष्य कौन-सा होता है, जिनसे सब डर जाते हैं? दुनिया की बात तो दुनिया में रही; लेकिन इस दैवी परिवार के अंदर सबसे खौफनाक नुकसान कारक वो है जो अंदर एक और बाहर से दूसरा रूप रखता है। वो परनिन्दक से भी जास्ती खौफनाक है; क्योंकि वो कोई के नज़दीक नहीं आ सकता, स्नेही नहीं बन सकता। उनसे सब दूर रहने की कोशिश करेंगे। (अ.वा. 28.9.69 पृ.110 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
क्रिश्चियन की बुद्धि पत्थरबुद्धि नहीं है, जितनी यहाँ वालों की है। वे सुख भी कम तो दुख भी कम पाते हैं।... उन्हों की न पारस बुद्धि, न पत्थरबुद्धि होती है।... साइंस का प्रचार सारा इन क्रिश्चियन से ही निकला है। (मु. 11.4.68 पृ.2 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
क्रिश्चियन लोग खुद भी समझते हैं- हमको कोई प्रेर रहा है, हम अपने ही विनाश के लिए बनाते हैं। कहते हैं हम ऐसे-2 बॉम्ब्स बना रहे हैं, जो एक दुनिया तो (क्या) 10 दुनियाओं को भी एक बॉम्ब से खत्म करेंगे। (मु. 23.3.68 पृ.4 आदि) मुरली प्रूफ देखें
क्रिश्चियन लोग के जन्म कितने होंगे, करके 40 जन्म होगें। (मु. 17.2.71. पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
क्राइस्ट को 2000 वर्ष हुए। अब हिसाब करो एवरेज कितने जन्म हुए? 30/32 जन्म होंगे। यह तो क्लीयर है। (मु. 22.11.71. पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
अभी इनसे तो कोई भारत को ताकत नहीं मिल सकती है। ताकत मिले तब जबकि गृहस्थ-व्यवहार में रह करके (पवित्र रह दिखाएँ)। (इसमें) हिम्मत चाहिए। वो तो हो गए कायर संन्यासी जो घर-बार छोड़कर जाते हैं और ही क्रियेशन को विधवा बनाकर जाते हैं, नर्क में डालकर चले जाते हैं। (मु. 28.4.64 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
संन्यासी न होते तो फिर यह भारत बहुत भ्रष्टाचारी बन जाता। संन्यासी थमाने के लिए आते हैं। तो संन्यासियों की भी तो महिमा है ना। तो जैसे महिमा है देवी-देवताओं की, तैसे महिमा है संन्यासियों की। (मु. 8.9.64 पृ.5 आदि) मुरली प्रूफ देखें
वास्तव में साधु-संन्यासियों आदि को तो भक्ति करना भी निषेध है। वह हैं ही निवृतिमार्ग वाले। तुम समझा सकते हो भक्ति तो है ही प्रवृत्तिमार्ग वालों के लिए। वह निवृत्तिमार्ग वाले जंगल में क्या भक्ति करेंगे। आगे यह भी सतोप्रधान थे तो सब कुछ उन्हों को जंगल में पहुँचाते थे। अभी तो देखो कुटियाएँ खाली पड़ी हैं; क्योंकि तमोप्रधान बनने कारण कोई उन्हों को पहुँचाता ही नहीं है। भक्तों की श्रद्धा ही नहीं रही। तो अब तो धंधे में लग गये हैं। करोड़पति पदमपति हैं। (मु. 20.1.79 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
भारत पतित होने लगता है तो संन्यासी आकर थमाते हैं। इसकी सेवा का उनको फल मिलता है जो गवर्मेन्ट के भी गुरु बनते हैं। (मु. 13.5.73. पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
संन्यासी तो समझते हैं अभी हम अपन को राँग मान लेवें तो सभी फॉलोवर्स हमको छोड़ देंगे। रिवोल्युशन हो जाए। इसलिए अभी संन्यासी लोग समझते तुम्हारी मत पर चल अपनी राजाई नहीं छोड़ेंगे। पिछाड़ी में कुछ समझेंगे। अभी नहीं। (मु. 5.9.70 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
हर आत्माओं के साथ सम्पर्क में आते हुए संस्कारों को मिलाना यह भी इतना सहज अनुभव हो, जैसे भाषण करना सहज है।... मुश्किल समझने के कारण उस समय क्या करते हैं? जैसे कहावत है-“दूरबाज़ खुशबाज़ तो उसी समय अपने को उस बात से दूर कर देते और किनारा कर लेते हैं। इसको भी कौन-से मार्ग की निशानी कहेंगे? निवृत्तिमार्ग वालों की। उस समय के लिए निवृत्त हो जाते हैं।... जैसे कमल का पुष्प निवृत्ति मार्गवाला नहीं है, पूरी ही प्रवृत्ति की निशानी है। इसी प्रकार प्रवृत्तिमार्ग वाले कभी दूर नहीं भागेंगे; लेकिन संगठन मे आते हुए और सम्पर्क में आते हुए मुश्किल को सहज बनाएँगे। यह है आप विशेष आत्माओं का परिचय। (अ.वा. 9.4.73 पृ.20 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
बाप कहते हैं- तुम हमारी कितनी ग्लानि करते हो! सर्वव्यापी कह कितनी बाप की इनसल्ट, डिफेम करते हो। अभी केस कौन चलावे? बाप आकर केस चलाते हैं। (मु. 16.1.69 पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
ईश्वर को सर्वव्यापी कहना यह तो सभी से बड़ा पाप है। भगवान को गाली देते हैं। जज आदि की कोई इज़्जत लेते हैं तो उनको फट से दण्ड दे देते हैं। केस आदि भी नहीं चलाते हैं। भगवान को भी बेइज़्जत करते हैं तो दण्ड मिल जाता है। बड़ा पाप बन जाता है। (मु. 26.11.68 पृ.3 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
जो कुछ भी सुनाते हैं झूठ। ईश्वर सर्वव्यापी कहाँ लिखा हुआ है? मनुष्य नाम लेते हैं गीता का। गीता में तो भगवानुवाच है कि मैं बहुत जन्मों के भी अंत में साधारण तन में प्रवेश करता हूँ। तो फिर सर्वव्यापी हूँ- यह कैसे कहेंगे। (मु. 24.11.67 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
यह तो जानते हो सबका पापों का घड़ा भरा हुआ है। उसमें संन्यासी उदासी सब आ गये। ऐसा कोई कह न सके कि संन्यासी आदि सभी से जास्ती पतित न हैं। संन्यासियों को खुद भी पता नहीं है। वह क्या जाने हम राँग रास्ते पर हैं। पूछो, यह कहाँ सुना है कि ईश्वर सर्वव्यापी है? तो फिर कह देते गीता में है भगवानुवाच्य। (मु. 4.5.75 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
अभी तुम बच्चे जानते हो बाप क्या समझाते हैं और गीता में क्या लिख दिया है। सुनाते क्या हैं। कहते भगवानुवाच, मैं सर्वव्यापी हूँ। बाप कहते हैं, मैं अपन को ऐसे गाली कैसे दूँगा कि मैं सर्वव्यापी हूँ। कुत्ते-बिल्ले सभी में हूँ। मुझे तो ज्ञान सागर कहते हो। मैं अपन को फिर कैसे कहूँगा। कितनी झूठ है। (मु. 13.5.70 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
कहेंगे कि संन्यासियों में तो पवित्रता का गुण है; परन्तु वह तो कह देते कि ईश्वर सर्वव्यापी है। गीता कृष्ण ने गाई है। यह कहना कितनी अपवित्रता है। इससे सभी का बुद्धियोग बेहद के बाप से टूट जाता है। सचखण्ड स्थापन करने वाला कृष्ण नहीं है। कृष्ण तो सच खण्ड में रहने वाला है। सचखण्ड स्थापन करने वाला एक बाप है। उल्टी बात बतलाने से मनुष्य मात्र निर्धन के बन पड़े हैं। (मु. 22.12.82 पृ.2 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
साधु अक्षर बेमाना, उनसे बेहतर मेहतर जो खाते मेहनत का खाना। (मु. 7.1.70 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
इन संन्यासियों आदि को अपना नशा कितना रहता है। वह पहले-2 नज़र रखते हैं साहूकारों में। बाबा पहले-2 नज़र रखते हैं गरीबों पर। गरीब निवाज़ है ना। (मु. 28.6.70 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
हठयोगी निवृत्तिमार्ग वाले संन्यासी कब प्रवृत्तिमार्ग वालों को राजयोग सिखा नहीं सकते। (मु. 20.1.74 पृ.4 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
शंकराचार्य आदि यह सब भक्त हैं ना। उन्हों को कहेंगे पवित्र भक्त। भक्ति कल्ट तो है ना। जो पवित्र रहते हैं, (उन्हों के) बड़े-2 अखाड़े बने हुए हैं। उनका मान कितना है। (मु. 9.11.66 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
संन्यासी एक तरफ पवित्र रह भारत को मदद करते हैं, दूसरी तरफ बाप से बेमुख कर देते हैं। (मु. 20.2.83 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
कलियुगी गुरू लोग कह देते श्री-श्री 108 जगत गुरू। इसके लिए फिर बाबा ने समझाया है जब अपन को परमात्मा समझ अपनी पूजा बैठ कराते हैं तो उनको हिरण्याकश्यप कहते हैं। (मु. 18.8.73 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
जिनको संन्यास धर्म में जाना है वह घर में ठहरेंगे नहीं। उनसे संन्यासी बनने का पुरुषार्थ ज़रूर होगा। (मु. 7.1.87 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
सबसे जास्ती कुंभकरण कौन? जिन कुंभकरणों का मेला लगता है, जो अज्ञान नींद में सोए हुए हैं।(मु. 7.1.87 पृ.1 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
यह मुफ्त में खा-पी खलास कर देते हैं। जैसे मकर टिड्डी आए फसल को खा चले जाते हैं। यह साधु-संत भी मकर हैं।... बाप समझाते हैं कि यह भक्तिमार्ग के अनेक गुरु हैं। (मु. 10.5.68 पृ.2 मध्य रात्रि.) मुरली प्रूफ देखें
दुर्गति कौन करता है? जरूर यह गुरू लोग ही करेंगे। (मु. 24.8.74 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
सबसे जास्ती दुख देने वाला (रावण) कौन है?... बाप कहते हैं इन गुरुओं ने परमात्मा की महिमा गुम कर दी है। (मु. 20.1.98 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
सन्यासियों को वास्तव में इतने पैसे इकट्ठे करने का (लॉ) नहीं। सभी कुछ छोड़ा फिर इतने पैसे क्यों रखते? (मु. 5.1.72 पृ. 3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
इन सन्यासियों ने भी पवित्रता के आधार पर भारत को थमाया ज़रूर है।... यह संन्यास धर्म नहीं होता तो भारत एकदम विकारों में जल मरता, पतित बन जाता। (मु.22.6.91 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
देखो, मुहम्मद गज़नवी ने मंदिर को लूटा था ना। अगर उनको यह मालूम होता कि हमारे बाप का मंदिर है तो लूटेंगे थोड़े ही। (मु. 28.10.72 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
सभी मनुष्य आयरन एजड हैं। पत्थर ही निकालते रहते। झूठ बोलने वाले के लिए कहते इनका मुँह काला है। (मु. 24.3.73 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
भारत कितना सॉलवेन्ट था। हीरे-जवाहिरों के महल थे।... सोमनाथ का मन्दिर था ना। एक मन्दिर तो नहीं होगा। यहाँ भी शिव के मन्दिर, ल.ना. के मंदिर ढेर हैं ना। वहाँ भी राजाएँ मंदिर बनाते हैं, जो साहूकार होते हैं। सोमनाथ के मंदिर में इतने तो हीरे जवाहिर थे जो मुहम्मद गज़नवी ऊँट भरकर ले गए। इतने माल थे। ऊँट तो क्या कोई लाखों ऊँट ले आए तो भी भर न सके। सोने, हीरे-जवाहिरों के तो अनेक महल थे। मुहम्मद गजनवी तो अभी आया। (मु. 21.6.75 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
माथा कौन टेकते हैं? भेड़िया। मुसलमानों की ईद में देखो रंग-बिरंगे कपड़ों वाले माथा नीचे कर नमाज़ पढ़ते हैं। अगर कोई उस समय देखे तो ऐसा लगता है जैसे भेड़ियों का झुण्ड बैठा हो। अगर कोई उनका फोटो देखे तो कोई नहीं कहेगा कि यह मनुष्य हैं। भेड़ियों का झुण्ड दिखाई पड़ता है। (मु. 8.10.65 पृ.6 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
स्वर्ग में हीरों जवाहरों के कितने महल थे। भक्तिमार्ग में भी कितना धन था। जो सोमनाथ का मंदिर बनाया है। एक-2 पत्थर चार लाख कीमत वाले थे। वो सब कहाँ चले गये हैं। कितने लूटकर ले गये। मुसलमानों ने भी जाकर मस्ज़िदों में लगा दिये हैं। इतना अथाह धन था। (मु. 26.2.67 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
लोभ वाला ज़रूर कुछ चोरी करता होगा। यह तो शिवबाबा का भण्डारा है। इससे तो पाई की भी चोरी नहीं करनी चाहिए। यह ब्रह्मा तो ट्रस्टी है। बेहद का बाप भगवान तुम्हारे पास आया है। भगवान के घर में कभी कोई चोरी करता होगा? स्वप्न में भी नही। (मु. 9.7.68 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
लोभ रखना चाहिए- बेहद के बाप से वर्सा लेने का और कोई चीज़ का लोभ नहीं। नहीं तो सारा बुद्धियोग उसमें चला जाता है। (मु. 27.10.82. पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
दुश्मन आते हैं क्यों? धन के पिछाड़ी। भारत में इतने सब अंग्रेज़, मुसलमान क्यों आये? पैसा देखा। पैसे बहुत थे। अब पैसे नहीं हैं। तो और कोई है नहीं। पैसे ले खाली कर गये। (मु. 1.8.84 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
मुसलमानों को 300/400 वर्ष हुआ होगा। इनके पहले नहीं कहेंगे कि घोर-अंधियारा था। कोई खिटपिट न थी। (मु. 26.3.73. पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
सत्य तो एक बाप है, जो ही सच्ची कथा सुनाए हमको विजय पहनाते हैं। यह है सब बातें। बच्चे अच्छी रीति समझते हैं तो मास्टर नॉलेजफुल बनते जाते हैं। कबसे नॉलेज सुनना शुरू किया है, इतनी सब मुरलियों के कागज़ रखें तो यह सारा महल भर जावे। कितने कागज़ खपाय होंगे और खपावेंगे। बच्चों पास ज़रूर जावेंगे। लित्थो होते रहेंगे। बहुत कॉपियाँ निकलेंगे। झाड़ वृद्धि को पाता रहता है। (मु. 22.6.64 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
मुसलमानों का मज़हबी पागलपना यह पुराना है। (मु. 13.5.72 पृ.3 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
मुसलमानों के बहुत हैं। अमेरिका (अफ्रीका) में कितने साहकूार हैं। सोने हीरों की खानियाँ हैं। जहाँ बहुत धन देखते हैं तो उस पर चढ़ाई कर धनवान बनते हैं। क्रिश्चियन लोग भी कितने धनवान बनते। भारत में भी धन है; परंतु गुप्त। (मु.27.8.69 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
पहले-2 है देवी-देवता धर्म, सेकेंड नम्बर में फिर है सिक्ख धर्म। इसलिए सिक्ख धर्म बहुत नया है; क्योंकि ब्रदर्स-सिस्टर्स हैं। (मु. 10.8.73 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
प्रवृत्तिमार्ग दूसरे नम्बर में गुरू नानक का चला है। पंजाब में महाराजा-महारानी भी हुए हैं। (मु. 9.8.73 पृ.1 अंत रात्रि.) मुरली प्रूफ देखें
गुरुनानक 500 वर्ष पहले आया। ऐसे तो नहीं सिक्ख लोग कोई 84 जन्म का पार्ट बजाते हैं। बाप कहते हैं 84 जन्म सिर्फ तुम ऑलराउण्डर ब्राह्मणों के हैं।... सिक्ख लोगों के कितने जन्म होते होंगे? एवरेज आयु 50 वर्ष लो तो 10/12 जन्म लेते होंगे। अर्थात गुरुनानक के भी 10 जन्म होंगे। कृष्ण के लिए कहेंगे 84 जन्म, गुरुनानक के लिए कहेगें 10 जन्म... यह बुद्धि का काम है ना। (मु. 30.12.88. पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
गुरुनानक ने भी भगवान की महिमा गाई है कि वह आकर मूत-पलीति कपड धोते हैं। जिसकी ही महिमा है एकोअंकार... शिवलिंग के बदले अकाल त़ख्त निशान रख दिया है। (मु. 12.3.76. पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
तुम सिक्ख लोगों को भी समझा सकते हो। ग्रंथ में तो पूरा वर्णन है। और कोई शास्त्र में इतना वर्णन नहीं है जितना ग्रंथ जप साहेब, सुखमणी में है। अक्षर ही दो हैं। बाप कहते हैं साहेब को याद करो तो तुमको 21 जन्मों लिए सुख मिलेगा। इसमें मूँझने की कोई बात नहीं। बाप सहज करके समझाते हैं। कितने हिन्दू ट्रान्सफर हो जाकर सिक्ख बने हैं। (मु. 15.12.67 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
काँग्रेस को कोई कौरव कहा तो ये कोई इनसल्ट नहीं है। वो अर्थ को समझते ही नहीं हैं और यहाँ तो राइट अक्षर दिया जाता है ना।... कौरव का अर्थ ही है काँग्रेस। ये पंचायती राज्य को ही तो काँग्रेस कहा जाता है ना। तो कुरू जो थे वो पंचायती राज्य थे। (मु.7.9.65 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
आर्य समाजी लोग देवताओं के चित्रों को नहीं मानते हैं। तुम्हारे पास चित्र देखते हैं तब ही बिगड़ते हैं। (मु. 5.11.71 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
अपने धर्म में रहना चाहिए। पर-धर्म दुख देने वाला है। (मु. 16.2.73 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
कहा जाता है रिलीजन इज़ माइट। आत्मा के स्वधर्म में टिकना है। इससे ही ताकत मिलती है। (मु. 19.2.68 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
यह कौरव गवर्मेन्ट प्रजा का ‘अंधेरी नगरी, चौपट राजा, टके सेर भाजी, टके सेर खाजा’- यह बात हो जाती है। (मु. 26.9.63 पृ.6 अंत) मुरली प्रूफ देखें
प्रजा का प्रजा पर राज्य है बेकायदे। (मु. 4.2.67 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
गवर्मेन्ट भी धर्म को नहीं मानती। अपने धर्म को भूल गये हैं। उनका नाम ही है, कौरव गवर्मेन्ट इरीलिजीयस, अनराइटियस। अनराइटियस है तो अनलॉफुल भी है। अनलॉफुल है तो इनसॉलवेन्ट है। (मु. 16.7.73 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
गाँधी का नाम ज़रूर लेना; क्योंकि गाँधी को तो अवतार मानते हैं ना। बहुत अवतार मानते हैं। भला अवतार क्यों मानते हैं? अवतार तो सबको मानते हैं। जो-2 धर्म की स्थापना करते हैं, उनको यह लोग अवतार मानते हैं। क्राइस्ट को किसका अवतार मानेंगे? क्रिश्चियन धर्म का। बौद्ध(बुद्ध) को किसका अवतार मानेंगे?... बुद्ध (बौद्ध धर्म) स्थापन करने। यह भी अवतार मानते हैं। पर क्या अवतार मानते हैं? क्या किया? इन्होंने आ करके कौरव राज्य स्थापन किया यानी प्रजा का प्रजा पर राज्य स्थापन किया। होना चाहिए न। नहीं तो कौरव-पांडव आए कहाँ से? (मु. 26.9.63 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
काँग्रेसियों ने फिरंगियों को निकाला तो राजाओं से भी राजाई छीन ली। राजा नाम ही गुम कर दिया है। (मु. 11.1.73 पृ.2 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
महाराजा का टाइटल तो गया, फिर भी चाहे तो कांग्रेस (गवर्मेंट) को लाख-दो (प्रजा) देवे तो टाइटल कायम हो सकता है। (मु.12.6.74 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
बाप की भी निंदा कराने वाले, लून-पानी होने वाले ठौर न पाएँ। वह आसुरी बन जाते हैं। उनको नास्तिक भी कहा जाए। आस्तिक होने से कब लड़ न सके। न लड़ना यहाँ ही सीखना है। जो फिर 21 जन्म आपस में प्रेम रहेगा। (मु. 31.7.68 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
बाकी कोई से आँख लगाना, बाइसकोप देखना यह सब व्यर्थ टाइम गँवाना है। बाप कहते हैं अशरीरी बन मुझे याद करो। अगर बाप का फरमान नहीं मानते तो गोया नास्तिक ठहरे। (मु. 4.11.69 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
रिज़ल्ट आऊट बापदादा मुख द्वारा नहीं करेंगे या कोई कागज़ व बोर्ड पर नम्बर नहीं लिखेंगे; लेकिन रिज़ल्ट आऊट कैसे होगी? आप स्वयं ही स्वयं को अपनी योग्यताओं के प्रमाण अपने2 निश्चित नंबर के योग्य समझेंगे और सिद्ध करेंगे। ऑटोमेटिकली उनके मुख से स्वयं के प्रति फाइनल रिज़ल्ट के नम्बर न सोचते हुए भी, उनके मुख से सुनाई देंगे और चलन से दिखाई देंगे। (अ.वाणी 27.5.74 पृ.56 अंत) मुरली प्रूफ देखें
पार्ट बजाना ही अपना पार्ट वा अपना नम्बर प्रत्यक्ष करना है। बापदादा ऐसे नम्बर नहीं देंगे; लेकिन पार्ट ही प्रत्यक्ष कर रहा है। (अ.वाणी 30.7.83 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
अधर्मी जो होते हैं वो अनराइटियस काम ही करते हैं। (मु. 16.7.65 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
यज्ञ कुंड से स्थापना के साथ-2 विनाश ज्वाला भी प्रज्वलित हुई। तो विनाश ज्वाला को प्रज्वलित करने वाले कौन? बाबा ने बताया- ब्रह्मा, बाप और ब्राह्मण बच्चे। (अ.वा. 3.2.74 पृ.13 अंत) मुरली प्रूफ देखें
रावण जब (सत्ता में) आते हैं तो पहले-2 घर (भारत) में से लड़ाई शुरू होती है। जुदा-2 हो जाते हैं।आपस में ही लड़ मरते हैं। अपना-2 प्राविंस (ज़ोन) अलग कर देते हैं। (मु. 8.8.70 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
बाप ने समझाया है कि दोनों का जन्म, परमपिता-परमात्मा जिसको राम भी कहते हैं और फिर जो दुश्मन है जो फिर तुम्हारे से जीत पहन लेते हैं, राज्य छीन लेते हैं, वो रावण का भी जन्म यहीं है। (मु. 6.1.66 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
झगड़ा होता ही है विकार पर। (मु. 6.8.76 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
शास्त्रों में तो पांडवों के लिए भी दिखाया है कि पहाड़ों पर गये तो साथ में कुत्ता भी ले गये। फिर वहाँ ही गल मरे। कुत्ते की महिमा सुनकर यहाँ बहुत मनुष्य कुत्ता भी पालते हैं। उनसे इतना तो प्यार करते हैं कि बात मत पूछो।... बाप को पता पड़ता है कि इसने खराब काम किया है तो कहते हैं ना कि तुम तो कामी कुत्ते हो। कुत्ते को लज्जा शर्म नहीं होता है। (मु. 10.10.69 पृ.4 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
बच्ची खेल तो सिर्फ 10/15 मिनट का ही था।... कुछ समय बाद कर्मभोग (दर्द) तो बिल्कुल निर्बल हो गया। बिल्कुल दर्द गुम हो गया। (अ.सं. 18.1.69 पृ.8 अंत) मुरली प्रूफ देखें
किस समय स्नेहमूर्त, किस समय शक्ति रूप बनना है, यह भी सोचना है। इन सभी बातों मे शक्तिरूप की आवश्यकता है।... स्नेह बापदादा और दैवी परिवार से करना है। बाकी सभी से शक्तिरूप से सामना करना है। (अ.वा. 18.5.69 पृ.63 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
मम्मा-बाबा को भी ड्रिल सिखलाते थे। डायरैक्शन देती थीं ऐसे-2 करो। टीचर हो बैठती थीं। हम समझते थे यह तो बहुत अच्छा नं. माला में आवेंगी। वो भी गुम हो गये। यह सब समझना पड़े ना। हिस्ट्री तो बहुत बड़ी है। (मु. 28.5.74 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
10 वर्ष (साथ में) रहने वाले ध्यान में जाय मम्मा-बाबा को ड्रिल कराते थे। हेड होकर बैठते थे। उनमें बाबा प्रवेश कर डायरैक्शन देते थे। (मु. 27.7.67 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
भारत माता शिव शक्ति अवतार अंत का यही नारा है। (अ.वा. 21.1.69 पृ.24 आदि) मुरली प्रूफ देखें
बच्चे जानते हैं यह राजधानी स्थापन हो रही है और जो धर्म स्थापन करते हैं उन्हों की पहले राजाई नहीं चलती है। राजाई तो तब हो जब 50/60 लाख हों, तब लश्कर बने। शुरू में तो आते ही हैं एक/दो। फिर वृद्धि को पाते हैं। तुम जानते हो क्राइस्ट भी कोई वेश में आवेंगे बेगर रूप में। पहला नम्बर वाला ज़रूर फिर लास्ट नम्बर में होगा। (मु. 3.12.68 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
और कोई धर्म में शुरू से राजाई नहीं चलती है। वह तो धर्म स्थापन करते हैं। फिर जब लाखों की अन्दाज में हो तब राजाई कर सकें। यहाँ तो बाप राजाई स्थापन कर रहे हैं। (मु. 24.8.75 पृ.2 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
अनपढ़े पढ़े आगे भरी ढोवेंगे। नौकर-चाकर जाकर बनेंगे। जो ब्राह्मण नहीं बनते हैं तो वह प्रजा में पाई पैसे का पद पा लेंगे... और कोई धर्म स्थापन करने वाला राजाई स्थापन नहीं करते। बेहद का बाप ही है जो भविष्य सतयुग के लिए राजधानी स्थापन करते हैं। (मु. 6.11.72 पृ.3 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
और धर्म स्थापक कोई राजाई नहीं स्थापन करते हैं। उनको तो गुरू भी न कहना चाहिए। वह सद्गति नहीं देते। आते हैं, सिर्फ अपना धर्म स्थापन करने। वह भी जब तमोप्रधान बन जाते हैं तो फिर बाप को आना पड़ता है तमोप्रधान से सतोप्रधान बनाने। (मु. 24.1.70 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
धर्म स्थापन किया। बस। जो शिक्षा दी उसके फिर शास्त्र बने। जो धर्म स्थापन करते हैं उनको फिर पालना ज़रूर करनी है। वापिस कोई जाता नहीं। सभी इस समय कब्रदाखिल हैं। पहले नम्बर में लक्ष्मी-नारायण को देखो वह भी अब कब्रदाखिल हैं। प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण रचते हैं, फिर यह जाकर राधे-कृष्ण बनेंगे। जब तक शिवबाबा न आये तब तक कोई पावन बन न सके। बलिहारी उस एक की है। उनकी ही महिमा है। (मु. 17.2.72 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
और धर्म स्थापक और बाप की धर्म स्थापना में रात-दिन का फर्क है। (मु.18.11.70 पृ.3 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
ऊँच-ते-ऊँच बाप को ज़रूर ऊँच-ते-ऊँच में ही प्रवेश करना चाहिए। (मु. 11.2.69 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
अन्दर की प्यार की और बाहर की प्यार की बाबा पास बहुत युक्ति है। (मु.29.3.68 पृ.4 अंत) मुरली प्रूफ देखें
बाबा ने समझाया है धर्म स्थापन करने अर्थ ऊपर से जो आत्माएँ आती हैं वो ज़रूर सतोप्रधान, श्रेष्ठाचारी होंगी। भल माया का राज्य है; परन्तु पहले आने वाले ज़रूर सतोप्रधान होंगे, तब तो उनकी महिमा होती है। फिर सतो-रजो-तमो में आते हैं। (मु. 9.8.64 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
सतोप्रधान आत्मा को सज़ा अथवा दुख कैसे मिल सकता है? (मु. 22.8.69 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
हाँ, धर्म स्थापक दूसरे के शरीर में आ सकते हैं। फिर उनका नाम होता है। पवित्र आत्मा आकर प्रवेश करेगी। जो है वह धर्म स्थापन नहीं करेगी। जो आत्मा प्रवेश करेगी वह स्थापना करेगी। सितम आदि पहली-2 आत्मा सहन करती है। (मु. 11.12.77 पृ.2 आदि, 9.12.87 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
जो भी 500 करोड़ आत्माएँ हैं वह सभी को सद्गति देने आया हूँ। ड्रामा अनुसार सभी नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार अपने-2 सेक्शन में चले जाते हैं। (मु. 4.4.68 पृ.4 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
शास्त्रों (में) फिर लिख दिया है श्राप दिया तो पत्थर बन गया। (मु. 21.3.68 पृ.4 आदि, 22.3.74 पृ.4 आदि) मुरली प्रूफ देखें
कोई वेश्या है, भल जन्म अच्छे घर में ले फिर भी संस्कार अनुसार वह वेश्या तरफ ही चली जावेगी।... बड़े-2 आदमियों की गुप्त रहती है। ज्ञान में आने से भी तो संस्कार बदलते नहीं तो समझते हैं कि यह शायद वैश्या होगी। (मु.14.5.73 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
वेश्याएँ भी पुरुषार्थ कर माला का दाना भी बन सकती हैं। (मु. 31.1.74 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
यूरोपवासी यादव, भारतवासी कौरव और पाण्डव। वह सभी एक तरफ हैं, इस तरफ दो भाई-2 हैं।... कौरव और पाण्डव एक ही घर के थे। (मु. 22.10.71 पृ.2 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
यादव हैं मूसल इन्वेंट करने वाले और कौरव-पाण्डव भाई-2 थे। वह आसुरी भाई, यह दैवी भाई। यह भी आसुरी थे। उन्हों को बाप ने ऊँच बनाकर दैवी भाई बनाया है। (मु. 2.11.78 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
समझाना चाहिए तीन सेनाएँ तो बरोबर खड़ी हैं। विनाश काले विपरीत बुद्धि तो खलास हुये थे। कौरवों और यादवों की है विनाश काले विपरीत बुद्धि। बाकी जिनकी प्रीत थी भगवान के साथ वह स्वर्ग के मालिक बन गये। (मु. 27.7.73 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
पाण्डव उनको कहा जाता है जो बाप को जानते हैं, बाप से प्रीत बुद्धि हैं। कौरव उनको कहा जाता है जो बाप से विपरीत बुद्धि हैं। (मु. 25.12.68 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
पाण्डवों का गायन है! सेवा करने में बहुत मज़बूत रहे हैं; इसलिए वह मज़बूत शरीर दिखाते हैं; लेकिन हैं मज़बूत दिल वाले, मज़बूत मन वाले। वह मन व दिल कैसे दिखाएँ? इसलिए शरीर (बड़ा-2) दिखा दिया है। (अ.वा. 21.10.87 पृ.99 अंत, 100 आदि) मुरली प्रूफ देखें
(ज्ञान) चन्द्रमा का गुण है शीतल (ज्ञान) प्रकाश देना। (अ.वा. 15.9.69 पृ.105 अंत) मुरली प्रूफ देखें
ब्रह्मा का पार्ट स्थापना के कार्य में अंत तक नूँधा हुआ है। (अ.वा. 30.6.74 पृ.83 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
(धर्म) युद्ध सिखाने वाले का नाम युधिष्ठिर रख दिया है। (मु. 26.7.71 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
मैंने तुमको इस युद्ध के मैदान में खड़ा किया है, 5 विकारों से लड़ने लिए। (मु. 21.9.68 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
यह है युधिष्ठिर की औलाद; क्योंकि युद्ध के मैदान में आकर खड़ा करते हैं। अंधे (देहधारियों के भगत) जब आकर सुजाक बने तब युधिष्ठिर के बच्चे बने।(मु. 12.1.74 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
“शंकर समान ज्वाला-रूप बनकर”(अ.वा. 3.2.74 पृ.13 अंत) मुरली प्रूफ देखें
‘ज्वाला देवी’(अ.वा.15.9.74 पृ.135 अंत) मुरली प्रूफ देखें
आधा में जाम आधा में रैयत। (मु.21.3.68 पृ.4 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
लोगों को परखना और शक्तियों की रखवाली करना पाण्डवों का मुख्य कर्तव्य है। (अ.वा. 19.6.69 पृ.75 अंत) मुरली प्रूफ देखें
पाण्डवों के चित्र कितने बड़े-बड़े बनाये हैं। इसका मतलब वह बड़े ही विशाल बुद्धि थे। बुद्धि बड़ी थी। उन्होंने फिर शरीर (और पेट) को बड़ा दिखा दिया है। (मु. 12.2.74 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
शरीर भल कैसा भी हो आत्मा प्रबल होनी चाहिए। (अ.वा. 5.12.89 पृ.61 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
किसी से घबराएँगे नहीं; परंतु उनके सामने आने वाले घबराएँगे। (अ.वा.13.3.71 पृ.47 अंत) मुरली प्रूफ देखें
भील बाहर रहने वाला अर्जुन से भी तीखा गया। (मु. 4.1.74 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
शेर सभी से तीखा होता है। (काँटों के) जंगल में शेर अकेला रहता है। (देहाभिमानी) हाथी झुंड में रहते हैं, नहीं तो कोई भी मार दे। शक्तियों की भी शेर पर सवारी होती है। (मु. 4.3.73 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
बाप भी है गुप्त। नॉलेज भी गुप्त। तुम्हारा पुरुषार्थ भी है गुप्त।(मु. 13.9.68 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
पांडव थे गुप्त।(मु. 20.5.73 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
तुम्हारी जैसी विशाल बुद्धि और किसी की हो न सके। (मु. 12.2.74 पृ.3 अदि, मु. 10.3.69 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
जापान में वह (बौद्धी) लोग अपन को सूर्यवंशी कहलाते हैं। (मु. 28.1.75 पृ.1 अंत, 29.1.70 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
ज्ञान सूर्य के उदय होने पर सब कुछ स्पष्ट हो जावेगा। (अ.वा. 22.1.70 पृ.170 आदि) मुरली प्रूफ देखें
न कुल का होगा तो समझेगा नहीं। हाँ, अंत में कहेंगे यह तो ठीक कहते थे। (मु. 25.4.73 पृ.4 आदि) मुरली प्रूफ देखें
सिक्खों की ही डिनायस्टी प्रवृत्ति मार्ग की होती है। और सब हैं निवृत्ति मार्ग वाले।... स्थापना कर फिर बादशाही ली है। (मु. 9.10.73 पृ.4 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
प्रवृत्तिमार्ग दूसरे नं. में गुरुनानक का चला है। पंजाब में महाराजा-महारानी भी हुए हैं। (मु.रात्रि 9.8.73 पृ.1 अंत) मुरली प्रूफ देखें
रावण का कोई चित्र थोड़े ही होता है। रावण का अर्थ ही है ये 5 विकार। (मु. 29.12.63 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
मनुष्यों से पूछो- आखिर रावण है कौन? कब से इनका जन्म हुआ? कब से जलाते हो? कहेंगे अनादि है। (मु. 13.4.84 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
कोई भी विद्वान, शंकराचार्य आदि से पूछो रावण कौन है? कह देंगे यह तो कल्पना है। जानते ही नहीं तो और क्या रिस्पॉण्ड देंगे! (मु. 20.2.70 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
रावण के 10 सिर वाली आत्माएँ हर छोटी-सी परिस्थिति में भी कभी सहयोगी नहीं बनेंगी। क्यों, क्या, कैसे के सिर द्वारा अपना उल्टा अभिमान प्रत्यक्ष करती रहेंगी।... बार-2 कहेंगे यह बात तो ठीक है; लेकिन यह क्यों, वह क्यों? इसको कहा जाता है कि एक बात के 10 शीश लगाने वाली शक्ति। सहयोगी कभी नहीं बनेंगे, सदा हर बात में अपोज़िशन करेंगे। तो अपोज़िशन करने वाले रावण सम्प्रदाय हो गए ना। (अ.वा. 3.4.82 पृ.339 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
जैसे साकार बाप को सदा निश्चय और नशा रहा कि मैं भविष्य में विश्व-महाराजन बना कि बना। ऐसे विश्वकिशोर को भी यह नशा रहा कि मैं पहले विश्व महाराजन का पहला प्रिन्स हूँ। यह नशा वर्तमान और भविष्य का अटल रहा। तो समानता हो गई ना। जो साथ में रहे उन्होंने ऐसा देखा ना। (अ.वा. 18.1.86 पृ.166 अंत) मुरली प्रूफ देखें
इन सभी सितारों में जास्ती खातिरी होती है कुमारका की। (मु.रात्रि 25.9.64, 19.8.73 पृ.4 आदि) मुरली प्रूफ देखें
भ्रष्टाचारी भ्रष्टाचारियों का ही मान रखते हैं। बाप कहते हैं जिनका बहुत मान है वह बड़े-ते-बड़ा भ्रष्टाचारी समझो। (मु.8.4.72 पृ.2 मध्यादि) मुरली प्रूफ देखें
यह पढ़ाई है। इसमें जो जितना पुरुषार्थ करेंगे उतना ऊँच पद पावेंगे। यह कोई साधु-संत आदि नहीं, जिसकी गद्दी चली आई है। यह तो शिवबाबा की गद्दी है। ऐसे नहीं कि यह जावेगा तो दूसरा कोई गद्दी पर बैठेगा। (मु. 20.5.70 पृ.3 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
बाकी आज से सभी के लिए कौन निमित्त है, वह तो आप जानते ही हैं। (मनमोहिनी) दीदी तो हैं, साथ में कुमारका मददगार है। (अ.वा.21.1.69 पृ.21अंत, 22 आदि) मुरली प्रूफ देखें
शुरू में थोड़े ही इतने चित्रों आदि के छपाई का काम था। यह क्रिश्चियन लोग जब आए हैं तब से यह शुरू हुए हैं। (मु. 27.8.68 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
पैसा कमाने के लिए कुछ तो चाहिए न। फिर किस्म-2 के चित्र बैठ बनाए हैं। (मु.18.8.73 पृ.2 मध्यांत, 8.8.93 पृ02 अंत) मुरली प्रूफ देखें
चित्र आदि जो भी बनाये हैं बेसमझी के। (मु.13.3.71 पृ.2 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
आसुरी मत पर अनेक ढेर के ढेर चित्र बने हैं। (मु. 5.5.68 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
प्रदर्शनी की राय बाबा ने थोड़े ही निकाली। यह रमेश बच्चे का इन्वेंशन है।... फिर बाबा भी पास करेंगे। (मु. 13.6.72 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
आप लोगों ने ही प्रकृति को सेवा दी है कि खूब सफाई करो। उसको लंबा-2 झाड़ू दिया है, सफा करो। ... गोल्डन एज में यह सफाई चाहिए ना। तो प्रकृति अच्छी सफाई करेगी। (अ.वा. 13.2.99 पृ.55 मध्य, 56 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
कमल के फूल को बाल-बच्चे बहुत होते हैं और मिसाल भी उनका ही दिया जाता है। बाप को भी बाल-बच्चे तो बहुत हैं। कमल का फूल खुद पानी के ऊपर रहता है। बाकी बाल-बच्चे नीचे रहते हैं। यह मिसाल अच्छा है। (मु. 28.12.83. पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
इस मायावी वैतारणी नदी में रहते कमल फूल समान पवित्र बनना है। कमल फूल बहुत बाल-बच्चों वाला होता है। फिर भी पानी से ऊपर रहता है। वह गृहस्थ है। बहुत चीज़ें पैदा करती है। यह दृष्टान्त तुम्हारे लिए (प्रजापिता ब्रह्मा के लिए) भी है। विकारों से न्यारा होकर रहो। (मु. 31.1.70 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
कमल पुष्प निवृत्तिमार्ग वाला नहीं है पूरी ही प्रवृत्ति की निशानी है। (अ.वा. 9.04.73.अ.वा. पृ.21 आदि) मुरली प्रूफ देखें
लड़ाई से कभी सृष्टि की बादशाही मिल न सके। यह वण्डर है ना। इस समय सब आपस में लड़कर खलास हो जाते हैं। मक्खन भारत को मिलता है। दिलाने वाली है वन्देमातरम्। मैज़ॉरिटी माताओं की है। (मु. 31.12.88 पृ 3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
रशिया और अमेरिका (अहंकारी और क्रोधी रूपी) दो भाई हैं। इन दोनों के ही कॉम्पीटीशन है बॉम्ब्स आदि बनाने की।... कहानी भी दिखाते हैं दो बिल्ले आपस में लड़े, मक्खन बीच में तीसरा खा गया। (मु. 22.10.68 पृ.2 आदि, 23.10.74 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
योगबल से होती है स्थापना, बाहुबल से होता है विनाश। (मु. 11.2.68 पृ.2 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
इनमें रशिया का इनके साथ गिट-2 (खिट-2) है; क्योंकि फ्रांस, इग्लैण्ड और अमेरिका ये फिर भी आपस में मिल जाएँगे। रशिया अलग है। (मु.रात्रि 6.9.65 पृ.1 आदि) मुरली प्रूफ देखें
इस समय बाहुबल भी है, योगबल भी है।... यह तो दो क्रिश्चियन आपस में मिलें तो विश्व के मालिक बन सकते हैं। इतनी ताकत इन्हों में है; परंतु लॉ नहीं है। (मु. 13.11.72 पृ.2 अंत) मुरली प्रूफ देखें
बाप कहते हैं अभी मैं तुम बच्चों के पास आया हूँ। नयनों पर बिठाय ले जाता हूँ। यह नयन नहीं, तीसरा नेत्र।... तुम जानते हो इस समय बाप आये हैं- करोड़ों को साथ ले जावेंगे। शंकर की बारात नहीं, शिव के बच्चों की बरात है। वह पतियों का पति भी है। (मु. 14.9.67 पृ.2 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
1. त्रेता के अंत तक 16,108 की बड़ी माला बनती है। (मु. 23.5.70 पृ.2 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
माला तैयार होना अर्थात् खेल खत्म। (अ.वा.18.1.79 पृ.230 अंत) मुरली प्रूफ देखें
2. त्रेता अंत तक इतने प्रिन्स-प्रिन्सेज बनते हैं कुछ तो निशानी है ना। आठ की भी निशानी है, 108 की भी निशानी है।... फिर वृद्धि होती जाती है। वह सब बनते यहाँ हैं। चान्स अभी बहुत अच्छा है; परन्तु मेहनत बहुत है। (मु. 25.5.71 पृ.2 मध्यांत) मुरली प्रूफ देखें
सिर्फ 2 नंबर आउट हुए हैं, बाप और माँ। अभी कोई भी भाई-बहन का तीसरा नंबर आउट नहीं हुआ है। (अ.वा.31.10.06 पृ.3 आदि) मुरली प्रूफ देखें
सीट कोई फिक्स नहीं हुई है। सिवाय ब्रह्मा बाप और जगदम्बा के और सब सीट खाली हैं। (अ.वा.25.11.95 पृ.40 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
जो जिस धर्म के है वह अपने धर्म स्थापक को याद करते है। (मु. 20.4.71 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
वास्तव में भारत का प्राचीन धर्म तो है आदि सनातन देवी-देवता धर्म। हिन्दू तो धर्म ही नहीं। सब से ऊँच है देवी-देवता धर्म। अब कायदा कहता है सबसे ऊँच-ते-ऊँच धर्म वाले को (विश्व की बादशाही की) गद्दी पर बिठाना चाहिए। (मु. 24.12.78 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
अब देवता धर्म की स्थापना कर रहे हो। तुम ही बता सकते हो- भारत का जो मुख्य धर्म है जो सब धर्मों का माई बाप है- उनके हेड को इस कॉनफ्रेन्स में मुख्य बनाना चाहिए। गद्दी नशीन उनको करना चाहिए। बाकी तो सब हैं उनके नीचे। (मु. 24.12.78 पृ.1 मध्य) मुरली प्रूफ देखें
बाप कहते हैं मैं आकर धर्म की स्थापना अधर्मों का विनाश करता हूँ। अधर्मियों को धर्म में ले आता हूँ। बाकी जो बचते हैं वह विनाश हो जावेंगे। (मु. 6.9.68 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
यह भारत भगवान की जन्मभूमि है। जैसे इब्राहीम, बौद्ध (बुद्ध) आदि की अपनी-2 जन्मभूमि (अर्थात् प्रगट होने का स्थान) है। (मु. 16.9.73 पृ.3 अंत) मुरली प्रूफ देखें
धर्म शास्त्र उनको कहा जाता जब धर्म स्थापक ने जो समझाया उनका शास्त्र बनाया। धर्म स्थापन करने वाले के नाम पर शास्त्र बना। (मु. 24.6.65 पृ.2 आदि) मुरली प्रूफ देखें
संन्यासियों का कोई शास्त्र है नहीं। धर्म का शास्त्र एक होता है। देवी देवता धर्म का शास्त्र गीता है। बाप ने जिस नॉलेज से धर्म स्थापन किया, उसको धर्म का शास्त्र कहा जाता है। (मु. 16.7.73 पृ.3 मध्य) मुरली प्रूफ देखें